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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३१


बहुत सी खराबियों के सिवाय यह एक बहुत बडी खराबी
है कि मनुष्य स्त्री संभोग के योग्य नही रहता और किसी किसी
को चैतन्यता भी नहीं होती अथवा हुई भी तो अपूर्ण होती है,
या होकर शीघ्रही मिट जाती है । चैतन्यता होते ही या स्त्री के
आलिंगनादि करने मे ही या केवल मानसिक विचारों के उत्पन्न
होते ही धातु निकलनी प्रारम्भ हो जाती है ।

क्षयरोग (तपेदिक) के एक हजार रोगियो में प्राय अधिक
हिस्सा रोग का कारण बहुमैथुन ही है उससे कुछ कम हस्तक्रिया
वाले और कुछ रोगियों का स्वप्नदोष व शुक्र पतन है, अन्य और
कारणों से रोगी होते हैं । पागलो में अधिक हिस्सा केवल हस्त-
क्रिया करने वालो का समझो । यह अनुसन्धान से डाक्टरो ने
पता लगाया है ।

मेरे पास भी जितनी स्त्रियां आती हैं और अपने पतियों के
रोग का हाल कहती हैं तो उनसे यही अनुभव होता है कि स्त्री
पुरुषो के रोगों का विशेष कारण बहुधा हस्तक्रिया, बहुमैथुन,
तथा अन्य प्रकार से वीर्यनाश गरमी सुजाक आदि ही है ।

क्षयरोग का विशेष कारण

२५ पच्चीस वर्षों मे मेरे पास जितनी क्षय रोग से ग्रसित
स्त्रियां आईं सबको देखने और उनकी जेवानी रोग की उत्पत्ति
का कारण सुनने से अधिक विषय ही निश्चय हुआ क्योकि ज्वर
की हरारत और खांसी आदि हर समय रहने पर भी मूर्ख पुरुष

१३२ आनन्द मन्दिर
स्त्री का पीछा नहीं छोड़ते, विषय करते ही जाते हैं। इस प्रकार
बेचारी निरपराध स्त्रिया कुसमय मे ही मूर्ख पतियों की कामाग्नि
की शान्ति में भस्म होजाती हैं अर्थात् जीवन लीला समाप्त
कर जाती हैं।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक सुश्रुत आदिको मे अधिक
मैथुन के विषय मे लिखा है,—
श्रमक्लमोरुदौर्बल्यबल धात्विंद्रियक्षयः ।
अपर्वमरणं च स्यादन्यथा गच्छतः स्त्रियम् ॥
अर्थ यह है कि जो नियम के विरुद्ध अधिक स्त्री प्रसग करते
हैं उन्हे श्रम, क्लान्ति, हृदय की कमजोरी, धातुक्षय, इन्द्रिय क्षय
और अकालमृत्यु आदि रोग उत्पन्न होजाते हैं ।
अधिक वीर्यक्षय से पुरुष को जो जो रोग उत्पन्न होते हैं
उनका पूरा वर्णन इसी पुस्तक मे दूसरी जगह मिलेगा इसलिये
इन सब खराबियो को समझ कर इन बुराइयो से सदैव बचना
चाहिये ।

आनन्द
मन्दिर
आठवां अध्याय
—:०:—

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३५
अधिक विषय का मुख्य कारण
पुरुषो की इस अज्ञानता भूल या मूर्खता का मुख्य कारण
यह है कि इस विषय का कोई उत्तम ग्रन्थ आजतक नहीं वना ।
किसी सज्जन विद्वान ने इस विषय के ग्रन्थ की कोई आवश्यकता
नहीं समझी क्योकि यह विषय विना शिक्षा के ही पशु पछी तक
जानते हैं इस विषय की शिक्षा प्रकृति से ही मिलजाती है।
यही समझ कर आजतक किसी का ध्यान इस ओर आकर्षित
नही हुआ । यद्यपि गर्भाधान क्रिया के नियम वताने वाले अनेक
ग्रन्थ वड़े वड़े विद्वानो के वनाये हुये मौजूद है परन्तु उनमें
केवल गर्भाधान विधि ही है रतिक्रिया का नियम विस्तार पूर्वक
नही समझाया गया इस कारण उन पुस्तको का प्रचार भी
नहुत कम है और केवल गर्भाधान विषय के लिये लोगो की
रुचि भी ऐसी पुस्तको की ओर कम रहती है।
ऐसी पुस्तको की अत्यन्त आवश्यकता है जिनसे विवाह
होते ही नव विवाहित वडे लड़के लड़कियो को उचित प्रसग के
गुण और अधिक नियम विरुद्ध प्रसग के अवगुण तथा उससे
होने वाले रोगो की उत्पति तथा रोगो से कष्ट और शरीर की
हानि इत्यादि विषय भली भांति समझाये जावे। फिर कोई कारण
नहीं है कि इसका प्रभाव उनके कोमल हृदयो पर न पड़े और
वे उन हानिकारक परिणामो से न बचे क्योकि मुझे इस बात
का पूरा अनुभव है। मेरे पास वीसो चिट्ठिया ऐसे नवयुवक रोगी

