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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

२२७ अकबर बीरबल विनोद

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२२७ अकबर बीरबल विनोद
वह लड़का “कौवा से कबेला चतुर ।” वालो कहावत पहले
ही चरितार्थ कर सोने की एक गुल्ली माल में से कपट कर
राख में छिपा दिये था। इस घटना को सुनकर बीरबलने कहा-
“पृथ्वीनाथ! कारीगर बड़े बज्र बेहया होते हैं। वे अपने कला में
जब तक चोरी करना नहीं जानते तबतक उनको अपने कारीगर
होने में सन्देह ही बना रहता है। आप इसे पक्का समझें कि जो
जितना बड़ा कारीगर होता है वह उतनाही चोर भी होता है।
यही इनकी विशेषता है कि माल चुरा लेते हैं और दूसरों पर
इनका भेद प्रकट नहीं होने पाता। सुनार तो शास्त्रों द्वारा इस
फन में विख्यात हैं। इनका नाम शास्त्रकारों ने “पश्यतो
हर” बतलाया है। इसका भावार्थ यह है कि यह आँख के
सामने ही चोरी करते हैं, परन्तु देखने वालों की बुद्धि कुछ
काम नहीं करती।”
व्यसनी की लत
एक दिन बादशाह बीरबल के साथ नगर में होकर हवा
खोरी के लिये निकला था। एक जगह नुक्कड़ पर उसे एक
औरत दिखाई पड़ी। वह महा फूहड़ देख पड़ती थी। उसके
मोटे मोटे होठों के बीच से दो बड़े २ दाँत बाहर को झाँक रहे
थे। नाक से पोटा जारी था। मलीन वस्त्र, खुले बाल और शरीर
पर मिट्टी पानी मिश्रित दाग पड़े हुए थे। बात करते समय
मुँह से थूक बाहर निकला आता था। कहाँ तक कहें वह
सर्वांग फूहड़ थी। राजा की तो बात ही अलग है, उसके

अकबर बीरबल विनोद २२८

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अकबर बीरबल विनोद २२८
हाथ के स्पर्श किये फल तक भी किसी रंक का खाने को जी
नहीं चाहता था। वह स्त्री गर्भिणी थी। यह देखकर बादशाह
को बड़ा आश्चर्य हुआ और वे बीरबल से बोले- "बीरबल !
जरा कामदेव का प्रबल प्रभाव तो देखो ! जिसके देखने
मात्र से घृणा उत्पन्न होती है, उसके साथ रमण करनेवाला
भला कैसा होगा ?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"पृथिवीनाथ ! भूखे को जूठा
मीठा नहीं सूझता। निद्रा देवी के आवाहन के समय मुलायम
सेज वा जमीन का विचार नहीं उठता। उसी प्रकार कामकी
ज्वाला के सामने भी भले बुरे का परिज्ञान भूल जाता है।
उस समय काम से पीड़ित व्यक्ति को न जात सूझता है न
कुजात। आपको अन्वेषण करने पर ऐसे बहुतेरे पुरुष मिलेंगे
जो देखने में तो बड़े सुन्दर और फिटिक बाज होंगे, परन्तु
ऐसी २ गलीज जगहों में उन्हीं का नम्बर निकलता है।"
बादशाह ने कहा-"हाँ तुम्हारा कहना भी सत्य हो सकता है।
इसलिये मैं चाहता हूँ कि इससे रमण करने वाले की खोज की
जाय। मैं उसे देखना चाहता हूँ। बीरबल बोला- "शायद कुछ
देर अगल बगल के लोगों से पूछताछ करने पर कुछ भेद खुले।
ऐसा विचार कर वे वहाँ से कुछ दूर निकल गये, परन्तु
बीरबलको उस बात की ही धुन बँधी रही। वह बराबर उसी
स्त्री की तरफ लगा हुआ था। थोड़ी देर बाद एक ऐसी घटना
घटी कि एक कामी पुरुष उसके बगल से होकर निकला और
उस स्त्री से कुछ संकेत द्वारा कहकर आप आगे निकल गया।
वह देखने में किसी उच्च कुल का जान पड़ता था, परन्तु

