गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context४५० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४। क० १८
होत्राकाणाम् अप्रतिभूतम् इव हि शस्त्रम्) फिर यह ही त्रिष्टुप् छन्द वाले स्तोत्र
प्रातःसवन में, मरुत्वतीय [ माध्यन्दिन सवन ] में और तीसरे सवन में सहायक होता लोगों
का अप्रतिभूत [ प्रतिभू अर्थात् स्थानी बिना ] ही शस्त्र [ स्तोत्र ] हैं [ अर्थात् त्रिष्टुप् तीनों
सवनों में अवश्य बोला जाता है ] । ( धीतरसं वै एतत् सवनम्, यत् तृतीयसवनम् )
पी चुके हुये रस वाला ही यह सवन है, जो तीसरा सवन है [ तीसरे सवन से पहिले
सोमरस पी लिया जाता है फिर किस लिये तीसरा सवन है—इस प्रश्न का समाधान इस
प्रकार है ] । ( अथ ह एतत् अधीतरसं शुक्रियं छन्दः, यत् त्रिष्टुभा यातयामसवनस्य
एव तत् सरसतायै ) फिर यह बिना पी चुके हुये रस वाला, वीर्यवान् छन्द [ स्तोत्र ] है,
जो त्रिष्टुप् [ तीनों सवनों में ठहरने वाले छन्द ] के साथ बीते हुये योग्य समय वाले सवन
के रसीलेपन के लिये है [ देखो-ऐतरेय ब्रा० ६। १२ ] । ( सर्वं समवतीभिः परिदधति,
यत् तत् समवतीभिः परिदधति. ) वे सब समवती ऋचाओं से [ सम शब्द वाली
ऋचाओं से जैसे—समं ज्योतिः सूर्येण······अथर्व० ४। १८ । १, इत्यादि मन्त्रों से ] समाप्त
करते हैं, क्योंकि वहां समवती ऋचाओं से वे समाप्त करते हैं। (अन्तः वै पर्यासः, अन्तः
उदर्कः, अन्तः सजायाः उ ह वै अवेनाय अन्तेन एव अन्नं परिदधति = परिदधाति )
अन्त ही पर्यास [ विराम ] है, अन्त ही उदर्क [ अवसान वा विच्छेद अर्थात् रोक ] है,
अन्त ही संगति के रक्षक के लिये अन्त के साथ ही अन्त को समाप्त करता है। [ एक एक
विषय पर रुककर दूसरे को आरम्भ करके समाप्त किया जाता है ] । ( सर्वे मद्गतीभिः
यजन्ति, यत् तत् मद्गतीभिः यजन्ति ) वे सब मद्वती [ मद शब्द वाली ] ऋचाओं से
यज्ञ करते हैं [ याज्या ऋचा बोलते हैं ], क्योंकि वहां मद्वती ऋचा से वे यज्ञ करते हैं ।
( सर्वे सुतवतीभिः पीतवतीभिः अभिरूपाभिः यजन्ति ) वे सब सुतवती [ सुत शब्द
वाली ] ऋचाओं से, पीतवती [ पीत शब्द वाली ] ऋचाओं से और अभिरूप [ विषय के
अनुकूल ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं। [ मद्गती, सुतवती और पीतवती ऋचाओं के लिये
देखो ऋग्० १ । १६ । ८ । और बहुवचन शब्द होने से ब्राह्मण में समस्त इस नौ ऋचा
वाले सूक्त का ग्रहण अभीष्ट है । अभिरूप शब्द से यह प्रयोजन है कि अभीष्ट देवता की
स्तुति में उस देवता के सूचक पद आ जावें ] । ( यत् यज्ञं अभिरूपं, तत् समृद्धम् ) जो
यज्ञ में विषय के अनुकूल कर्म है, वह समृद्ध है । ( सर्वे स्विष्टकृरवा अनुवषट्
कुर्वन्ति ) सब स्विष्टकृत् मन्त्र [ यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं·········देखो--गो० उ० ३ । १ ]
पढ़कर अनुवषट् [ समाप्ति सूचक पद ] पढ़ते हैं । ( अनुवषट्कारः स्विष्टकृतं नेत्
अन्तरयाम इति ) अनुवषट्कार स्विष्टकृत् मन्त्र को कभी भी बीच [ व्यवधान ] से नहीं
लेता [ स्विष्टकृत् के पीछे ही अनुवषट् होता है ] । ( असौ वै लोकः तृतीयसवनम् )
जगतोछन्दोयुक्तानि । जगते हितानि ( अप्रतिभूतम् ) प्रतिभूरहितम् । स्थानिना
रहितम् ( धीतरसम् ) धेट् पाने--क्तः । पीतसारम् ( अधीतरसम् ) अपीतसा-
रम् । सर्वरसोपेतम् ( शुक्रियम् ) शुक्र—घन् । वीर्ययुक्तम् । ( यातयामसवनस्य )
गतयोग्यकालसवनस्य ( सरसतायै ) सरसत्वाय ( सजायाः ) षञ्ज सङ्गे--कः,
टाप् । सङ्गतेः ( अवेनाय ) श्यास्त्याह्वणविम्व्य इनच् ( उ० २ । ४६ ) अव रक्षणार्दौ