विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
प्रेमप्रदर्शन । पृ० १८८ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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आनन्द
मन्दिर
नवां अध्याय
—:०:—
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५१
माता पिता के विचारों का
सन्तान पर प्रभाव
माता पिता के विचारो का सन्तान पर बड़ा भारी प्रभाव
पढता है उसी प्रकार की सन्तान उत्पन्न होती है ।
आयुर्वेद बतलाता है:—
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशीभिः समन्वितः ।
स्त्रीपुंसौमुपेयातां तयोः पुत्रोपितादृशः ॥
अर्थात्—माता पिता जैसे आहार विहार आचार और
चेष्टा मे संभोग करते हैं उससे जो गर्भ रहता है उसी प्रकार
के गुण अवगुण सन्तान मे भी उत्पन्न होते हैं ।
निर्लज्ज, लज्जावान्, हास्य प्रिय, आलसी सदाचारी, व्यभि-
चारी निर्बल रोगी दीर्घजीवी इत्यादि सब प्रकार के गुण अवगुण
माता पिता के रजवीर्य स्वभाव चेष्टा आदि से ही सन्तान मे
होते हैं ।
योग्य सन्तान
योग्य सन्तान उत्पन्न करने के लिये पति पत्नी दोनो योग्य
और आरोग्य तथा प्रसन्न चित्त, एक दूसरे से हृदय से प्रेम रखने
वाले हो इस प्रकार सभोग होने से सन्तान उत्तम होती है आयुर्वेद
उत्तम सन्तान के लिये अनेकों साधन बतलाता है ।
३५२ आनन्द मन्दिर
जितने नियम उत्तम सन्तान के लिये आयुर्वेद मे बतलाए
गये है उसके अनुसार तो करना बड़ा ही कठिन है जब कि
कामान्ध पुरुष साधारण नियमो का भी पालन नहीं करते और
विषयाग्नि की शान्ति के लिये अनेक प्रकार के आसनों की
खोज मे रहते हैं।
सभी पुरुष एक से नहीं होते सैकड़ा पीछे एक दो ऐसे भी
अवश्य मिलेगे जो नियम पूर्वक सन्तान उत्पन्न करने की इच्छा
रखते हैं और उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के नियमों की खोज
मे रहते है। जिस प्रकार विषयी लोग आसनों की खोज मे रहते
हैं उसी प्रकार वे भी उत्तम और आरोग्य सन्तान उत्पन्न करने
के लिये आयुर्वेद के नियमो की खोज मे रहते है। मेरे पास
दोनो प्रकार की पुस्तको के लिये प्रतिदिन बीसो पत्र आया
करते है इसलिये मै यहां उत्तम और आरोग्य सन्तान उत्पन्न
करने के नियम आयुर्वेद के अनुसार लिखती हू और यह आशा
रखती हू कि इन नियमो पर चलने से उन कामान्ध लोगो को
भी आरोग्यता और उत्तम सन्तान की प्राप्ति होगी जो अनेक
प्रकार की मनगढंत पुस्तके पढ़कर विषयाग्नि की शान्ति के लिये
उलटे सुलटे अनेक प्रकार के आसनों से पति पत्नी दोनो रोगी
होकर निर्बल दुर्बल सन्तान उत्पन्न करते है।
आरोग्यता और उत्तम सन्तान
दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग का भी बहुमूल्य पदार्थ है। दाम्पत्य प्रेम
केवल रतिसुख के ही लिये नहीं किन्तु मनुष्य जीवन का सच्चा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५३
सुख और आनन्द भोगने के लिये, उत्तम सन्तान उत्पन्न करने
के लिये उत्तम आदर्श स्वास्थ्य रखने के लिये है। जो अज्ञानी पुरुष
केवल रतिसुख को ही जीवन का सुख मानते हैं वे ससार मे
