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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

६८ आनन्द मन्दिर
वृद्धि करता रहे। पूर्व जन्म के किये हुए पुण्य और शुभकर्मों से
ही मनुष्य को इस जन्म मे धन सम्पत्ति और सांसारिक सब
सुख तथा सुन्दर स्त्री भोगने मे आती है।
यदि शुभकर्म न किये हो और पूर्व जन्म का किया हुआ
पुण्य इस जन्म मे साथ न दे तो धन सम्पत्ति और ससार के सभी
बहुमूल्य पदार्थ तथा सुन्दर रूपवती स्त्री होने पर भी भाग्यहीन पुरुष
भोग नही सकते। यह निश्चय वेद शास्त्र सम्मत है कि शुभ कर्मों
से ही मनुष्य सुख भोग करता है। शुभ कर्म न किये हों तो
सांसारिक सभी पदार्थों से वह मनुष्य हीन रहता है और यदि
कुछ पदार्थ कर्मों से प्राप्त भी हो तो उन्हे भोग नहीं सकता
केवल चौकीदारी करता है।
मुझे २५ वर्ष स्त्रियो की चिकित्सा करते हुए व्यतीत हुईं, इस
बीच मे मैंने लाखो ही स्त्रियो और स्त्रियो द्वारा उनके पतियो
की चिकित्सा कर इस विषय के हजारो उदाहरण पाये।
कई वर्ष व्यतीत हुए, एक रियासत से मेरे पास एक बडे भारी
जिमीदार अपनी स्त्रियो को लेकर इलाज के लिये आये जिनके छै
स्त्रियां थीं। उन जिमीदार की अवस्था लगभग चालीस वर्ष की थी।
उन्होंने सन्तान के लिये छै विवाह किये। उनकी आमदनी कई-
लाख रुपया सालाना की थी। उनकी स्त्रियो की जबानी मुझे
मालूम हुआ कि वे इतने सुस्त थे कि छै स्त्रियो से विवाह करके
एक स्त्री से भी एक बार भी उचित रीति से सभोग नहीं कर सके।
उनकी सब मे छोटी स्त्री की, जिसका हाल मे ही विवाह हुआ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६६

था, सोलह साल की अवस्था थी और अन्य पांचो स्त्रियां भी
जवान थीं।
उन सब स्त्रियो ने मुझ से अपना २ खुलासा हाल बतलाया
कि विवाह करके एक दिन पति जी पास आये, घंटो उद्योग
करने से उनकी कुछ इच्छा हुई सो भी उचित रीति से नही।
इच्छा होते ही शीघ्रपात हो जाने से बात करते ही सुस्त
हो गये इसी प्रकार सभी स्त्रियो ने अपना अपना हाल मुझसे
खुलासा बतलाया।
उनके भोजनो का यह हाल था कि मूंग की दाल और पुराने
चावल का भात तथा परवल, लौकी की तरकारी के सिवा यदि
कभी पूड़ी खाले या मलाई रबड़ी हलुवा खाले तो दस्त आने
लगे। यदि कब्ज हो जाय तो एक दो सप्ताह तक मूंग की दाल
का पानी भी स्वप्न हो जाय।
उनकी यह दशा होश सम्भालने के समय से ही थी। उन
स्त्रियों ने मुझ से कहा कि हम मे से कोई भी ऐसी नही है कि
जिसने एक दिन भी संभोग सुख का अनुभव किया हो।
उन जिमीदार साहब को और भी अनेक रोग ऐसे थे कि
वे उचित रीति से रतिक्रिया कर ही नही सकते थे सन्तान कैसे
होती। वे शेखी के मारे विवाह करते जाते थे परन्तु किसी
योग्य न थे।
उनकी स्त्रियो को भी उचित संभोग न होने से अनेक रोग