२२६ अकबर बीरबल विनोद

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२२६ अकबर बीरबल विनोद
स्वभाव से लम्पट प्रगट होता था । बीरबल ने उसे बादशाह
को दिखाकर कहा-"पृथिवीनाथ ! यही पुरुष उस स्त्री का
यार जान पड़ता है।" बादशाह को बीरबल की बातों से
आश्चर्य हुआ और वे बोले- "इसपर कैसे विश्वास किया जाय ?"
बीरबल ने उत्तर दिया-"उसकी तरफ कुछ देर तक ध्यान-
पूर्वक देखने से आपको स्वयं सिद्ध हो जायगा।" बादशाह ने
बीरबल के कहने का अनुशरण किया। वे अनजानों की
तरह उसकी दृष्टि बचा कर बराबर उसी तरफ देखते रहे। कुछ
कालोपरान्त वह लम्पट फिर घूम कर आया और अँगुली के
संकेत से उसे कुछ कहकर आप अग्रसर हुआ। महामायां
भी उसके पीछे २ चलीं। कुछ देर के बाद वे दोनों एक गली में
मुड़कर इनकी आँखों से ओझल हो गये।
यह देख कर बादशाह का भ्रम मिट गया और उन्हें उस लम्पट
का जार उस होना निश्चित हो गया। परन्तु फिर भी उधर ही
दृष्टि अड़ाये रहे। अब ये दोनों आगे बढ़े। बादशाह को बीरबल
की परख पर बड़ा आश्चर्य हो रहा था। इसलिये बीरबल को
छेड़कर बोले-"बीरबल ! तुम्हारी परख तो बड़ी सच्ची
निकली। परन्तु यह तो बतलाओ कि पहले तुमने उसको
कैसे पहचाना था।" बीरबल बोला-"पृथिवीनाथ ! यह सब
आँखों की खूबियाँ हैं। हम लोग नगर में निकलते हैं तो बरा-
बर रास्ते में आने जाने वालों की चाल ढाल का निरीक्षण
किया करते हैं। जिससे आँखों को मनुष्यों से मिलकर वा दूर
से देखकर उनके आचरण समझलेने की शक्ति प्राप्त हो
गई है। मैं बहुत देर से बराबर उस लम्पट की हरकतों

अकबर बीरबल विनोद २३०

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अकबर बीरबल विनोद २३०
को देख रहा था। पहले जब वह आया तो उसके हाथ
पर केवल खैनी थी। चूने की तलाश में अगल बगल की
दीवारों को देखता जा रहा था। दैवात् एक सण्डास पर
ताजा चूना छूया गया था। झट अँगुलियों से चूना पोछकर
खैनी बनाकर खा लिया। अब आपही बतलावें कि जो
सण्डास का चूना खैनी में मिलाकर खाने में नहीं हिचकता
उसके लिये यह काम करना कौनसा आश्चर्य है।” उसी
समय मुझे विदित हो गया कि यह व्यक्ति व्यसनों का सच्चा
गुलाम है। बादशाह को बीरबल की ऐसी गुप्त पहिचान
से बड़ी प्रसन्नता हुई और वह घर आकर उसको एक जोड़ी
दुशाला पारितोषिक दिया।
━०*०━
लोहा और पारश का स्पर्श
एक दिन सन्ध्या समय बादशाह बीरबल को साथ ले
घोड़सवारी द्वारा हवा खाने के लिये महल से बाहर निकले। ये
आपस में वार्तालाप करते हुए मध्य बाजार में जा पहुँचे। वहाँ
सब प्रकार की वस्तुएँ बिक रही थीं, परन्तु इन्हें क्या प्रयोजन
जो कहीं उतर कर कुछ सौदा खरीदते। इसी बीच बादशाह
की दृष्टि एक वृद्धा स्त्री पर पड़ी। उसके हाथ में पुरानी म्यान
से ढकी हुई एक तलवार लटक रही थी। उसकी तलवार
देखते ही बादशाह के जी में आया कि अक्सर पुराने
लोगों के पास अच्छी वस्तुए निकल आती हैं। इसलिये

२३१ अकबर बीरबल विनोद

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२३१ अकबर बीरबल विनोद


इस वृद्धा की तलवार को देखना चाहिये। वह घोड़े की
राश को बुढ़िया की तरफ मोड़ दिया। जब घोड़ा उसके
समीप पहुँचा तो बादशाह ने उस वृद्धा से पूछा- "यह
तलवार लेकर तू शहर में क्यों खड़ी है?" बुढ़िया ने
दीनता भरी बाणी से कहा- "गरीबपरवर! मैं इसे बेचना
चाहती हूँ। यह तलवार बहुत दिनों से मेरे घर में पड़ी हुई है
आज बड़ी गिरीवस्था को प्राप्त होकर और कोई दूसरा
सामान न रहने पर इस बेचने की गरज से बाज़ार में लाई हूँ।"

बादशाह उससे तलवार माँग उसे म्यान से निकालकर
देखने लगे। वह एकदल खराब हो गई थी। उस पर जंग का
गहरा परदा पड़ गया था और उसकी धार भी कई जगह से
टूट गई थी। बादशाह ने बुढ़िया की तलवार को ज्यों का
त्यों लौटा दिया। वह उसको हाथ में लेकर बड़े गौर से
देखने लगी। ऐसा मालूम होता था मानो उसकी तलवार
बदल गई हो। इसको ऐसी भौचक सी हुई देखकर बादशाह ने
पूछा- "क्या बात है ! तेरी तलवार बदल तो नहीं गई है ?"
वह वृद्धा बोली- "पृथिवीनाथ ! मैंने सुना था कि पारस के
स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है, परन्तु यह हमारी लोहे की
तलवार आपके पारस हाथों के स्पर्श से सोने की क्यों नहीं
हुई। बस मैं यही देख रही हूँ।" बादशाह वृद्धा के इस उत्तर से
गदगद हो गये और उसको तलवार के बराबर सोना देने
की आज्ञा दी।

