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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

About this granth

This is the Gyan Khand (ज्ञान खण्ड), the second volume of the 108 Upanishad series edited by Pandit Shriram Sharma Acharya. The series sorts the Upanishads into three thematic groups; this one brings together texts focused on knowledge of the Self, Brahman and the world.

As in the other volumes, the Sanskrit mantras are printed with a simple Hindi bhavartha, and running heads mark adhyaya, khanda and mantra numbers. The Katha Upanishad appears here with its two adhyayas and six vallis, carrying the dialogue between Nachiketa and Yama. The introduction places the Upanishads within the four layers of Vedic literature (Samhita, Brahmana, Aranyaka and Upanishad) and contrasts their emphasis on knowledge with the ritual concerns of the earlier layers.

The copy was published by Yug Nirman Yojana, Gayatri Tapobhumi, Mathura, in 2005 and runs to 505 pages, making it the largest of the three parts in this printing.

अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३२ ३१५

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अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र ३२ ३१५
यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्र
तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत ॥ २८ ॥
मनन करने की सामर्थ्य होने पर भी वह मनन नहीं करता। कभी नष्ट न होने वाला होने से उसकी मनन शक्ति
कभी समाप्त नहीं होती। उसके अतिरिक्त जब अन्य कुछ है ही नहीं, तो वह मनन भी किसका करे ? ॥ २८ ॥
यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशत्वान्न तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥
स्पर्श की शक्ति से सम्पन्न होने पर भी वह स्पर्श नहीं करता। उसकी स्पर्श शक्ति का कभी लोप नहीं
होता, क्योंकि वह अमरणशील है। जब उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, तो वह स्पर्श भी किसका करे ? ॥
यद्वै तन्न विजानाति विजानन्वौ तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो
विद्यतेऽविनाशित्वात्र तु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥
जानने की सामर्थ्य होने पर भी वह नहीं जानता। उसके ज्ञान का कभी लोप नहीं होता, क्योंकि वह
अनश्वर है। उससे भिन्न कुछ भी नहीं है, जिसे वह जाने ॥ ३० ॥
[ उपर्युक्त स्थितियाँ सुषुप्तावस्था की हैं- अब जाग्रत् स्थिति का वर्णन है- ]
यत्र वान्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद्रसयेदन्योऽन्यद्वदेदन्योऽ-
न्यच्छृणुयादन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत्स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥
जहाँ (जाग्रत् अवस्था में) अपने से भिन्न कुछ अन्य का भाव होता है, वहाँ (उस स्थिति में) अन्य,
अन्य का दर्शन करने; अन्य, अन्य को सूंघने; अन्य, अन्य का रसास्वादन करने; अन्य, अन्य को बोलने;
अन्य, अन्य का स्पर्श करने और अन्य, अन्य को जानने में समर्थ होता है (अर्थात् जाग्रतावस्था में समस्त
बाहरी विषयों से सम्बद्ध रहने से स्वयं से भिन्न सबकी अनुभूति होती है) ॥ ३१ ॥
सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य
एषास्य परमा गतिरेषास्य परमा संपदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द
एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा- हे राजन् ! जिस प्रकार अथाह जल में एक अद्वितीय द्रष्टा है, उसी प्रकार
सुषुप्तावस्था में एक अद्वैत द्रष्टा है। यही ब्रह्मलोक है। यही इस पुरुष की परम गति, यही इसकी सच्ची
सम्पदा है, यही इसका परम लोक और परम आनन्द है। इसी परम आनन्द के एक भाग का आश्रय ग्रहण
करके समस्त भूत जीवित रहते हैं ॥ ३२ ॥
स यो मनुष्याणाँ राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः संपन्नतमः
स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामाानन्दाः स एकः पितॄणां
जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक
आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाःस एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा
देवत्वमभिसंपद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च

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३१६ बृहदारण्यकोपनिषद्
श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोक
आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको
ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः
सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र
ह याज्ञवल्क्यो बिभयांचकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो मान्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥
जो मनुष्यों में राद्ध (सम्पूर्ण अंग-अवयवों से युक्त) और समृद्धि से सम्पन्न है, समस्त मानवीय भोग्य पदार्थों
से युक्त है, मनुष्यों में उत्तम और उनका अधिपति है, वही मनुष्य का परमानन्द है। मनुष्यों का सौ गुना आनन्द,
पितृलोक विजेता पितरों का एक आनन्द होता है। पितृलोक विजेता पितरों के सौ आनन्द गन्धर्व लोक का एक
आनन्द है। गन्धर्व लोक के सौ आनन्द देवताओं का कर्मरूपी एक आनन्द है। कर्म के माध्यम से ही देवत्व की प्राप्ति
होती है। देवगणों के कर्म स्वरूप शत आनन्द, जन्मसिद्ध (अजन्मा) देवताओं के एक आनन्द के बराबर है।
निष्काम वेदपाठी और पापरहित पुरुषों का भी वही एक आनन्द है। आजान देवताओं के सौ आनन्द प्रजापति लोक
के एक आनन्द के समतुल्य हैं। कामना रहित श्रोत्रिय और पापरहित व्यक्तियों का भी वही एक आनन्द है। प्रजापति
लोक के सौ आनन्द, ब्रह्मलोक के एक आनन्द के बराबर है। वेदपाठी, कामनारहित और पापरहित व्यक्तियों का वही
एक आनन्द है। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे सम्राट् ! इसी को परमानन्द और इसी को ब्रह्मलोक कहते हैं। महाराज जनक
बोले- मैं आपको एक सहस्र (गौएँ अथवा मुद्राएँ) प्रदान करता हूँ। अब आप आगे भी हमारे निमित्त मोक्ष का
उपदेश करें। यह सुनकर ऋषि याज्ञवल्क्य भयभीत हो गये कि इस मेधावी राजा ने तो मुझे सब प्रश्नों के उत्तर मिल
जाने तक प्रतिबन्धित कर लिया है ॥ ३३ ॥
स वा एष एतस्मिन्स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा- यह पुरुष स्वप्न समाप्त हो जाने पर क्रीड़ा और विहार के पश्चात् पाप-पुण्य
का दर्शन करके पुनः उसी मार्ग से जाग्रतावस्था में पहुँच जाता है, जहाँ से वह गया था ॥ ३४ ॥
तद्यथाऽनः सुसमाहितमुत्सर्जद्यायादेवमेवायग् शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनान्वारूढ
उत्सर्जन्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३५ ॥
जैसे भारवाहक शकट बोझ के कारण (चर-मर) शब्द करते हुए गतिमान् होता है, वैसे ही देहस्थित यह आत्मा
प्राज्ञ आत्मा से अधिष्ठित होकर, शब्दायमान होता हुआ, ऊपर को श्वास खींचता हुआ गमन करता है ॥ ३५ ॥
स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपतावाणिमानं निगच्छति तद्यथाम्रं वोदुम्बरं
वा पिप्पलं वा बन्धनात्प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः संप्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥
जिस समय यह शरीर वृद्धावस्था को प्राप्त होकर कमजोर हो जाता है, उस समय यह पुरुष
उसी प्रकार शरीर के अवयवों से छूटता जाता है, जिस प्रकार आम, गूलर अथवा पीपल का फल,
वृक्ष से अलग होकर गिरने लगता है। यह पुरुष उसी मार्ग से अन्य योनियों में शरीर धारण करने के
निमित्त चला जाता है, जिस मार्ग से आया था ॥ ३६ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २ ३१७