आकर इस जीवन मे कुछ नही करते। कुछ दिन मे रतिसुख से
उन्हे इतने अधिक दुःख उठाने पडते हैं कि वे पछताते और स्वय
कहते हैं कि जीवन व्यर्थ है क्योकि मेरे पास ऐसे रोगी पुरुषो
की लाखो चिट्ठिया अब तक आ चुकी हैं और अनेक चिट्ठियां
प्रतिदिन आया करती हैं। उन्होंने विवाह होते ही रतिसुख को
ही जीवन का सर्वस्व समझकर अनियम रतिक्रिया करके अपनी
निरपराध प्यारी पत्नी को अनेक रोगो का घर बना दिया और
आप भी रोगी हो गये तथा सन्तान भी रोगी निर्बल और दुर्बल
उत्पन्न हुई।
महात्मा भर्तृहरि जी ने ठीक कहा है —
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता-
स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याता-
स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥
अर्थात् हमने विषयो को नही भोगा परन्तु विषयो ने ही हमारा
भुगतान कर दिया अर्थात् विषयवासना को हमने खतम नही
किया उसने ही हमारा खातमा करदिया, हमने तप न तपा परन्तु
२५४ आनन्द मन्दिर
तप ने ही हमे तपा डाला, काल व्यतीत नही हुआ परन्तु काल ने
हमे बिता दिया अर्थात् हमारी उम्र बीत गई, तृष्णा पुरानी नहीं
हुई परन्तु हम ही पुराने हो गये।
और भी शास्त्रकारो ने कहा हैः—
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्द्धते ॥
मनुष्य की विषय भोगो से शान्ति नही होती इसका ऐसा
प्रभाव है कि इसमे जितनी ही मनुष्य तृप्ति की इच्छा करता है
उतनी ही इच्छा और भी अधिक प्रबल होती जाती है।
मनुष्य की कामाग्नि उस अग्नि की समान है कि जिसमे
चाहे जितना घी डालते जाओ परन्तु अग्नि और भी अधिक
तेज होती है, कम नही होती। अग्नि की शान्ति नही होती
और असख्य मन घी स्वाहा हो जाता है इसी प्रकार मनुष्य
का यह असंख्य धन से भी कीमती जीवन कामाग्नि की तृप्ति
मे ही भस्म हो जाता है।
मेरे पास ऐसी रोगी स्त्रियो के प्रति दिन बीसो पत्र आया
करते है कि जिनके पतियो ने अनियम रतिक्रिया करके थोडी ही
अवस्था मे अपने शरीर का सत्यानाश मार लिया है इसी के
कारण क्षय आदि भयकर रोगो मे न जाने कितने नवयुवक
दम्पति काल का कलेवा बनते जारहे हैं और बनेगे।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५५
शूलकासज्वर श्वासकार्श्यपांड्वामयक्षया ।
अतिव्यवायाज्जायंते रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥
अर्थात् अधिक मैथुन करने से शूलरोग, खांसी, ज्वर, श्वास
रोग, दुर्बलता, पांडुरोग और सब रोगो का दादा क्षय (तपेदिक)
और अनेक प्रकार के वात सम्बन्धी रोग उत्पन्न होते हैं और
इन रोगो के कारण और भी भयकर रोग उत्पन्न होजाते हैं। क्षय
(तपेदिक) ही एक ऐसा रोग है कि विना प्राणनाश किये
पीछा नहीं छोड़ता । यही कारण है कि हमारे देश मे तपेदिक
अधिक होता है यह असाध्य रोग है जो रोग युवको को ही
अधिक होता है। क्षय रोग से ग्रसित अधिकतर स्त्रियां देखी जाती
हैं क्योंकि क्षय रोग वाली स्त्रियां भी मेरे पास अधिक आती हैं
और चिट्ठियां भी इस प्रकार के रोगी स्त्री पुरुषों की अधिक आती