बीरबल अभी तक खड़े खड़े इनकी सब बातें सुन रहा
था। बुढ़िया की बुद्धिमत्ता भरी बातें सुन और बादशाह

अकबर बीरबल विनोद २३२

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अकबर बीरबल विनोद २३२
की उदारता देखकर उसे बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ। दोनों
सानन्द घोड़ा बढ़ाते हुये नगर से बाहर निकले।
तुम बड़े गदहे हो
एक दिन बीरबल और बादशाह दोनों एक साथ बैठे हुये
आपस में कुछ वार्तालाप कर रहे थे। इसी बीच बीरबल को
वायु सरी। बादशाह ने कहा-"बीरबल तुम बड़े गदहे हो।"
बीरबलने उत्तर दिया-पृथिवीनाथ ! पहले तो मैं ऐसा नहीं था
परन्तु गधों की संगत में पड़कर गधा हो गया हूँ। बीरबल
के ऐसे उत्तर से बादशाह की बोलती बन्द हो गई।
कौन कौन क्या क्या नहीं कर सकता
एक दिन का यह समाचार है कि अकबर बादशाह
दरबार में बैठे हुए सरकारी कामों को दत्तचित्त होकर
देख रहे थे। जब वे उन कामों से निवृत्त हुए तो उन्हें
गपाष्टक करनेकी सूझी और कुछ मुसाहिबों को साथ में लेकर
आकाश पाताल की बातें करने लगे। कोई किसी विषय को
लेकर विवेचन, करता, तो कोई किसी विषय को। इसी
बीच बादशाह को पुराने कवियों का कहा हुआ एक दोहा
याद आया-
दोहा-"क्या नहिं अबला करि सकै, क्या नहिं सिन्धु समाय।
क्या नहिं पावक जर सकै, क्यो काल न.हिं खाय ॥"

२३३ अकबर बीरबल विनोद

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२३३ अकबर बीरबल विनोद
वे दरबारियों से उपरोक्त दोहे का उत्तर पूछ बैठे, पर अफ-
सोस कि एक दरबारी भी उत्तर देने को समर्थ न हुआ। तब
बादशाह ने दीवानखाने से बीरबल को बुलवाया। जब वह
आया तो उससे उसी दोहे का उत्तर पूछा-बीरबल अपनी
बुद्धि से ऐसे ऐसे चुटकुलों को अँगुली पर नचाया करता
था, वह तुरत बोला:-
“पुत्र न अबला कर सके, यश नहिं सिन्धु समाय।
धर्म अग्नि में नहिं जलै, नाम काल नहिं खाय ॥”
बीरबल के ऐसे सटीक उत्तर को सुनकर बादशाह बहुत
सन्तुष्ट हुए और बीरबल को कई बहुमूल्य आभूषण पारि-
तोषिक में दिया। सभासद् बीरबल का मुख निहारते रह
गये। उन लोगों ने बीरबल के बुद्धि की भूरि २ प्रसंशा की।
दीपक तले अँधेरा
एक दिन बादशाह अपनी सबसे ऊँची छतपर बीरबल के
साथ बैठे हुए हवाखोरी कर रहे थे इसी बीच उनके सामने
ही कुछ दूरी पर एक यात्री को कई चोर मिलकर लूटते हुये
दिखाई पड़े। विचारे यात्री का कुछ वश नहीं चलता था।
सारा धन लुट जाने पर उस यात्री ने बादशाह के महल के
समीप पहुँच कर बम लगाया-“बड़े दुख की बात है, कि मैं
सरकार के देखते देखते सरे बाजार लुटगया। बादशाह को
इस यात्री की करुण कथा पर बड़ी दया आई और वे बीरबल