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अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २ ३१७
तद्यथा राजानमायान्तमुग्राःप्रत्येनसःसूतग्रामण्योऽन्नैःपानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽ-
यमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं
ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥ ३७ ॥
जैसे क्रूरकर्मी सैनिक, दण्डाधिकारी, सारथि और ग्राम के प्रधान या नेता लोग आते हुए राजा की
अन्न, पानी, निवास आदि की व्यवस्था करके स्वागतार्थ प्रतीक्षा करते रहते हैं कि ये आ रहे हैं, ये आ रहे
हैं। वैसे ही ज्ञान सम्पन्न (कर्मफल जानने वाले) इस जीव की सभी भूत यह कहकर प्रतीक्षा करते रहते हैं,
कि यह आ रहा है, ब्रह्म आ रहा है॥ ३७॥
तद्यथा राजानं प्रयािसन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवे-
ममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छासी भवति ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार राजा के जाते समय उग्रकर्मा सैनिक, दण्डाधिकारी, सारथि और गाँव के मुखिया लोग
उसके समक्ष उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार यह जीव जाते समय ऊपर को श्वास खींचता है, तब इस
गमनशील जीव के समक्ष समस्त प्राण उपस्थित होकर उसका अनुगमन करते हैं॥ ३८॥
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
स यत्रायमात्माऽबल्यं न्येत्य संमोहमिव न्येत्यथैनमेते प्राणा अभिसमायन्ति स
एतास्तेजोमात्राः समभ्याददानो हृदयमेवान्ववक्रामति स यत्रैष चाक्षुषः पुरुषः पराङ्
पर्यावर्ततेऽथारूपज्ञो भवति ॥ १ ॥
जिस प्रकार यह जीवात्मा निर्बल होकर सम्मोहित (मूर्छित जैसा) हो जाता है, तब शरीरगत सभी
प्राण उसके समक्ष उपस्थित होते हैं। इसके पश्चात् वह इनके (प्राणों के) तेजांश को भली प्रकार ग्रहण
करके हृदय की ओर गमन करता है। जिस समय वह चक्षु में व्याप्त पुरुष नेत्रों से बहिर्गमन कर जाता है,
तब उनकी रूप दर्शन की सामर्थ्य समाप्त हो जाती है॥ १॥
एकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवति न जिघ्रतीत्याहुरेकीभवति न रसयत इत्याहुरे-
कीभवति न वदतीत्याहुरेकीभवति न शृणोतीत्याहुरेकीभवति न मनुत इत्याहुरेकीभवति
न स्पृशतीत्याहुरेकीभवति न विजानातीत्याहुस्तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष
आत्मा निष्क्रामति चक्षुष्टो वा मूर्ध्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्राणोऽ-
नूत्क्रामति प्राणमनूत्क्रामन्तः सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति सविज्ञानो भवति सविज्ञान-
मेवान्ववक्रामति तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च ॥ २॥
इस प्रकार शरीरस्थ प्राण जीवात्मा में (समाहित) एकीकृत हो जाने पर यह जीव देखना बन्द कर देता
है, ऐसा कहते हैं। (इसी प्रकार घ्राणेन्द्रिय, वाक् इन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, कर्णेन्द्रिय, त्वचा, मन और बुद्धि स्थित
चेतना जब उस आत्मा से एकीकृत हो बहिर्गमन करती है, तो) यह जीव न सूँघता है, न बोलता है, न स्वाद
चखता है, न सुनता है, न स्पर्श करता है, न मनन करता है और न ही जानता है, ऐसा लोग कहते हैं। उस

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३१८ बृहदारण्यकोपनिषद्
समय उसके हृदय का अग्रभाग अत्यन्त देदीप्यमान होता है और प्राण, नेत्र, मस्तिष्क अथवा शरीर के अन्य
किसी अवयव से बहिर्गमन कर जाता है। प्राण के बाहर निकलने के साथ ही समस्त इन्द्रियाँ उसका
अनुगमन करने लगती हैं। उस समय यह आत्मा विशिष्ट ज्ञान से सम्पन्न होता है और विशिष्ट ज्ञान-सम्पन्न
प्रदेश (देह) को ही गमन करता है। उस समय उसके साथ उसकी विद्या, उसके कर्म और पूर्व प्रज्ञा
(अनुभव किये गये विषयों की वासना) भी साथ चलते हैं॥ २॥
तद्यथा तृणजलायुका तृणस्यान्तं गत्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसंहरत्ये-
वमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यमाक्रममाक्रम्यात्मानमुपसं हरति ॥
जैसे तृण (घास पर चलने वाली) जोंक नामक कीड़ा एक तृण के अन्तिम भाग पर पहुँच कर दूसरे
तृण का आश्रय ग्रहण करने के लिए अपनी देह को सिकोड़ता हुआ अन्य तृण पर रखता है, वैसे ही यह
आत्मा इस (वर्तमान) शरीर का आश्रय छोड़कर अविद्या का परित्याग करके अपना उपसंहार करते हुए
दूसरे नवीन शरीर का आश्रय ग्रहण कर लेता है॥ ३॥
तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत
एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वाऽन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते
पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम् ॥ ४॥
जिस प्रकार स्वर्णकार स्वर्ण लेकर उसे नवीन कल्याणकारी रूप प्रदान करता है, उसी प्रकार यह
आत्मा वर्तमान शरीर को चेतनारहित करके, अविद्या से मुक्ति पाकर पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा
अथवा अन्य प्राणियों के नवीन स्वरूपों को धारण करता है अथवा नूतन रूपों का निर्माण करता है॥ ४॥
स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः प्राणमयश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः पृथिवीमय
आपोमयो वायुमय आकाशमयस्तेजोमयोऽतेजोमयः काममयोऽकाममयः
क्रोधमयोऽक्रोधमयो धर्ममयोऽधर्ममयः सर्वमयस्तद्यदेतदिदंमयोऽदोमय इति यथाकारी
यथाचारी तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति पुण्यः पुण्येन कर्मणा
भवति पापः पापेन । अथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति
तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते यत्कर्म कुरुते तदभिसंपद्यते ॥ ५॥
यह आत्मा ब्रह्म स्वरूप है; जो विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथ्वीमय, जलमय,
वायुमय और आकाशमय है। यह तेजोयुक्त, अतेजोयुक्त, कामयुक्त, अकामयुक्त, क्रोधयुक्त, अक्रोधयुक्त
और धर्म तथा अधर्म से भी युक्त है। यह सर्वमय इदम् युक्त (प्रत्यक्ष) अदोयुक्त (परोक्ष) भी है। वह जिस
तरह का कर्म और आचरण करता है, उसी तरह के भाव वाला हो जाता है। शुभ कार्य करने से वह शुभ
और पाप कृत्य करने से पापी होता है। वह पुण्य कर्मों द्वारा पुण्यात्मा और पाप कर्मों द्वारा पापात्मा होता
है। कुछ लोगों का कथन है कि वह पुरुष कामात्मा है। वह कामना के अनुरूप ही संकल्प करता है और
संकल्प के अनुरूप ही कार्य करता है तथा कर्मानुसार ही फल प्राप्त करता है॥ ५॥

अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र ९ ३१९

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अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र ९ ३१९
तदेष श्लोको भवति। तदेव सक्तः सह कर्मणैति लिङ्गं मनो यत्र निषक्तमस्य ।
प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किंचेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरैत्यस्मै लोकाय कर्मण
इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्मकामो न तस्य
प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति ॥ ६ ॥
यह श्लोक इस सन्दर्भ में है- इस पुरुष का लिङ्ग (कारण शरीर) जिस पर आसक्त होता है, उसी की ओर अपनी
इच्छा शक्ति एवं कर्म सहित गमन करता है। इहलोक में किए गये कर्मों द्वारा परलोक को प्राप्त करके उन कर्मों के
भोग के निमित्त वह पुनः इहलोक में आता है। कर्मफल भोग की कामना वालों का ही निश्चित रूप से आवागमन
चलता रहता है, किन्तु निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम पुरुष के प्राणों (इन्द्रियों) का उत्क्रमण (संकल्प पूर्वक
गमन) नहीं होता, वह तो ब्रह्म स्वरूप बनकर ब्रह्म को ही प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
तदेष श्लोको भवति ।
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुत इति ।
तद्यथाऽहिनिर्व्ययनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथा-यमशरीरोऽमृतः
प्राणो ब्रह्मैव तेज एव सोऽहं भगवते सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः ॥७॥
यह श्लोक इस विषय में है- जब इस पुरुष के हृदय में स्थित समस्त कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब
यह मर्त्य, अमृत अर्थात् अविनाशी होकर यहीं ब्रह्म की प्राप्ति कर लेता है। जिस प्रकार सर्प की केंचुली
उसके बिल के बाहर मृत स्थिति में पड़ी रहती है और उसी प्रकार यह शरीर भी मृत पड़ा रहता है और
ब्रह्मतेज से युक्त यह पुरुष जीवनमुक्त होकर शरीर के बिना ही रहता है। (यह सुनकर) विदेहराज जनक
ने कहा- हे भगवन्! मैं आपको एक सहस्र गौएँ (अथवा मुद्राएँ) प्रदान करता हूँ ॥ ७ ॥
तदेते श्लोका भवन्ति ।
अणुः पन्था विततः पुराणो माꣳस्पृष्टोऽनुवित्तो मयैव ।
तेन धीरा अपियन्ति ब्रह्मविदः स्वर्गं लोकमित ऊर्ध्वं विमुक्ताः ॥ ८ ॥
उस विषय (मोक्ष) के सन्दर्भ में ये श्लोक हैं- यह मार्ग (ज्ञानमार्ग) अति सूक्ष्म, विस्तृत और प्राचीन
है, जो मुझे प्राप्त हुआ है और मैंने ही इसकी शोध की है। धैर्यशील ब्रह्मविद् पुरुषों को इहलोक में ही मुक्ति
प्राप्त हो जाती है और शरीर छोड़ने के पश्चात् वे उसी पथ से स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं। विमुक्त स्थिति
वाले तो स्वर्ग से भी आगे ऊर्ध्व लोक को प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥
तस्मिञ्छुक्लमुत नीलमाहुः पिङ्गलꣳ हरितं लोहितं च ।
एष पन्था ब्रह्मणा हानुवित्तस्तेनैति ब्रह्मवित्पुण्यकृत्तैजसश्च ॥ ९ ॥
ब्रह्मवेत्ता द्वारा खोजे गये उस मार्ग को कई लोग अलग-अलग रंग वाला बताते हैं। कुछ लोगों का
कहना है कि वह श्वेत वर्ण का है, कुछ कहते हैं कि वह नीलवर्ण वाला है, कुछ उसे पीला, कुछ हरा तथा
कुछ लाल वर्ण वाला बताते हैं। वह मार्ग साक्षात् परब्रह्म (परमात्म स्वरूप ब्रह्मज्ञ) द्वारा अनुभव किया
हुआ है। उस मार्ग से पुण्यात्मा, तेजस्वी और ब्रह्मवेत्ता ही जाते हैं ॥ ९ ॥

