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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished634 pages

२९- वास्तुमण्डल-पूजा-विधि

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काण्ड ] देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि ६३


प्रातःकालकी संध्या खड़ा होकर तथा मध्याह्न एवं सायंकालकी संध्या बैठकर करनी चाहिये। प्रणव (ॐकार) और महाव्याहृतियों अर्थात् 'भूः, भुवः, स्वः' से संयुक्त करके गायत्री-मन्त्रका दस बार जप करनेसे इस जन्मके पाप, सौ बार जप करनेपर पूर्वजन्मके पाप तथा हजार बार गायत्रीका जप करनेसे तीन युगोंके पाप नष्ट हो जाते हैं—

दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम्।
त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हन्ति दुष्कृतम्॥
(३६। १०)

प्रातःकालमें गायत्री रक्तवर्णा, मध्याह्नकालमें सावित्री शुक्लवर्णा और सायंकालमें सरस्वती कृष्णवर्णा कही गयी हैं।<sup>१</sup> गायत्री-मन्त्रकी प्रथम व्याहृति 'भूः' का 'ॐ भूः हृदयाय नमः' से हृदयमें, द्वितीय व्याहृति 'भुवः' का 'ॐ भुवः शिरसे स्वाहा' से सिरमें तथा तृतीय व्याहृति 'स्वः' का 'ॐ स्वः शिखायै वषट्' से शिखामें न्यास करे। गायत्री-मन्त्रके प्रथम पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं)-का कवचमें, द्वितीय पाद (भर्गो देवस्य धीमहि)-का नेत्रोंमें तथा तृतीय पाद (धियो यो नः प्रचोदयात्)-का अस्त्रमें और चतुर्थ पाद (परोरजसेऽसावदोम्)-का सर्वाङ्गमें न्यास करे। संध्याओंके समय इस कथित विधिसे न्यास करके वेदमाता गायत्रीका जप करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण होता है। प्राणायामके अनन्तर सभी अङ्गोंमें न्यास करे।

त्रिपदा गायत्री ब्रह्मा-विष्णु और शिवस्वरूपा है। इसके ऋषि, छन्द और विनियोगको भलीभाँति जानकर जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे साधक सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।

'परोरजसेऽसावदोम्' यह गायत्रीका तुरीय पाद कहा जाता है। जो व्यक्ति संध्योपासन नहीं करता है, उसको सूर्यदेव विनष्ट कर देते हैं। तुरीय पादके ऋषि निर्मल तथा छन्द गायत्री एवं देवता परमात्मा हैं।

जो मनुष्य योग और मोक्षको प्रदान करनेवाली परमश्रेष्ठा देवी गायत्रीका जप करता है, उसके महान्-से-महान् पाप नष्ट हो जाते हैं।

प्रातः, मध्याह्न एवं सायं—इन तीनों संध्याओंमें १००८ या १०८ बार गायत्री-मन्त्रका जप करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक जानेका अधिकारी हो जाता है।
(अध्याय ३५—३७)


देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! नवमी आदि तिथियोंमें 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि'—इस मन्त्रसे देवी दुर्गाका पूजन करना चाहिये। मार्गशीर्ष (अगहन)-मासकी तृतीया तिथिसे आरम्भ करके नामक्रमके अनुसार गौरी, काली, उमा, दुर्गा, भद्रा, कान्ति, सरस्वती, मङ्गला, विजया, लक्ष्मी, शिवा और नारायणीरूपमें उन देवीका पूजन करनेवाले अधिकृत मनुष्यका इष्ट (प्रियजनों या प्रिय वस्तुओं)-से वियोग नहीं होता।

दुर्गादेवीके अट्ठारह हाथ हैं। उन हाथोंमें खेटक<sup>२</sup>, घण्टा, दर्पण, तर्जनी-मुद्रा, धनुष, ध्वज, डमरू, परशु, पाश, शक्ति, मुद्गर, शूल, कपाल, शरक (बाण), अंकुश, वज्र, चक्र और शलाका—ये


