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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 266 of 918

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Page 266

१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

मुहूर्तः पूर्वापरभागौ दिवसो रात्रिः पक्षो मास ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति कालः ।
(१) निमेषचतुर्भागस्तुटः ।
(२) द्वौ त्रुटौ लवः ।
(३) द्वौ लवौ निमेषः ।
(४) पञ्च निमेषाः काष्ठाः ।
(५) त्रिंशत् काष्ठाः कला ।
(६) चत्वारिंशत् कला नाडिका ।
(७) सुवर्णमाषकाश्चत्वारश्चतुरंगुलायामाः कुम्भच्छिद्रकाढकमम्भसो वा नालिका ।
(८) द्विनालिको मुहूर्तः । पञ्चदशमुहूर्तो दिवसो रात्रिश्च चैत्रे मास्याश्वयुजे च मासि भवतः । ततः परं त्रिभिर्मुहूर्तैरन्यतरः षण्मासं वर्धते ह्सते चेति ।
(९) छायायामष्टपौरुष्यामष्टादशभागच्छेदः, षट्पौरुष्यां चतुर्दश-


काष्ठा, कला, नालिका, मुहूर्त, पूर्वाह्ण, अपराह्न, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग, काल के ये सत्रह विभाग हैं ।

( १ ) निमेष = पलक मारने तक का समय, त्रुटि = निमेष का चौथा हिस्सा
( २ ) २ त्रुटि = १ लव
( ३ ) २ लव = १ निमेष
( ४ ) ५ निमेष = १ काष्ठा
( ५ ) ३० काष्ठा = १ कला
( ६ ) ४० कला = १ नालिका
( ७ ) अथवा एक घड़े में चार सुवर्णमाषक के बराबर चौड़ा और चार अंगुल लम्बा छेद बनाकर इतने ही परिमाण की एक नली घड़े में लगा दी जाय, उस घड़े में एक आढ़क जल भर दिया जाय । वह जल उस नली के द्वारा जितने समय में बाहर निकले, उतने समय को नलिका कहते हैं ।
२ नालिका = १ मुहूर्त
१५ मुहूर्त = १ दिन या १ रात

( ८ ) इस मान के दिन और रात केवल चैत तथा आश्विन मास में होते हैं । इसके बाद छह-मास तक दिन बढ़ता और रात्रि घटती है, दूसरे छह महीने तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता रहता है ।

( ९ ) जब धूपघड़ी की छाया ९६ अङ्गुल लम्बी हो तो दिन का अठारहवां भाग समाप्त हुआ समझना चाहिए, ७२ अङ्गुल छाया रहने पर दिन का चौदहवां भाग,