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३२० बृहदारण्यकोपनिषद्
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳरताः ॥
(एकांगी जीवन जीने वाले) जो लोग केवल अविद्या (पदार्थपरक कौशल) की उपासना करते हैं,
वे घने अंधेरे में (जहाँ कोई मार्ग नहीं सूझ पड़ता उस स्थिति में) जा गिरते हैं। इसी प्रकार जो लोग केवल
विद्या (चेतना परक कौशल) की उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार अन्धकार में पड़ जाते हैं ॥ १० ॥
अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः ।
ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वाꣳसोऽबुधो जनाः ॥ ११ ॥
जो अज्ञानी और मूढ़ जन हैं, वे मृत्योपरान्त आनन्दहीन और अन्धकार से युक्त लोकों को प्राप्त करते हैं ॥
आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ॥
यदि पुरुष (आत्मा को) यह ज्ञान हो जाए कि मैं क्या हूँ, तो फिर किस कामना और इच्छा से शरीर
के लिए उसे दुःखी होना पड़े ? ॥ १२ ॥
यस्यानुवित्तः प्रतिबुद्ध आत्माऽस्मिन्संदेह्ये गहने प्रविष्टः ।
स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोकः स उ लोक एव ॥ १३ ॥
जो मननशील और प्रबुद्ध आत्मा वाला है, वह इस विषम (गहन) शरीर में प्रविष्ट होकर समस्त कर्म
सम्पन्न करता है, क्योंकि वह विश्वकृत् (कृत-कृत्य) है, सब कुछ करने वाला है, उसी प्राणी का वह लोक
है और वही स्वतः भी लोक है ॥ १३ ॥
इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदीर्महती विनष्टिः ।
ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १४ ॥
हम इस शरीर में ही निवास करते हुए यदि उस आत्मा या ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं (तो कृत-
कृत्य हो जाते हैं)। यदि उसे नहीं जानते, तो विनष्ट होते हैं। जो जान लेते हैं, वे अमृतत्व प्राप्त कर लेते हैं,
इससे भिन्न तो दुःख ही उठाते हैं ॥ १४ ॥
यदैतमनुपश्यत्यात्मानं देवमञ्जसा । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ १५ ॥
जब मनुष्य उस भूतकाल और भविष्यत् काल के स्वामी, प्रकाशमान आत्मा का प्रत्यक्ष दर्शन कर
लेता है, तब वह उससे कभी पराङ्मुख नहीं होता ॥ १५ ॥
यस्मादर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते । तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् ॥
जिसके पीछे दिन-रात्रि सहित संवत्सर अनुगमन करता हुआ, परिभ्रमण करता रहता है; ज्योतियों में
परम ज्योति उस 'आयु' (रूप आत्मा) की देवगण उपासना करते हैं ॥ १६ ॥
यस्मिन्पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः । तमेव मन्य आत्मानं विद्वान्ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥
जिसके अन्दर पञ्च महाभूत, पञ्चजन और आकाश आश्रित हैं, उस आत्मा को ही मैं अविनाशी ब्रह्म
मानता हूँ अथवा मैं ही वह ब्रह्मवेत्ता और अमृत हूँ ॥ १७ ॥
प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः । ते निचिक्युर्ब्रह्म
पुराणमग्र्यम् ॥ १८ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २२ ३२१

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अध्याय ४ ब्राह्मण ४ मन्त्र २२ ३२१
जो उसे प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु, श्रोत्र का भी श्रोत्र और मन का भी मन जानते हैं, वे उसे
पुरातन और अग्रगण्य ब्रह्म मानते हैं ॥ १८॥
मनसैवानुद्रष्टव्यं नेह नानास्ति किंचन। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥
उस ब्रह्म को एकात्मभाव से अन्तर्मुखी होकर ही देखा जाना चाहिए। इसमें नानात्व विभेद नहीं है।
जो इसे नानात्व के रूप में देखता है, वह मृत्यु के द्वारा मृत्यु को प्राप्त करता है ॥ १९ ॥
एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्। विरजः पर आकाशादज आत्मा महान्ध्रुवः ॥२०॥
वह ब्रह्म जो एक ही प्रकार से दर्शन करने योग्य है, वह अप्रमेय एवं निश्चल है, निर्मल है, आकाश
से भी अधिक सूक्ष्म है, अजन्मा है और वह महान् आत्मा अनश्वर है ॥ २० ॥
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दान्वाचो विग्लापनं हि
तदिति ॥ २१ ॥
प्रज्ञावान् ब्राह्मण को चाहिए कि उसे ही जाने और उसी का चिन्तन-मनन करे। अधिक शब्दों के
जंजाल में न उलझे। वह तो वाणी का व्यर्थ श्रम ही है ॥ २१ ॥
[ शब्दों से मात्र संकेत मिलते हैं, फिर तो प्रत्यक्ष अनुभव से ही उसका बोध होता है। अस्तु, यहाँ व्यर्थ वाग्-
जंजाल से बचने का परामर्श दिया गया है।]
स वा एष महानज आत्मा योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु य एषोऽन्तर्हृदय
आकाशस्तस्मिञ्छेते सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः स न साधुना कर्मणा
भूयान्नो एवासाधुना कनीयानेष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण
एषां लोकानामसंभेदाय तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन
तपसाऽनाशकेनैतमेव विदित्वा मुनिर्भवति एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति
एतद्ध स्म वैतत्पूर्वे विद्वांसः प्रजां न कामयन्ते किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्माऽयं
लोक इति ते ह स्म पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं
चरन्ति या ह्येव पुत्रैषणा सा वित्तैषणा या वित्तैषणा सा लोकैषणोभे ह्येते एषणे एव
भवतः । स एष नेति नेत्यात्माऽनगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि
सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्येतमु हैवैते न तरत इत्यतः पापमकरवमित्यतः
कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैष एते तरति नैनं कृताकृते तपतः ॥ २२ ॥
यह आत्मा महान्, अमृत, अज, विज्ञानमय तथा हृदयाकाशशायी है। यह सबको वश में रखने वाला
तथा सबका नियन्त्रक और अधिपति है। यह पुण्य कर्मों से प्रवृद्ध नहीं होता और न ही पापकृत्यों से ह्रास
को प्राप्त होता है। यह सभी प्राणियों का स्वामी, उनका ईश्वर और सर्वभूत पालक है। लोकों की मर्यादा
बनाये रखने के लिए इनको धारण करने वाला सेतु है। इस आत्मा को ब्राह्मण जन वेदों का अध्ययन करके
यज्ञ, दान और कामना रहित तप के द्वारा जानते हैं। इसी को जानकर वे मुनि बनते हैं। इस (आत्मारूपी)
लोक की कामना करते हुए ही त्यागी पुरुष सब कुछ त्याग कर संन्यास ग्रहण करते हैं। पहले के विद्वान