अकबरवीरबल विनोद २३४

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अकबरवीरबल विनोद २३४
को डाँटकर कहा-“क्यों बीरबल ! क्या ऐसा ही प्रबन्ध करते
हो। जब हमारी आँखों के सामने विचारे परदेशी लुटे जाते हैं
तो आँख पीछे क्या होता होगा।” बीरबल ने उत्तर दिया-
“पृथ्वीनाथ ! क्या आप नहीं जानते कि दीपक तो दूसरों को
प्रकाश देता है, परन्तु उसके तले अँधेरा ही बना रहता है।”
बादशाह बीरबलकी बातें सच्ची मानकर खामोश रह गये।
—:*:—
बादशाह के चार प्रश्न
एक दिन जब कि कड़ाके की शर्दी पड़ रही थी। बादशाह
बीरबलके साथ अपने बागमें टहलते हुए धूप खा रहे थे। उनके
मन में अचानक एक तरंग उठी और उसके निराकरण के
लिये बीरबल को मध्यस्त बनाकर पूछेः-
“कौन बोलने को चहै, और कौन चहै है चूप।
कौन चहै है बरसनो, कौन चहै है धूप ॥”
इतना कहने के साथही बादशाह बीरबल को धमका कर
बोले-“यदि आजके चारों सवालों का समुचित उत्तर न दे सकोगे
तो जान से मारे जावोगे।” बीरबल को बादशाह का कथन
सुनकर बड़ी करुणा आई; क्योंकि बादशाह सचमुच उसकी
जान मारने को उतारू होगये थे। दूसरे करुणा इसलिये
आई कि इतने छोटे से प्रश्न के लिये बादशाह इतना उग्ररूप
क्यों धारण करते हैं। इसका उत्तर तो एक बुद्धिमान लड़का
भी समझ कर दे सकता है। खैर इस समय तो अपनी जान
बचानी चाहिये। ऐसा विचार कर वह बोला-

२३५ अकबर बीरबलविनोद

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२३५ अकबर बीरबलविनोद


“माली बरसन को चहै, धोबी के मन धूप ।
साई चाहै बोलना, चोर चहै जू चूप ॥”
बादशाहको बीरबल का यह युक्तिसंगत दोहा बहुत भला
मालूम हुआ, परन्तु वह उससे और भी सरलार्थ चाहते थे
इसलिये फिर बोले-“बीरबल ! आपका यह दोहा काटने लायक
नहीं है; फिरभी मुझे इससे पूरा सन्तोष नहीं हुआ। इसलिये
कोई दूसरी विधि से और स्पष्ट कर मुझे समझावो ।
बीरबल ने कहा-“बहुत अच्छा, और यह दूसरा दोहा रचकर
पढ़ सुनाया—
“अति का भला न बोलना, अति की भली न धूप ।
अतिका भला न बरसना, अति की भली न धूप ॥”
फिर भी बादशाह संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने बीरबल से
दूसरा उत्तर माँगा। तब बीरबल बोला-“हे पृथ्वीनाथ !
सबका मूलमंत्र यह है कि अपनी अपनी सभी चाहते हैं, मैं इस
संबंध का एक दास्तान आपको सुनाता हूँ, शायद उससे आप
सन्तुष्ट हो जायें। एक गरीब बापके दो लड़कियाँ थीं।
उसने उनमें से एक को तो बागवान के घर ब्याहा और
दूसरी को कोंहार से । जब कुछ दिनों के बाद उनसे मिलने
गया तो पहले बागवान के घर गया। वहाँ पहुँचकर कुशल
प्रश्न के पश्चात् अपनी कन्या का चेहरा उतरा हुआ देखकर
उसके सोच का कारण पूछा? वह बोली-“हे पिताजी ! मैं
अपने दुःखकी बात आपसे क्या सुनाऊँ । उसका छूटना ईश्वर
के हाथ है। इधर कितनेही दिनों से अवर्षण होरहा है। जिस

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कारण सारा बाग का बाग सूखा जा रहा है। उसमें न तो
अच्छे फूल आते हैं और न फल ही। तब वह वहाँ से बिदा
हो अपनी दूसरी लड़की से मिलने कोहार के घर गया। वह
लड़की मन मारकर द्वार पर बैठी हुई थी। पिता से मिलकर
बड़ी प्रसन्न हुई और अपना सारा दुखड़ा सुनाकर फिर मौन
हो गई। पिता ने उसकी ऐसी उदासी का कारण पूछा तो
वह बोली- "हे पिताजी! मैं आपसे अपने दुख की बात
क्या कहूँ। इधर कई दिनों से मेह बराबर बरस रहा है। न
बरतन सूखने पाते हैं और न सूखी गोहरी ही आँवाँ लगाने
को मिलती है। सब हाल रोजगार बन्द है। न मालूम इस
बारिस का क्रम कब तक जारी रहेगा।" पिता अपनी दोनों
लड़कियों की पृथक पृथक चाहना सुनकर चुप रहगया और
सोचने लगा-"यह सब कुछ नहीं, हम जीव धारी अपनी-
अपनी चाहते हैं। परन्तु ईश्वर किसकी करे और किसकी न
करे। वह जो कुछ करता है सब भला ही करता है।" इस
दृष्टान्त को सुनाकर बीरबल ने कहा- "पृथ्वीनाथ ! यों तो
पेशे के अनुसार सब की चाहना अलग-अलग होती है, परन्तु
आपके प्रश्नों का वही ठीक उत्तर है जो मैंने पहले दोनों दोहों
में आपको सुनाया है। बादशाह बीरबल के उत्तर से बहुत
सन्तुष्ट हुए।

