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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished600 pages

About this granth

The Gopatha Brahmana (गोपथ ब्राह्मण) is the only surviving Brahmana of the Atharvaveda. It is divided into an earlier and a later part, each arranged in prapathakas and kandikas, and alongside ritual matters it exalts the Atharvaveda, explains the role of the Brahman priest, and tells cosmogonic stories.

This edition carries the Hindi commentary of Pandit Kshemakarandas Trivedi, the Arya Samaj scholar who also translated the Atharvaveda into Hindi. It was edited by Acharya Dr. Prajna Devi and Vyakaranacharya Medha Devi and published as No. 71 of the Vrajajivan Prachyabharati Granthamala by Chaukhamba Sanskrit Pratishthan, Delhi; the copy scanned is the 2015 reprint, with 4+32+560 pages.

Kandika headings give a sense of the contents: streams of sweat from the pores of Brahman, the ten Atharvan seers and the ten Atharvanas, the Vedas and Om, and five further Vedas such as the Sarpaveda with five great utterances beginning with vridhat. The editors add notes where the commentary was unclear. It offers Hindi readers a way into the Atharvan ritual tradition.

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४४२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १६ ॥
४—यह मन्त्र [ ब्राह्मणाच्छंसी का ] उक्थमुख है । ( ऐन्द्रं जागतं, जागताः पशवः,
पशूनाम् आप्त्यै ) इन्द्र देवता वाला [ स्तोत्र ] जगत् का हितकारी है, जगत् के हितकारी
पशु हैं, पशुओं की प्राप्ति के लिये [ यह स्तोत्र है ] । ( जागतम् उ वै तृतीयसवनं
तृतीयसवनस्य रूपम् ) जगत् का हितकारी ही तीसरा सवन है [ और पूर्वोक्त कर्म ]
तृतीय सवन का रूप है । ( उदप्रुतो न वयो रक्षमाणाः......इति बार्हस्पत्यं सांशं-
सिकम् ) उदप्रुतः न वयः रक्षमाणाः......५—यह मन्त्र बृहस्पति देवता वाला सांशंसिक
[ यथार्थ प्रशंसायुक्त उक्थ ] है । ( अहं च इति बृहस्पतिः अब्रवीत्, देवतयोः संशं-
साय अनतिशंसाय ) और मैं—यह बृहस्पति ने कहा [ क० ११ ], वह दो देवताओं
की यथार्थ प्रशंसा के लिये है जो अत्युक्ति बिना प्रशंसा हो । ( अच्छा म इन्द्रं मतयः
स्वर्विदः......इति ऐन्द्राबार्हस्पत्ये पर्य्यासः ) अच्छा मे इन्द्र' मतयः स्वर्विदः.... ६—
यह मन्त्र इन्द्र और बृहस्पति वाले [ उक्थ ] में पर्य्यास [ अन्त ] है । ( अस्य ऐन्द्रा-
बार्हस्पत्यम् एतत् नित्यम् उक्थम्) इस [ब्राह्मणाच्छंसी ऋत्विज्] का इन्द्र और बृहस्पति
देवता वाला यह नित्य उक्थ है । ( तत् एतत् स्वस्मिन् आयतने स्वस्यां प्रतिष्ठायां
प्रतिष्ठापयति ) सो यह [ उक्थ ] अपने स्थान में और अपनी प्रतिष्ठा में [ यजमान
को ] स्थापित करता है । ( एताः देवताः द्वन्द्वं वै भूत्वा विजित्यै एव व्यजयन्त ) इन
देवताओं ने दो दो होकर विजय के लिए ही विजय पाया है । ( अथो द्वन्द्वस्य एव मिथु-
नस्य प्रजात्यै ) फिर दो दो [ देवता ] वाले ही मिथुन [ ज्ञान वा जोड़ ] की उत्पत्ति के
लिये है । ( बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चात् .. इति ऐन्द्राबार्हस्पत्या परिदधाति )
वृहस्पतिः नः परि पातु पश्चात् ......७—इस इन्द्र और बृहस्पति वाली [ ऋचा ] से
वह परिधानीया इष्टि करता है । ( इन्द्राबृहस्पत्योः एव यज्ञं प्रतिष्ठापयति ) इन्द्र
और बृहस्पति के ही यज्ञ को वह स्थापित करता है । ( उत उत्तरस्मात् अधरात्
अघायोः इन्द्रः पुरस्तात् उत मध्यतः नः सखा सखिभ्यः वरिवः कृणोतु इति )
उत उत्तरस्माद् .... यह [ पूर्वोक्त मन्त्र ७ के तीन पाद बोले जाते हैं ] ( सर्वाभ्यः एव
दिग्भ्यः आशिषम् आशास्ते, अत्वीयं कामं न कामयते ) सब ही दिशाओं से वह
आशीर्वाद चाहता है और निन्दा योग्य कामना नहीं चाहता । ( सः कामः अस्मै समृध्यते,
यःएवं वेद, यः च एवं विद्वान् ब्राह्मणाच्छंसी एतया परिदधाति ) वह काम [ कामना
योग्य पदार्थ ] उस के लिये समृद्ध [ सफल ] होता है, जो ऐसा जानता है, और ऐसा
अण् । जगते हिताय ( उदप्रुतः ) प्रुङ् गतौ—क्विप् । उदकं प्राप्ताः ( न ) यथा
( वयः ) पक्षिणः ( रक्षमाणाः ) आत्मानं पालयन्तः ( अच्छ ) सुष्ठु ( मे ) मम
( मतयः ) बुद्धयः ( स्वर्विदः ) सुखस्य लम्भयित्र्यः ( बृहस्पतिः ) बृहतां शूराणां
रक्षकः सेनापतिः ( नः ) अस्मान् ( परि ) सर्वतः ( पातु ) रक्षतु ( ऐन्द्रा-
बार्हस्पत्या ) विभक्तेर्लुक् । ऐन्द्राबार्हस्पत्यया ऋचा ( उत ) अपि च (उत्तरस्मात्)
ऊर्ध्वलोकात् ( अधरात् ) अधस्तनलोकात् ( अघायोः ) पापेच्छुकात् । दुराचा-
रिणः ( पुरस्तात् ) अग्रे ( नः ) अस्मभ्यम् ( सखा ) सुहृत् ( सखिभ्यः ) मित्राणां
हिताय ( वरिवः ) वृञ् वरणे यङ्लुकि—ऋतश्च ( पा० ७ । ४ । ९२ ) अभ्यासस्य

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४। क० १६ ४४३
विद्वान् ब्राह्मणाच्छंसी [ ऋत्विज् ] इस [ स्तुति ] से परिधानीया इष्टि करता है। (बृहस्पते
युवम् इन्द्रश्च वस्वः······इति यजति ) बृहस्पते युवम् इन्द्रः च वस्वः····८-इस मन्त्र'
से वह याज्या आहुति देता है। ( एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्य
अनुवषट्करोति ) इन ही दोनों देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह
प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है।
( प्रति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि
लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों [ नेताओं ] की स्तुति बिना यज्ञ [ यजमान को ] न
बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं। देखो क० ३ ] ॥ १६ ॥
भावार्थः—कण्डिका १५ के समान है ॥ १६ ॥
विशेष : १—( वृहद्रथ ) के स्थान पर ( बृहद्रथ ) वेदमन्त्र से शुद्ध किया है ॥
विशेषः २--प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१--इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन् यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू । आं
वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्---अथर्व० २०। १३ ।
१, ऋग्० ४ । ५० । १० ॥ (बृहस्पते) हे बृहस्पति ! [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक
विद्वान् ] ( च ) और ( इन्द्रः ) हे इन्द्र ! [ अत्यन्त ऐश्वर्य वाले राजन् ] (मन्दसाना)
आनन्द देने वाले, ( वृषण्वसू ) बलवान् वीरों के निवास कराने वाले तुम दोनों (सोमम् )
सोम [ उत्तम ओषधियों के रस ] को (अस्मिन् ) इस ( यज्ञे ) यज्ञ [राजपालन व्यवहार]
में ( पिबतम् ) पीओ । (स्त्राभुवः) अच्छे प्रकार सब ओर होने वाले ( इन्दवः )
ऐश्वर्य ( वाम् ) तुम दोनों में ( आ विशन्तु ) प्रवेश करें, ( अस्मे ) हम को ( सर्व-
वीरम् ! सबको वीर बनाने वाला ( रयिम् ) धन ( नि ) नियम पूर्वक ( यच्छतम् )
तुम दोनों दो ॥
२--वयमु त्वामपूर्व्वं स्थूरं न कच्चिद् भरन्तोऽवस्यवः । वाजे चित्रं
हवामहे - अथर्व २० । १४ । १, ऋग्० ८ । २१ । १, साम० पू० ५ । २ । १० ॥
( अपूर्व्यं ) हे अनुपम ! [ राजन् ] ( कत् चित् ) कुछ भी ( स्थूरम् ) स्थिर वस्तु (न)
नहीं ( भरन्तः ) रखते हुये, (अवस्यवः) रक्षा चाहने वाले ( वयम् ) हम ( वाजे )
संग्राम के बीच ( चित्रम् ) विचित्र स्वभाव वाले (त्वाम् ) तुझ को ( उ ) ही ( हवा-
महे ) बुलाते हैं ॥
३--यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु वः स्तुषे । सखाय इन्द्र-
मूतये-अथर्व० २० । १४ । ३, ऋग्० ८ । २१ । ९, साम० उ० ५ । २ । २ ॥ (यः)
जो [ पराक्रमी ] ( नः ) हमारे लिये ( इदमिदम् ) इस-इस ( वस्यः ) उत्तम वस्तु
रिगागमः, वरिवो धननाम--निघ० २ । १० । वरणीयं धनम् ( कृणोतु )
करोतु ( अत्वीयम् ) भृमृशीङ्० ( उ० १ । ७ ) ऋत जुगुप्सायाम्--उप्रत्ययः ।
अतुं--छः । निन्दायो ग्यम् ( युवम् ) युवाम् ( वस्वः ) वसुनः । धनस्य । अन्यत्
पूर्ववत् क० १५ ॥

