अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
Page 260 of 292
Read in contextअकबर बीरबल विनोद २४६
सोया सो खोया
एक दिन बीरबल किसी मसलहत से कुजड़े का भेष
बनाकर बादशाहके महल का चक्कर काट रहा था। अचानक
बादशाह की दृष्टि उस पर जा पड़ी। बादशाह ने उसे कुँजड़ा
समझकर पूछा- "अरे ओ कुँजड़े, सोया किस भाव पर
बेचेगा ?" कुँजड़ा भेषधारी बीरबल बोला- "टके का एक
सेर ।" बादशाह उसका उत्तर सुनकर बोले- "तब तो और
भी चूका ?" बीरबल ने कहा- "सोया सो खोया।" ऐसे
उत्तर से बादशाह को सन्देह हो गया और भलीभाँति जाँच
पड़ताल करने पर सोये वाले को बीरबल जानकर हँस पड़े।
लड़ाई में जीत किसकी ?
एक दिन कहीं संग्राम में जाने के लिये उद्यत होकर
बादशाहने बीरबल से पूछा 'अच्छा बीरबल ! मैं तुमसे पूछता
हूँ कि आज की लड़ाई में किसकी जीत होगी ?" बीरबल ने
उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! यह बात मैं यहाँ से नहीं बतला
सकता । हाँ युद्ध का मैदान देखकर आपको बतला दूँगा।"
बादशाह जब संग्रामांगण में पहुँचे तो फिर वही बात बीरबल
से पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! आपकी ही
जीत होगी।" बादशाह बोले- "यह तुमने कैसे जाना ?"
बीरबल ने "-सरकार ! मैं इससे कह रहा हूँ कि आपका
शत्रु हाथी पर सवार होकर आया है और हाथी एक मनहूस