जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
by भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक
Source: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (origin)
लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का
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शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना "भिक्षुओ ! मैंने केवल अभी इस दुष्ट
लिच्छवि कुमार को सीधा नहीं किया, पहले भी सीधा किया है" कह जातक का
मेल बैठाया ।
उस समय दुष्ट कुमार यह लिच्छवि कुमार था। राजा आनन्द था।
उपदेश देनेवाला तपस्वी मैं ही था ।
१५०. सञ्जीव जातक
“असन्तं यो पग्गण्हाति ” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
अजातशत्रु राजा द्वारा किए गए दुर्गुणी के आदर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उसने बुद्धो के विरोधी, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त के प्रति श्रद्धावान् हो,
उस दुष्ट असत्पुरुष को ऊँचा स्थान दे उसका आदर करने की इच्छा से बहुत सा
धन खर्च करके गया-सीस पर एक विहार बनवा दिया। उसी की बात मान
अपने पिता को जो कि श्रोतापन्न आर्य-श्रावक था मरवा डाला । इस प्रकार
अपने श्रोतापन्न होने की सम्भावना में बाधा डाल विनाश को प्राप्त हुआ।
जब उसने सुना कि देवदत्त को जमीन निगल गई तो उसे डर हुआ कि
कहीं उसे भी जमीन न निगल जाए। भयभीत होने से उसका राज्य-सुख जाता
रहा। शय्या पर सोता तो उसे सोने में मजा न आता। तीव्र वेदना से पीडित
हाथी के बच्चे के समान वह इधर उधर विचरता । उसे ऐसा दिखाई देने लगा
जैसे पृथ्वी फट गई हो, उसमें से अवीचि-ज्वाला¹ निकल रही हो, और पृथ्वी
¹ अवीचि नरक से निकलने वाली ज्वाला ।
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उसे निगले जा रही हो, तप्त लोह शय्या पर लिटाकर लोहे की कीलें ठोकी जा
रही हो। इससे उस राजा को चोट खाए मुर्ग की तरह क्षण भर के लिए भी
शान्ति न थी, कांपता ही रहता था।
उसने सम्यक् सम्बुद्ध के दर्शन कर उनसे क्षमा माँगने की तथा शंका मिटाने
की इच्छा थी। लेकिन अपने अपराध के भार के कारण उसकी जाने की हिम्मत
न हुई।
राजगृह नगर में कात्तिकोत्सव था। नगर देवनगर की तरह अलङ्कृत था।
महल पर अमात्यगणों से घिरा राजा स्वर्ण सिंहासन पर बैठा था। उसने
देखा कि कौमारभृत्य जीवक पास ही बैठा है। उसके मन मे आया कि मै जीवक
को लेकर सम्यक् सम्बुद्ध के पास जाऊँ। लेकिन उसने साथ ही सोचा कि मैं
जीवक को सीधा तो यह नही कह सकता कि हे जीवक ! मै सम्यक् सम्बुद्ध
के पास जाना चाहता हूँ। अकेला नही जा सकता। मुझे बुद्ध के पास ले चल।
मै उसे एक ढग से कहूँगा—रात्रि के सौन्दर्य की प्रशंसा करके पूछूँगा कि आज
हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका सत्संग करने से मन प्रसन्न हो।
इसे सुन कर आमात्य अपने अपने शास्ता की प्रशंसा करेंगे। जीवक भी सम्यक्
सम्बुद्ध की प्रशंसा करेगा। तब उसे लेकर बुद्ध के पास जाऊँगा।
उसने पाँच पदो से रात्रि की प्रशंसा की—"भो ! चांदनी रात्रि लक्षण-
सम्पन्न है। भो ! चांदनी रात्रि सुन्दर है। भो ! चांदनी रात्रि दर्शनीय
है। भो ! चांदनी रात्रि मन को प्रसन्न करने वाली है। भो ! चांदनी रात्रि
रमणीय है। आज की रात हम किस श्रमण या ब्राह्मण का सत्संग करें, जिसका
सत्संग करने से चित्त प्रसन्न हो ?"