१३६ आनन्द मन्दिर
पुरुषों की आया करती हैं। वे लिखते हैं मुझे स्त्री प्रसंग की
अधिकता के इन भयंकर परिणामो का पता न था। आपकी बनाई
दाम्पत्य जीवन शास्त्र से मुझे इस दुर्ब्यसन के भयंकर परिणाम
मालूम हुए। इसके कारण मेरी स्त्री भी रोगों का घर बनगई है
और मैं भी अब अपनी जिन्दगी से आरी आगया हूं।
इस प्रकार की एक दो नही, सौ दो सौ नहीं मेरे पास पचीस
वर्षों में युवक पुरुष रोगियो के लाखो पत्र आचुके हैं और
प्रतिदिन बराबर अनेक पत्र आया करते हैं। इसी कारण इस
पुस्तक के प्रकाशित करने की आवश्यकता समझी गई।
आजकल इसके विरुद्ध अनेक पुस्तकें कामशास्त्र कोकशास्त्र
इत्यादि अनेक नामो से प्रकाशित होरही हैं जिनमे मनगढ़ंत इतनी
अनर्थक बाते भरदी गई हैं कि जिनके पढ़ने से स्त्री पुरुषों को
उनकी परीक्षा की उत्कण्ठा होती है और वे बाते महा हानिकारक हैं।
उनमे उनकी हानि को छिपाकर लाभ दिखाया गया है और बीच
बीच मे कही कही धर्म की दुहाई भी दी गई है जिससे सभी
पुरुषों को अरुचि न हो। उपाय ऐसे हानिकारक बतलाये गये
हैं कि जिनको पढ़ सुनकर उन उपायों पर चलने वाले महा
भयंकर रोगों में फंस जाते हैं।
कामशास्त्र का नाम लेकर ऐसे मनगढंत आसनो का प्रयोग
बतलाया गया है कि उसके पढ़नेवाले मूर्ख विषयी पुरुष उस
विधि से रतिक्रिया कर स्त्रियों को वन्ध्या बनादेते हैं उनके
गर्भाशय मे ऐसी खराबियां उत्पन्न होजाती हैं कि गर्भ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३७
नहीं रहता यदि रहा तो गर्भपात व गर्भस्राव होजाता है। ऐसी
स्त्रियां मेरे पास अबतक बीसो हजार आचुकी हैं उनकी जबानी
उन कोकशास्त्र कामशास्त्र नामक अनेक पुस्तको का हानिकारक
परिणाम मालूम हुआ । अनेक स्त्रियो ने मुझसे कहा कि
हमारे पति ने कई जगह से पुस्तके मंगाईं उनमे लिखी विधि
से उलटी सुलटी रीति से सभोग किया तबसे गर्भाशय और पेडू
में पीडा होती है और भी अनेक शिकायतें होगईं हैं। किसी का
गर्भाशय टेढ़ा देखा गया, किसी का गर्भाशय सूजा हुआ पाया
गया, किसी का भीतर को धसा हुआ देखा गया, किसी का
गर्भाशय वाहर निकला हुआ मिला। इसी प्रकार के अनेक रोग
गर्भाशय सम्बन्धी देखे गये और देखे जाते हैं इन सबका विशेष
कारण अनियम रतिक्रिया है। लोग ऐसी पुस्तको को पढकर
विषय वासना की कामाग्नि वुझाने के लिये उसका बुरा परिणाम
न विचार कर स्त्रियो पर अत्याचार करते हैं। अधिक आनन्द
पाने की जगह कुछ रोज मे कष्ट भोगने लगते हैं और अपनी
प्यारी निरपराध स्त्रियो को भी रोगी बनादेते हैं। इसीलिए ऐसी
पुस्तके हर एक के लिए सदैव हानिकारक ही हैं, लाभकारी नही,
उन्हे न पढ़ना चाहिए।
अज्ञानी अपढ़ ही नही यह दशा अच्छे अच्छे पढ़े लिखे
सभ्य समाज के पुरुषो की भी है। अनेक डाक्टरों अन्य चिकि-
त्सको की स्त्रियां भी इस दुर्व्यसन के कारण रोगी हो मेरे पास
आईं और आरही हैं।