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३२२ बृहदारण्यकोपनिषद्
सन्तान आदि सकाम कर्मों के फल प्राप्त करने की आकांक्षा नहीं करते थे अर्थात् इससे विरत रहते हुए ये
सोचते थे कि हमारा लोक तो आत्म लोक है, सन्तति आदि का हम क्या करेंगे ? इसी कारण वे पुत्रैषणा,
वित्तैषणा और लोकैषणा से ऊँचे उठकर भिक्षाटन करते थे। पुत्रैषणा ही वित्तैषणा और वित्तैषणा ही
लोकैषणा है। आत्मा का ज्ञान देते समय विद्वज्जन 'नेति-नेति' ही कहते हैं, क्योंकि वह ग्रहण नहीं किया
जा सकता अर्थात् अग्राह्य है। वह आत्मा असङ्ग अर्थात् आसक्ति रहित है, अहिंस्य है, बन्धन रहित अर्थात्
मुक्त है, व्यथा रहित है और कभी नष्ट न होने वाला है। पाप और पुण्य दोनों को लाँघने में ये समर्थ हैं,
क्योंकि ये किए हुए और न किए हुए दोनों ही प्रकार के कर्मों से लिप्त नहीं होता ॥ २२ ॥
तदेतदृचाभ्युक्तम् । एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्धते कर्मणा नो कनीयान् ।
तस्यैव स्यात्पदवित्तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेनेति । तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त
उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वमात्मानं पश्यति नैनं पाप्मा
तरति सर्वं पाप्मानं तरति नैनं पाप्मा तपति सर्वं पाप्मानं तपति विपापो विरजोऽविचिकित्सो
ब्राह्मणो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडेनं प्रापितोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते
विदेहान् ददामि मां चापि सह दास्यायेति ॥ २३ ॥
इसी तथ्य का उल्लेख ऋचा में भी मिलता है- ब्रह्मवेत्ता (ब्रह्मविद्) की यह महिमा नित्य है, जो कर्म
के द्वारा न प्रवृद्ध होती है और न ह्रास को ही प्राप्त होती है। उस महिमा के स्वरूप का ही ज्ञान प्राप्त करना
चाहिए। उसका ज्ञान प्राप्त करके फिर वह पापकर्म से लिप्त नहीं होता। इस प्रकार ज्ञान रखने वाला शान्त
चित्त, तपस्वी, उपरत, तितीक्षा करने वाला और समाहित चित्त वाला होकर आत्मा में ही आत्मा का दर्शन
करता है, सभी को अपने आत्मा के रूप में ही देखता है। फिर कोई पाप उसे नहीं व्याप्तता, वह पापों को
लाँघ जाता है। वह पाप शून्य, मलरहित, संशयहीन और ब्राह्मण हो जाता है। हे राजन् ! यही ब्रह्मलोक है,
आप यहाँ तक पहुँच गये हैं। तब जनक बोले- हे भगवन् ! मैं आपको नमन करता हूँ और आपकी सेवार्थ
(आपके श्री चरणों में ) स्वयं को भी समर्पित करता हूँ ॥ २३ ॥
स वा एष महानज आत्माऽन्नादो वसुदानो विन्दते वसु य एवं वेद ॥ २४ ॥
यह महान् आत्मा जन्म न लेने वाला, अन्न भक्षक और कर्मफल प्रदाता है। इसे इस प्रकार जानने
वाला मनुष्य समस्त कर्मों का फल प्राप्त कर लेता है ॥ २४ ॥
स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्माभयं वै ब्रह्माभयँ हि वै ब्रह्म
भवति य एवं वेद ॥ २५ ॥
यह महान् आत्मा अज, जरारहित, मृत्युरहित, अमर एवं भयरहित ब्रह्म स्वरूप है। जो अभय है, वही
ब्रह्म है, ऐसा जानने वाला अभय ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ॥ २५ ॥

अध्याय ४ ब्राह्मण ५ मन्त्र ५ ३२३

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अध्याय ४ ब्राह्मण ५ मन्त्र ५ ३२३
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
अथ ह याज्ञवल्क्यस्य द्वे भार्ये बभूवतुर्मैत्रेयी च कात्यायनी च तयोर्ह मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी
बभूव स्त्रीप्रज्ञैव तर्हि कात्यायन्यथ ह याज्ञवल्क्योऽन्यद्वृत्तमुपाकरिष्यन् ॥ १ ॥
यह प्रख्यात है कि ऋषि याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं। जिनका नाम मैत्रेयी और कात्यायनी था। इन
दोनों में मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी और कात्यायनी सामान्य स्त्रियों की तरह ही थी। याज्ञवल्क्य ने अगले आश्रम
(वानप्रस्थ) में प्रवृत्त होने की इच्छा से कहा ॥ १ ॥
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः प्रव्रजिष्यन्वा अरेऽयमस्मात्स्थानादस्मि हन्त तेऽनया
कात्यायन्यान्तं करवाणीति ॥ २ ॥
पत्नी मैत्रेयी से (उन्होंने कहा)-हे मैत्रेयी ! मैं अब वर्तमान स्थान (गृहस्थाश्रम) से अगले स्थान
(वानप्रस्थ) में परिव्रज्या हेतु जाना चाहता हूँ। अतः मेरी आकांक्षा है कि दूसरी धर्मपत्नी कात्या

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३२४ बृहदारण्यकोपनिषद्
ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति न वा अरे क्षत्रस्य
कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति न वा अरे लोकानां कामाय
लोकाः प्रिया भवन्त्यामनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति न वा अरे देवानां कामाय
देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति न वा अरे वेदानां कामाय वेदाः
प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय वेदाः प्रिया भवन्ति न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि
प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति न वा अरे सर्वस्य कामाय
सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो
मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदꣲ सर्वं विदितम् ॥ ६ ॥
ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- हे मैत्रेयी ! निश्चित ही पति की आकांक्षा पूर्ति के लिए पति प्रिय नहीं होता
वरन् अपनी (आत्मीयता को ) आकांक्षा पूर्ति के लिए (पत्नी को) पति प्रिय होता है। इसी प्रकार पत्नी के
प्रयोजन के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रयोजन के लिए (पति को) पत्नी प्रिय होती है। पुत्रों की आकांक्षा
पूर्ति के लिए नहीं, वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए (पिता को) पुत्र प्रिय होते हैं। धन के प्रयोजन पूर्ति
के लिए नहीं, वरन् अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए (व्यक्ति को) धन प्रिय होता है। पशुओं के प्रयोजन
के निमित्त नहीं, वरन् अपने प्रयोजन के लिए पशु प्रिय होते हैं। ज्ञान या ब्राह्मण के प्रयोजन के लिए नहीं,
वरन् अपने प्रयोजन के लिए ज्ञान या ब्राह्मण प्रिय होता है। शक्ति अथवा क्षत्रिय की आकांक्षा के लिए नहीं,
वरन् अपनी आकांक्षा पूर्ति के लिए शक्ति या क्षत्रिय प्रिय होते हैं। लोकों के प्रयोजन के लिए नहीं, वरन्
अपनी ही इच्छा पूर्ति के लिए लोक प्रिय होते हैं। देवों के प्रयोजन के लिए देव प्रिय नहीं होते अपने
(आत्मीयता) प्रयोजन के लिए देव प्रिय होते हैं। वेदों के प्रयोजन के लिए नहीं, वरन् निज के प्रयोजन के
लिए वेद प्रिय होते हैं। प्राणियों के हित के लिए नहीं, वरन् अपने हित के लिए प्राणी प्रिय होते हैं। सभी
के हित के निमित्त नहीं, वरन् अपने हित के निमित्त सब प्रिय होते हैं। इसलिए हे मैत्रेयी ! यह आत्मा ही
दर्शन करने योग्य, श्रवण करने योग्य, मनन करने योग्य और निदिध्यासन (अनुभव) करने योग्य है। इस
आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है ॥ ६ ॥
ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः क्षत्रं वेद लोकास्तं
परादुर्योऽन्यात्रात्मनो लोकान्वेद देवास्तं परादुर्योऽन्यत्रात्मनो देवान्वेद वेदास्तं
परादुर्योऽन्यत्रात्मनो वेदान्वेद भूतानि तं परादुर्योऽन्यात्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं
परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेदेदं ब्रह्मेदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमे वेदा इमानि भूतानीदꣲ
सर्वं यदयमात्मा ॥ ७ ॥
जो ब्राह्मण या ज्ञान को आत्मा से भिन्न किसी अन्य वस्तु में जानने वाला होता है, उसे ब्राह्मण या ज्ञान
परित्यक्त कर देता है। क्षत्रिय या बल को आत्मा से भिन्न किसी वस्तु में देखने वाले को बल या क्षत्रिय
परित्यक्त कर देता है। लोकों को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को लोक त्याग देते हैं।
देवताओं को आत्मा के अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को देवता छोड़ देते हैं। वेदों को आत्मा के