एक आमात्य ने पूरण कश्यप की प्रशंसा की। एक ने मक्खलि गोशाल
की। एक ने अजित केश कम्बल की। एक ने प्रबुध कात्यायन की। एक ने
बेलट्ठिपुत्र सञ्जय की। एक ने निर्ग्रन्थनाथपुत्र की।
राजा उनकी बातचीत सुन चुप रहा। वह महामात्य जीवक के कहने
का ही विश्वास करता था। जीवक ने भी यह सोचकर कि जब राजा मेरे प्रति
कुछ कहेगा, तभी देखूँगा मौन ही रक्खा। राजा ने पूछा—"जीवक ! तू क्यो
चुप है ?" तब जीवक ने आसन से उठ जिधर भगवान् थे उधर हाथ जोडकर
कहा—देव ! यह भगवान् अर्हंत सम्यक् सम्बुद्ध हमारे आम्रवन में रहते हैं।
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उनके साथ साढे बारह सौ भिक्षु हैं। उन भगवान् की इस प्रकार की कीर्ति है
कि यह अरहंत हैं ...इस प्रकार नौ तरह¹ के गुण हैं, वह और उनके जन्म के
समय से पूर्व निमित्त आदि भेद तथा भगवान् के प्रताप को प्रकाशित कर कहा
कि देव ! उन भगवान् बुद्ध का संसर्ग करें, धर्म सुनें तथा शंकाएँ मिटाएँ।
राजा का मनोरथ पूरा हुआ। वह बोला—सौम्य ! जीवक !
हाथियों को सजवाओ। हाथियो को सजवा वह राजसी ठाट-बाट से जीवक के
आम्रवन में पहुँच राजा ने देखा सुगन्धित बडे भवन में तथागत भिक्षु संघ से
घिरे बैठे है। जैसे महान् सरोवर हो, किन्तु उसकी लहरें शान्त हो, वैसे ही भिक्षु-
संघ को इधर उधर से देखकर राजा ने सोचा—ऐसी शान्त परिषद् तो मैने इससे
पहले कभी देखी ही नही। उसने भिक्षु-परिषद् के उठने-बैठने के तरीके से ही प्रसन्न
हो संघ को प्रणाम किया। फिर संघ की स्तुति करते हुए उसने भगवान् को
प्रणाम किया और एक ओर बैठकर श्रमणत्व के फल के बारे में प्रश्न किया।
भगवान् ने उसे दो भाणवारो में विस्तार करके सामञ्जफल सूत्र² का उपदेश
दिया। सूत्र का उपदेश हो चुकने पर वह प्रसन्न हो भगवान् से क्षमा माँग
आसन से उठकर चला गया।
राजा के चले जाने के थोडी ही देर बाद बुद्ध न भिक्षुओ को बुलाकर कहा—
भिक्षुओ, यह राजा जख्मी होगया समझो। भिक्षुओ, राजा को आहत हो गया
समझो। यदि यह ऐश्वर्य्य के लोभ मे पडकर अपने धार्मिक, धर्म से राज्य करने
वाले पिता को जान से न मरवाता, तो इसे इसी आसन पर रज रहित, मल-
रहित धर्म-चक्षु, उत्पन्न हो जाता। देवदत्त के कारण, दुष्ट को वडा स्थान देने
से वह श्रोतापत्ति फल को न प्राप्त कर सका।
किसी दूसरे दिन भिक्षुयो ने धर्म-सभा म बातचीत चलाई—'आयुष्मानो !
अजातशत्रु ने दुष्ट का आदर करके, दुश्चरित्र, पापी देवदत्त की प्रेरणा से पितृ-
¹ इति पि सो भगवा¹, अरहं², सम्मासम्बुद्धो³, विज्जाचरणसम्पन्नो⁴, सुगतो⁵,
लोकविदू⁶, अनुत्तरो पुरिसदम्मसारथि⁷, सत्था देवमनुस्सान⁸, बुद्धो भगवाति॥९
² दीघ निकाय, (दूसरा सूत्र) ।