हैं परन्तु क्षयी रोगी के ठहराने के लिये मेरे पास कोई उत्तम स्थान
नहीं है इसलिये ऐसी रोगी स्त्रिया ठहराई नहीं जाती ।
रतिक्रिया विज्ञान और उत्तम सन्तान
वेद और धर्मशास्त्रों से दाम्पत्य प्रेम और सन्तान के लिये
रतिक्रिया करने का नियम पीछे लिखा जा चुका है। दाम्पत्य प्रेम का
इतिहास और महत्व मे शिवजी, श्रीकृष्ण और श्रीरामचन्द्र तथा
महाराजा रामचन्द्र के बाबा (दशरथ के बाप) का दाम्पत्य प्रेम
सचित्र लिखा जा चुका है। अब यहां आयुर्वेद से गर्भाधान क्रिया
और उत्तम सन्तान उत्पन्न करने की विधि बतलाई जाती है ।
२५६ आनन्द मन्दिर
जिस प्रकार उत्तम फल अन्न आदि की उत्पत्ति की उत्तमता
के लिये उत्तम खेत और उत्तम बीज की आवश्यकता होती है इसी
प्रकार वल्कि उससे भी अधिक उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये
उत्तम खेत रूपी खी का रज और बीज रूपी पुरुप को वीर्य की
अत्यन्त आवश्यकता हुआ करती है।
जिस प्रकार खेत मे बीज वोने के कुछ दिन पहिले से ही
किसान खेत को ठीक बनाता है और उसमें खाद आदि उत्तम
अन्न उत्पन्न होने के लिये डालता है और जब खेत ठीक हो जाता है
तब उत्तम बीज जिसमें कीडे न लगे हों घुना सड़ा सूखा न हो
अर्थात् किसी प्रकार की खराबी न हो ऐसा चीज बोता है। बीज
वो देने पर भी उसका अनेक प्रकार से उत्तम होने का उपाय
करता है और बीज वो देने पर तथा पौधा निकल आने पर भी
अनेक प्रकार की बाधाएं होती हैं उनसे भी पौधे की रक्षा करता है।
जो किसान मूर्खता अथवा आलस्यवश खेत वोने के र्फ ले
' इन बातों का ध्यान नही रखता वह सिवाय पछताने के और
कुछ नही कर सकता इसी प्रकार जो पुरुप उत्तम सन्तान उत्पन्न
करने का पहिले से ही ध्यान नही
विदुर की पत्नि को प्रणाम । पृ० १९८
( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५७
कष्ट उठा चुकी थी जब से मैने उन्हे उपाय वतला दिये और
चिकित्सा करके ठीक कर दिया तब से उनके वालक ठीक होने
लगे और वे हृष्ट पुष्ट हैं।
रज वीर्य के दोषो के कारण जिनके कभी गर्भ रहा ही नही
था, जो सन्तान हीन थी, सन्तान के दुःख से रो रोकर जीवन
व्यतीत कर रही थी, मेरे बताए उपाय और चिकित्सा से उनके
सन्तान होने लगी। ऐसी एक दो नही हजारो स्त्रियां मौजूद हैं।
जिनके नियम विरुद्ध अधिक संभोग के कारण सन्तान नही
होती थी उनको ब्रह्मचर्य से रहकर औषधियो का सेवन कराया
गया, सन्तान होने लगी। इस प्रकार हजारो स्त्रियों के जो वन्ध्या
थी जिनके कभी गर्भ रहा ही न था, सन्तान होने लगी।
यह मेरे अनुभव की वात है। मैं आयुर्वेद की रीति से देशी
चिकित्सा करती हू। आयुर्वेद के अनुसार ही रोगो का निदान
करती हूं, स्त्रियां तो मेरे पास स्वय आकर अपने रोगो की परीक्षा
और चिकित्सा कराती हैं। जो नही आसकती वे अपने रोगो
का पूरा हाल लिखती है। उनके रोगो का निदान और इलाज
उसी हाल से घर बैठे ही औषधि भेजकर करती हू, इस प्रकार
स्त्रियो की जो शिकायते होती हैं दूर होजाती है।
पुरुषो के रोगो की परीक्षा और चिकित्सा के लिये मैने आयुर्वेद