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४४४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १६
को ( पुरा ) पहिले ( प्र ) अच्छे प्रकार ( आनिनाय ) लाया है, ( तम् उ ) उस ही
( इन्द्रम् ) इन्द्र [ महाप्रतापी वीर ] को, ( सखायः ) हे मित्रो ! ( वः ) तुम्हारी
( ऊतये ) रक्षा के लिये ( स्तुषे ) मैं सराहता हूं ॥
४--प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये सत्यशुष्माय तवसे मतिं भरे । अपामिव
प्रवणे यस्य दुर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावृतम्-अथर्व० २० । १५ । १, ऋग्० १ ।
५७ । १ ॥ (मंहिष्ठाय) अत्यन्त दानी, ( बृहते ) महागुणी, ( बृहद्रये ) महाधनी,
( सत्यशुष्माय सच्चे बलवान् [ सभाध्यक्ष ] के लिये ( तवसे ) बल पाने को (मतिम् )
बुद्धि ( प्र ) उत्तम रीति से ( भरे ) मैं धारण करता हूँ (प्रवणे ) ढालू स्थान में (अपाम्
इव ) जलों के [ प्रवाह के ] समान, ( यस्य ) जिस [ सभाध्यक्ष ] का (दुर्धरम् ) बेरोक
( विश्वायु ) सब को जीवन देने वाला ( राधः ) धन (शवसे ) बल के लिये (अपा-
वृतम् ) फैला हुआ है ॥
५--उदप्रतो न वयो रक्षमाणा वावदतो अभ्रियस्येव घोषाः । गिरिज्रो
नोर्मयो मदन्तो बृहस्पतिम्अभ्य१ र्का अनावन्-अथर्व २० । १६ । १, ऋग्० १० ।
६८ । १ ॥ ( उदप्रुतः ) जल को प्राप्त हुये, ( रक्षमाणाः ) अपनी रक्षा करते हुये
( वयः न ) पक्षियों के समान, (वावदतः ) बार बार गरजते हुये ( अभ्रियस्य ) बादल
के (घोषाः इव ) शब्दों के समान ( गिरिभ्रजः ) पहाड़ों से गिरते हुये, (मदन्तः )
तृप्त करते हुये ( ऊर्मयः न ) जल के प्रवाहों के समान, ( अर्काः ) पूजनीय पण्डितों ने
( बृहस्पतिम् ) बृहस्पति [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक महाविद्वान् ] को ( अभि ) सब
ओर से ( अनावन् ) सराहा है ॥
६--अच्छा म इन्द्रं मतयः स्वर्विदः सध्रीचीर्विश्वा उशतीरनूषत । परिष्व-
जन्ते जनयो यथा पतिं मर्यं न शुन्ध्युं मघवानमूतये--अथर्व० २० । १७ । १,
ऋग्० १० । ४३ । १ ॥ ( स्वर्विदः ) सुख पहुँचाने वाली, ( सध्रीचीः ) आपस में मिली
हुई, ( उशतीः ) कामना करती हुई, ( विश्वाः ) सब ( मे ) मेरी ( मतयः ) बुद्धियों
ने ( इन्द्रम् ) इन्द्र [ महाप्रतापी राजा ] को ( अच्छा ) अच्छे प्रकार से ( अनूषत )
सराहा है और ( ऊतये ) रक्षा के लिये [ ऐसे, उसे ] (परिष्वजन्ते ) सब ओर से घेरती
हैं, ( यथा ) जैसे ( जनयः ) पत्नियां ( पतिम् ) [ अपने अपने ] पति को और ( न )
जैसे ( शुन्ध्युम् ) शुद्ध आचार वाले ( मघवानम् ) महाधनी ( मर्यम् ) मनुष्य को [लोग
घेरते हैं ] ॥
७-बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः इन्द्रः पुरस्तादुत
मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु--अथर्व० २० । १७ । ११, ऋग्० १० ।
४३ । ११ ॥ ( बृहस्पतिः ) बृहस्पति [ बड़े शूरों का रक्षक सेनापति ] ( नः ) हमें
( पश्चात् ) पीछे से, ( उत्तरस्मात् ) ऊपर से ( उत ) और ( अधरात् ) नीचे से
( अघायोः ) बुरा जीतने वाले शत्रु से ( परि पातु ) सब प्रकार बचावे । ( इन्द्रः )
इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाला राजा ] ( पुरस्तात् ) आगे से ( उत ) और ( मध्यतः )
मध्य से ( नः ) हमारे लिये ( वरिवः ) सेवनीय धन ( कृणोतु ) करे, ( सखा )
[ जैसे ] मित्र ( सखिभ्यः ) मित्रों के लिये [ धन करता है ] ॥

कण्डिका १७॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७ ४४५
८—बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य । धत्तं रयिं
स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः--अथर्व० २०। १७। १२,
ऋ० ७। ६७। १०॥ (बृहस्पते) हे बृहस्पते ! [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक विद्वान् ]
(च) और (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [ महाप्रतापी राजन् ] (युवम्) तुम दोनों (दिव्यस्य)
आकाश के (उत) और । पार्थिवस्य) पृथिवी के (वस्वः) धन के (ईशाथे) स्वामी
हो । (स्तुवते) स्तुति करते हुये (कीरये) विद्वान् को (रयिम्) धन को (चित्)
अवश्य (धत्तम्) तुम दोनों दो, [हे वीरो!] [यूयम्] तुम सब (स्वस्तिभिः) सुखों
के साथ (सदा) सदा (नः) हमें (पात) रक्षित रखो ॥
कण्डिका १७॥
अथ यदैन्द्रावैष्णवमच्छावाकस्योक्थं भवति इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा
सोमं यातं द्रविणो दधानेत्यृचाभ्यनूक्तम् । मद्धद्धि तृतीयसवनम् । अधा हीन्द्र गिर्वण
इयन्त इन्द्र गिर्वण इत्यच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ। ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्प-
रीत्युक्थमुखम्। तस्योक्तं ब्राह्मणं, नूमत्तर्त्तो दयते सनिष्यन्निति वैष्णवं सांशंसिकम्।
अहञ्चेति विष्णुरब्रवीत्, देवतयोः संशंसायानतिशंसाय। सं वां कर्मणा समिषा
हिनोमीति पर्यास ऐन्द्रावैष्णवे। ऐन्द्रावैष्णवमस्यैतन्नित्यमुक्थम्। तदेतत् स्व-
स्मिन्नायतने स्वस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठापयति । द्वन्द्वं वा एता देवता भूत्वा व्यजयन्त
विजित्या एव। अथो द्वन्द्वस्यैव मिथुनस्य प्रजात्या उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे
इत्यैन्द्रावैष्णव्यर्चा परिदधाति, इन्द्राविष्णोरेव यज्ञं प्रतिष्ठापयति । इन्द्राविष्णू
पिबतं मध्वो अस्येति यजति। एते एव तद्देवते यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्यानु-
वषट्करोति । प्रत्येवाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति न ह्यानाराशंसाः सीदन्ति ॥ १७ ॥
कण्डिका १७ ॥ एकाह यज्ञ के तृतीयसवन के उक्थ में
अच्छावाक ऋत्विज् के मन्त्र ॥
(अथ यत् अच्छावाकस्य ऐन्द्रावैष्णवम् उक्थं भवति) फिर जो अच्छावाक
[ अच्छे बोलने वाले ऋत्विज् ] का इन्द्र और विष्णु [ मन और कान—क० ११ ] देवता
वाला उक्थ [ स्तोत्र ] होता है [ उसका वर्णन ] । (इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा
सोमं यातं द्रविणो दधाना••••••इति ऋचा अभ्यनूक्तम्) इन्द्राविष्णू मदपती …
१—इस ऋचा करके अनुकूल कहा गया है। (मद्धद्धि तृतीयसवनम्) हर्ष युक्त [ अथवा
मद शब्द वाला ] ही तृतीय सवन है। (अधा हीन्द्र गिर्वणः · इयं त इन्द्र गिर्वणः••• इति
अच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ) अधा हि इन्द्र गिर्वणः•••• २—और, इयं ते इन्द्र
१७—(इन्द्राविष्णू) वायुविद्युताविव सभासेनेशौ (मदपती) आनन्दस्य
पालको (मदानाम्) आनन्दानाम् (सोमम्) ऐश्वर्य्यम् (आ यातम्) आगच्छतम्
(द्रविणो) द्रविणा उ इति पदद्वयमेकीभूय द्रविणो इति सिद्धम् । द्रविणा
द्रविणानि धनानि उ अपि (दधाना) दधानौ । धरन्तौ (अद्य) अद्य । सम्प्रति
(हि) एव (गिर्वणः) स्तुतिभिः सेवनीय (ऋतुः) वर्षाकालः (जनित्री)

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४४६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७
गिर्वणः...... ३-यह दो मन्त्र अच्छावाक के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। (ऋतुर्जनित्री तस्या
अपस्परि...... इति उक्थमुखम्) ऋतुः जनित्री तस्याः अपः परि......४-यह मन्त्र
[अच्छावाक का] उक्थमुख है। (तस्य उक्तं ब्राह्मणम्) उसका ब्राह्मण कहा गया है।
(नु मर्त्तो दयते सनिष्यन्...... इति वैष्णवं सांशंसिकम्) नु मर्त्तः दयते सनिष्यन्......
५--यह मन्त्र विष्णु देवता वाला सांशंसिक [यथार्थ प्रशंसा युक्त उक्थ] है। (अहं च
इति विष्णुः अब्रवीत्, देवतयोः संशंसनाय अनतिशंसनाय) और मैं-यह विष्णु ने कहा
[क० ११], वह देवताओं की यथार्थ प्रशंसा के लिये है जो अत्युक्ति बिना प्रशंसा हो।
(सं वां कर्मणा समिषा हिनोमि......, इति ऐन्द्रावैष्णवे पर्य्यासः) सं वां
कर्मणा......६-यह मन्त्र इन्द्र और विष्णु वाले [उक्थ] में पर्यास [अन्त] है। (अस्य
ऐन्द्रावैष्णवम् एतत् नित्यम् उक्थम्) इस [अच्छावाक] का इन्द्र और विष्णु देवता
वाला यह नित्य उक्थ है। (तत् एतत् स्वस्मिन् आयतने स्वस्यां प्रतिष्ठायां
प्रतिष्ठापयति) सो यह [उक्थ] अपने स्थान में और अपनी प्रतिष्ठा में [यजमान को]
स्थापित करता है। (एताः देवताः द्वन्द्वं वै भूत्वा विजित्यै एव व्यजयन्त) इन सब
देवताओं ने दो दो होकर विजय के लिये ही विजय पाया है। (अथो द्वन्द्वस्य एव
मिथुनस्य प्रजात्यै) फिर दो दो [देवता] वाले ही मिथुन [ज्ञान वा जोड़ा] की
उत्पत्ति के लिये है। (उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे ...इति ऐन्द्रावैष्णव्या ऋचा
परिदधाति) उभा जिग्यथुः न...... ७-इस इन्द्र और विष्णु वाली ऋचा से वह परिधानीया
इष्टि करता है। (इन्द्राविष्णोः एव यज्ञं प्रतिष्ठापयति) इन्द्र और विष्णु के यज्ञ को
वह स्थापित करता है। (इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य ...इति यजति) इन्द्रा-
विष्णू पिबतम् ...८--इस मन्त्र से वह याज्या आहुति देता है। (एते एव देवते
तत् यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्य अनुवषट्करोति) इन ही दो देवताओं को उससे
अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [अन्तिम
आहुति दान] करता है। (प्रत्ति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति
न हि सीदन्ति) वे [ऋषि लोग] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं-नरों [नेताओं] की स्तुति
जनयित्री। जननी (अपः) जलानि (परि) सर्वतः (नु) शीघ्रम् (मर्त्तः)
मनुष्यः (दयते) धनमादत्ते (सनिष्यन्) सर्वधातुभ्यः इन् (उ० ४।११८)
षणु दाने--इन्। सुप आत्मनः क्यच् (पा० ३।१।८) सनि--क्यच् लालसायां
सुगागमः, ततः शतृ ।१ दातव्यधनमिच्छन् (सम्) सम्यक् (वाम्) युवाम्
(कर्मणा) ईप्सिततमेन व्यापारेण (इषा) अन्नेन (हिनोमि) वर्धयामि (उभा)
उभौ। इन्द्राविष्णू (जिग्यथुः) लिटि रूपम्। युवां जितवन्तौ शत्रून् (न)
निषेधे (पराजयेथे) पराजयं प्राप्नुथः (मध्वः) मधुरस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥
१. रूपसिद्धि की प्रक्रिया के इतने लम्बे व्यायाम की अपेक्षा लृडन्त सन् धातु से 'लुटः
सद्वा' के नियम के अनुसार शतृ प्रत्यय होकर प्रथमा के एकवचन में 'सनिष्यन्' बनाना
अधिक श्रेयस्कर है ॥ सम्पा० ॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७ ॥ ४४७
बिना यज्ञ [ यजमान का ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते है। देखो
क० ३ ] ॥ १७ ॥
भावार्थः-कण्डिका १५ के समान है ॥ १७ ॥
विशेषः १-( मदयती ) के स्थान पर ( मदपती ) और ( अपसस्परि )
के स्थान पर ( अपस्परि ) वेद मन्त्र से शोधा है ॥
विशेषः २-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१-इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना । सं
वामञ्जन्त्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः-ऋग्० ६ । ६९ । ३ ॥
( इन्द्राविष्णू ) हे इन्द्र और विष्णु [ वायु और विजुली के समान सभापति और सेनापति ]
( मदानाम् ) आनन्दों के बीच ( मदपती ) आनन्द के पालने वाले और ( द्रविणो )
धनों के भी ( दधाना ) धारण करने वाले तुम दोनों ( सोमम् ) ऐश्वर्य को ( आ यातम् )
प्राप्त होओ । ( मतीनाम् ) मनुष्यों के ( शस्यमानासः ) बोले हुये ( स्तोमासः ) स्तोम
[ स्तुति व्यवहार ] ( अक्तुभिः ) तेजों और ( उक्थैः ) वेद स्तोत्रों के साथ ( वाम् )
तुम दोनों को ( सं सम् अञ्जन्तु ) बहुत अच्छे प्रकार प्रकट करें ।
२-अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान् महः ससृज्महे । उदेव यन्त
उदभिः-अथर्व० २० । १०० । १, ऋ० ८ । ६८ । ७, [ सायण भाष्य ८७ ]
साम० उ० १ । १ । तृच २३ ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ( इन्द्र ) इन्द्र !
[ महाप्रतापी राजन् ] ( अध हि ) अब ही ( त्वा ) तुझे ( महः ) अपनी बड़ी
( कामान् ) कामनाओं को, ( उदा ) जल [ जल की बाढ़ ] के पीछे ( उदभिः ) दूसरे
जलों की बाढ़ों के साथ ( यन्तः इव ) चलते हुये पुरुषों के समान हमने ( उप, ) अंदर से
( ससृज्महे ) समर्पण किया है ॥
३-इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि
राजसि-ऋ० ८ । १३ । ४ ॥ ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ( इन्द्र ) इन्द्र !
[ महाप्रतापी राजन् ] ( ते ) तेरे लिये ( सुन्वतः ) तत्त्वरस निचोड़ने वाले पुरुष की
( इयम् ) यह ( रातिः ) दान क्रिया ( क्षरति ) बहती है, ( मन्दानः ) हर्ष करता हुआ
तू ( अस्य बर्हिषः ) इस वृद्धि कारक व्यवहार का ( वि ) विशेष करके ( राजसि )
राजा है ॥
४-ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्परि मक्षू जात आविशद्यासु वर्धते । तदाहना
अभवत् पिप्युषी पयोऽशोः पीयूषं प्रथमं तदुक्थ्यम्-ऋ० २ । १३ । १ ॥ ( ऋतुः )
ऋतु [ वर्षाकाल ] ( जनित्री ) [ प्रत्येक पदार्थ की ] जननी है, ( तस्याः परि ) उस
[ जननी ] से ( जातः ) उत्पन्न होकर वह [ पदार्थ ] ( मक्षू ) शीघ्र ( अपः ) जलों में
( आ अविशत् ) सब प्रकार से प्रवेश करता है, ( यासु ) जिन [ जलों ] में ( वर्धते )
वह बढ़ता है । ( तत् ) इससे वह [ पदार्थ ] ( आहनाः ) पाने योग्य ( अभवत् ) होता
है, और ( पयः ) रस की ( पिप्युषी ) बढ़ाने वाली [ वह जननी ऋतु होती है ] । ( तत् )