३३८ आनन्द मन्दिर
शारीरिक और मानसिक निर्बलता
की अधिकता
वीर्य की निर्बलता व वीर्य क्षीणता के कारण कमजोरी
आजकल एक जगत व्यापी रोग है इसका कारण यह है कि
नियम के विरुद्ध व बहुमैथुन आदि अत्याचार भी जगत व्यापी
हो रहे हैं। समस्त देश मे यह रोग फैला हुआ है, यह पापो में
सबसे बड़ा भारी पाप है और बुराइयो मे सबसे बड़ी बुराई है
किसी ने इस तरह बीमारी और असभ्यता नहीं फैलाई
जितनी इस दुष्ट आदत ने फैलगई है।
नियम विरुद्ध विषय करना स्त्री पुरुष का सबसे बढ़कर जबर्दस्त
शत्रु ( कुल्हाड़ा ) है जिसे मनुष्य अपने ही हाथों से अपने पाओं
पर मारते हैं, जिस किसी को जीते जी मुर्दा बनना हो, सुन्दरता,
लावण्यता, और आरोग्यता को अपने भीतर से दूर करना हो
और रोगी, कुरूप, सुस्त, तथा नपुंसक बनना हो उन्ही का यह
मित्र है। अपने हाथो से आप ही स्वयं सत्यानाश करने की
मिसाल इस पर ठीक आती है। स्पष्ट कहना यह है कि अपनी ही
गर्दन अपने हाथ की छुरी से काटनी है। इससे पठ्ठो की
कमजोरी, क्षयरोग, मिरगी ( अपस्मार ) अधरंग, मूर्छा,
उन्माद, पागलपन, आदि दुष्ट रोग आकर उस मनुष्य का
प्राणान्त करते हैं। आखो की कमजोरी, धातु का जाना, स्वप्नदोष
शीघ्रपतन, दर्द कमर, दिल की धड़कन, दिल व दिमाग आदि

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २३६
की कमजोरी, श्वास, दर्द गुर्दा, दर्द जिगर, कब्ज (कोष्ठ
बद्धता) मन्दाग्नि, प्रमेह, दुर्बलता, चेहरे पर बेरौनकी, सुस्ती,
उदासी, सन्तान का न होना, चित्त की भ्रान्ति, दर्द सिर और
जुकाम, नजला, मूत्राशय, आमाशय, हृदय, सिर मस्तिष्क यकृत
तथा प्लीहा की कमजोरी, गठिया, भ्रम इत्यादि रोग प्राय आ
कर दबाते हैं। यह भी पूरे तौर से ध्यान मे रखना चाहिये कि पृथक
पृथक प्रकृतियो पर विपरीत तथा अधिक मैथुन का अलग २
दुष्परिणाम होता है। यह ऊपर लिखे रोगो वाले हजारो रोगी
पुरुषों की स्त्रियो का इलाज करने से मुझे अनुभव हुआ है। ऐसे
बहुत से पुरुष हैं कि लगातार वर्षों विपरीत मैथुन अथवा बहु
मैथुन करते हैं परन्तु उनको इतनी हानि नही पहुँचती कि
जितनी दो चार मास नियम विरुद्ध करनेवाले को पहुँचती है।
ऐसे पुरुष भी बहुत है कि जिन्होंने दो चार बार नियम विरुद्ध
विषय किया था उतने ही बिगाड़ से वे स्त्री प्रसंग के योग्य न
रहे। जिन लोगो के पट्ठे ( स्नायु ) कमजोर होते हैं उन्हीं के
ऊपर जल्द और गहरा असर होता है और वह थोड़ी सी अनु-
चित क्रिया करके भी सारी आयु के लिये बरबाद हो जाता है।
शोक की बात तो यह है कि स्त्री और पुरुष दोनो मे यह बुरी
आदत पड़ रही है।
मेरे पास हजारो स्त्रियां ऐसी आई और आ रही हैं कि
जिनके पति की अवस्था २०, २२ तथा २५ ही वर्ष की है परन्तु
वे नपुंसक हो गये हैं उन्होने विवाह होते ही नियम विरुद्ध