के अनुसार रोगो का निदान जानने के लिये एक फार्म ४० चालीस
प्रश्नो का तैय्यार किया है वही भेजती हूँ। उसे भरकर अर्थात् कुल
प्रश्नो का उत्तर लिख देने से पुरुष रोगियो के रोगो की भी परीक्षा
१७
२५८ आनन्द मन्दिर
ठीक ठीक होजाती है, औषधिया पारसल से भेज दी जाती हैं इस
प्रकार पुरुष रोगी भी आराम होजाते हैं।
जिस प्रकार उत्तम खेती के लिये पहिले खेत का उत्तम बना-
लेना अत्यन्त आवश्यक है उसी प्रकार उत्तम सन्तान उत्पन्न करने
के लिये गर्भाधान क्रिया के पहिले स्त्री रूपी खेत को उत्तम
(आरोग्य) बना लेने की आवश्यकता है अर्थात् रोगी स्त्री को
आरोग्य कर शुद्ध आर्तव (रज) की आवश्यकता है।
पुरुष दोष तथा स्त्रियों के आहार विहार
के अनियम से उत्पन्न होने वाले
स्त्री रोग
पुरुषो की अज्ञानता असावधानी और विषय लोलुपता के
कारण स्त्रियो के शरीर मे नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होजाते हैं
इनमे से अनियम और अधिक स्त्री प्रसंग से उत्पन्न होने वाले
रोगो की संख्या अधिक है, स्त्री रोगो मे ऋतु का अनियम होना
सबसे बड़ा रोग है क्योकि इससे ही स्त्रियो मे अन्य अनेक प्रकार
के भयकर रोग उत्पन्न होजाते हैं।
स्त्री पुरुष दोनो आरोग्य हो तो आयुर्वेद के अनुसार उत्तम
सन्तान उत्पन्न करने के लिये नियम पूर्वक जैसा कि आयुर्वेद
बतलाता है गर्भाधान क्रिया अर्थात् स्त्री सम्भोग करना चाहिये।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५६
सन्तान
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये सम्भोग करने की विधि
पीछे बतलाई गई है उसी विधि से पुरुष स्त्री के पास जावे।
अन्यत्र चित्र में देखो, स्त्री पलंग पर लेटी है, पति सफेद वस्त्र धारण
कर माला हाथ में लिये स्त्री के पास खड़ा है। इस प्रकार पति
स्त्री के पास शय्यापर जाकर अनेक प्रकार से प्यार कर आलिंगन
चुम्बन द्वारा स्त्री को प्रसन्न करके उसकी इच्छा उत्पन्न करे। पति
के सच्चे प्यार से ही स्त्री की इच्छा पूरी होजाती है। यह प्यार ही ऐसा
अमूल्य और सर्व श्रेष्ठ उपाय है कि केश पकड़ने नाखून से नोचने
खसोटने की आवश्यकता नहीं है। जैसा कि आजकल की अनेक
मनगढ़ंत पुस्तकों में पाया जाता है।
चौरासी आसन मनगढ़ंत हैं
प्रकृति का बताया हुआ सर्वश्रेष्ठ आसन सब से उत्तम और
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाला आसन जिसे मनुष्य मात्र
जानते हैं और जिससे स्त्री प्रसन्न होकर संभोग से तृप्त हो गर्भ-
धारण करती है। वह आसन है स्त्री को सीधा लिटाकर पुरुष को
भी ठीक सीध में लेटना और सम्भोग करना।
आलिंगन चुम्बन और प्यारी बातों से जब स्त्री की इच्छा हो
स्त्री के नेत्रों में कुछ आलस्य सा प्रतीत हो तब पति को सम्भोग मे
प्रवृत्त होना चाहियें, इस कार्य में मूर्खतावश जल्दी नही करनी
२६० आनन्द मन्दिर
चाहिये । पति पत्नी दोनो के विचार उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के
होने चाहिये । पति पत्नी के मुह को और पत्नी पति के मुह को ध्यान
पूर्वक वडे स्नेह और प्यार से देखे ।