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४४८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७
तब ( अंशोः ) अंशु [ ओषधि के डांठल ] का ( पीयूषम् ) पीने योग्य रस ( प्रथमम् )
मुख्य करके ( उक्थ्यम् ) प्रशंसनीय [ अथवा उक्थ नामक यज्ञ के योग्य ] होता है ॥
५—नू मर्तो दयते सनिष्यन् यो विष्णव उरुगायाय दाशत् । प्र यः सत्राचा
मनसा यजात एतावन्तं नर्यमा विवासान्--ऋग्० ७ । १०० । १ ॥ ( सनिष्यन् )
भक्ति चाहता हुआ ( मर्तः ) वह मनुष्य ( नु ) शीघ्र ( दयते ) [ मनोरथ ] पाता है,
( यः ) जो ( उरुगायाय ) बहुत गाने योग्य ( विष्णवे ) विष्णु [ व्यापक परमात्मा ] को
( दाशत् ) देवे [ आत्मदान करे ] और ( यः ) जो ( सत्राचा ) सत्य को प्राप्त हुये
( मनसा ) मन से ( एतावन्तम् ) इतने बड़े ( नर्यम् ) नरों के हितकारी [ विष्णु ] को
( प्र यजाते ) अच्छे प्रकार पूजे और ( आबिवासात् ) सब ओर से सेवे ॥
६-सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य । जुषेथां
यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता- ऋ० ६ । ६६ । १ ॥ ( इन्द्रा-
विष्णू ) हे इन्द्र और विष्णु [ सूर्य और बिजुली के समान सभापति और सेनापति ]
( वाम् ) तुम दोनों को ( अस्य ) इस ( अपसः पारे ) कर्म के पार में ( कर्मणा )
अत्यन्त चाहे हुये व्यापार और ( इषा ) अन्न से ( सं मं हिनोमि ) मैं बढ़ाता हूं,
( यज्ञम् ) यज्ञ [ संगति करण व्यवहार ] को ( जुषेथाम् ) सेवो ( च ) और ( नः )
हमको ( अरिष्टैः ) बेरोक ( पथिभिः ) मार्गों से ( पारयन्ता ) पार करते हुये तुम
दोनों ( द्रविणम् ) धन वा यश ( धत्तम् ) दो ॥
७–उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न पराजिग्ये कतरश्च नैनयोः । इन्द्रश्च विष्णो
यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्--अथर्व० ७ । ४४ । १, ऋ० ६ । ६९ ।
८ ॥ ( विष्णो ) हे विष्णु ! [ बिजुली के समान व्याप्त होने वाले सभापति ] ( च )
और ( इन्द्रः ) हे इन्द्र ! [ वायु के समान ऐश्वर्यवान् सेनापति ] ( उभा ) तुम दोनों ने
[ शत्रुओं को ] ( जिग्यथुः ) जीता है, और तुम दोनों ( न ) कभी नहीं ( परा जयेथे )
हारते हो, ( एनयोः ) इन [ तुम ] दोनों में से ( कतरः चन ) कोई भी ( न ) नहीं
( परा जिग्ये ) हारा है । ( यत् ) जब ( अपस्पृधेथाम् ) तुम दोनों ललकारे हो
( तत् ) तब ( सहस्रम् ) असंख्य [ शत्रु सेना दल ] को ( त्रेधा ) तीन विधि पर
[ ऊंचे, नीचे और मध्य स्थान में ] ( वि ) विविध प्रकार से ( ऐरयेथाम् ) तुम दोनों ने
निकाल दिया है ॥
८--इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम् । आ
वामन्धांसि मदिराण्यग्मन्नप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे-ऋग्० ६ । ६६ । ७ ॥
( दस्रा ) हे दुःखनाशक ( इन्द्राविष्णू ) इन्द्र और विष्णु ! [ वायु और बिजुली के समान
अध्यापक और उपदेशक ] तुम दोनों (अस्य ) इस ( मध्वः ) मधुर ( सोमस्य ) सोम
[ ओषधियों के रस ] का ( पिबतम् ) पान करो और ( जठरम् ) पेट को ( आ
पृणेथाम् ) अच्छे प्रकार भरो । ( वाम् ) तुम दोनों को ( मदिराणि ) आनन्द देने वाले
( अन्धांसि ) अन्न ( अगमन् ) प्राप्त हुये हैं, ( मे ) मेरे ( ब्रह्माणि ) स्तोत्रों और
( हवम् ) पुकार को ( उप शृणुतम् ) तुम दोनों समीप से सुनो ॥

कण्डिका १८ ॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १८ : ४४९
कण्डिका १८ ॥
अथा॑ध्वर्यो॒ शंश्शं॑सावो॒मिति॑ स्तोत्रियाया॒नुरू॑पायोक्थ॒मुखाय॑ परिधा-
नीयाया॒ इति॒ चतु॑श्चतुराह्वयन्ते । चत॑स्रो॒ वै दिशः॑, दिक्षु॒ तत्प्रति॑तिष्ठन्ते । अथो॒
चतु॑ष्पादः प॒शवः॑, प॒शूना॒माप्त्यै॑ । अथो॒ चतु॑ष्पर्वाणो॒ हि तृ॒तीय॑सवने होत्रकाः
तस्मा॑च्चतुः सर्वे॒ त्रैष्टु॑भं जागता॒नि शंसन्ति । जागतं॒ हि तृ॒तीय॑सवनम् । अथ॒ हैतत्
त्रैष्टु॑भान्य॒प्रति॑भूतमिव॒ हि प्रातः॑सवने म॒रुत्व॑तीये तृ॒तीय॑सवने च होत्रकाणां
शस्त्रम् । धीतर॑सं॒ वा ए॒तत्सव॑नं, यत्तृ॒तीय॑सवनम् । अथ॒ हैतद॑धीतरसं शु॒क्रियं॑
छन्दः॑, यत् त्रि॒ष्टुभा यात॑याम॒सेवन॑स्यैव॒ तत् सर॑सतायै । सर्वे॑ समवती॒भिः परि॑-
दधति, तद्यत्स॒मवती॑भिः परि॒दध॑ति । अन्तो॒ वै प॒र्यासो॒ऽन्त उ॒दर्कॊऽन्तः, सजाया
उ ह॒ वा अ॑वेनायान्तेनै॒वान्तं॑ परि॒दध॑ति । सर्वे॑ मद्वती॒भिर्य॑जन्ति । तद्यन्म॒द्वती॑भि॒र्यज॑न्ति
सर्वे॑ सुतवती॒भिः पीतवती॑भिरू॒पाभिर्य॑जन्ति । यद्य॒ज्ञेऽभि॑रूपं॒ तत्समृ॑द्धम् ।
सर्वेंऽनुवषट् कुर्वन्ति, स्विष्टकृत्त्वा अनुवषट्कारो नेत् स्विष्टकृतमन्तरयामेति ।
असौ वै लोकस्तृतीयसवनं, तस्य पञ्च दिशः, पञ्चोक्थानि तृतीयसवनस्य । स एतैः
पञ्चभिरुक्थैः एताः पञ्च दिश आप्नोति । तद्यदेषां लोकानां रूपं, या मात्रा । तेन
रूपेण तया मात्रयेमांल्लोकान्दृध्नोतीमांल्लोकान्दृध्नोतीति ॥ १८ ॥
कण्डिका १८ ॥ एकाह यज्ञ के तृतीयसवन में ( शंशासावोम् )
इस मन्त्र को चार चार बार बोलें ॥
( अथ अध्वर्य्यो शंशांसावोम् इति, स्तोत्रियाय अनुरूपाय उक्थमुखाय
परिधानीयायै इति चतुः चतुः आह्वयन्ते ) फिर ( अध्वर्य्यो शंशांसाव ओम् ) हे
अध्वर्यो ! हम दोनों स्तुति करें, हां—इस मन्त्र से स्तोत्रिय [ स्तुति योग्य व्यवहार ] के
लिये, अनुरूप [ विषय की अनुकूलता ] के लिये; उक्थमुख [ यज्ञ की मुख्यता ] के लिये
और परिधानीया [ समाप्ति क्रिया ] के लिये—इस प्रकार चार-चार बार वे बोलते हैं ।
( चतस्रः वै दिशः, दिक्षु तत् प्रतितिष्ठन्ते ) चार ही दिशायें हैं, दिशाओं में उससे वे
[ याजक ] प्रतिष्ठा पाते हैं । ( अथो चतुष्पादः पशवः पशूनाम् आप्त्यै ) फिर चार
पांव वाले पशु होते हैं, पशुओं की प्राप्ति के लिये [ यह यज्ञ ] है । ( अथो तृतीयसवने
चतुष्पर्वाणः हि होत्रकाः ) फिर तृतीयसवन में चार अङ्ग वाले ही सहायक होता लोग
होते हैं । ( तस्मात् चतुः सर्वे त्रैष्टुभं जागतानि शंसन्ति ) इसलिये चार बार वे सब
त्रिष्टुप् [ कर्म उपासना ज्ञान के सहारे वाले अथवा त्रिष्टुप् ] छन्दों वाले स्तोत्रों से जगत्
के हितकारी कर्म वे बोलते हैं । ( जागतं हि तृतीयसवनम् ) जगत् का हितकारी ही
तीसरा सवन है । ( अथ ह एतत् त्रैष्टुभानि प्रातःसवने मरुत्वतीये तृतीयसवने च
१८–( शंशांसाव ) पूर्वाक्षरस्य द्वित्वमार्षम्–गो० उ० ३ । १०, १६
तथा ४ । ४ । शंसाव । आवाम् शंसनं स्तोत्रं करवाव ( ओम् ) अनुमतौ ( त्रैष्टु-
भम् ) त्रैष्टुभानि । त्रिष्टुप्छन्दोयुक्तानि । कर्मोपासनाज्ञानयुक्तानि ( जागतानि )
५६