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२३७ अकबर बीरबल बिनोद
शाही रामायण
एक दिन बीरबल और बादशाह की एकान्त में बातें हो
रही थीं। इसी बीच बादशाह ने बीरबल से शाही रामायण
बनाने की चर्चा की। बीरबल बोला-“पृथवीनाथ ! यह कौन
बड़ी बात है। शाही रामायण मैं बनाकर आपको दिखलाऊँगा;
परन्तु यह इतना आसान काम नहीं है जो थोड़े समय में कर
दिखाया जाय। इसमें तीन माँस की देर लगेगी और रुपये भी
काफी खर्च पड़ेंगे। इस समय मैं खर्च के रुपयों का ठीक-
ठीक आँकड़ा तो नहीं बता सकता, परन्तु इतना है कि
पहले पहल कार्यारम्भ के लिये मुझे १५ हजार रुपये
मिलने चाहिये।
बादशाह ने खजाने से पन्द्रह हजार रुपये दिलाकर बीरबल
को तीन मास की मुहलत दे शाही रामायण तय्यार करने के
लिये विदा किया। वह रुपयों को लेकर सीधे अपने घर पहुँचा
और उनसे स्थान २ पर मौका देखकर कुँआँ बावली खुदवाने
का कार्यारंभ किया। इस प्रकार जब दो मास समाप्त होकर
तीसरा भी समाप्त होने पर आया तो बीरबल को शाही
रामायण की सूझी। वह बाजार से कोरा कागज मँगाकर
उसकी एक मोटी पुस्तक तय्यार कराई और फिर उसे एक
आदमी के सिर पर रख कर बादशाह के पास पहुँचा।
बादशाह को पुस्तक दिखाकर बोला-“पृथिवीनाथ ! अबतक
रामायण तय्यार हो गई होती; परन्तु अभी इसमें कुछ काम
बाकी हैं; जिसकी पूर्ति के लिये आपके पास आना पड़ा। कृपा

अकबर बीरबल विनोद २३८

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अकबर बीरबल विनोद २३८

कर मेरे सन्देह को मिटाकर इसकी पूर्ति करा दीजिये ।
रामायण में एक नायक और नायिका का प्रधान होना आव-
श्यक है । नायक तो आप अकेले हैं । परन्तु आपके पास कई
नायिकाएँ हैं । इसलिये इसमें किस बेगम को प्रधान मानकर
नायिका बनाया जाय ।”
बादशाह बोले-“प्रधान बेगम को ही इसकी नायका
बनाओ ।” बीरबल पुस्तक को लिये दिये बड़ी बेगम के
पास पहुँचा और उनसे कुशल प्रश्न के पश्चात् पूछा-“
रामायण की नायिका महारानी सीताजी को राक्षस राज
रावण के घर रहना पड़ा था । इसलिये आप किसके घर
रही हो ।” आपसे इसका उत्तर मिलने पर मैं शाही रामा-
यण तय्यार कर डालूँगा ।” बीरबल की ऐसी बातें सुनकर
बेगम सिर से पैर तक जल गईं और वे अपनी दासी को
आज्ञा देकर उस रामायण को बीरबल के सामने ही जलवा
दिया । बीरबल बेगम से बिदा होकर बादशाह के पास आया
और बेगम के द्वारा चिढ़कर रामायण जलाये जाने का सारा
किस्सा कह सुनाया। फिर हाथ जोड़कर बोला-“पृथ्वीनाथ !
शाही रामायण फिर भी तय्यार हो सकती है । यदि आप
चाहते हों तो दूसरी आज्ञा दीजिये ।”
बादशाह हँसते हुए बोले-“बीरबल जो कुछ होना था सो
हो गया, अब दूसरी रामायण बनाने का कष्ट आपको नहीं
दिया जायगा । महाराज रामचन्द्र समर्थ थे, मैं उनकी तुलना
नहीं कर सकता । तो मैं यह पहले ही समझ चुका था मुझे
तो केवल तुम्हारी परीक्षा लेनी थी । सो ले लिया । मैं भली

