कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
Page 259 of 918
Read in contextप्र० ३५ : अ० १६ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७५
(१) अर्धमाषकः, माषकः, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ माषकाः, सुवर्णो, द्वौ, चत्वारः, अष्टौ सुवर्णाः, दश, विंशतिः, चत्वारिंशत्, शतमिति ।
(२) तेन धरणानि व्याख्यातानि ।
(३) प्रतिमानान्वयोमयानि मागधमेकलशैलमयानि, यानि वा नोदक-प्रदेहाभ्यां वृद्धिं गच्छेयुरुष्णेन वा ह्रासम् ।
(४) षडङ्गुलादूर्ध्वमष्टाङ्गुलोत्तराः दश तुलाः कारयेल्लोहपलादूर्ध्व-कपलोत्तराः । यन्त्रमुभयतः शिक्यं वा ।
(५) पञ्चविंशत्पललोहां द्विसप्तत्यङ्गुलायामां समवृत्तां कारयेत् । तस्याः पञ्चपलिकं मण्डलं बद्ध्वा समकरणं कारयेत् । ततः कर्षोत्तरं पलं, पलोत्तरं दशपलं, द्वादश पञ्चदश विंशतिरिति पदानि कारयेत् । तत आ शताद् दशोत्तरं कारयेत् । अक्षेषु नद्ध्त्रीपिनद्धं कारयेत् ।
( १ ) तोलने के बाटों ( प्रतिमानों ) का निर्माण इस क्रम से होना चाहिए : आधा माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक, सुवर्ण, दो सुवर्ण, चार सुवर्ण, आठ सुवर्ण, दस सुवर्ण, बीस सुवर्ण, तीस सुवर्ण, चालीस सुवर्ण, सौ सुवर्ण, सोना तोलने के लिए ये १४ बाट होने चाहिए ।
( २ ) इसी क्रम से चांदी तोलने के लिए धरण एवं रूप्यमाषक बाटों का भी निर्माण करवाना चाहिए; अर्थात् धरण, दो धरण, चार धरण, आठ धरण, दस धरण, बीस धरण, तीस धरण, चालीस धरण और सौ धरण; एवं अर्ध माषक, माषक, दो माषक, चार माषक, आठ माषक; आदि १४ बाटों का क्रम है ।
( ३ ) तौलने के बाट लोहे के बनने चाहिए या मगध तथा मेकल देश के पत्थर के होने चाहिए; या ऐसी-वस्तुओं के बनने चाहिए, जो पानी पड़ने तथा लेप लगने से वजनी न हो जांय और गर्मी के प्रभाव से हलके न पड़ जांय ।
( ४ ) सोना-चांदी तोलने के लिये छोटी-बड़ी दस तुलाऐं बनवानी चाहिए, जिनका क्रम इस प्रकार है १. छह अंगुल की, २. चौदह अंगुल की, ३. बाईस अंगुल की, ४. तीस अंगुल की ५. अड़तीस अंगुल की, ६. छियालीस अंगुल की, ७. चौवन अंगुल की, ८. बासठ अंगुल की, ६. सत्तर अंगुल की और १०. अठहत्तर अंगुल की; उनका वजन क्रमशः एक पल से १० पल तक होना चाहिए; उनके दोनों ओर पलड़े ( शिक्य ) लगे होने चाहिए ।
( ५ ) सोना-चांदी के अतिरिक्त दूसरे पदार्थों को तोलने के लिए जो तुलायें बनवायी जाँय, उनका आकार-प्रकार इस तरह होना चाहिए; पैतीस पल लोहे से बनी हुई, तीन हाथ लंबी समवृत्ता ( गोलाकार ) नामक तुला अन्य पदार्थों को तोलने के लिए बनवानी चाहिए । उसके बीच में पाँच पल का काँटा लगवाकर ठीक मध्य में एक चिह्न भी करवा देना चाहिए । उसके बाद काँटे की गोलाकार परिधि में उस चिह्न से क्रमशः एक कर्ष, दो कर्ष, तीन कर्ष, चार कर्ष, एक पल, दो पल,