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४५० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४। क० १८
होत्राकाणाम् अप्रतिभूतम् इव हि शस्त्रम्) फिर यह ही त्रिष्टुप् छन्द वाले स्तोत्र
प्रातःसवन में, मरुत्वतीय [ माध्यन्दिन सवन ] में और तीसरे सवन में सहायक होता लोगों
का अप्रतिभूत [ प्रतिभू अर्थात् स्थानी बिना ] ही शस्त्र [ स्तोत्र ] हैं [ अर्थात् त्रिष्टुप् तीनों
सवनों में अवश्य बोला जाता है ] । ( धीतरसं वै एतत् सवनम्, यत् तृतीयसवनम् )
पी चुके हुये रस वाला ही यह सवन है, जो तीसरा सवन है [ तीसरे सवन से पहिले
सोमरस पी लिया जाता है फिर किस लिये तीसरा सवन है—इस प्रश्न का समाधान इस
प्रकार है ] । ( अथ ह एतत् अधीतरसं शुक्रियं छन्दः, यत् त्रिष्टुभा यातयामसवनस्य
एव तत् सरसतायै ) फिर यह बिना पी चुके हुये रस वाला, वीर्यवान् छन्द [ स्तोत्र ] है,
जो त्रिष्टुप् [ तीनों सवनों में ठहरने वाले छन्द ] के साथ बीते हुये योग्य समय वाले सवन
के रसीलेपन के लिये है [ देखो-ऐतरेय ब्रा० ६। १२ ] । ( सर्वं समवतीभिः परिदधति,
यत् तत् समवतीभिः परिदधति. ) वे सब समवती ऋचाओं से [ सम शब्द वाली
ऋचाओं से जैसे—समं ज्योतिः सूर्येण······अथर्व० ४। १८ । १, इत्यादि मन्त्रों से ] समाप्त
करते हैं, क्योंकि वहां समवती ऋचाओं से वे समाप्त करते हैं। (अन्तः वै पर्यासः, अन्तः
उदर्कः, अन्तः सजायाः उ ह वै अवेनाय अन्तेन एव अन्नं परिदधति = परिदधाति )
अन्त ही पर्यास [ विराम ] है, अन्त ही उदर्क [ अवसान वा विच्छेद अर्थात् रोक ] है,
अन्त ही संगति के रक्षक के लिये अन्त के साथ ही अन्त को समाप्त करता है। [ एक एक
विषय पर रुककर दूसरे को आरम्भ करके समाप्त किया जाता है ] । ( सर्वे मद्गतीभिः
यजन्ति, यत् तत् मद्गतीभिः यजन्ति ) वे सब मद्वती [ मद शब्द वाली ] ऋचाओं से
यज्ञ करते हैं [ याज्या ऋचा बोलते हैं ], क्योंकि वहां मद्वती ऋचा से वे यज्ञ करते हैं ।
( सर्वे सुतवतीभिः पीतवतीभिः अभिरूपाभिः यजन्ति ) वे सब सुतवती [ सुत शब्द
वाली ] ऋचाओं से, पीतवती [ पीत शब्द वाली ] ऋचाओं से और अभिरूप [ विषय के
अनुकूल ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं। [ मद्गती, सुतवती और पीतवती ऋचाओं के लिये
देखो ऋग्० १ । १६ । ८ । और बहुवचन शब्द होने से ब्राह्मण में समस्त इस नौ ऋचा
वाले सूक्त का ग्रहण अभीष्ट है । अभिरूप शब्द से यह प्रयोजन है कि अभीष्ट देवता की
स्तुति में उस देवता के सूचक पद आ जावें ] । ( यत् यज्ञं अभिरूपं, तत् समृद्धम् ) जो
यज्ञ में विषय के अनुकूल कर्म है, वह समृद्ध है । ( सर्वे स्विष्टकृरवा अनुवषट्
कुर्वन्ति ) सब स्विष्टकृत् मन्त्र [ यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं·········देखो--गो० उ० ३ । १ ]
पढ़कर अनुवषट् [ समाप्ति सूचक पद ] पढ़ते हैं । ( अनुवषट्कारः स्विष्टकृतं नेत्
अन्तरयाम इति ) अनुवषट्कार स्विष्टकृत् मन्त्र को कभी भी बीच [ व्यवधान ] से नहीं
लेता [ स्विष्टकृत् के पीछे ही अनुवषट् होता है ] । ( असौ वै लोकः तृतीयसवनम् )
जगतोछन्दोयुक्तानि । जगते हितानि ( अप्रतिभूतम् ) प्रतिभूरहितम् । स्थानिना
रहितम् ( धीतरसम् ) धेट् पाने--क्तः । पीतसारम् ( अधीतरसम् ) अपीतसा-
रम् । सर्वरसोपेतम् ( शुक्रियम् ) शुक्र—घन् । वीर्ययुक्तम् । ( यातयामसवनस्य )
गतयोग्यकालसवनस्य ( सरसतायै ) सरसत्वाय ( सजायाः ) षञ्ज सङ्गे--कः,
टाप् । सङ्गतेः ( अवेनाय ) श्यास्त्याह्वणविम्व्य इनच् ( उ० २ । ४६ ) अव रक्षणार्दौ

कण्डिका १९ ॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १६ ॥ ४५१
वह ही [ सूर्य ] लोक तीसरा सवन है। ( तस्य पञ्च दिशः, तृतीयसवनस्य पञ्च
उक्थानि ) उस [ सूर्य लोक ] की पांच दिशायें [ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और एक
ऊपर नीचे की दिशा ] हैं और तीसरे सवन के पांच उक्थ [ समवती, मद्वती, सुतवती,
पीतवती और अभिरूपा ऋचाओं वाले स्तोत्र ] हैं। ( सः एतैः पञ्चभिः उक्थैः, एताः
पञ्चदिशः आप्नोति ) वह [ यजमान ] इन पांच प्रकार वाले स्तोत्रों से इन पांच दिशाओं
को पाता है। ( तत् यत् एषां लोकानां रूपं या मात्रा ) क्योंकि वह इन लोकों का
रूप [ आकार ] है जो मात्रा [ परिमाण ] है। ( तेन रूपेण तया मात्रया इमान्
लोकान् ऋध्नोति, इमान् लोकान् ऋध्नोति इति ) उस ही रूप [ आकार ] से और
उस मात्रा [ परिमाण ] से इन लोकों को वह समृद्ध करता है, इन लोकों को वह समृद्ध
करता है [ अवश्य समृद्ध करता है ] ॥ १८ ॥
भावार्थः-मनुष्यों को योग्य है कि देश और काल का विचार करके कार्य करें
जिससे उन्हें सफलता प्राप्त हो ॥ १८ ॥
विशेषः १-( शस्रं ) के स्थान पर ( शस्त्रं ) ठीक है, और ( सरस्वतायै ) के
स्थान पर ( सरसतायै ) ऐ० ब्रा० ६ । १२ से शुद्ध किया है ॥
विशेषः २-इस कण्डिका को प्रातःसवन में गो० उ० ३ । १६ और माध्यन्दिन
सवन में उ० ४ । ४ से मिलाओ और वहां पर ही प्रयोजनीय मन्त्र हैं ॥
कण्डिका १९ ॥
तदाहुः, किं षोडशिनः षोडशित्वं षोडश स्तोत्राणि षोडश शस्त्राणि
षोडशभिरक्षरैरादत्ते, द्वे वा अक्षरे अतिरिच्येते, षोडशिनोऽनुष्टुभमभिसम्पन्नस्य ।
वाचो वा एतौ स्तनौ, सत्यानृते वाव ते, अवत्येनं सत्यम् नैनमनृतं हिनस्ति, य
एवं वेद ॥ १९ ॥
इत्यथर्ववेदस्य गोपथब्राह्मणस्य चतुर्थः प्रपाठकः समाप्तः ॥ ४ ॥
कण्डिका १९ ॥ एकाह यज्ञ में षोडशी शब्द की व्याख्या ॥
( तत् आहुः, षोडशिनः किं षोडशित्वम् ) वे कहते हैं-षोडशी [ सोलह
अङ्ग वाले यज्ञ ] का क्या षोडशित्व [ सोलहपन ] है? [ इस का समाधान ] ( षोडश
स्तोत्राणि षोडश शस्त्राणि षोडशभिः अक्षरैः आदत्ते ) सोलह स्तोत्रों और सोलह
शस्त्रों को [ आधे आधे अनुष्टुप् छन्द के ] सोलह अक्षरों से वह [ अध्वर्युं ] ग्रहण करता
है। ( अनुष्टुभम् अभिसम्पन्नस्य षोडशिनः द्वे अक्षरे वै अतिरिच्येते ) अनुष्टुप्
रखने वाले षोडशी [ स्तोत्र ] के दो दो अक्षर बढ़ जाते हैं [ आधे अनुष्टुप् के १६ अक्षरों
के आदि और अन्त में ओम् शब्द बोलने से १८ अक्षर होते हैं-इस का समाधान ] ।
—इनच् = एनच् । अविनाय । रक्षकाय ( अन्तरयाम ) गो० उ० ३ । १६ । अन्त-
र्याति । अन्तरेण गच्छति । अन्यद् गतम्--गो० उ० ३ । १६ ॥
१९--( आदत्ते ) गृह्णाति ( अतिरिच्येते ) अधिके भवतः ( अभिसम्प-