२३६ अकबर बीरबल विनोद

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२३६ अकबर बीरबल विनोद
भाँति जानता हूँ कि तुम्हारे हाथ से रुपये बुरे कामों में खर्च
नहीं हो सकते । इसलिये समय कुसमय आने पर तुम्हें कुछ
रुपये देकर इसी बहाने तुमसे अच्छे २ कामों को कराया करता
हूँ । अब तुम घर जाकर विश्राम करो । कल से दरबार में
हाजिर होकर अपना तीन मास का पिछड़ा काम सँभालो ।
—०:*:०—
केवल लोटा न था
एक दिन आपस में कुछ पहेली बुझौवल की बातें छिड़ीं
इसी बीच बादशाह ने पूछा-“गधा उदास क्यों दीखता था,
ब्राह्मण क्यों प्यासा रहा ?” बीरबल ने दोनों के लिये एक
ही उत्तर देकर किस्सा समाप्त किया । उसने कहा-“के ल
लोटा नहीं था ।” उसका अभिप्राय यह था कि बिना लोटे
गधा उदास था और लोटा ही न रहने से ब्राह्मण भी प्यासा
रहा । बादशाह को बीरबल के इस दुअर्थी उत्तर से बड़ी
प्रसन्नता हुई और वे बीरबल को इनाम देकर बिदा किये ।
कौन ऋतु सर्वोत्तम है ?
एक दिन बादशाह राजकीय कामों से अवकाश पाकर अपने
दरबार में बैठे थे। इधर उधरकी बातें भी हो रहीं थी। तब बादशाह
ने पूछा-गर्मी, बरसात, जाड़ा, हेमन्त, शिशिर और बसन्त इन
छहों ऋतुओं में सर्वोत्तम ऋतु कौन है ?” दरबारियों ने अपनी
अभिरुचि के अनुसार किसी ने कुछ और किसी ने कुछ
बतलाया, परन्तु उनका मतैक्य न हुआ। तब बादशाह बीरबल

अकबर बीरबल विनोद २४०

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अकबर बीरबल विनोद २४०
से पूछे-"बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-"पृथ्वीनाथ ! पेट
भरों को सभी ऋतुवें अच्छी होतो हैं, भूखों के लिये एक भी
नहीं। यानी सभी बुरी होती हैं।"
पीर, बावर्ची भिश्ती-खर
एक दिन बादशाह प्रफुल्लित चित्त हो अपने पुत्र को गोदी
में लिये हुए खेला रहे थे। इसी बीच बीरबल भी वहाँ आ
पहुँचा। बादशाह तुरत पूछ बैठे-"बीरबल ! कोई लावे
नर, पीर, बबर्ची, भिश्ती, खर।" बीरबल ने कहा-"पृथ्वीनाथ !
मैं कल इस सवाल का जवाब ढूढ़कर लाऊँगा। जब संध्या
समय वह लौटकर घर जाने लगा तो रास्ते में एक गरीब
ब्राह्मण के घर पहुँचा और उसको पाँच रुपये देकर बोला-“
देखो कल तुम्हें दस बजे मेरे साथ दरबार में चलना होगा।
अपने खाने पीने का प्रबन्ध कर ठीक समय पर तय्यार रहना।”
वह बोला-“बहुत अच्छा, ताबेदार हर एक आज्ञाओं को
अक्षरसह पालन करने के लिये तय्यार है।”
दूसरे दिन बीरबल ठीक समय पर उसे लेकर दर्बार में
हाजिर हुआ। बादशाह ब्राह्मण को देखकर बीरबल का भावार्थ
समझ गये और उससे पूछे-"साबित करो कि इस मनुष्य में
कलवालेचारो गुण विद्यमान हैं।" बीरबल दोनों हाथ जोड़कर
बोला-"पृथ्वीनाथ ! यह पुजाते समय पीर होता है और
ब्राह्मण के हाथ का बनाया भोजन सभी लोग खाते हैं, इस
संबंध से बावर्ची है, पौसरा चलाने का काम ब्राह्मण से लिया

२४१ अकबर बीरबल विनोद

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२४१ अकबर बीरबल विनोद
जाता है, इसलिये पानी पिलाते समय यह भिश्ती बन जाता
है। परदेश में जाने पर इसी के सर बोझ भी लादा जाता है
इसलिये ऐसा काम करने से खर भी कहा जा सकता है।"
केवल एक ब्राह्मण को नौकर रखने से ये चारों काम आसानी
से निकल आते हैं। पूजन के समय इसकी पैर पूजा कर पीर
बना लीजिये, समय पर रोटी बनवा कर बवर्ची बनाइये, प्यास
लगे तो इससे भिश्ती का काम कराइये यानी वह पानी भी
पिला देगा, और चाहे जब बोझा भी ढुलवा कर खर का काम
भी सुगमता से करा लीजिये। यानी यह उन समस्त चारों
कामों को भली भाँति कर सकता है।" बादशाह बीरबल का
उत्तर सुनकर मन में प्रसन्न हो मुसकरा दिये। बीरबल उस
गरीब ब्राह्मण को २५ रुपये पुरस्कार देकर विदा किया।
❖-❖
बनस्पति का बीज
एक दिन ऐसा हुआ कि बादशाह के बहुतेरे दरबारी उस
पर चिढ़कर मौन धारण कर लिये। जब बादशाह स्वयं किसी
को छेड़कर कुछ पूछते तो वे थोड़े में उसका उत्तर देकर चुप
रह जाते। आज की सभा में बीरबल नहीं था। बादशाह अपने
दरबारियों की खपको को मन ही मन ताड़ गये और उनके ऐसे
मनमलीनता का कारण पूछा। तब एक वृद्ध दरबारी बादशाह
से विनती कर बोला—"पृथ्वीनाथ ! मुझे एक बात का
बड़ा खेद है, यदि आज्ञा पाऊँ तो कहूँ।" बादशाह ने उसकी
प्रार्थना स्वीकार कर ली। तब बुड्ढा बोला—"मैं २५ वर्ष से
१६

