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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक

Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)

DevanagariHindipublished479 pages

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का

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राजा भी बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर
कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु अर्हत्व में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय राजा आनन्द था। सुनहरी रंग का मोर तो मैं ही था।

१६०. विनीलक जातक

“एवमेव मून राजान...” यह शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त
के बुद्ध की नकल करने के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

जब देवदत्त गया-शीर्ष पर गए हुए दोनो प्रधान श्रावको के सामने बुद्ध
का रंग-ढंग बनाकर लेट रहा, तो दोनो स्थविर धर्मोपदेश दे अपने शिष्यो को
लेकर वेळुवन चले आए।
शास्ता ने पूछा-“सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ?”
“भन्ते ! सुगत का रंग-ढंग दिखाकर महाविनाश को प्राप्त हुआ।”
“सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त
हुआ है, पहले भी प्राप्त हुआ है”। इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में विदेह राष्ट्र में मिथिला में विदेहराज के राज्य करने के समय
बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला

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विनीलक ] १८३

जाकर सब विद्याए सीखी । पिता के मरने पर राज्य गद्दी पर बैठे।
उस समय एक स्वर्ण हंसराज का चुगने की जगह पर एक कौवी से सहवास
हो गया । उसे पुत्र हुआ । वह न माता के सदृश था, न पिता के सदृश ।
उसका रूप रंग भद्दा नीला होने से उसका नाम विनीलक ही हो गया ।
हंसराजा सदैव पुत्र को देखने जाता । उसके दो दूसरे हंस-बच्चे पुत्र थे।
उन्होंने पिता को हमेशा बस्ती की ओर जाते हुए देखकर पूछा—"तात !
तुम हमेशा बस्ती की ओर क्यो जाते हो ?"
"तात ! एक कौंवी से सहवास होकर मुझे एक पुत्र हुआ । उसका नाम
विनीलक है । मैं उसे देखने जाता हूँ।"
"वह कहाँ रहते है ?"
'विदेह राष्ट्र में मिथिला के पास अमुक जगह पर एक ताड के वृक्ष पर रहते
हैं।"
"तात ! बस्ती सशंकित जगह है । वहाँ खतरा होता है । तुम न जाओ ।
हम जाकर उसे ले आएगे।"
दोनो हंस-बच्चे पिता के बताए हुए निशान से वहाँ पहुँच उस विनीलक को
एक डण्डे पर बिठा चोच से डण्डे के सिरो को पकड मिथिला नगर के ऊपर से
चले ।
उस समय विदेह राज सर्वश्वेत चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर
की परिक्रमा कर रहे थे । विनीलक ने उसे देख मन में कहा—"मुझ में विदेह-
राज में क्या अन्तर हैं ? यह चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर में
घूमता है । मै हंस जुते रथ में बैठकर जा रहा हूँ।" उसने आकाश से जाते
हुए यह गाथा कही—
एवमेव नून राजान वेदेह मिचिलग्गहं,
अस्सा वहन्ति आजञ्जा यथा हंसा विनीलकं ॥
[ जैसे हंस विनीलक को ढो रहे हैं उसी तरह से श्रेष्ठ घोडे मिथिला के
विदेहराजा (के रथ) को खीचते हैं ।]
एवमेव, इसी तरह, नून, सर्वल्प विकल्प विषयक निपात है । 'निश्चय से'
भी ठीक अर्थ है । वेदेह, विदेह राष्ट्र के स्वामी को । मिथिलग्गह, मिथिलागेह

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मिथिला में घर लेकर रहने वाला। आज्ञञ्जा, कारण, अकारण जानने वाले,
यथा हंसा विनीलकं, जैसे यह हंस मुझ विनीलक को ढो रहे हैं, उसी प्रकार
खींच रहे हैं।
हंस-बच्चों ने उसकी बात सुनी तो उन्हें क्रोध आया। उन्होंने सोचा
इसे यही गिरा जायें। लेकिन फिर सोचा ऐसा करने से हमारा पिता हमें क्या
कहेगा ? उसकी निन्दा के डर से वे उसे पिता के पास ले गए और उसकी
करतूत पिता से कही।
पिता को क्रोध आया। वह बोला—'क्या तू मेरे पुत्रों से बढ़कर है जो
उनको नीचा दिखा रथ में जुतने वाले घोडो के समान बनाता है ? अपनी
बिसात नही जानता ? यह स्थान तेरे योग्य नही है। जहाँ तेरी माँ रहती है,
वहीं जा।' इस प्रकार धमका कर दूसरी गाथा कही—
विनील ! दुग्गं भजसि अभूमिं तात ! सेवसि,
गामन्तिकानि सेवस्सु एतं मातालयं तव ॥
[विनील ! तू दुर्ग में रहता है ) तात ! तू अयोग्य स्थान में रहता है।
तू ग्राम के आसपास रह। वह तेरा मातृ-गृह है।]
विनील उसे नाम से बुलाता है। दुग्गं भजसि, इनके साथ गिरि-दुर्ग
में रहता है। अभूमिं तात ! सेवसि तात ! गिरि विषम स्थान, तेरे लिए
अयोग्य स्थान है। तू अभूमि में वास करता है। एतं मातालयं तव, यह
ग्राम के सिरे पर जो कूड़ा फेंकने की जगह है तथा कच्चा श्मशान है वही तेरी
माता का निवास-स्थान है। तू वहीं जा।
इस प्रकार उसे धमका कर पुत्रों को आज्ञा दी—जाओ, इसे मिथिला
नगर की कूड़ा डालने की जगह पर ही उतार आओ। उन्होने वैसा ही किया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय विनीलक देवदत्त था। दो हंस-बच्चे दो अग्र-श्रावक थे।
पिता आनन्द था। विदेहराज तो मैं ही था।