कण्डिका १ ॥

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४५२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १०.
( वाचः वै एतौ स्तनौ, ते वाव सत्यानृते ) वाणी के [ स्त्रीलिङ्ग होने से ] यह दोनों
स्तन [ कुच वा चूची ] हैं जो ही सत्य और झूठ हैं। ( सत्यम् एनम् अवति अनृतम् एनं न
हिनस्ति, यः एवं वेद ) सत्य उसकी रक्षा करता है और झूठ उसको नहीं सताता है जो
ऐसा जानता है ॥ १६ ॥
भावार्थ :--मनुष्य को उन्नति के लिये सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना
चाहिये ॥ १६ ॥
विशेषः १--एकाह यज्ञ समाप्त हुआ ॥
विशेषः २ - इस कण्डिका को मिलाओ--ऐ० ब्रा० ४ । १ ॥
विशेषः ३--( ते वा ) के स्थान पर ( द्वे वा ) ऐ० ब्रा० से शुद्ध किया है ॥
इति श्रीमद्राजाधिराज-प्रथितमहागुणमहिम-श्रीसयाजीराव-गायकवाहा-
धिष्ठित-बड़ोदेपुरीगत-श्रावणमासदक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु
लब्धदक्षिणेन श्री पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदिना अथर्ववेदभाष्यकारेण
कृते गोपथब्राह्मणभाष्य उत्तरभागे चतुर्थः प्रपाठकः समाप्तः ॥
अय प्रपाठकः प्रयागनगरे माघमासे शुक्लचतुर्दश्यां तिथौ १९८० [ अशी-
त्युत्तरेकोनविंशतिशतके ] विक्रमीये संवत्सरे सुसमाप्तिमगात् ॥
मुद्रितम्—आश्विनशुक्ला ४ संवत् १९८१ वि० ता० २ अक्टूबर सन् १९२४ ई० ॥
अथ पञ्चमः प्रपाठकः ॥
कण्डिका १ ॥
ओम् । अहर्वै देवा आश्रयन्त रात्रीमसुराः । तेऽसुराः समावद्वीर्य्या एवा-
सन्, नो व्यावर्तन्त । सोऽब्रवीत् इन्द्रः, कश्चाहं चेमानसुरान् रात्रीमन्ववैष्यामहा
इति । स देवेषु न प्रत्यविन्दत्, अभिभूय रात्रेस्तमसः । मृत्योस्तम इव हि रात्रिः,
मृत्युर्वै तमः, तस्माद्वाप्येतर्हि भूयानिव नक्तम् । स यावन्मात्रमिवाप¹क्रम्य बिभेति,
तं वै छन्दांस्येवान्ववायन्। तद्यच्छन्दांस्येवान्ववायन्, तस्मादिन्द्रश्च छन्दांसि च
रात्रिं वहन्ति, न निविच्छस्यते न पुरोरुङ् न धाय्या नान्या देवता। इन्द्रश्च ह्येव
छन्दांसि च रात्रिं वहन्ति तान्वै पर्य्यायैः पर्य्यायमनुदन्त । यत् पर्य्यायैः पर्य्याय-
मनुदन्त, तस्मात् पर्य्यायाः, तत् पर्य्यायाणां पर्य्यायत्वम् । तान्वै प्रथमैरेव पर्य्यायैः
पूर्वरात्रादनुदन्त, मध्यमैर्मध्यरात्रादुत्तमैरपररात्रात् । अपिशर्वर्या अपिस्मसीत्य-
ङ्गस्य ) अभिप्राप्तस्य ( स्तनौ ) स्तन मेघशब्दे—अच् । स्त्रीणाम् अङ्गभेदौ (सत्या-
नृते ) सत्यं यथार्थवदनं च अनृतं मिथ्यावदनं च ( अवति ) रक्षति ( हिनस्ति )
दुःखयति ॥
१. पू. सं. “आप्रक्रम्य” इति पाठः ॥ सम्पा० ॥

कण्डिका १ ॥ आख्यायिका—अतिरात्र यज्ञ में से इन्द्र और

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १ ४५३
ब्रुवन् । तद्यदपिशर्वर्या अपिस्मसीत्यब्रुवन्, तदपिशर्वराणामपिशर्वरत्वम् । शर्व-
राणि खलु ह वा अस्यैतानि छन्दांसीति ह स्माह । एतानि ह वा इन्द्रं रात्र्यास्त-
मसो मृत्योरभिपत्यावारयन्, तदपिशर्वराणामपिशर्वरत्वम् ॥ १ ॥
कण्डिका १ ॥ आख्यायिका—अतिरात्र यज्ञ में से इन्द्र और
छन्दों ने तीन पर्य्यायों में असुरों को निकाल दिया ॥
( ओम् ) ओम् [ हे परमेश्वर ] । ( देवाः वै अहः आश्रयन्त, असुराः रात्रीम् )
देवताओं ने दिन [ प्रकाश वा ज्ञान ] का आश्रय लिया और असुरों ने रात्रि [ अन्धकार
वा अज्ञान ] का । ( ते असुराः समावद्वीर्याः एव आसन् नो व्यावर्तन्त ) वे असुर
[ देवताओं के ] तुल्य पराक्रमी निश्चय करके थे, [ इसलिये ] वे न हटे । ( सः इन्द्रः
अब्रवीत् कः च अहं च इमान् असुरान् रात्रीम् अनु अवेष्यामहै इति ) वह इन्द्र
बोला—कौन और मैं [ हम दोनों ] इन असुरों को रात्रि में ढूंढकर निकाल दें । ( सः देवेषु
न प्रत्यविन्दत्, रात्रेः तमसः अबिभयुः ) उसने देवताओं में ढूंढकर [ किसी को भी ]
न पाया, वे रात्रि के अन्धकार से डर गये । ( मृत्योः तमः इव हि रात्रिः, मृत्युः वै
तमः ) मृत्यु के अन्धकार के समान ही रात्रि है, मृत्यु [ के समान ] ही अन्धकार है ।
( तस्मात् ह अपि एतर्हि नक्तं भूयान् इव सः यावन्मात्रम् इव अपक्रम्य बिभेति )
इसलिये ही अब भी रात्रि में अधिकतर वह [ प्रत्येक मनुष्य ] थोड़ा भी बाहर जाकर
डरता है । ( छन्दांसि एव तं वै अनु अवायन् ) छन्द [ आह्लादक गायत्री आदि ] ही
उस [ इन्द्र ] के साथ साथ चले । ( तत् यत् छन्दांसि एव अनु अवायन्, तस्मात् इन्द्रः
च छन्दांसि च रात्रिं वहन्ति, न निवित् शस्यते, न पुरोरुक् न धाय्या, न अन्या
देवता ) सो जो छन्द ही साथ साथ चले, इसलिये इन्द्र और छन्द रात्रि [ अतिरात्र यज्ञ ]
को चलाते हैं, न निवित् [ निश्चित विद्या स्तुति विशेष ] बोली जाती है, न पुरोरुक्
[ आगे से प्रसन्न करने वाली स्तुति विशेष ] न धाय्या [ धारण करने योग्य, सामिधेनी
ऋचा ] न दूसरा देवता । ( इन्द्रः च हि एव छन्दांसि च रात्रिं वहन्ति, तान् वै
पर्य्यायैः पर्य्यायम् अनुदन्त ) इन्द्र और छन्दों ने ही रात्रि [ अतिरात्र यज्ञ ] को
चलाया, उन्होंने उन [ असुरों ] को ही पर्य्यायों [ क्रम क्रम से ] घेरकर निकाल दिया ।
( यत् पर्य्यायैः पर्य्यायम् अनुदन्त, तस्मात् पर्य्यायाः, तत् पर्य्यायाणां पर्य्यायित्वम् )
१—( आश्रयन्त ) आ-अश्रयन्त । आश्रितवन्तः । सेवितवन्तः ( समाव-
द्वीर्याः ) पूर्वपदस्य दीर्घत्वं मतुपो योजनं चार्षम् । समवीर्याः । तुल्यपरा-
क्रमाः ( नो ) निषेधे ( व्यावर्तन्त ) वि+आ+वृतु वर्तने—लङ् । निवृत्ता अभवन्
( अनु ) अनुगम्य ( अवेष्यामहै ) अव+आ+इष गतौ—लोट् । निःसारयाम
( प्रत्यविन्दत ) प्रतीक्ष्य प्राप्तवान् (अबिभयुः) भीताः अभवन् (तमसः) अन्धकारात्
( एतर्हि ) इदानीम् ( भूयान् ) बहुतरः ( यावन्मात्रम् ) यत्किंचित् ( इव ) एव ।
अपि ( छन्दांसि ) गायत्र्यादीनि छन्दांसि ( अन्ववायन् ) अनु+अव+इण्
गतौ—लङ् । अनुगम्य प्राप्ताः ( रात्रिम् ) रात्रिभवमतिरात्रयज्ञम् ( वहन्ति )

कण्डिका २ ॥

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४५४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० १
जो पर्यायों से घेरकर [ उनको ] उन्होंने निकाला, इसलिये वे पर्याय [ घूमकर आने
वाले ] हैं, वह ही पर्यायों का पर्यायिपन है । ( तान् वै प्रथमैः एव पर्यायैः पूर्वरात्रात्
अनुदन्त, मध्यमै मध्यरात्रात्, उत्तमैः अपररात्रात् ) उन [ असुरों ] को उन्होंने
पहिले पर्यायों [ घूमकर आने के व्यवहारों ] के द्वारा रात्रि के पहिले भाग से निकाला,
मध्यमों के द्वारा मध्यरात्रि से और पिछलों के द्वारा पिछली रात्रि से । ( अपिशर्वर्याः
अपिस्मसि-इति अब्रुवन् ) वे [ छन्द ] बोले--निश्चित रात्रि से [ असुरों के निकालने
को ] हम उपस्थित हुये हैं । ( तत् यत् अपिशर्वर्याः अपिस्मसि. इति अब्रुवन्, तत्
अपिशर्वराणाम् अपिशर्वरत्वम् ) जो उन [ छन्दों ] ने कहा-निश्चित रात्रि से
[ असुरों के निकालने को ] हम उपस्थित हुये हैं, इसलिये अपिशर्वरों [ निश्चित नाश
करने वालों ] का अपिशर्वरत्व [ निश्चित नाश करने वाला व्यवहार ] है । ( शर्वराणि
खलु ह वै अस्य एतानि छन्दांसि इति ह स्म आह ) [ निश्चय करके असुरों के ] नाश
करने वाले इस [ यज्ञ ] के यह छन्द हैं-यह वह [ ऋषि ] कहता है । ( एतानि ह वै
इन्द्रं रात्र्याः मृत्योः तमसः अभिपत्य अवारयन्, तत् अपिशर्वराणाम् अपिशर्वरत्वम्)
इन [ छन्दों ] ने ही इन्द्र को रात्रि के मृत्यु [ के समान ] अन्धकार से निकाल कर स्वीकार
किया, इसलिये अपिशर्वरों [ निश्चित नाश करने वालों ] का अपिशर्वरत्व [ निश्चित
नाश करने वाला व्यवहार ] है ॥ १ ॥
भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि सदा सावधान रह कर पर्यायों अर्थात् पहरुओं
द्वारा परस्पर रक्षा करें जिससे निशाचर चोर डाकू आदि कष्ट न देवें ॥ १ ॥
विशेषः-इस कण्डिका को मिलाओ-ऐ० ब्रा० ४ । ५ ॥
कण्डिका २ ॥
प्रथमेषु पर्य्या॑यिषु स्तुवते, प्रथमान्येव पदानि पुनराददते । यदेवैषां मनो-
रथा आसन्, तदेवैषा॒न्तेना॑ददते । मध्यमेषु पर्य्या॑यिषु स्तुवते, मध्यमान्येव पदानि
पुनराददते । यदेवैषामश्वा गाव आसन्, तदेवैषां तेनाददते । उत्तमेषु पर्या-
येषु स्तुवते, उत्तमान्येव प॑दानि पुनराददते । यदेवैषां वासो हिरण्यं मणिरध्या-
निर्वहन्ति ( निर्वित् ) सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविद० ( पा० ३ । २ । ६१ ) नि + विद ज्ञाने-
क्विप् । निर्वित्, वाङ्नाम-निघ० १ । ११ । निश्चितविद्या । स्तुतिविशेषः
( पुरोरुक् ) पुरः+रुच दीप्तावभिप्रीतौ च-क्विप् । स्तुतिविशेषः ( धाय्या )
पाय्यसान्नाय्यनिकाय्यधाय्या० ( पा० ३ । १ । १२६ ) दधातेर्ण्यत् । अग्निज्वालनार्था
ऋक् । सामिधेनी ( पर्यायैः ) परि+इण् गतौ-घञ् । अनुक्रमैः ( पर्यायम् )
पर्याय-णमुल् । परीत्य ( अनुदन्त ) निःसारितवन्तः ( पूर्वरात्रात् ) रात्रिप्रथम-
भागात् ( अपिशर्वर्याः ) कृगृशॄपृवृंच्वतिभ्यः ष्वरच् ( उ० २ । १ - १ ) शॄ हिंसायाम्-
ष्वरच्, ङीष् । निश्चयेन रात्रेः सकाशात् ( अपिस्मसि ) अपिस्मः । निश्चयेन
तिष्ठामः ( अपिशर्वराणाम् ) निश्चयेन असुरादिनाशकानाम् ( शर्वराणि ) असुर-
नाशकानि ( अभिपत्य ) उद्धृत्य ( अवारयन् ) स्वीकृतवन्तः ॥