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अध्याय ४ ब्राह्मण ५ मन्त्र ११ ३२५
अतिरिक्त किसी अन्य में जानने वाले को वेद परित्यक्त कर देते हैं। समस्त प्राणियों को आत्मा के अतिरिक्त
किसी अन्य में देखने वाले को समस्त प्राणी त्याग देते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण (ज्ञान), क्षत्रिय (शक्ति),
लोक, देवता, वेद और समस्त प्राणी ये सभी आत्मा ही हैं, उसके अतिरिक्त कुछ नहीं ॥ ७ ॥
[ आत्मा से भिन्न देखने पर ज्ञान, बल, लोक, देव, वेद आदि का वास्तविक लाभ मिलना बन्द हो जाता
है। उनका कलेवर भर बना रहे, तो कुछ लाभ नहीं होता।]
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय दुन्दुभेर्ग्रहणेन दुन्दुभ्या-
घातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि के बाहर निकलते हुए शब्दों को ग्रहण कर सकने (रोक सकने) में
कोई दूसरा समर्थ नहीं है, उन (शब्दों) को केवल स्वयं दुन्दुभि अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता
है (उसी प्रकार आत्मा को ग्रहण करने में आत्मा ही समर्थ है अथवा आत्मा के संचालक प्राण द्वारा ही
ग्रहण किया जा सकता है) ॥ ८ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन
शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
जिस प्रकार बजाये जाते हुए शङ्ख के शब्दों को केवल वह शङ्ख अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर
सकता है, अन्य कोई ग्रहण करने में समर्थ नहीं है (उसी प्रकार आत्मा अथवा संचालक द्वारा ही आत्मा
को ग्रहण किया जा सकता है।) ॥ ९ ॥
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन
वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ १० ॥
जैसे बजायी जाती हुई वीणा के शब्दों को स्वयं वह वीणा अथवा उसका वादक ही ग्रहण कर सकता
है, अन्य कोई नहीं (उसी प्रकार आत्मा को आत्मा द्वारा अथवा उसके संचालक द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है) ॥
स यथार्द्राग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य
निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः
श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्टः हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च
लोकः सर्वाणि च भूतान्यस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ११ ॥
जिस प्रकार चारों ओर से आधान किए हुए गीले ईंधन से उत्पन्न अग्नि से धूम्र निकलता है, उसी
प्रकार हे मैत्रेयी ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, उपनिषद्, सूत्र, श्लोक, व्याख्यान,
अनुव्याख्यान, इष्ट (यज्ञ), हुत (यज्ञ किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ),
इहलोक, परलोक और समस्त प्राणी उस महान् सत्ता के निःश्वास ही हैं ॥ ११ ॥
स यथा सर्वासामपाꣳ समुद्र एकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ स्पर्शानां त्वगेकायनमेवꣳ सर्वेषां
गन्धानां नासिके एकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ रसानां जिह्वैकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ रूपाणां
चक्षुरेकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ शब्दानाꣳ श्रोत्रमेकायनमेवꣳ सर्वेषाꣳ संकल्पानां मन

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३२६ बृहदारण्यकोपनिषद्
एकायनमेवँ सर्वासां विद्यानाँ हृदयमेकायनमेवँ सर्वेषां कर्मणाँ हस्तावेकायनमेवँ
सर्वेषामाSnapshot: न्दानामुपस्थ एकायनमेवँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवँ सर्वेषामध्वनां
पादावेकायनमेवँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम्॥ १२॥
जिस प्रकार समस्त जलों का आश्रय स्थल एक मात्र समुद्र है, समस्त स्पर्शों का अयन त्वचा है, समस्त गन्धों
का आश्रय नासिका है, समस्त रसों का आश्रय रसना (जिह्व) है, समस्त रूपों का आश्रय चक्षु है, समस्त शब्दों का
आश्रय श्रोत्र, समस्त संकल्पों का आश्रय मन, समस्त विद्याओं का आश्रय हृदय, समस्त कर्मों का आश्रय हस्त,
समस्त आनन्दों का आश्रय उपस्थ, समस्त विसर्गों (विसर्जनों) का आश्रय पायु (गुदा), समस्त मार्गों का आश्रय
चरण है, उसी प्रकार समस्त ज्ञान (वेदों) का एक ही आश्रय वाक्शक्ति (वाणी) है॥१२॥
स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्माऽनन्त-
रोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य
संज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १३ ॥
याज्ञवल्क्य ने आगे कहा-जिस प्रकार लवण (नमक) की डली बाहर और भीतर से रहित सम्पूर्ण रूप
से रसघन ही है, उसी प्रकार हे मैत्रेयी ! यह आत्मा बाह्याभ्यन्तर भेदों से शून्य प्रज्ञान घन ही है। यह
विज्ञानघन आत्मा समस्त भूतों से ऊँचा उठकर उन्हीं में विलीन होकर नष्ट हो जाता है। मृत्यु के उपरान्त इस
तत्त्व का नाम शेष नहीं रहता (संज्ञाविहीन हो जाता है, क्योंकि वह देहेन्द्रिय भाव से मुक्त हो जाता है) ॥१३
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवान्मोहान्तमापीपिपन्न वा अहमिमं विजानामीति स
होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा ॥ १४॥
मैत्रेयी ने कहा- हे भगवन्! यहीं आपने मुझे मोह में डाल दिया है। मैं इस (उपर्युक्त) तथ्य को विशेष
रूप से नहीं समझ सकती। याज्ञवल्क्य बोले- हे मैत्रेयी? मैं मोह में डालने के लिए यह बात नहीं कह
रहा हूँ। यह आत्मा निश्चित रूप से अमर्त्य (अविनाशी) है और उच्छेद (नष्ट होने के) धर्म वाली नहीं है॥
यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरँ
रसयते तदितर इतरमभिवदति तदितर इतरँ शृणोति तदितर इतरं मनुते तदितर इतरँ
स्पृशति तदितर इतरं विजानाति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं
जिघ्रेत्तत्केन कँ रसयेत्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कँ शृणुयात्तत्केन कं मन्वीत तत्केन
कँस्पृशेत्तत्केन कं विजानीयाद्येनेदँ सर्वं विजानाति तं केन विजानीयात्स एष नेति
नेत्यात्माऽगृह्यो न हि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो न हि सज्यतेऽसितो न व्यथते न
रिष्यति विज्ञातारमरे केन विजानीयादित्युक्तानुशासनासि मैत्रेय्येतावदरे खल्वमृतत्वमिति
होक्त्वा याज्ञवल्क्यो विजहार ॥ १५ ॥
जहाँ (अज्ञान जनित स्थिति में) द्वैतावस्था में कोई अन्य किसी अन्य को देखता, सूँघता, रसास्वादन
करता, सुनता, कहता, मनन करता, स्पर्श करता और जानता है; किन्तु जब इसके लिए सभी कुछ आत्मा
ही हो गया है, तब (वहाँ) किसके द्वारा किसे देखे, किसके माध्यम से किसे सुने, किसके द्वारा किसका

अध्याय ४ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ ३२७

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अध्याय ४ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ ३२७
रसास्वादन करे, किसके माध्यम से किसे कहे, किसके द्वारा किसका मनन करे, किससे किसका स्पर्श
करे, किससे किसे जाने ? हे मैत्रेयी ? जिसके द्वारा सभी को जाना जाता है, उसे किसके द्वारा जाने ? वह
आत्मा अग्राह्य है, जिसके विषय में 'नेति-नेति' ऐसा कहा गया है। उसका कभी नाश नहीं होता- वह
अशीर्य (नष्ट न होने वाला) है, वह किसी से आसक्त नहीं होता- वह असङ्ग है, वह कभी बन्धन में नहीं
बँधता- वह अबद्ध है। हे मैत्रेयी ! सर्वज्ञाता को किसके द्वारा जाना जाए ? अरी मैत्रेयी ! अमृतत्व की प्राप्ति
के लिए इतना ज्ञान (शिक्षा) बहुत है, ऐसा कहकर याज्ञवल्क्य (परिव्रज्या हेतु) चले गये ॥ १५ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
अथ वंशः (पौतिमाष्यात्) पौतिमाष्यो गौपवनाद्वौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो
गौपवनाद्वौपवनः कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः
कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः ॥ १॥ आग्निवेश्यादाग्निवेश्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो गार्ग्याद्गार्ग्यो
गौतमाद्गौतमः सैतवात्सैतवः पाराशर्यायणात्पाराशर्यायणो गार्ग्यायणाद्गार्ग्यायण उद्दालकायं-
नादुद्दालकायनो जाबालायनज्जाबालायनो माध्यन्दिनायनान्माध्य-
न्दिनायनः सौकरायणात्सौकरायणः काषायणा-त्काषायणः सायकायनात्सायकायनः
कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २॥ घृतकौशिकाद्धृतकौशिकः पाराशर्यायणात्पा-
राशर्यायणःपाराशर्यात्पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चासुरा-
यणस्त्रैवणेस्त्रैवणिरापजङ्गनेरापजङ्घनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज आत्रेयादात्रेयो
माण्टेर्माण्टिर्गौतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्य शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कैशोर्या-
त्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो विदर्भीकौण्डि-
न्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्धत्सनपाद्वाभ्रवः पथः सौभरात्पन्थाः
सौभरोऽयस्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वा-
ष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्ङाथर्वणो दैवादथर्वांदैवो मृत्योः
प्राध्वंसनान्मृत्युःप्राध्वंसनःप्रध्वंसनात्प्रध्वंसन एकऋषेरेकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्ति-
व्यंष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो
ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥
अब (याज्ञवल्कीय काण्ड का) वंश वर्णन किया जाता है। पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने
पौतिमाष्य से, पौतिमाष्य ने गौपवन से, गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने कौण्डिन्य से, कौण्डिन्य ने
शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कौशिक और गौतम से (ज्ञानार्जन किया), गौतम ने आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य
ने गार्ग्य से, गर्गवंशी ने गर्गवंशी से, गर्गवंशी ने गौतम से, गौतम ने सैतव से, सैतव ने पाराशर्यायण
(पराशर पुत्र) से, पाराशर्यायण ने गार्ग्य पुत्र से, गार्ग्य पुत्र ने उद्दालकायन से, उद्दालकायन ने जाबालायन
से, जाबालायन ने माध्यन्दिनायन से, माध्यन्दिनायन ने सौकरायण से, सौकरायण ने काषायण से, काषायण
ने सायकायन से, सायकायन ने कौशिकायनि से (ज्ञानार्जन किया); कौशिकायनि ने घृतकौशिक से,