२४० आनन्द मन्दिर
प्रकृति विरुद्ध और अपनी शक्ति से वारह विषय किया है और जिन
बुरे कर्मों का फल उन्हे शीघ्र ही मिल गया। आप तो जीवन के
सन्तान सुख से हाथ धो ही बैठे और बेचारी निरपराध रूपवती
प्यारी स्त्रियां अब रो रो कर दिन बिता रही हैं।
एक स्त्री जिसकी अवस्था १८ वर्ष की थी वह अपने पति
के साथ मेरे पास अपना इलाज कराने आई, पति पत्नी दोनो
की दशा बहुत खराब थी। उस स्त्री की दशा देख कर नाड़ी
की परीक्षा की तो मालूम हुआ कि उसको प्रदर बहुत जोर पर
है। मैंने उससे कुछ गुप्त बातें पूछीं। उसने मुझसे कुछ भी नहीं
बतलाया शिर नीचा करके बैठी रही। तब मैंने उससे पूछा कि
अभी तक तुम्हारा इलाज किस रोग का होता था, उसने कहा
कि खांसी और ज्वर की हरारत का इलाज होता था। डाक्टर
लोग फेफड़े की खराबी और वैद्य पुराना बुखार बतलाते थे इसी
रोग का इलाज होता रहा। बुखार के लिये गरम गरम औषधियां
दी गईं जिससे प्रदर और भी बढ़ गया। शरीर अधिक कमजोर
हो गया। स्त्री को देखकर मैने उसके पति के पास अपना बनाया
एक रोगी फार्म भेजा और मैंने उस स्त्री को समझा दिया कि
तुम्हारे शरीर मे जो कुछ भी रोग है वह तुम्हारे पति के रोगों
का असर है। यदि तुम्हारे पति इस फार्म मे अपना पूरा हाल
ठीक ठीक न लिखेगे तो मैं इलाज न करूंगी। उस स्त्री ने पति
से यही बात कही तब उसने फार्म भरकर भेजा उसके फार्म
से मालूम हुआ कि उसका विवाह १६ वर्ष की अवस्था में

गर्भाधान की तैयारी । पृ० १७०
( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २४१

हुआ था साथ ही गौना भी हुआ था। विवाह होने ही उसने
प्रसंग का नियम प्रतिदिन का कर दिया और जब कभी स्त्री
अपने माता पिता के यहां चली जाती थी तब वह हस्तक्रिया
किया करता था। कैसे दुःख की बात है कि एक दिन भी उससे
बिना प्रसंग के नहीं रहा जाता था। इस प्रकार १६ से २४ वर्ष
तक उसने अपने जीवन की जड़ को विषय रूपी कुल्हाड़े से इस
प्रकार काटा था कि अब जीवन रूपी वृक्ष गिरना ही चाहता था।
जिस समय मेरे पास वे दोनों स्त्री पुरुष इलाज कराने आये थे
उस समय भी उनकी यही दशा थी कि स्त्री पुरुष दोनो रोगी
होने पर भी दस पन्द्रह दिन तक भी बिना संभोग किये नहीं
रह सकते थे।
मैंने उस रोगी पुरुष का फार्म देखकर स्त्री से कहा कि अगर
तुम्हारे पति ने यह आदत न छोड़ी तो वह आराम हो नहीं सकता
और कुछ दिनों में इससे भी खराब दशा हो जावेगी क्योंकि
अधिक विषय और हस्तक्रिया के कारण उनके शरीर में कुछ भी
तत्व नहीं रहा था अब उन्हें कम से कम एक वर्ष तक ब्रह्मचर्य से
रहना चाहिये। वह बेचारी रोने लगी और बोली-मैं उन्हें ऐसा
मौका न दूंगी परन्तु हस्तक्रिया का मैं क्या उपाय करूंगी उनका
स्वभाव तो ऐसा होगया है कि मासिकधर्म के दिनों में भी सन्तोष
नहीं करते और बीमारी की दशा में भी नहीं मानते। यद्यपि शक्ति
उनके शरीर में नहीं है परन्तु बिना इच्छा भी अपनी आदत
नहीं छोड़ते। मैंने औषधि देकर बहुत सावधान कर दिया। वे दोनों
१६