कण्डिका २॥ अतिरात्र यज्ञ के तीन पर्यायों में तीन

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ क० ३ ॥ ४५५
तममासीत्, तदेवैषां तेनाददते। आ द्विषतो वसु दत्ते, निरेवैनमेभ्यः सर्वेभ्यो
लोकेभ्यो नुदते, य एवं वेद ॥ २ ॥
कण्डिका २॥ अतिरात्र यज्ञ के तीन पर्यायों में तीन
प्रकार से स्तुति ॥
(प्रथमेषु पर्य्यायेषु स्तुवते, प्रथमानि एव पदानि पुनः आददते) पहिले
पर्यायों में वे [ऋत्विज्] स्तुति करते हैं, [मन्त्रों के] पहिले ही पदों को वे दो बार
लेते हैं [बोलते हैं]। (यत् एव एषां मनोरथाः आसन्, एषां तत् एव तेन आददते)
जो कुछ भी इन [असुरों] के मनोरथ होते हैं, उनके उन [मनोरथों] को उसके द्वारा
वे ले लेते हैं। (मध्यमेषु पर्य्यायेषु स्तुवते, मध्यमानि एव पदानि पुनः आददते)
मध्य वाले पर्यायों में वे स्तुति करते हैं, [मन्त्रों के] मध्य वाले ही पदों को वे दो बार
लेते हैं। (यत् एव एषाम् अश्वाः गावः आसन्, एषां तत् एव तेन आददते) जो
कुछ भी इन [असुरों] के घोड़े और गौयें हैं उनके उनको ही वे उस के द्वारा ले लेते हैं।
(उत्तमेषु पर्य्यायेषु स्तुवते, उत्तमानि एव पदानि पुनः आददते) पिछले पर्यायों में
वे स्तुति करते हैं, [मन्त्रों के] पिछले ही पदों को वे दो बार लेते हैं। (यत् एव एषां
वासः हिरण्यं मणिः अध्यात्मम् आसीत्, एषां तत् एव तेन आददते) जो कुछ भी
इन [असुरों] का वस्त्र, सुवर्ण, और मणि शरीर पर वर्तमान है, उनका उसको ही
उसके द्वारा वह ले लेते हैं। (द्विषतः वसु आदत्ते, एनम् एभ्यः सर्वेभ्यः लोकेभ्यः
एव निर् नुदते, यः एवं वेद) वह [मनुष्य] शत्रु का धन ले लेता है और इस [शत्रु]
को इन सब लोकों से निकाल देता है, जो ऐसा विद्वान् है ॥ २ ॥
भावार्थः-नीति निपुण पुरुष सावधानी से शत्रुओं को अनेक प्रकार से आधीन
करें ॥ २ ॥
विशेष :-इस कण्डिका को मिलाओ-ऐ० ब्रा० ४। ६ ॥
कण्डिका ३ ॥
पवमानवदहरित्याहुः, न रात्रिः पवमानवती, कथमुभे पवमानवती भवतः,
केन ते समावद्ब्राजौ भवत इति । यदेवेन्द्राय मन्द्रने सुतमिदं वसो सुतमन्ध इदं
ह्यान्वोजसा सुतमिति स्तुवन्ति च शंसन्ति च, तेन रात्रिः पवमानवती, तेनोभे
पवमानवती भवतः, तेन ते समावद्ब्राजौ भवतः। पञ्चदशस्तोत्रमहरित्याहुः, न
रात्रिः पञ्चदशस्तोत्रा, कथमुभे पञ्चदशस्तोत्रे भवतः, केन ते समावद्ब्राजौ भवत
इति । द्वादशस्तोत्राण्यपिशर्वराणि तिसृभिर्देवताभिः सन्धिना रायन्तरेणाश्विना
२-(स्तुवते) स्तुवन्ति (पुनः) द्विवारम् (आददते) गृह्णन्ति (मनो-
रथाः) इच्छाव्यवहाराः (एषाम्) असुराणाम् (आसन्) सन्ति (अध्यात्मम्)
आत्मानं शरीरमधिकृत्य वर्तमानम् । शरीरे अवस्थितम् (आसीत् ) अस्ति
(द्विषतः) शत्रोः (आदत्ते) गृह्णाति ॥

कण्डिका ३ ॥ अतिरात्र यज्ञ में पवमान आदि स्तोत्रों का विचार ॥

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४१६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३ ॥
यः स्तुवते, तेन रात्रिः पञ्चदशस्तोत्रा, तेनोभे पञ्चदशस्तोत्रे भवतः, तेन ते समा-
वद्भाजी भवतः । परिमितं स्तुवन्त्यपरिमितमनुशंसन्ति, परिमितं भूतमपरिमितं
भव्यमपरिमितान्येवावरुन्द्ध्यादित्यतिशंसन्ति । स्तोममति वै प्रजास्यात्मानमति
पशवः । तद्यदेवास्यात्या१त्मानन्तदेवास्यैतेनाप्याययन्ति । अथो द्वयं वा इदं सर्वं स्नेह-
श्चैव तत्तेजश्च । अथ तदहोरात्राभ्यामाप्तं२ स्नेहतेजसोराप्त्यै । गायत्रीं स्तोत्रियानु-
रूपं शंसन्ति, तेजो वै गायत्री, तमः पाप्मा, रात्रिस्तेन तेजसा तमः पाप्मानन्तरन्ति
पुनरादाय३, शंसन्ति । एवं हि सामगाः स्तुवते, यथास्तुतमनुशस्तं भवति । न हि
तत् स्तुतं यन्नानुशस्तम् । तदाहुः, अथ कस्मादुत्तमात् प्रतीहारादाहूय साम्ना
शस्त्रमुपसन्तन्वन्तीति ॥ ३ ॥
कण्डिका ३ ॥ अतिरात्र यज्ञ में पवमान आदि स्तोत्रों का विचार ॥
( पवमानवत् अहः इति आहुः, रात्रिः पवमानवती न, कथम् उभे पव-
मानवती भवतः, केन ते समावद्भाजौ भवतः इति ) वे [ ब्रह्मवादी ] कहते हैं दिन
[ यज्ञ ] पवमान स्तोत्र वाला है, और रात्रि [ यज्ञ ] पवमान स्तोत्र वाली नहीं है, कैसे
दोनों [ दिन और रात ] पवमान स्तोत्र वाले होते हैं और किस कारण से वे दोनों एक से
भाग वाले होते हैं । [ इसका समाधान ] ( इन्द्राय मद्वने सुतम्. इदं वसो सुतमन्धः,
इदं हि अन्वोजसा सुतम् इति—यत् एव स्तुवन्ति च शंसन्ति च, तेन रात्रिः पव-
मानवती, तेन उभे पवमानवती भवतः, तेन ते समावद्भाजौ भवतः ) इन्द्राय
मद्वने सुतम्.......ऋ० ८ । ६२ । १६, [ सायणभाष्य ८१ ] । साम० उ० २ । ७ । ४ ।
इदं वसो सुतम् अन्धः.......ऋ० ८ । २ । १, सा० पू० २ । ३ । १०, इदं हि अनु ओजसा
सुतम्.......ऋ० ३ । ५१ । १०, सा० पू० २ । ८ । १, इन [ तीन मन्त्रों ] से वे [उद्गाता
लोग ] स्तोत्र पढ़ते हैं और [ होता लोग ] शस्त्र पढ़ते हैं, इससे रात्रि पवमान स्तोत्र
वाली है [ क्योंकि तीनों मन्त्रों में सुत—निचोड़ा गया सोम—शब्द पवमानवाची है ], इस
से दोनों पवमान स्तोत्र वाले हैं, इस कारण से वे दोनों एकसे भाग वाले हैं ॥
( पञ्चदश स्तोत्रम् अहः इति आहुः रात्रिः पञ्चदश स्तोत्रा न, कथम् उभे
पञ्चदश स्तोत्रे भवतः, केन ते समावद्भाजौ भवतः इति ) वे [ ब्रह्मवादी ] कहते
३— (पवमानवत्) पवमानस्तोत्रयुक्तम् ( उभे ) अहोरात्रे ( समावद्भाजौ )
समानभागयुक्ते ( मद्वने ) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (पा० ३ । २ । ७५) मदी हर्षे
—क्वनिप् । हर्षशीलाय ( सुतम् ) अभिषुतं सोमम् ( वसो ) हे वासयितः ( अन्धः )
अन्नम् ( ओजसा ) बलेन (स्तुवन्ति) उद्गातारः स्तोत्रं पठन्ति ( शंसन्ति ) होतारः
शस्त्रं पठन्ति ( पवमानवती ) पवमानस्तोत्रयुक्ता । तथा द्विवचनस्य ईकारादेशः
१. पू. सं. 'त्या' पाठः नास्ति ॥ २. पू. सं. 'आप्यं' इति पाठः ॥
३. पू. सं 'आदायं' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३ ।। ४५७
हैं—दिन पन्द्रह स्तोत्र वाला है, और रात्रि पन्द्रह स्तोत्र वाली नहीं है, कैसे दोनों [ दिन
और रात्रि ] पन्द्रह स्तोत्र वाले हैं और किस कारण से वे दोनों एक से भाग वाले होते हैं।
[ इस का समाधान ] ( द्वादश स्तोत्राणि अपिशर्वराणि तिसृभिः देवताभिः, रायन्त-
रेण सन्धिना अश्विना यः स्तुवते, तेन रात्रिः पञ्चदशस्तोत्रा, तेन उभे पञ्चदश-
स्तोत्रे भवतः तेन ते समावद्भाजो भवतः ) तीन देवताओं सहित बारह स्तोत्र वाले
अपिशर्वरस्तोत्र हैं [ आगे विशेषः ४ देखो, उन स्तोत्रों में ] रथन्तर साम की ध्वनि वाले
सन्धि [ प्रातःकालीन स्तोत्र ] से दोनों अश्विनों [ दिन रात के मेल ] को जो [ ऋत्विज् ]
स्तुति करता है, उस से रात पन्द्रह स्तोत्र वाली है, उससे वे दोनों पन्द्रह स्तोत्र वाले होते
हैं, और उसी कारण से वे दोनों एक से भाग वाले होते हैं। ( परिमितं स्तुवन्ति, अप-
रिमितम् अनुशँसन्ति ) परिमित [ गिने हुये मन्त्र युक्त ] स्तोत्र पढ़ते हैं और अपरिमित
[ बेगिनती मन्त्र वाला ] अनुशास्त्र [ स्तोत्र के पीछे पढ़ा गया स्तोत्र ] वे पढ़ते हैं। ( परि-
मितं भूतम्, अपरिमितं भव्यम् ) परिमित [ सीमाबद्ध ] भूतकाल है और अपरिमित
[ सीमा बिना ] भविष्यकाल है। (अपरिमितानि एव अवरुन्ध्यात् इति अति-
शंसन्ति ) अपरिमितों [ सीमा बिना फलों ] को वह प्राप्त करे, इसलिये वे अति शस्त्र
[ स्तोत्रों से अधिक शस्त्र ] पढ़ते हैं। ( स्तोमम् अति, अस्य आत्मानम् अति वै प्रजा
पशवः ) स्तोत्र से अधिक [ जैसे अनुशस्त्र हैं, वैसे ] इस के आत्मा से अधिक प्रजा [ पुत्र
पौत्र आदि ] और पशु [ गो, घोड़ा हाथी आदि ] होते हैं। ( तत् यत् एव अस्य आत्मा-
नम् अति, अस्य तत् एव एतेन आप्याययन्ति ) जो वे [ प्रजा और पशु ] इस के
आत्मा से अधिक होते हैं, उसके उनको इस व्यवहार से वे बढ़ाते हैं॥
( अथो द्वयं वै इदं सर्वं स्नेहः च एव तत् तेजः च ) फिर यह सब दो हैं स्नेह
और वह तेज ही [ रात्रि का रस और दिन का प्रकाश ]। ( अथ तत् अहोरात्राभ्याम्
आप्तम्, स्नेहतेजसोः आप्त्यै ) फिर जो कुछ दिन और रात्रि से पाने योग्य है, वह
(वा० पा० ७ । १ । ३६) पवमानवत्यौ१ (सन्धिना) प्रातःसन्धिना (रायन्तरेण) रथ-
न्तरसामध्वनियुक्तेन(अश्विना)अशूङ् व्याप्तौ–क्वन्,इनिः। अश्विनौ यद् व्यश्नुवाते
सर्वं रसेनान्यो ज्योतिषान्यः अहोरात्रावित्येके—निरु० १२ । १ । व्याप्तिमन्तौ ।
अहोरात्रौ । सूर्याचन्द्रमसौ (परिमितम्) परिमितमन्त्रोपेतम् (अनुशंसन्ति)
स्तोत्रपश्चात् शस्त्रं पठन्ति (परिमितम्) सीमाबद्धम् (अपरिमितम्) सीमार-
हितम् (अवरुन्ध्यात्) प्राप्नुयात् (अतिशंसन्ति) स्तोत्रगतामृक्संख्यामतिलङ्घ्य
होतारः शस्त्रं पठन्ति (स्तोमम्) स्तोत्रम् (अति) अतीत्य । उल्लङ्घ्य (प्रजा)
पुत्रपौत्रादिरूपा (अस्य) यजमानस्य (स्नेहः) रसः। आर्द्रम् (आप्तम्) प्राप्त-
१—यह सिद्धि ठीक नहीं है। यह 'पवमानवती' शब्द को नपुंसकलिङ्ग का द्वि-
वचन मान कर की गई है, पर वस्तुतः यह शब्द स्त्रीलिङ्ग द्विवचन का है। जैसा कि इसके
विशेषण 'उभे' शब्द से प्रकट है। यद्यपि ऐसी स्थिति में पवमानवत्यौ बनना चाहिये। पुन-
रपि 'वाच्छन्दसि' के नियम से पूर्वसवर्ण दीर्घ होकर 'पवमानवती' शब्द साधु सिद्ध होता
है ॥ सम्पा० ॥