<sup>१</sup> गायत्री, सावित्री एवं सरस्वती—ये गायत्रीके ही तीन स्वरूप हैं।
<sup>२</sup> खेटक—'खेटति भयमुत्पादयति अनेन इति खेटकः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार भय उत्पन्न करनेवाली यष्टि (दण्ड विशेष)-को खेटक या खेट कहते हैं। यह देवीके हाथमें रहता है—
यष्टिरूपेण खेट त्वमरिसंहारकारक। देवीहस्तस्थितो नित्यं मम रक्षां कुरुष्व च॥ (शारदीय दुर्गापूजापद्धति, अस्त्र-पूजा-प्रकरण)

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६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

सभी सुशोभित रहते हैं। इनसे सुसज्जित उन अष्टादशभुजा देवीका स्मरण करना चाहिये।

अट्ठाईस भुजावाली या अट्ठारह भुजावाली अथवा बारह भुजावाली या आठ भुजा अथवा चार भुजावाली दुर्गादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। महिषासुरका वध करनेवाली वे देवी सिंहपर विराजमान रहती हैं।

वासुदेवने कहा—हे रुद्र ! सूर्यार्चनमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—

वे भगवान् सूर्य तेजःस्वरूप, रक्त वर्णवाले, श्वेत पद्मपर विराजमान, एक चक्रवाले रथपर समासीन, दो भुजाओंसे युक्त तथा कमल धारण करनेवाले हैं। इस रूपमें उनका सदैव ध्यान करना चाहिये।

श्रीहरिने पुनः कहा—हे वृषध्वज ! [अब] मैं माहेश्वरी-पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो—पहले स्नान तथा आचमन कर ले। इसके बाद आसनपर बैठकर न्यास करके मण्डलमें महेश्वरकी पूजा करे। हे महेशान ! हरकी पूजा परिवारके साथ करे। हे रुद्र ! 'ॐ हां शिवासनदेवता आगच्छत'—इस मन्त्रसे आसनके देवताओंका आवाहन करे। मण्डलके मुख्य द्वारपर स्नान, गन्ध आदिद्वारा 'ॐ हां गणपतये नमः' मन्त्रसे गणपतिकी, 'ॐ हां सरस्वत्यै नमः' मन्त्रसे सरस्वतीकी, 'ॐ हां नन्दिने नमः' मन्त्रसे नन्दीकी, 'ॐ हां महाकालाय नमः' मन्त्रसे महाकालकी, 'ॐ हां गङ्गायै नमः' मन्त्रसे गङ्गाकी, 'ॐ हां लक्ष्म्यै नमः' मन्त्रसे लक्ष्मीकी, 'ॐ हां महाकलायै नमः' मन्त्रसे महाकलाकी तथा 'ॐ हां अस्त्राय नमः' मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।