एक दूसरे को प्यार की दृष्टि से देखने से मग्न होजावे
संसार की अन्य सब बाते चिन्ता शोक इत्यादि भूल जावे ।
सम्भोग के समय कुछ मूर्खों का मत है जो आयुर्वेद के नियमों
को न जानकर मनगढ़त बाते पुस्तको मे लिख डालते हैं और
पाठको को धोखे मे डालते हैं। वे लिखते हैं—
“प्रसग के समय अपने मन को पुरुष कही जंगलो में
लेजाकर भटकने दे अथवा बन्दर बडा चचल जीव है अपने मन
मे सम्भोग करते वक्त किसी बन्दर का ध्यान करे कि एक बन्दर
किसी वृक्ष पर बैठा इधर उधर वृक्ष की शाखाओ पर कूद रहा है
अथवा इसी प्रकार के अन्य खिलाड़ी चंचल जीवो मे ध्यान
लगादेवे या किसी ऐसी बात को विचारने लगजावे कि जिसमे
चित्त उलझ जावे । इस प्रकार चित्त को स्त्री प्रसग से हटा कर
कही दूसरी जगह फंसा देने से पुरुष जल्दी स्खलित नही होता”।
पाठको ! देखा आपने पुस्तक लेखको की बुद्धिमानी और
मनगढ़ंत कामशास्त्र ! उन्हे अभी इस बात की कुछ भी खबर नही
है कि संभोग के समय पुरुष के जैसे विचार होगे वैसे ही विचार
और आकृति वाला बालक उत्पन्न होगा । भला विचार तो कीजिये
ऐसी बुद्धिमानी को बलिहारी है। फिर भला सन्तान बन्दर प्रकृति
की न हो तो क्या हो । सन्तान मूर्ख न हो तो क्या हो ! क्योकि
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६१
सभोग के समय व्यर्थ की बातो का विचार करना सन्तान को
उसी प्रकार का वनाना है ।
लिखा है “इस उपाय से पुरुष स्खलित न होगा । स्त्री पहिले
हो जावेगी तब वड़ा आनन्द आवेगा इत्यादि।” वाहरी मूर्खता !
क्षणिक आनन्द के लिये और स्त्री को स्खलित करने के लिये कैसे
कैसे उपाय वाली पुस्तके प्रकाशित होरही हैं !
और सुनिये एक और ऐसी ही पुस्तक मे लिखा है—
“अनेक उपाय करने पर भी यदि वीर्य स्तम्भन न हो, स्खलित
होने का समय आही जावे तो कुछ देरी के लिये प्रसंग करने से
रुक जावे। थोड़ी देरी बाद फिर आरम्भ करे। इसी प्रकार जब
वीर्य स्खलित होने का समय आवे तभी रुक जावे । इस अद्भुत
उपाय से पुरुष जितनी देरी तक चाहे उतनी देरी तक स्तम्भन
कर सकता है ।”
पाठको ! यह बुद्धिमानी देखिये । इसके लेखक महाशय को
यह पता नही कि निकलते हुये वीर्य को रोकने से कितनी
अधिक स्वास्थ्य को हानि होती है। मूत्रकृच्छ्र, पथरी आदि अनेक
रोग होजाते है। यही नही और भी भयकर रोग उत्पन्न होते है।
बलिहारी है इस बुद्धिमानी को कि स्त्री के स्खलित करने के
लिये तथा क्षणिक आनन्द के लिये और स्त्री से अपनी वीरता
का सर्टीफिकेट लेने के लिये अपने शरीर का सत्यानाश मारलेना
और फिर पुस्तक लेखको के नाम को जीवन भर रोना । ऐसी
पुस्तको और लेखकों से ईश्वर बचावे ।
२६२ आनन्द मन्दिर
जरा और एक ऊंचे दिमाग वाले महाशय का विचार
सुनिये एक पुस्तक मे लिखते हैं:—
“जव पुरुष समझे कि वीर्य का स्तम्भन नही होता निकलना
ही चाहता है तव अपने हाथ की दो अंगुलियो से अपनी इन्द्री
के नीचे और गुदा के ऊपर वीच के स्थान मे जो वीर्यपात
करने वाली नस है उसे खूव जोर से दवा रक्खे इस प्रकार वीर्य
स्खलित न होगा वाहर निकलता हुआ भी भीतर लौट जावेगा ।