(ध)!
Wait, let's look at "औषधि" in line 2:
Does it have a 'ध' or 'व'?
It has 'धि'! It's ध with an i-matra (ि)!
And what about the letter before it? Is it 'ष' or 'प'?
Wait, let's look at 'ष' in "औषधि" (L2):
Look inside the belly of that 'प':
Is there a diagonal slash?
Look at "दशा" in line 5: 'श' is clear.
Look at "क्षीण" in line 14: 'क्ष' has a 'ष' component.
Now look at "पुरुष" in line 10:
Wait, in line 10: "उस पुरुष ने" -> is there a diagonal slash in 'ष'?
Let's look really closely at line 10 "पुरुष":
Wait, it's very faint, but it's a standard letter 'ष' in this typeface!
Wait, but what about the diagonal line? In many old Indian letterpresses, the thin diagonal line of 'ष' often broke or got clogged with ink, OR the font simply had a very faint diagonal line!
Wait, look at line 19: "स्त्री पुरुषों की"
Is it "पुरुषों" or "पुरुपों"? No Hindi book prints "पुरुपों"! The title of the book is "आनन्द मन्दिर", a known Hindi book (by Pt

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २४३
भी हाथ धो बैठते हैं और मुर्दा बन जाते हैं। “मर्ज बढ़ता गया
ज्यों ज्यो दवा की' की कहावत ठीक हो जाती है। यदि वे स्तम्भन
वटी और तिला आदि का सेवन न करके साधारण औषधियां
खाते हुए ब्रह्मचर्य से रहे तो यह निश्चय बात है कि ब्रह्मचर्य से
रहने से ही उनकी शिकायते दूर हो जायें। मेरे पास ऐसी स्त्रियो की
बीसो चिट्ठियाँ प्रतिदिन आया करती हैं कि जिनके पतियो को
तिला आदि की जरूरत है परन्तु मै उन्हें इनकार लिख देती हूँ
कि ऐसी औषधियों का बेचना महा मूर्खता है और लोगों को
धोखे में डालकर उनकी रही सही शारीरिक दशा और भी
बिगाटना है। क्योंकि सबको वे औषधिया फायदा नहीं करती ।
मेरी जो आज़मूदा दवाइया हैं जिनको उनसे फायदा हो सकता है
वे आगे लिखूगी।
लोग अपनी पूरी व्यवस्था न तो पत्र मे लिखते हैं न वैद्य
से कहते हैं फिर कैसे ठीक ओषधि फायदा कर सके, जरा
कमजोरी शरीर या नसों मे देखी बस तिला और स्तम्भनवटी
नोटिस में देखकर मंगाली, चाहे वह फायदा करे या नुक्सान,
इस बात का विचार नहीं करते ।
ऐसे पुरुषो की स्त्रिया जब मेरे पास आती हैं तो अपना
हाल तो कह देती हैं परन्तु पति का हाल बहुत पूछने पर नीचा
शिर करके मुझ से अपनी दुःख कथा कहती हैं तो भला वे पुरुष
वैद्य से कैसे कह सकती हैं। पुरुषो का भी यही हाल होगा, वैद्य
को पूरा हाल अपनी मुर्खता का न बता सके तो बडी मूर्खता