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३२८ बृहदारण्यकोपनिषद्
घृतकौशिक ने पाराशर्यायण से, पाराशर्यायण ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने जातूकण्र्य से, जातूकण्र्य ने
आसुरायण और यास्क से, आसुरायण ने त्रैवणि से, त्रैवणि ने औपजन्धनि से, औपजन्धनि ने आसुरि से,
आसुरि ने भरद्वाजवंशी से, भरद्वाजवंशी ने आत्रेय से, आत्रेय ने माण्टि से, माण्टि ने गौतम से, गौतम ने
गौतम से, गौतम ने वात्स्य से, वात्स्य ने शाण्डिल्य के द्वारा, शाण्डिल्य ने कैशोर्य काप्य के द्वारा, कैशोर्यकाप्य
ने कुमार हारित के द्वारा, कुमार हारित ने गालव के माध्यम से, गालव ने विदर्भी कौण्डिन्य से, विदर्भी
कौण्डिन्य ने वत्सनपाद् बाभ्रव के द्वारा, वत्सनपाद् बाभ्रव ने पन्थासौभर के द्वारा, पन्थासौभर ने अयास्य
आङ्गिरस से, अयास्य आङ्गिरस ने आभूति त्वाष्ट्र से, आभूति त्वाष्ट्र ने विश्वरूप त्वाष्ट्र से, विश्वरूप त्वाष्ट्र ने
अश्विनीकुमारों के द्वारा, अश्विद्वय ने दधीचि आथर्वण के माध्यम से, दध्यङ् आथर्वण ने अथर्वांदैव से,
अथर्वांदैव ने मृत्यु प्राध्वंसन के द्वारा, मृत्यु प्राध्वंसन ने प्रध्वंसन के द्वारा, प्रध्वंसन ने एकर्षि के द्वारा, एकर्षि
ने विप्रचित्ति के माध्यम से, विप्रचित्ति ने व्यष्टि के माध्यम से, व्यष्टि ने सनारु से, सनारु ने सनातन से,
सनातन ने सनग से, सनग ने परमेष्ठी के द्वारा और परमेष्ठी ने ब्रह्मा से (ज्ञान प्राप्त किया); ब्रह्म तो स्वयंभू
है, उस ब्रह्म को नमन है ॥ १-३ ॥
॥ अथ पञ्चमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
ॐ पूर्णमदःपूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ ३ खं ब्रह्म खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदो यं ब्राह्मणा
विदुर्वेदैनेन यद्वेदितव्यम् ॥ १ ॥
वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत् भी) पूर्ण है। (उस) पूर्ण ब्रह्म से ही यह पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ
है। उस पूर्ण ब्रह्म सें से इस पूर्ण जगत् को निकाल लेने पर पूर्ण ब्रह्म ही शेष रहता है। ॐ (इस अक्षर) से
संबोधित खं (अनन्त आकाश या परम व्योम) ब्रह्म है। आकाश सनातन (परमात्म रूप) है। जिस
(आकाश) से वायु विचरण करता है, वह आकाश ही 'खं' है- ऐसा कौरव्यायणी पुत्र का कथन है। यह
ओंकार स्वरूप ब्रह्म ही वेद है- इस प्रकार (ज्ञानी) ब्राह्मण जानते हैं, क्योंकि जो जानने योग्य है, वह सब
इस ओंकार रूप वेद से ही जाना जा सकता है ॥ १ ॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
त्रयः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमूषुर्दैवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं
देवा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति
होचुर्दाम्यतेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥
देव, मानव तथा असुर इन तीनों प्रजापति के पुत्रों ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्रजापति के यहाँ
निवास किया। ब्रह्मचर्य वास पूर्ण करने के पश्चात् देवताओं ने (प्रजापति से) कहा- 'आप हमें उपदेश

अध्याय ५ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३२९

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अध्याय ५ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३२९
दीजिए।' तब उन्हें प्रजापति ने 'द' अक्षर का उपदेश दिया और पूछा- क्या तुमने इसका तात्पर्य समझ
लिया ? तब उन (देवों) ने कहा 'हाँ समझ गये'। आपने हमसे (इन्द्रियों का) दमन करो - इस प्रकार
कहा है। तब प्रजापति बोले- 'ठीक है', तुम समझ गये ॥ १ ॥
अथ हैनँ मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा
३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥
इसके बाद मनुष्यों ने प्रजापति से कहा- 'आप हमें उपदेश प्रदान करने की कृपा करें।' तदनन्तर
उन मनुष्यों से भी प्रजापति ने 'द' अक्षर का उपदेश देकर पूछा- 'क्या तुम इसका तात्पर्य समझ गये'?
तब समस्त मानवों ने कहा-'हाँ' समझ गये। उन्होंने कहा- आपने हमसे 'दान करो' इस प्रकार कहा है।
प्रजापति ने कहा- हाँ, तुम सब ठीक ही समझ गये ॥ २॥
अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा
३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा
दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्तत्रयꣳ शिक्षेद्दमं दानं
दयामिति ॥ ३॥
अन्त में असुरों ने भी प्रजापति से उपदेश करने की प्रार्थना की। प्रजापति ने उनको भी उसी 'द' अक्षर
का उपदेश किया और पूछा-क्या तुम सभी ने इसका अर्थ (भाव) समझ लिया? तब उन असुरों ने कहा-
'हाँ' भगवन् ! समझ गये, आपने हमको 'दया करो' ऐसा उपदेश प्रदान किया है। (तत्पश्चात्) प्रजापति
बोले- हाँ ठीक, तुम समझ गये। प्रजापति के अनुशासन का द. द. द. ............ मेघ गर्जना के रूप में
दैवी वाक् आज भी अनुमोदन करता है अर्थात् दमन करो, दान करो, दया करो। इस कारण से इन तीनों
दमन, दान और दया की ही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ॥ ३॥
[ प्रजापति के तीनों पुत्रों ने एक ही अक्षर 'द' से अपने लिए अनुकूल भाव ग्रहण कर लिया- प्रजापति
सन्तुष्ट हुए। यह कैसे संभव हुआ? उत्तर है- ब्रह्मचर्य तप से शुद्ध अन्तःकरण के आधार पर यह संभव हुआ;
अन्यथा पूरे वाक्य बोलने पर भी श्रोता अपने विकारों के आवरण में सत्य के स्पन्दन ग्रहण नहीं कर पाते। ऋषि
आग्रह करते हैं कि आज भी हमें प्रजापति के इन तीनों निर्देशों का अनुपालन करना चाहिए। प्रश्न उठता है- हम
मनुष्य हैं, तो तीनों निर्देशों का अनुपालन क्यों करें? समाधान यह है कि यदि हम ब्रह्मचर्य (ब्रह्म के अनुकूल
आचरण) की साधना करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि जब अपने 'स्व' में देवत्व का उदय हो, तो उससे उत्पन्न
श्रेष्ठता के अहं से बचने के लिए दमन का सहारा लें, जब मनुष्योचित भाव जागे, तो संकीर्ण स्वार्थों से बचने के
लिए दान करें और जब आसुरी भाव जागे, तो क्रूरता से बचने के लिए दया का आश्रय लें।]
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सर्वं तदेतत्त्र्यक्षरꣳहृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहर-
न्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्ये-
कमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥