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४५८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ३
[ यजमान के ] स्नेह और तेज [ रस और प्रताप ] की प्राप्ति के लिये है । ( गायत्रीं
स्तोत्रियानुरूपं शंसन्ति ) गायत्री ' छन्द वा मन्त्र ] में स्तोत्रिय अनुरूप को वे बोलते
हैं । ( तेजः वै गायत्री, तमः पाप्मा ) तेज ही गायत्री है, अन्धकार पाप है । ( तेन
तेजसां रात्रिः तमः पाप्मानं तरन्ति, पुनः [ तेजः ] आदाय शंसन्ति ) उस
[ गायत्री रूप ] तेज से रात्रि के अन्धकार [ समान ] पाप को वे पार करते हैं, और फिर
[ तेज ] ग्रहण करके वे बोलते हैं [ शस्त्र पढ़ते हैं ] । ( एवं हि सामगाः स्तुवते यथा
स्तुतम् अनुशस्तं भवति ) ऐसे ही सामगायक [ उद्गाता लोग ] स्तोत्र बोलते हैं कि स्तुति
के योग्य अनुशस्त्र होवे । (तत् स्तुतं न हि, यत् अनुशस्तं न ) वह स्तोत्र नहीं है जिस
में अनुशस्त्र न हो । ( तत् आहुः, अथ कस्मात् उत्तमात् प्रतीहारात् आहूय साम्ना
शस्त्रम् उपसन्तन्वन्ति इति ) वे कहते हैं—फिर किसलिये सबसे पिछले प्रतीहार
[ प्रतिहर्ता के गाने योग्य स्तोत्र ] से बोलकर सामगान के साथ शस्त्र को समीप में वे
बढ़ाते हैं [ इसका उत्तर ऊपर आ चुका है ] ॥ ३ ॥
भावार्थः अवसर को विचार कर स्तुति करनी योग्य है ॥ ३ ॥
विशेषः १—इस कण्डिका को मिलाओ—ऐ० ब्रा० ४ । ६ ॥
विशेषः २—( उभ ) के स्थान में ( उभे ) ऐ० ब्रा० से शुद्ध किया गया है ॥
विशेषः ३—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१--इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः अर्कमर्चन्तु कारवः—ऋग्०
८ । ६२ । १९, [ सायण भाष्य ८१ ] । साम० २ । ७ । ४ ॥ ( नः गिरः ) हमारी
वाणियां ( मद्वने ) हर्षशील ( इन्द्राय ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले वीर पुरुष ] के लिये
( सुतम् ) सुत [ निचोड़े हुये तत्त्व रस ] को ( परि स्तोभन्तु ) सब ओर से सराहें,
और ( कारवः ) स्तुति करने वाले लोग ( अर्कम् ) पूजनीय [ वीर ] को (अर्चन्तु ) पूजें ॥
२--इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते—ऋग्०
८ । २ । १, साम० पू० ३ । २ । १० ॥ ( वसो ) हे वसु ! [ वसाने वाले इन्द्र राजन् ]
( इदम् ) इस ( सुतम् ) सुत [ निचोड़े हुये ] ( अन्धः ) अन्न [ तत्त्वरस ] को ( सुपूर्णम्
उदरम् ) भले प्रकार भर पेट ( पिब ) पी, ( अनाभयिन् ) हे निर्भय ! ( ते ) तुझे
( ररिम ) [ वह ] हम देते हैं ॥
३—इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधांनां पते । पिबा त्व१स्य गिर्वणः—ऋ०
३ । ५१ । १०, साम० पू० २ । ८ । १ ॥ ( राधांनां पते ) हे धनों के स्वामी ! [ इन्द्र
राजन् ] ( इदं हि ) यह ही ( ओजसा ) बल के साथ ( अनु ) निरन्तर ( सुतम् ) सुत
[ निचोड़ा गया तत्त्व रस ] है, ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ! ( अस्य ) इस
[ तत्त्वरस ] का ( तु ) ( पिब ) पान कर ॥
व्यम् ( आदाय ) गृहीत्वा ( सामगाः ) उद्गातारः ( प्रतीहारात् ) प्रति + हृञ्
हरणे-घञ् वा दीर्घः । प्रतिहर्त्रा गातव्यात् स्तोमात् ॥

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५। क० ४ ४५९
विशेषः ४-बारह स्तोत्र वाले अपिशर्वरे छह मन्त्र प्रातः सन्धि में रथन्तर साम
की ध्वनि से गाये जाते हैं। छह मन्त्रों के अर्धर्च अर्धर्च करके पाठ करने से बारह हो जाते
है [ देखो—गो० उ० ६ । ८ ], तीन देवता इस प्रकार हैं—पहिले और दूसरे मन्त्र अग्नि,
तीसरे और चौथे उषा तथा पांचवें और छठे अश्विनौ देवता वाले हैं। सामवेद में यह छह
मन्त्र एक स्थान पर हैं ॥
१, २ अग्निदेवता ॥
१--एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिं स्वध्वरं
विश्वस्य दूतममृतम्--ऋग्० ७ । १६ । १ यजु० १५ ० ३२, साम० १ । २ । १३ ।।
( एना नमसा ) इस अन्न वा सत्कार से ( वः ) तुम्हारे लिये ( ऊर्जः नपातम् ) पराक्रम
के न गिराने वाले, ( प्रियम् ) प्रिय, ( चेतिष्ठम् ) अत्यन्त चेताने वाले, ( अरतिम् )
गति वाले [ पुरुषार्थी ], ( स्वध्वरम् ) अच्छे प्रकार हिंसा रहित व्यवहार वाले, ( विश्वस्य
दूतम् ) सबके कार्य साधने वाले, ( अमृतम् ) न मरने वाले ( अग्निम् ) अग्नि [ अग्नि के
समान तेजस्वी विद्वान् ] को ( आ हुवे ) मैं बुलाता हूं ॥
२- स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत् स्वाहुतः । सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी
वसूनां देवं राधो जनानाम्-ऋ० ७ । १६ । २, यजु० १५ । ३३, ३४ भेद से,
साम० उ० १ । २ । १३ ।। ( सः ) वह [ अग्नि समान तेजस्वी विद्वान् ] ( विश्व-
भोजसा ) संसार के रक्षा करने वाले ( अरुषा ) तेज से ( योजते ) युक्त होता है,
( स्वाहुतः ) अच्छे प्रकार बुलाया गया ( सः ) वह ( दुद्रवत् ) शीघ्र पहुँचता है, वह
( सुब्रह्मा ) सुन्दर अन्न वा धनों वाला वा अच्छे प्रकार चारों वेद जानने वाला, ( यज्ञः )
संगति योग्य ( सुशमी ) सुन्दर कर्मों वाला, ( जनानाम् ) मनुष्यों के लिये ( वसूनाम् )
धनों के बीच ( देवम् ) प्रकाशमान ( राधः ) धन [ के समान ] है ॥
३ ४ उषा देवता ॥
३-प्रत्यु अदर्श्यायत्यु१ च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो महि व्ययति चक्षसे तमो
ज्योतिष्कृणोति सूनरी- ऋ० ७ । ८१ । १, साम० उ० १ । २ । १४ भेद से ।।
( आयती ) आती हुई ( उच्छन्ती ) अन्धकार निकालती हुई ( दिवः ) सूर्य की
( दुहिता ) पुत्री [ उषा, प्रभात वेला ] ( उ ) निश्चय करके ( प्रति अदर्शि ) प्रत्यक्ष
देखी जाती है, वह ( महि तमः ) बड़े अन्धकार को ( अपो व्ययति ) हटा देती है,
( सूनरी ) सुन्दर नेत्री [ अच्छे प्रकार ले चलने वाली वह ] ( चक्षसे ) देखने के लिये
( ज्योतिः ) ज्योति [ उजाला ] ( कृणोति ) करती है ॥
४-उदुस्रियाः सृजते सूर्यः सचाँ उद्यन् नक्षत्रमर्चिवत् । तवेदुषो व्युषि
सूर्यस्य च सं भक्तेन गमेमहि-ऋग्० ७ । ८१ । २, साम० उ० १ । २ । १४ ।।
( अर्चिवत् ) किरणों वाला ( नक्षत्रम् ) नक्षत्र, [ अर्थात् ] ( उद्यन् ) उदय होता
हुआ ( सूर्यः ) सूर्य ( उस्रियाः ) किरणों को ( सचा ) एक साथ ही ( उद् सृजते )
ऊपर को छोड़ता है। ( उषः ) हे उषा ! [ प्रभात वेला ] ( तव ) तेरे ( च ) और