अकबर बीरबल विनोद २४२

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अकबर बीरबल विनोद २४२
आपका नमक खाता हूँऔर अपना सब काम बराबर खैरख्वाही
से करता आ रहा हूँ, फिर भी देखता हूँ कि आप एक कल के
आये हुए छोकरे के सामने हम लोगों को कुछ भी नहीं
समझते । आपको जो कुछ भी पूछना होता है बीरबल ही से
पूछा करते हैं। इस बातकी हम लोगों को बड़ी चोट है।”
बादशाह बोले-“आप लोग इसके लिये कोई चिन्ता न
करें, अच्छा मौका है। इस समय बीरबल भी यहाँ मौजूद नहीं
है। मैं एक जरूरी बात पूछना चाहता हूँ आप में से कोई
भी बतलावे कि बनस्पति के बीज कहाँ हैं।” दरबारियों
ने इसका अनुसन्धान करनेमें महीनों सिर तोड़ परिश्रम
किया, परन्तु सब बेफायदा हुआ। लाचार होकर एक
दिन भरी सभा में बादशाहने वही बात बीरबल से पूछा-
“बीरबल तत्क्षण हाथ में गंगाजल लेकर जमीन पर छिड़क
दिया और बोला- “बस पृथ्वीनाथ ! वह बीज इसी ठौर
पर है।” लोगों का मुख मलीन हो गया और फिर बादशाह
के सामने ऐसी बातें कभी जवान पर नहीं लाये ।

हौज के अण्डे

एक दिन बादशाह को बीरबल की हँसी उड़ाने की इच्छा
जागृत हुई। अतएव वे बीरबल के आने के पूर्व ही बाजार
से बहुत से मुर्गी के अण्डे मँगाकर अपने दरबारियों को एक
एक कर बाँट दिया। केवल बीरबल ही खाली रह गया
था। वह ज्योंही दरबार में हाजिर हुआ, बादशाह ने कहा-

२४३ अकवल बीरवल विनोद़

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२४३ अकवल बीरवल विनोद़
“बीरबल ! मैंने आज रातमें एक अजीब सपना देखा है,उसका
तात्पर्य यह निकलता है कि जो मनुष्य इस हौजमें डुबकी लगा
कर एक अण्डा मुरगी का न निकाल लावे उसे दो बाप का
समझना चाहिये। मैं केवल तुम्हारी ही बाट देख रहा था।
बेहतर है कि सबकी वारी२ से परीक्षा ली जाय। देखें स्वप्न
का क्या प्रभाव पड़ता है।”
बादशाह की अनुमति से सभी दरबारी हौज में डुबकी
मार कर हाथ में एक एक मुरगी का अण्डा लेकर बाहर
निकले। जब बीरबल की ओसरी आई तो वह हौज में डुबकी
मारकर खाली हाथ निकला। परन्तु उसके मुखारबिन्द से
कुकड़ू कूं का शब्द निकल रहा था।” बादशाह ने कहा-
मियाँ बीरबल तुम्हारा अण्डा कहाँ है, जल्दी दिखलाओ।
बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! तमाम अण्डा देने
वाली मुर्गियों के बीच एक मैं ही मुर्गा हूँ। विचारे दरबारी
सहम गये और बादशाह के ओठों पर मुस्कुराहट आ गई।
कोई धनी और कोई दरिद्र क्यों होता है
एक दिन बीरबल और बादशाह में विज्ञान की बातें
छिड़ीं थीं। दोनों अपनी अपनीवाली कहते थे, परन्तु उनका
मन किसी सिद्धान्त पर स्थिर नहीं होता था इसी बीच
बादशाह ने बीरबल से पूछा-“अच्छा बीरबल इसका विवेचन
कर सिद्ध करो कि संसार में कोई तो धनी और कोई दरिद्री
क्यों हो जाता है?” बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-