२४४ आनन्द मन्दिर
हैं। लोग वैद्य के पास जाकर असल रोग को कभी प्रकट नही
करते और यह कहते हैं कि मुझे जोफ जिगर है, अथवा प्रमेह
है, आंखे कमजोर है, दर्द शिर है, मैं दुर्बल होता जाता
हू। वैद्य या डाक्टर उनके कथनानुसार इन्ही रोगों का इलाज
करने लगते हैं । मूल कारण हस्तक्रिया अथवा बहुमैथुन
प्रकृति के विरुद्ध विषय अथवा अन्य बुराइया दूर नहीं की जाती
हैं। सम्भव है रोगी इस महा हानिकारक व्यसन के प्रभाव को
न जानता हो किन्तु यह सम्पूर्ण रोगों का घर है। अस्तु रोगी
को चाहिये कि अपना पूरा हाल सकोच न करके वैद्य या हकीम
से कह दे और चिकित्सक को चाहिये कि अच्छी तरह खोज
कर (पूछ कर) रोगो के मूल कारण को दूर करे ।
पुरुष रोगियों के विषय में मेरा अनुभव
मेरा २५ पच्चीस वर्ष का अनुभव है मैने लाखों रोगी स्त्रियो
की चिकित्सा करके और स्त्रियो द्वारा उनके पुरुषो की चिकित्सा
करके तथा पुरुष रोगियों के पत्रों से पारसल द्वारा औषधियों
से चिकित्सा करके अनुभव प्राप्त किया है कि पुरुष रोग-ग्रसित
रहने पर भी ब्रह्मचर्य से नही रहते, औषधियां पथ्य से रहकर
सेवन करना उन्हे वड़ा कठिन मालूम होता है। रोग चाहे बढ
क्यो न जावे परन्तु ब्रह्मचर्य से दो चार महीने भी नही रह
सक्ते ।
स्त्रियों के प्रतिदिन मेरे पास इस विषय के पत्र आया करते

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २४५


हैं कि "आपकी भेजी हुई औषधि आई, पति जी सेवन तो कर
रहे हैं परन्तु ब्रह्मचर्य से रहना नही चाहते। एक सप्ताह भी ब्रह्म-
चर्य से रहना उन्हे कठिन होरहा है। मुझे भी पति के इस स्वभाव
से बड़ा कष्ट होता है। मैं औषधि खारही हूं दस पांच दिन को
रोग कम होजाता है फिर पति के कारण बढ़जाता है" इस प्रकार
के अनेक पत्र स्त्रियो के आया करते हैं। जो पति पत्नी पथ्य से
ब्रह्मचर्य से औषधियो का सेवन करते हैं उनके रोग दूर होजाते
हैं। वे तन्दुरुस्त हो जाती हैं।

सैंकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष रोगी हैं

जो शीघ्रपात, स्वप्रदोष, सिथिलता और नपुंसकता आदि रोगों
से ग्रसित हैं। जो स्त्री का स्पर्श करते ही स्वयं स्खलित होजाते हैं,
इसका प्रमाण यह है कि वैद्यो और हकीमो के यहां जाकर पता
लगाइये। इस प्रकार के कितने रोगी जाते हैं और धातुपुष्ट की
औषधियां शीघ्रपात और नपुंसकता आदि की दवाइयां खाते हैं.
तिला आदि बेचने वाले नोटिसवाजो के यहां जाकर पता लगाइये
तो मालूम होगा कि सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष शीघ्रपात और
स्वप्रदोष आदि वीर्य विकार की औषधियो के लिए पत्र भेजते हैं।

वीर्यदोष वाले रोगियों के पत्र

मेरे पास २५ पच्चीस वर्षों मे लाखों ही पुरुषों के पत्र वीर्य
दोष की औषधियो के लिये आये और प्रतिदिन पचीसो आते हैं

२४६ आनन्द मन्दिर
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तथा रोगी पुरुषो की रोगी स्त्रियां भी आइँ और आया करती
हैं। वे भी पति के शीघ्रपात की शिकायत और सिथिलता नपुस-
कता का रोना रोती हैं और औषधियां लेजाती हैं। इस प्रकार
पुरुषो की निर्वलता वीर्य्यक्षीणता और सम्भोग शक्ति का पता
लगता है। जब कि पुरुषो की शक्ति की यह दशा है तो इस दशा
मे आसनो का प्रयोग और अनेक निन्दनीय और हानिकारक
उपायो से सम्भोग करना और स्त्रियो को स्खलित करने का
उपाय काम मे लाना जीवन के लिए कितना हानि कारक और
अनुचित है।