कण्डिका ४ ॥

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४६० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ४
( सूर्यस्य ) सूर्यं के ( उत् ) ही ( व्युषि ) प्रकाश में ( भक्तेन ) अपने विभाग वा
अन्न से ( सं गमेमहि ) हम मेल करें ॥
५, ६ अश्विनौ देवते ॥
५-इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना । अयं वामह्वेऽवसे
शचीवसू विशंविशं हि गच्छथः - ऋग्० ७ । ७४ । १, साम० उ० १ । २ । १५ ॥
( अश्विना ) हे अश्वियो ! [ दिन रात ] ( इमाः ) यह ( दिविष्टयः ) प्रकाश
चाहने वाली [ प्रजायें ] ( उस्रा वाम् ) निवास कराने वाले तुम दोनों को ( उ ) ही
( हवन्ते ) बुलाती हैं, ( शचीवसू ) हे कर्म वा बुद्धि का धन रखने वाले ! ( अयम् )
यह मैं ( वाम् ) तुम दोनों को ( अवसे ) रक्षा के लिये ( अह्वे ) बुलाता हूं, ( हि )
क्योंकि ( विशंविशम् ) प्रजा प्रजा को ( गच्छथः ) तुम प्राप्त होते हो ॥
६-युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथां सूनृतावते । अर्वाग्रथं समनसा
नि यच्छतं पिबतं सोम्यं मधु-ऋग्० ७ । ७४ । २, साम० उ० २ । । १५ ॥
( नरा ) हे नरो ! [ नेताओ, वीरो ] ( युवम् ) तुम दोनों ( चित्रम् ) अद्भुत
( भोजनम् ) भोजन ( ददथुः ) धारण करते हो और ( सूनृतावते ) सुन्दर वेदवाणी
वाले पुरुष को ( चोदेथाम् ) [ उसे ] भेजते हो, ( समनसा ) समान मन वाले तुम
दोनों ( रथम् ) रथ [ रमणीय स्वरूप ] को ( अर्वाक् ) सामने ( नि यच्छतम् ) नियम
से लाओ और ( सोम्यम् ) सोम [ ओषधियों ] के ( मधु ) मधु [ मीठे रस ] को
( पिबतम् ) पीओ ॥
कण्डिका ४ ॥
पुरुषो वै यज्ञः, तस्य शिर एव हविर्धानं, मुखमाहवनीयः, उदरं सदः,
अन्तरूक्थानि बाहू मार्जालीयश्चाग्नीध्रीयश्च, या इमा देवतास्ते अन्तःसदः,
सन्धिष्ठचाप्रतिष्ठे गार्हपत्यव्रतश्रवणो इति । अथापरन्तस्य, मन एव ब्रह्मा, प्राण
उद्गाता, अपानः प्रस्तोता, व्यानः प्रतिहर्त्ता, वाग्घोता, चक्षुरध्वर्युः, प्रजापतिः
सदस्यः, अङ्गानि होत्राशंसिनः, आत्मा यजमानः । तद्यदध्वर्युः स्तोत्रमुपाकरोति
सोमः पवत इति, चक्षुरेव तत् प्राणैः सन्दधाति । अथ यत् प्रस्तोता ब्रह्माणमा-
मन्त्रयते, ब्रह्मन् स्तोष्यामः प्रशास्तरिति । मनोज्ञणीर्भवति एतेषां प्राणानां,
मनसा हि प्रसूताः स्तोमेन स्तु१यामइति, प्राणानेव तत् मनसा सन्दधाति ।
अथ यद् ब्रह्मा स्तुतेत्युच्चैरनुजानाति, मनो वै ब्रह्मा, मन एव तत् प्राणैः
सन्दधाति । अथ यत् प्रस्तोता प्रस्तौति, अपानमेव तत् प्राणैः सन्दधाति । अथ
यत् प्रतिहर्त्ता प्रतिहरति, व्यानमेव तदपानैः सन्दधाति । अथ यदुद्गातोद्गा-
यति, समानमेव तत् प्राणैः सन्दधाति । अथ यद्धोता साम्ना शस्त्रमुपसन्तनोति,
वाग्वै होता, वाचमेव तत् प्राणैः सन्दधाति । अथ यत् सदस्यो ब्रह्माणमुपासी-
दति, प्रजापतिर्वै सदस्यः, प्रजापतिमेवाप्नोति । अथ यद्धोत्राशंसिनः साम२ सन्तति
कुर्वन्ति, अङ्गानि वै होत्राशंसिन, अङ्गान्येवास्य तत् प्राणैः सन्दधाति । अथ
१. पू. सं. 'स्तयाम' इति पाठः ॥ २. पू. सं. 'सामं सन्तति' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥

कण्डिका ४ ॥ यज्ञ का मनुष्य के अङ्गों और ऋत्विजों का प्राणों

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गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ५ । क० ४ ॥ ४६१
यद्यजमानः स्तोत्रमुपासीदति, आत्मा वै यजमानः, आत्मानमेवास्य तत् कल्पयति ।
तस्मान्नैनं बहिर्वेद्यभ्याश्रावयेयुर्नाभ्युदियान्नाभ्यस्तमियान् नाधिष्ण्ये प्रतपेन्नेव
प्राणेभ्य आत्मानमन्तरगादिति ॥ ४ ॥
कण्डिका ४ ॥ यज्ञ का मनुष्य के अङ्गों और ऋत्विजों का प्राणों
आदि के दृष्टान्त से वर्णन ॥
( पुरुषः वै यज्ञः ) पुरुष [ के समान ] ही यज्ञ है । ( तस्य शिरः एव हवि-
र्धानम् ) उस [ यज्ञ ] का शिर हविर्धान [ हविःस्थान ] ही है, ( मुखम् आहवनीयः )
मुख आहवनीय [ अग्नि ] है, ( उदरं सदः ) पेट सद [ यज्ञशाला ] है, ( अन्तः उक्-
थानि ) भीतर वाली [ आंत ] उक्थ [ स्तोत्र ] हैं, ( बाहू मार्जालीयः च आग्नी-
ध्रीयः च ) दोनों भुजायें मार्जालीय [ शुद्धिस्थान ] और आग्नीध्रीय [ अग्नि का स्थान ]
हैं, ( याः इमाः देवताः ते अन्तःसदः ) जो यह देवता [ इन्द्रियां ] हैं, वे भीतर बैठने.
वाले [ सभासद ] हैं, ( सन्धिष्ठचाप्रतिष्ठे गार्हपत्यव्रतश्रवणौ इति ) सन्धिष्ठ्या और
प्रतिष्ठा [ पैर की गांठ और तलुआ दोनों ] गार्हपत्य और व्रत श्रवण [ यज्ञाग्नि
विशेष ] हैं ॥
( अथ तस्य अपरम् ) फिर इस [ यज्ञ ] का दूसरे प्रकार [ वर्णन ] है । ( मन
एव ब्रह्मा ) मन [ यज्ञ के मन समान ] ही ब्रह्मा [ चारों वेद जानने वाला ऋत्विज् ] है,
( प्राणः उद्गाता ) प्राण उद्गाता है, ( अपानः प्रस्तोता ) अपान प्रस्तोता है, ( व्यानः
प्रतिहर्ता ) व्यान प्रतिहर्ता है, ( वाक् होता ) वाक् [ जिह्वा ] होता है, ( चक्षुः अध्वर्युः )
नेत्र अध्वर्यु है, ( प्रजापतिः सदस्यः ) प्रजापति [ प्रजाओं इन्द्रियों का पालने वाला
व्यवहार ] सदस्य है, ( अङ्गानि होत्राशंसिनः ) अङ्ग होत्राशंसी [ ऋचा बोलने वाले ]
लोग हैं, ( आत्मा यजमानः ) और आत्मा [ समान ] यजमान है । ( सोमः पवते······
–इति तत् यत् अध्वर्युः स्तोत्रम् उपाकरोति, चक्षुः एव तत् प्राणेः सन्दधाति )
सोमः पवते······१, इस मंत्र से जब वह अध्वर्यु स्तोत्र को विधिपूर्वक आरम्भ करता है,
नेत्र को ही उससे प्राणों के साथ वह मिलाता है, ( अथ यत् प्रस्तोता ब्रह्माणम्
आमन्त्रयते, ब्रह्मन् प्रशास्तःस्तोश्यामः इति ) फिर जब प्रस्तोता ब्रह्मा को बुलाता है--
हे ब्रह्मन् ! हे प्रशास्ता ! [ शासक ] हम स्तुति करेंगे । ( मनः एतेषां प्राणानाम् अग्रणीः
भवति, मनसा हि प्रसूताः स्तोमेन स्तुयाम इति, प्राणान् एव तत् मनसा सन्दधाति )
४-( अन्तः ) शरीरमध्ये भवानि । आन्त्राणि ( मार्जालीयः ) स्थाचति-
मृजेरालज्चालञालीयचः ( उ० १ । ११६ ) मृजू शौचालङ्कारयोः—आलीयच् ।
शोधनदेशः ( आग्नीध्रीयः ) स्वार्थे—छः । आग्नीध्रम् । होतुर्गृहम् । अग्निस्थानम्
( देवताः ) इन्द्रियाणि ( अन्तःसदः ) सभासदः ( सन्धिष्ठचाप्रतिष्ठे ) पादग्रंथि-
श्च पादतलं च ( वाक् ) जिह्वा ( प्रजापतिः ) इन्द्रियपालकव्यवहारः ( उपा-
करोति ) विधिपूर्वकम्यारभते ( सोमः ) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः (पवते) शुद्धोऽस्ति
(सन्दधाति) संयोजयति (अग्रणीः) अग्र + णीञ् प्रापणे-क्विप् । अग्रनेता । प्रधानः