इसी प्रकार 'ॐ हां ब्रह्मणे वास्त्वधिपतये नमः' से वास्त्वधिपतिकी, 'ॐ हां गुरुभ्यो नमः' से गुरुकी, 'ॐ हां आधारशक्त्यै नमः' से आधारशक्तिकी, 'ॐ हां अनन्ताय नमः' से अनन्तकी, 'ॐ हां धर्माय नमः' से धर्मकी, 'ॐ हां ज्ञानाय नमः' से ज्ञानकी, 'ॐ हां वैराग्याय नमः' से वैराग्यकी, 'ॐ हां ऐश्वर्याय नमः' से ऐश्वर्यकी, 'ॐ हां अधर्माय नमः' से अधर्मकी, 'ॐ हां अज्ञानाय नमः' से अज्ञानकी, 'ॐ हां अवैराग्याय नमः' से अवैराग्यकी, 'ॐ हां अनैश्वर्याय नमः' से अनैश्वर्यकी, 'ॐ हां ऊर्ध्वच्छन्दाय नमः' से ऊर्ध्वच्छन्दकी, 'ॐ हां अधश्छन्दाय नमः' से अधश्छन्दकी, 'ॐ हां पद्माय नमः' से पद्मकी, 'ॐ हां कर्णिकायै नमः' से कर्णिकाकी, 'ॐ हां वामायै नमः' से वामाकी, 'ॐ हां ज्येष्ठायै नमः' से ज्येष्ठाकी, 'ॐ हां रौद्र्यै नमः' से रौद्रीकी, 'ॐ हां काल्यै नमः' से कालीकी, 'ॐ हां कलविकरण्यै नमः' से कलविकरणीकी, 'ॐ हां बलप्रमथिन्यै नमः' से बलप्रमथिनीकी, 'ॐ हां सर्वभूतदमन्यै नमः' से सर्वभूतदमनीकी, 'ॐ हां मनोन्मन्यै नमः' से मनोन्मनीकी, 'ॐ हां मण्डलत्रितयाय नमः' से मण्डलत्रितयकी, 'ॐ हां हौं हं शिवमूर्तये नमः' से शिवमूर्तिकी, 'ॐ हां विद्याधिपतये नमः' से विद्याधिपतिकी और 'ॐ हां हीं हौं शिवाय नमः' से शिवकी पूजा करे।

अनन्तर 'ॐ हां हृदयाय नमः' से हृदयकी, 'ॐ हीं शिरसे नमः' से सिरकी, 'ॐ हूं शिखायै नमः' से शिखाकी, 'ॐ हैं कवचाय नमः' से कवचकी, 'ॐ हौं नेत्रत्रयाय नमः' से नेत्रत्रयकी, 'ॐ हः अस्त्राय नमः' से अस्त्रकी और 'ॐ हां सद्योजाताय नमः' से सद्योजातकी पूजा करे।

सद्योजातकी आठ कलाएँ जाननी चाहिए, जो पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनकी पूजा [गन्ध आदिसे] इस प्रकार करनी चाहिये—'ॐ हां सिद्धयै नमः' से सिद्धिकी, 'ॐ हां ऋद्धयै नमः'

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काण्ड ] देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि [ ६५

से ऋद्धिकी, ‘ॐ हां विद्युतायै नमः’ से विद्युताकी, ‘ॐ हां लक्ष्म्यै नमः’ से लक्ष्मीकी, ‘ॐ हां बोधायै नमः’ से बोधाकी, ‘ॐ हां काल्यै नमः’ से कालीकी, ‘ॐ हां स्वधायै नमः’ से स्वधाकी और ‘ॐ हां प्रभायै नमः’ से प्रभाकी अर्चना करनी चाहिये।

हे वृषभध्वज ! वामदेवकी तेरह कलाएँ जाननी चाहिये, उनकी भी पूजा गन्ध-पुष्प आदिसे करनी चाहिये। उनकी पूजामें पहले ‘ॐ हां वामदेवाय नमः’ कहकर वामदेवकी पूजा करनेके बाद उनकी कलाओंका पूजन करना चाहिये। जैसे—‘ॐ हां रजसे नमः’ से रजस्की, ‘ॐ हां रक्षायै नमः’ से रक्षाकी, ‘ॐ हां रत्यै नमः’ से रतिकी, ‘ॐ हां कन्यायै नमः’ से कन्याकी, ‘ॐ हां कामायै नमः’ से कामाकी, ‘ॐ हां जनन्यै नमः’ से जननीकी, ‘ॐ हां क्रियायै नमः’ से क्रियाकी, ‘ॐ हां वृद्धयै नमः’ से वृद्धिकी, ‘ॐ हां कार्यायै नमः’ से कार्याकी, ‘ॐ हां रा (धा)-त्र्यै नमः’ से रा (धा)-त्रि (त्री)-की, ‘ॐ हां भ्रामण्यै नमः’ से भ्रामणीकी, ‘ॐ हां मोहिन्यै नमः’ से मोहिनीकी और ‘ॐ हां क्ष (त्व) रायै नमः’ से क्ष (त्व)-राकी अर्चना करनी चाहिये।