अकबर बीरबल विनोद २४४

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अकबर बीरबल विनोद २४४
राम झरोखे बैठ के, सब सौदा कर लेत ।
जो जैसा कर लावता, वाको वैसहिं देत ॥
अब मैं उसको भूल गया
एक दिन बादशाह बीरबल से हँसी मजाक करते हुए
पूछ बैठे-“बीरबल ! मैंने सुना है कि तुम्हारी स्त्री नितान्त
सुन्दरी है दरअसल क्या है?” बीरबल ने उत्तर दिया-
“पृथिवीनाथ ! मुझे भी ऐसा ही गुमान था, परन्तु बेगम
साहिबा को देखकर अब मैं उसे एकदम भूल गया हूँ।”
बीरबल को कुत्तों की हाकिमी
एक दिन बादशाह अपने चुने २ दरबारियों के साथ
बातांलाप कर रहे थे। इसी अन्तर्गत अब्दुलफजल नामी
दरबारी को बीरबल की हँसी उड़ाने की सूझी। वह बीरबल
को चिताकर बोला-“बीरबल ! आज से तुमको कुत्तों की
हाकिमी प्रदान की जाती है।” बीरबल झट बोल उठा-“फिर
तो आपको मेरी आज्ञा पालन करनी पड़ेगी। उलटे मुँह
खाकर अब्दुलफजल शरमिन्दा हो गया। फिर कभी उससे
बीरबल से ऐसी छेड़खानी नहीं करी।
एक हजार जूते
एक दिन बादशाह बीरबल को झिपाने की नीयत से
उसके जूते गुम करा दिये। जब घर जाने का समय हुआ

२४५ Akbar Birbal Vinod \quad अकबर बीरबल विनोद

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२४५ Akbar Birbal Vinod \quad अकबर बीरबल विनोद
तो बीरबल अपने जूतों को तलाश करने लगा। जब वे न
मिले तो बादशाहने कहा-"अच्छी बात है; बीरबलको हमारी
तरफ से जूते दिये जायँ।" बीरबल नये जूतों को पहन कर
ऊपरी प्रसन्नता दिखलाते हुए बोला- "मैं आपको आशीर्वाद
देता हूँ कि ईश्वर इसके पहले आपको हरलोक परलोक सभी
जगह ऐसे ही हजार जूते दे।"
बीरबल के ऐसे हास्यपूर्ण आशीर्वाद को सुनकर बाद-
शाह खिलखिला कर हँस पड़ा। दरबारी लोग चकित होकर
बीरबल का मुँह देखते रह गये।

चोर की दाढ़ी में तिनका

बादशाहके यहाँ एक दिन चोरी होगई यानी आलमारी से
एक कीमती जेवर गायब हो गया। बादशाह ने बीरबल को
अन्वेषण करने की आज्ञा दी। तब बीरबल ने चाल चलने की
एक नई तरकीब सोचकर निकाली। वह पहले आलमारी से
बारी२ अपना दोनों कान सटाया, गोया कोई बात सुनने की
चेष्टा कर रहा हो। बाद फिर कान हटाकर बादशाह से अर्ज
किया- "पृथिवीनाथ ! वह आपकी आलमारी साफ बतला
रही है कि चोर की दाढ़ी में तिनका है।" एक दरबारी
सहम कर अपनी दाढ़ी से हाथ लगाया। बीरबलने झट उसे
गिरफ्तार कर लिया। उस दरबारी ने थोड़ी देर बाद
भरी सभा में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

अकबर बीरबल विनोद २४६

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अकबर बीरबल विनोद २४६
सोया सो खोया
एक दिन बीरबल किसी मसलहत से कुजड़े का भेष
बनाकर बादशाहके महल का चक्कर काट रहा था। अचानक
बादशाह की दृष्टि उस पर जा पड़ी। बादशाह ने उसे कुँजड़ा
समझकर पूछा- "अरे ओ कुँजड़े, सोया किस भाव पर
बेचेगा ?" कुँजड़ा भेषधारी बीरबल बोला- "टके का एक
सेर ।" बादशाह उसका उत्तर सुनकर बोले- "तब तो और
भी चूका ?" बीरबल ने कहा- "सोया सो खोया।" ऐसे
उत्तर से बादशाह को सन्देह हो गया और भलीभाँति जाँच
पड़ताल करने पर सोये वाले को बीरबल जानकर हँस पड़े।
लड़ाई में जीत किसकी ?
एक दिन कहीं संग्राम में जाने के लिये उद्यत होकर
बादशाहने बीरबल से पूछा 'अच्छा बीरबल ! मैं तुमसे पूछता
हूँ कि आज की लड़ाई में किसकी जीत होगी ?" बीरबल ने
उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! यह बात मैं यहाँ से नहीं बतला
सकता । हाँ युद्ध का मैदान देखकर आपको बतला दूँगा।"
बादशाह जब संग्रामांगण में पहुँचे तो फिर वही बात बीरबल
से पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! आपकी ही
जीत होगी।" बादशाह बोले- "यह तुमने कैसे जाना ?"
बीरबल ने "-सरकार ! मैं इससे कह रहा हूँ कि आपका
शत्रु हाथी पर सवार होकर आया है और हाथी एक मनहूस