और सभोग वाले की इच्छा पूरी होगी ।”
इस प्रकार जव वीर्य स्खलित होने को हो तव लौटाल देवे
इस उपाय से चाहे जितनी देरी तक वीर्य को स्तम्भन कर सकता
है । यह भी न हो सके तो संभोग करने के शुरू से ही उस नस को
पकड़े रहे इत्यादि । ये सव वाते कितनी रद्दी और अनुचित
हैं। पुस्तको के लेखक या मूढ पुरुष समझते हैं कि इस प्रकार
वीर्य स्खलन करने से तो वस वैकुण्ठ का दरवाजा ही खुल जायगा
और स्त्री स्खलित होकर पति की वीरता और मर्दानगी के वड़े
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६३
सावधान
ऐसे हानिकारक उपाय कभी नही करना चाहिये । निकलते
हुए वीर्य को भूलकर भी किसी अज्ञानी की वातो मे आकर
रोकना नही चाहिये ।
जो उपाय ऊपर वताया गया है उसी के अनुसार स्त्री को
पूरी तरह से सच्चे स्नेह, हृदय से प्यार करके, स्त्री के प्रसन्न होने
पर संभोग आरम्भ करना चाहिये और एक दूसरे मे ध्यान लगा-
कर चिन्ता रहित हो खूब प्रसन्नता से भली भांति सभोग करना
चाहिये ।
यहां एक वात और ध्यान देने योग्य है । यदि पति को किसी
प्रकार का वीर्य दोष नहीं है, गरमी सुजाक प्रमेह कुछ नहीं है
तो ऊपर के उपाय से संभोग करने से स्त्री की अवश्य तृप्ति होगी
इस वात की भूलकर भी कोशिश नही करनी चाहिये कि स्त्री
हमसे पहिले स्खलित हो परन्तु इस वात का अवश्य ध्यान रखना
चाहिये कि दोनो साथ स्खलित न होने पावे यदि स्त्री पति के
बाद् स्खलित होगी तो गर्भ रहने पर कन्या उत्पन्न होगी और पति
पहिले स्खलित होगा तो पुत्र उत्पन्न होगा ।
ध्यान रखना चाहिये, यदि पति मे
१६४ आनन्द मन्दिर
रोगी पुरुष स्त्री की तृप्ति कभी नही कर सकते और इन
मूर्खता के उपायो से भी जो आज कल की कामशास्त्र सम्बन्धी
पुस्तको मे बतलाये गये है नही कर सकते ।
रोगी पुरुषो की स्त्रियां भी प्रायः रोगी रहती है और इस
प्रकार मूर्खता से सभोग करने वाले पतियो की स्त्रियां भी रोगी रहती
हैं। रोगी स्त्रियो के साथ सभोग करना स्त्रियो के साथ बड़ा भारी
अत्याचार करना है और अपने पैरो मे आप कुल्हाडा मारना है ।
इसलिये आरोग्य पति पत्नी ही सभोग के अधिकारी हैं
और आरोग्य पति ही स्त्री की इच्छा पूरी कर सकता है ।
संभोग के समय जल्दी करने से स्त्री पुरुष दोनो को हानि
पहुचती है और यही कारण है जो पुरुषो को इस मूर्खता के
कारण अनेक प्रकार के स्तम्भन उपाय ढूढने पड़ते है । मूर्ख विषयी
पुरुष चाहते है कि हम घटो तक प्रसंग करते रहे । परन्तु प्रकृति
भी ऐसा करने से रोकती है । इसका नियम यही है कि जिस
समय ऋतुस्नान के समय स्त्री की प्रबल इच्छा हो उस समय
सभोग किया जावे तो स्त्री की इच्छा पूरी होगी । किसी उपाय
की आवश्यकता नही है । वगैर स्त्री की इच्छा हुए गर्भ रहता ही
नही, यह बात किसी पुस्तक लेखक को मालूस नही है । यदि मालूम
होती तो इतने मनगढत उपाय लिखने की आवश्यकता न पड़ती
और पाठक धोखे मे न पड़ते ।
यह बात दूसरी है कि स्त्री पुरुष दोनो रोगी हो । गर्भाशय मे
कुछ खराबी हो तो गर्भ न रहे । मासिक धर्म्म के दिनो के