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३३० बृहदारण्यकोपनिषद्
यह जो हृदय है, वह प्रजापति है- ब्रह्म है, वह सब कुछ है। यह 'हृदय' तीन अक्षर (वर्णों या क्षरित
न होने वाले गुणों) से युक्त है। 'हृ' यह एक अक्षर है (यह हृञ् धातु से बना है, जिसका भाव हरणशील
होता है), जो यह जानता है, उसके निमित्त अपने और अन्य (प्राण प्रवाह या प्राणी) अभिहरण करते
(अभीष्ट पदार्थ कहीं से प्राप्त करके देते) हैं। एक अक्षर 'द' है ('द' दानार्थ धातु से बना है) जो यह
जानता है, उसके निमित्त अपने और अन्य सभी दान करते (स्नेहपूर्वक अपने पास के पदार्थ देते) हैं। एक
अक्षर 'यम्' है (यह 'इण्' गत्यर्थक धातु से बना है) यह जानने वाला स्वर्ग की प्राप्ति करता है॥ १॥
[हृदय के तीन भाव हैं, जो आवश्यक है और अपने पास नहीं है, उसे प्राप्त करना, जो है उसे श्रेष्ठतर प्रयोगों
के लिए देना तथा अपने श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर गतिशील रहना। तीनों भाव मिलकर मनुष्य को इस लोक एवं अन्य
लोकों के अनुदानों के साथ सद्गति की प्राप्ति कराने में समर्थ होते हैं।]
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
तद्वैतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोकान्
जित इन्न्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यꣳ ह्येव ब्रह्म ॥ १ ॥
यह हृदय ही सत्यरूप है, यही महान् यक्ष है तथा यही ब्रह्म के रूप में प्रसिद्ध है। जो व्यक्ति इस
प्रकार जानता है, वह इन समस्त लोकों को जीत लेता है। जो असत् मानता है, वह उससे पराजय को प्राप्त
होकर नष्ट हो जाता है। जो इस तरह इस महान् यक्ष, आदिपुरुष (पूज्य), प्रथम उत्पन्न हुए 'सत्य ब्रह्म'
को जानता है, (उसको ही उपर्युक्त फल प्राप्त होता है); क्योंकि सत्य ही ब्रह्म रूप है॥ १॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं
प्रजापतिर्देवाꣳस्ते देवाः सत्यमेवोपासते तदेतत्त्र्यक्षरꣳ सत्यमिति स इत्येकमक्षरं
तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदमृतमुभयतः सत्येन
परिगृहीतꣳ सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वाꣳसमनृतं हिनस्ति ॥ १॥
यह व्यक्त जगत् प्रारम्भिक काल से आपः (मूल क्रियाशील तत्त्व) के रूप में ही था। तत्पश्चात् उस आपः ने
सत्य (यथार्थ भासित होने वाले जगत्) की सर्जना की। इसलिए सत्य ही ब्रह्म का स्वरूप है। ब्रह्म ने प्रजापति को
तथा प्रजापति ने समस्त देवगणों को उत्पन्न किया। वे सभी देवगण ब्रह्मरूप सत्य की उपासना करते हैं। यह 'सत्य'
नाम तीन अक्षरों से युक्त है। 'स' यह प्रथम अक्षर है, 'ती' (उच्चारण सौकर्य हेतु 'त्' को 'ती') यह द्वितीय अक्षर
तथा 'यम्' यह तृतीय अक्षर है। इन तीनों में प्रथम और तृतीय अक्षर ही सत्य रूप है, मध्य का दूसरा अक्षर अनृत है।
यह अनृत (तकार) दोनों तरफ से (सकार-यकार रूप) सत्य से व्याप्त है। अतः 'सत्य'- यह नाम सत्य प्राय ही है।
इस तरह से जानने वाले की अनृत कभी भी हिंसा नहीं करता॥ १॥
[यह नश्वर पदार्थ या जगत् सत्य के सम्पुट में है, अर्थात् सत्य से उत्पन्न है और उसी में लीन होता है। यह जानने वाला
नश्वर पदार्थ का सामयिक उपयोग करते हुए भी उसमें लिप्त होकर नष्ट नहीं होता, यह ऋषि का भाव है।]

अध्याय ५ ब्राह्मण ६ मन्त्र १ ३३१

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अध्याय ५ ब्राह्मण ६ मन्त्र १ ३३१
तद्यत्तत्सत्यमसौ स आदित्यो य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषो यश्चायं दक्षिणेऽक्षन्पुरुष-
स्तावेतावन्योन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः प्राणैरयममुष्मिन् स
यदोत्क्रमिष्यन्भवति शुद्धमेवैतन्मण्डलं पश्यति नैनमेते रश्मयः प्रत्यायन्ति ॥ २ ॥
वह सत्य ही आदित्य रूप है। इस सूर्य मण्डल में विद्यमान पुरुष और दक्षिण नेत्र में स्थित पुरुष दोनों
आपस में संयुक्त हैं। वे ये दोनों पुरुष एक दूसरे में स्थित हैं। आदित्य-रश्मियों के माध्यम से चाक्षुष पुरुष
में स्थित है और चाक्षुष पुरुष आदित्य में प्राण के रूप में स्थित है। जब चाक्षुष पुरुष निकलने लगता है,
उस समय यह आदित्य मण्डल को ही देखता है। पुनश्च, ये किरणें लौटकर समीप नहीं आती हैं ॥ २ ॥
य एष एतस्मिन्मण्डले पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकंः शिर एकमेतदक्षरं भुव इति
बाहू द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहरिति हन्ति
पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ३ ॥
इस आदित्य मण्डल में जो यह (सत्य नाम से युक्त) पुरुष विद्यमान है, 'भूः' उसका शिर है। (उस
पुरुष का) शिर एक है तथा वह अक्षर भी एक ही है। 'भुवः' यह भुजा है, इसकी भुजाएँ दो हैं तथा ये
अक्षर भी दोनों भुजाओं के रूप में (दो) हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अर्थात् चरणों के रूप में हैं; चरण दो हैं और
ये (स्वः=सुवः) अक्षर भी दो हैं। 'अहर्' (हन् धातु से बना है, अर्थ है- हननकर्ता) यह इस (पुरुष) का
उपनिषद् (गूढ़ नाम) है, जो इस तरह से जानता हुआ, उस ब्रह्म की उपासना करता है, वह पापों का हनन
करके उनका परित्याग कर देता है ॥ ३ ॥
योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य भूरिति शिर एकंः शिर एकमेतदक्षरं भुव इति बाहू
द्वौ बाहू द्वे एते अक्षरे स्वरिति प्रतिष्ठा द्वे प्रतिष्ठे द्वे एते अक्षरे तस्योपनिषदहमिति हन्ति
पाप्मानं जहाति च य एवं वेद ॥ ४ ॥
यह दक्षिण नेत्र में जो पुरुष (विद्यमान) है। भूः उसका शिर है। (उस पुरुष का) शिर एक है तथा
वह अक्षर भी एक ही है। 'भुवः' यह भुजा है, इसकी भुजाएँ दो हैं तथा ये अक्षर भी दोनों भुजाओं के रूप
में (दो) हैं। 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अर्थात् चरणों के रूप में हैं और ('स्वः = सुवः') अक्षर भी दो हैं।
'अहम्' (इसका भी अर्थ हननकर्ता है) उस (पुरुष) का उपनिषद् (गूढ़ नाम) है; जो इस तरह से जानता
हुआ ब्रह्म की उपासना करता है, वह पापों का हनन करके उनका परित्याग कर देता है ॥ ४ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष
सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किंच ॥ १॥
यह पुरुष मनोमय एवं सत्य स्वरूप प्रकाश से युक्त है। यह हृदय के अन्तः भाग में व्रीहि (धान)
अथवा यव (जौ) के रूप (जैसे सूक्ष्म आकार) में प्रतिष्ठित है। (यह अनन्त हृदय में योगियों द्वारा
दृष्टिगोचर होता है।) वह इन सभी का स्वामी एवं अधिष्ठाता है और जो भी कुछ (दृश्य जगत्) है, सभी
को अपने शासन में रखता है ॥ १॥

॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥

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३३२ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥
विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद्विद्युद्विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥
विद्युत् ही (प्रकाश स्वरूप) ब्रह्म है, इस प्रकार (प्रायः लोग) कहते हैं। पापों का खण्डन अथवा विनाश करने
में सक्षम होने से ब्रह्म ही विद्युत् (प्रकाश) स्वरूप है। जो (व्यक्ति) 'विद्युत् ब्रह्म है' इस प्रकार जानता है, उसके
पापों का (यह विद्युत् ब्रह्म) शमन कर देता है; क्योंकि प्रकाश के रूप में विद्युत् ही ब्रह्म है॥ १ ॥
॥ अष्टमं ब्राह्मणम् ॥
वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः
स्वधाकारस्तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः
स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥
वाणी की, कामधेनु गौ के समान उपासना करे। उस गौ के स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार तथा
स्वधाकार ये चार स्तन हैं। उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्कार से देवताओं की जीविका चलती है,
हन्तकार से मनुष्य जीवन पाते हैं तथा स्वधाकार से पितृगण जीवित रहते हैं। उस वाणी रूपी धेनु के लिए
प्राण ही वृषभ है और मन ही वत्स (बछड़ा) रूप है॥ १ ॥
॥ नवमं ब्राह्मणम् ॥
अयमग्निवैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति
यमेतत्कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषः शृणोति ॥ १ ॥
यह वैश्वानर अग्नि ही है, जो सभी पुरुषों के शरीर में स्थित है। जो अन्न भक्षण किया जाता है, उसका
पाचन शरीर में स्थित यह वैश्वानर अग्नि ही करता है। उसी का ही यह घोष (नाद) होता है, जिसे व्यक्ति
कानों को बन्द करके अनहद नाद की भाँति श्रवण करता है। जिस समय यह प्राण (पुरुष) शरीर से बाहर
निकलने वाला होता है, उस समय इस नाद को नहीं श्रवण कर पाता ॥ १ ॥
॥ दशमं ब्राह्मणम् ॥
यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य
खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं
तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स
ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन्वसति शाश्वतीः समाः ॥ १ ॥
जब यह पुरुष इस (मनुष्य) लोक से उन्मुक्त होकर गमन करता है, तब वह सर्वप्रथम वायु लोक को
प्राप्त करता है। (तदनन्तर) वहाँ पर वह वायु उसके लिए छिद्र युक्त होकर मार्ग प्रदान कर देता है, वह छिद्र
रथ के पहिये की भाँति होता है। उस (छिद्र) के द्वारा वह ऊर्ध्व की ओर आरोहण करता है। इसके पश्चात्
वह सूर्यलोक में प्रतिष्ठित होता है। वहाँ पर सूर्य भी उसके लिए लम्बर नामक वाद्ययन्त्र के छिद्र की भाँति
रास्ता प्रदान करता है। वहाँ से वह ऊर्ध्व की ओर आरोहण करते हुए चन्द्रलोक में पहुँचता है। वहाँ चन्द्रमा
भी उसके लिए दुन्दुभि के छिद्र की तरह का मार्ग देता है। उस मार्ग के द्वारा ही वह ऊपर की ओर बढ़ता
है। इसके बाद वह अशोक (अर्थात् मानसिक पीड़ा से रहित ) और अहिम (अर्थात् शारीरिक दुःख से
रहित) नामक लोक में पहुँचकर वहाँ सदा अनन्त वर्षों तक (अनन्तकाल तक) निवास करता है॥ १ ॥