स्त्रियों की रोगी संख्या

पुरुषो की अज्ञानता और भूल से स्त्रियो की भी रोगी
संख्या सैकड़ा पीछे निन्नानवे से कम नहीं है। २५ पच्चीस वर्षों
में मेरे पास लाखों ही स्त्रिया अपने रोगो की परीक्षा और
चिकित्सा कराने आईं। इन सब के देखने से और उन स्त्रियों की
जबानी मालूम हुआ कि अधिक विषय और नियम विरुद्ध
विपरीत रति के कारण स्त्रियों मे अनेक प्रकार के गुप्त रोग
उत्पन्न होगये हैं। इस प्रकार रोगी स्त्रियों की संख्या देखते हुये
यही निश्चय होता है कि स्त्री पुरुष दोनो की रोगी संख्या एक
दूसरे से कम नहीं है। ऐसी दशा मे ऐसी पुस्तको का प्रचार
करना जिनको पढ़सुन कर उनमे लिखे मनगढत प्रयोगों को काम
में लाने से और भी अधिक हानि पति पत्नी दोनों को पहुँचने की

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २४७

सम्भावना है उसीसे रोगी और भी अधिक वढ रहे हैं।
'आयुर्वेद बतलाता है पति पत्नी दोनों आरोग्य हों तब
सम्भोग करना चाहिये और यहा सैकड़ा पीछे निन्नानवे पति पत्नी
दोनो रोगी देखे जाते हैं यह ठीक आयुर्वेद के नियम के विरुद्ध है
अर्थात् रोगी होते हुए भी प्रसंग बिना किये बाज नहीं आते ।
शक्ति न रहते हुये भी स्तम्भन वटी खाकर तिला का सेवन
करके बिना शक्ति के ही सम्भोग करके अपना और अपनी
प्यारी स्त्री का जीवन नष्ट करना महा अज्ञानता है। स्तम्भन वटी
आदि रोगों को हटानेवाली अवश्य हैं परन्तु औषधि खाते हुए
यदि परहेज न किया जायगा, रोग उत्पत्ति का मूल नष्ट न होगा
तो वटी क्या करेगी ।

रोगों की उत्पत्ति

पुरुषों की विषयाग्नि में स्त्रियों के प्राणों की किस
प्रकार आहुती होरही है इसका मुझे पूरा अनुभव है क्योंकि
अनेक रोगों वाली स्त्रियां प्रति दिन आया करती हैं। उनकी जबानी
मालूम होता है कि जो जो कारण स्त्रियों के रोगों की उत्पत्ति के
आयुर्वेद में बतलाये गये हैं वे ही कारण पुरुषों के द्वारा प्रति
दिन हुआ करते हैं ।
जिससे स्त्रियां रोगी होजाती हैं और रोगी स्त्रियों से प्रसंग
करने से पुरुष भी रोगी होजाता है। इस प्रकार पति पत्नी दोनों
रोगी होकर रोगी सन्तान उत्पन्न करते हैं ।

२५८ आनन्द मन्दिर
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत”।
अर्थात् ब्रह्मचर्य के बल से देवता मृत्यु को जीतते थे।
इससे ब्रह्मचर्य का महत्व प्रकट होजाता है। आजकल भी सर्व
साधारण मे देखा जाता है कि जो पुरुष वीर्य का नाश नही
करते उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहता है। यदि ऐसे पुरुष
अपने पैतृक असर के कारण दुबले पतले और कमजोर भी
उत्पन्न हो तो भी उनका स्वास्थ्य अच्छा रहता है वे बीमार नही
होते। जितेन्द्रिय ऐसे कितने ही पुरुष देखे गये हैं जिनके वर्षों
सिर तक मे दर्द नही होता है पचास साठ वर्ष की आयु तक वे
देखने मे नौजवान मालूम होते हैं। उनकी आयु लम्बी होती है।
परन्तु जब ऐसा नही होता और कामी पुरुष विषयो मे आंख
मूंद कर अपने को झोक देते हैं तो शरीर के दुश्मन, असमय
में ही शरीर को नाश कर देने वाले कितने ही रोग आघेरते हैं।
थोड़े ही समय में शक्ति का नाश हो जाने से उनकी इन्द्रियां
शिथिल हो जाती हैं। उनका तेज नष्ट हो जाता है और
उनके सारे सुखो पर पानी फिर जाता है। वे किसी काम के नही
रहते हैं। तब तो उनका तमाम समय और धन रोगो के
दूर करने की चिन्ता और रोगो की औषधियों में नष्ट होता है।
इससे सावित होता है कि रोगों की उत्पत्ति का मूल कारण
वीर्यनाश, बहुमैथुन और हस्तक्रिया है।
—(•)—