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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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२३६ अकबर बीरबल विनोद
भाँति जानता हूँ कि तुम्हारे हाथ से रुपये बुरे कामों में खर्च
नहीं हो सकते । इसलिये समय कुसमय आने पर तुम्हें कुछ
रुपये देकर इसी बहाने तुमसे अच्छे २ कामों को कराया करता
हूँ । अब तुम घर जाकर विश्राम करो । कल से दरबार में
हाजिर होकर अपना तीन मास का पिछड़ा काम सँभालो ।
—०:*:०—
केवल लोटा न था
एक दिन आपस में कुछ पहेली बुझौवल की बातें छिड़ीं
इसी बीच बादशाह ने पूछा-“गधा उदास क्यों दीखता था,
ब्राह्मण क्यों प्यासा रहा ?” बीरबल ने दोनों के लिये एक
ही उत्तर देकर किस्सा समाप्त किया । उसने कहा-“के ल
लोटा नहीं था ।” उसका अभिप्राय यह था कि बिना लोटे
गधा उदास था और लोटा ही न रहने से ब्राह्मण भी प्यासा
रहा । बादशाह को बीरबल के इस दुअर्थी उत्तर से बड़ी
प्रसन्नता हुई और वे बीरबल को इनाम देकर बिदा किये ।
कौन ऋतु सर्वोत्तम है ?
एक दिन बादशाह राजकीय कामों से अवकाश पाकर अपने
दरबार में बैठे थे। इधर उधरकी बातें भी हो रहीं थी। तब बादशाह
ने पूछा-गर्मी, बरसात, जाड़ा, हेमन्त, शिशिर और बसन्त इन
छहों ऋतुओं में सर्वोत्तम ऋतु कौन है ?” दरबारियों ने अपनी
अभिरुचि के अनुसार किसी ने कुछ और किसी ने कुछ
बतलाया, परन्तु उनका मतैक्य न हुआ। तब बादशाह बीरबल