हे वृषभध्वज ! तत्पुरुषकी चार कलाएँ हैं। पहले ‘ॐ हां तत्पुरुषाय नमः’ इस मन्त्रद्वारा तत्पुरुषकी पूजा करे। तदनन्तर ‘ॐ हां निवृत्यै नमः’ से निवृत्तिकी, ‘ॐ हां प्रतिष्ठायै नमः’ से प्रतिष्ठाकी, ‘ॐ हां विद्यायै नमः’ से विद्याकी और ‘ॐ हां शान्त्यै नमः’ से शान्तिकी पूजा करनी चाहिये।

अघोरकी भैरव-सम्बन्धी छः कलाएँ जाननी चाहिये। इनकी पूजामें पहले ‘ॐ हां अघोराय नमः’ मन्त्रद्वारा अघोरकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ हां उमायै नमः’ से उमाकी, ‘ॐ हां क्षमायै नमः’ से क्षमाकी, ‘ॐ हां निद्रायै नमः’ से निद्राकी, ‘ॐ हां व्याध्यै नमः’ से व्याधिकी, ‘ॐ हां क्षुधायै नमः’ से क्षुधाकी तथा ‘ॐ हां तृष्णायै नमः’— से तृष्णाकी पूजा करनी चाहिये।

हे वृषभध्वज ! ईशानदेवकी पाँच कलाएँ हैं, इनकी पूजामें ‘ॐ हां ईशानाय नमः’ इस मन्त्रसे ईशानकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ हां समित्यै नमः’ से समितिकी, ‘ॐ हां अङ्गदायै नमः’ से अङ्गदाकी, ‘ॐ हां कृष्णायै नमः’ से कृष्णाकी, ‘ॐ हां मरीच्यै नमः’ से मरीचिकी और ‘ॐ हां ज्वालायै नमः’ से ज्वालाकी पूजा करे।

तदनन्तर हे शङ्कर ! ‘ॐ हां शिवपरिवारेभ्यो नमः’ से शिवपरिवारका, ‘ॐ हां इन्द्राय सुराधिपतये नमः’ से सुराधिपति इन्द्रका, ‘ॐ हां अग्नये तेजोऽधिपतये नमः’ से तेजोऽधिपति अग्निका, ‘ॐ हां यमाय प्रेताधिपतये नमः’ से प्रेताधिपति यमका, ‘ॐ हां निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये नमः’ से रक्षोऽधिपति निर्ऋतिका, ‘ॐ हां वरुणाय जलाधिपतये नमः’ से जलाधिपति वरुणका, ‘ॐ हां वायवे प्राणाधिपतये नमः’ से प्राणाधिपति वायुका, ‘ॐ हां सोमाय नेत्राधिपतये नमः’ से नेत्राधिपति सोमका, ‘ॐ हां ईशानाय सर्वविद्याधिपतये नमः’ से सर्वविद्याधिपति ईशानका, ‘ॐ हां अनन्ताय नागाधिपतये नमः’ से नागाधिपति अनन्तका, ‘ॐ हां ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये नमः’ से सर्वलोकाधिपति ब्रह्माका और ‘ॐ हां धूलिचण्डेश्वराय नमः’ से धूलिचण्डेश्वरका आवाहन, स्थापन, संनिधान, संनिरोध तथा सकलीकरण करना चाहिये।

तदनन्तर तत्त्व-न्यास करके मुद्रा दिखानी चाहिये तथा ध्यान करना चाहिये। इसके बाद पाद्य, आचमन, अर्घ्य, पुष्प, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन और स्नान तथा सुगन्धानुलेपन, वस्त्र, अलंकार, भोग, अङ्गन्यास, धूप, दीप, नैवेद्य-अर्पण, करोद्वर्तन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गन्ध एवं ताम्बूल निवेदन करनेके बाद