अध्याय ५ ब्राह्मण १३ मन्त्र १ ३३३

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अध्याय ५ ब्राह्मण १३ मन्त्र १ ३३३
॥ एकादशं ब्राह्मणम् ॥
एतद्वै परमं तपो यद्व्याहितस्तप्यते परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेदौतद्वै परमं
तपो यं प्रेतमरण्यंः हरन्ति परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेदौतद्वै परमं तपो यं
प्रेतमग्नावभ्यादधति परमंः हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
रोगग्रस्त व्यक्ति को जो ताप-क्लेश होता है- यह निश्चित रूप से परम तप है, जो इस प्रकार श्रेष्ठ
चिन्तन करता है, वह परम सत्य लोक को अपने वश में कर लेता है। मृत अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को जो
लोग जंगल (श्मशान) की ओर ले जाते हैं, यह भी श्रेष्ठ तप है, जो इस प्रकार से जानता है- वह भी परम
सत्य लोक को जीत लेता है। मृत व्यक्ति को जो भी अग्नि में प्रतिष्ठित करते हैं, निश्चित ही यह परम तप
है, जो इस तरह से जान लेता है, वह श्रेष्ठ लोक को अपने वश में कर लेता है॥ १ ॥
॥ द्वादशं ब्राह्मणम् ॥
अन्नं ब्रह्मेत्येकआहुस्तन्न तथा पूयति वा अन्नमृते प्राणात्प्राणो ब्रह्मेत्येक आहुस्तन्न तथा
शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नादेते ह त्वेव देवते एकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतस्तद्ध स्माह प्रातृदः
पितरं किंःस्विदेवैवं विदुषे साधु कुर्यां किमेवास्मा असाधु कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा
प्रातृद कस्त्वेनयोरेकधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै वि अन्ने
हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि
ह वा अस्मिन्भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥
प्रातृद ऋषि अपने पिता से विचार विमर्श करते हुए कहते हैं- कुछ लोगों का कथन है कि अन्न ब्रह्म है, किन्तु
यह बात मिथ्या लगती है; क्योंकि प्राण के अभाव में अन्न सड़ (नष्ट हो) जाता है। कुछ लोग प्राण को ही ब्रह्म कहते
हैं, किन्तु यह बात भी मिथ्या प्रतीत होती है, क्योंकि अन्न के अभाव में प्राण शुष्क पड़ जाता है। यह दोनों देव तत्त्व
एक साथ मिलकर परमात्म भाव को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार की विशेष अनुभूति प्राप्त करने वाले का मैं क्या शुभ
अथवा क्या अशुभ करूँ ? (क्योंकि कृतार्थ होने के उपरान्त उसका न तो शुभ किया जा सकता है और न तो
अशुभ ।) तत्पश्चात् उसके पिता ने रोकते हुए इस प्रकार कहा-'हे प्रातृद' ! ऐसा मत कहो, इन दोनों तत्त्वों की
समरूपता को प्राप्त करके कौन परमभाव को प्राप्त होता है? अतः उस (प्रातृद के पिता) ने 'वी' इस प्रकार कहा। 'वी'
यही अन्न रूप है। 'वी' रूप अन्न में ही ये समस्त भूत (प्राणी) समाहित हैं। 'रम्' यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राण
में ही ये समस्त भूत (प्राणी समुदाय) रमण करते हैं। जो इस प्रकार से जानता है (वह वीर है), उसमें ये सभी प्राणी
समाहित होते हैं तथा सभी प्राणी रमण करते हैं॥ १ ॥
॥ त्रयोदशं ब्राह्मणम् ॥
उक्थं प्राणो वा उक्थं प्राणो हीदंः सर्वमुत्थापयत्युद्धास्मादुक्थविद्वीरस्तिष्ठत्युक्थस्य
सायुज्यंः सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ १ ॥
प्राण ही 'उक्थ' अर्थात् स्तोत्र है, इस कारण 'उक्थ' की प्राण के रूप में उपासना करें; क्योंकि प्राण

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३३४ बृहदारण्यकोपनिषद्
ही इन सभी (प्राणियों) को (ऊपर) उठाता है। इस उक्थ के द्वारा ही उक्थवेत्ता पुत्र का प्राकट्य होता है।
इस तरह से जानने वाला ज्ञानी ही 'उक्थ' (प्राण) के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
यजुः प्राणो वै यजुः प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते युज्यन्ते हास्मै सर्वाणि
भूतानि श्रेष्ठ्याय यजुषः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ २ ॥
प्राण की उपासना 'यजुः' (योग) के रूप में सम्पन्न करें। प्राण ही यजुः है, इस कारण प्राण में इन
समस्त भूतों (प्राणियों) का योग होता है। समस्त भूत (प्राणी) इस (प्राण) की श्रेष्ठता के कारण ही इस
यजुः रूप प्राण से संयुक्त होते हैं। अतः जो भी इस प्रकार से उपासना करता है, वह यजुः के सायुज्य और
सालोक्य को प्राप्त कर लेता है ॥ ३ ॥
साम प्राणो वै साम प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि सम्यञ्चि सम्यञ्चि हास्मै सर्वाणि
भूतानि श्रेष्ठ्याय कल्पन्ते साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ३ ॥
प्राण ही साम है; क्योंकि समस्त प्राणी साम में ही समाहित होते हैं; इस कारण 'साम' की इसी रूप
में उपासना करे। सभी प्राणी उस साम के साथ ही एक रूप होते हैं एवं उसकी श्रेष्ठता को धारण करने में
समर्थ होते हैं। इस प्रकार से उपासना करने वाला व्यक्ति साम के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त करता है ॥
क्षत्रं प्राणो वै क्षत्रं हि वै क्षत्रं त्रायते हैन प्राणः क्षणितोः प्र क्षत्रमन्नमाप्नोति
क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥
प्राण ही क्षत्र (बल) है, इसलिए प्राण की उपासना करें। प्राण ही क्षत्र है अर्थात् इस शरीर की
शस्त्रादि जनित क्षति से रक्षा करता है। अतः क्षत से रक्षा करने के कारण प्राण का क्षत्रत्व प्रसिद्ध है। अन्य
किसी से त्राण (रक्षा) न पाने वाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त करता है। जो भी व्यक्ति इस तरह जानता है,
वह क्षत्र के सायुज्य और सालोक्य को प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥
॥ चतुर्दशं ब्राह्मणम् ॥
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्‍यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत्सं
यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥
इस ब्राह्मण में गायत्री के तत्त्वज्ञान एवं महात्म्य का वर्णन किया गया है-
गायत्री के प्रथम पद (चरण) का महत्त्व समझाते हुए ऋषि कहते हैं- भूमि (भू+मि=दो, इसी
प्रकार), अन्तरिक्ष (चार) तथा द्यौ (दि+वौ =दो) ये कुल मिलाकर आठ अक्षर होते हैं। आठ अक्षरों से
युक्त गायत्री का एक (प्रथम)पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं) है। यह (भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ) ही इस गायत्री का
प्रथम पाद है। जो भी व्यक्ति इस तरह जानता है, वह तीनों लोकों के सम्पूर्ण ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेता है ॥
ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्‍यष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या
एतत्सं यावतीयं त्रयी विद्या तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥
ऋचः (ऋ+चः =दो, इसी प्रकार), यजूंषि (तीन) और सामानि (तीन) ये भी कुल मिलाकर आठ
अक्षर हैं। गायत्री महामन्त्र का द्वितीय पाद भी आठ अक्षरों से युक्त है। यह वेदत्रयी ऋक्, यजुः और साम
ही गायत्री का द्वितीय पाद (भर्गो देवस्य धीमहि) है। इस प्रकार से जानने वाला ज्ञानी त्रयी विद्या की
उपासना का फल प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