उत्पन्न हो गये थे। छहों स्त्रियां रोगी हो गई थीं उसका कारण
वही था जैसा कि शास्त्रकारो ने बतलाया है:—
अमैथुनं जरा स्त्रीणामनध्वा वाजिनं जरे ।
अर्थात्—जिस स्त्री को कभी सभोग सुख नही मिलता अर्थात्
जिन्हे रतिक्रिया का आनन्द कभी नही मिलता वे स्त्रियां शीघ्रही
वृद्धा हो जाती हैं और उन्हे अनेक प्रकार के रोग आ घेरते हैं।
जैसे घोड़ा बधे रहने से अर्थात् घोड़े से मेहनत का काम न लेने
से वह बुड्ढा और रोगी होजाता है।
उन सब स्त्रियो के साधारण रोगो का जिनका इलाज हो
सकता था, करके आराम कर दिया गया परन्तु उनके पति को जवाब
दे।दिया क्योकि उन्हे रोग नही था पूर्व कर्मों का भोग था जोकि
उन्हे भोगना ही था।
इसी प्रकार के अनेक धनवान् जिन्हे किसी बात की कमी
न थी और जिनके दो दो तीन तीन रूपवती स्त्रियां भी थी परन्तु
'पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार वे उस धन सम्पत्ति के चौकीदार थे
इसलिये सुख भोग नही कर सकते । पाठको ने भी इस प्रकार
के अनेको धनवान् मनुष्य देखे होगे । ससार मे ऐसे उदाहरणों से
ही पता लगता है कि धन सम्पत्ति और सुन्दर स्त्री पूर्वजन्म के
पुण्य से ही भोग मे आती है। इसलिये पराई धन सम्पत्ति और
रूपवती स्त्री को देखकर चित्त को विचलित न होने देना चाहिये
उन्हे प्राप्त करने के लिये शुभकर्म करने चाहिये।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ७१
शुचिः सौधोत्सङ्गः प्रतनु वसनं पङ्कजदृशो ।
निदाघे तूर्णं तत्सुखमुपलभन्ते सुकृतिनः ॥
अर्थात्—अच्छी सुगन्धित माला, पंखे की वायु, चांदनी,
पुष्पों का पराग, तड़ाग, चन्दन, अच्छी ऊंची श्वेत घर की छत
और अच्छे मलमल के महीन वस्त्र तथा सुन्दर स्त्री इत्यादि पदार्थों
से पुण्यवान पुरुष ही सुख उठाते हैं ।
जो सब सुख होते हुए भी सुख भोग नहीं कर सकते उन्हें
शुभ कर्मों से रहित समझना चाहिए ।
ससार के बहुमूल्य पदार्थ हुए ही तो क्या ? सुन्दर स्त्री मिली
ही तो क्या ? यदि पूर्वजन्म से अथवा इस जन्म मे पुण्य नहीं किया,
शुभ कर्म नहीं किये तो सब व्यर्थ है। उनकी धन सम्पत्ति किस
काम की, नवयौवना सुन्दरी स्त्री घर मे मौजूद होते हुए भी रोगी
होने के कारण वे सुख नहीं भोग सकते ।
पाठकों ने अनेक ऐसे मनुष्यों को भी देखा होगा कि जो
आज सब प्रकार से सुख भोग कर रहे हैं परन्तु देखते ही
देखते थोड़े समय मे ही उनके वे सब सुख पीछे बतलाए हुए
कामक्रीड़ा की कलह से टूटे हार के मोतियों की समान सब सुख
छिन्न भिन्न हो गये। न वह धन सम्पत्ति रही न वे सुख रहे न
वह स्त्री रही फिर बतलाइये यह सब पुण्य क्षय का फल नहीं है
तो क्या है।

७२ आनन्द मन्दिर
पूर्व जन्म और इस जन्म के शुभाशुभ कर्म
पूर्व जन्म के कर्मों को जाने दीजिये। इसी जन्म के कर्मों का
फल देखिये। जो पुरुष कोई बुरा कर्म करता है उसे इसी जन्म में
ही अनेक प्रकार के फल भोगने पड़ते हैं।
जो पुरुष धन की बेकदरी करके बुरे कर्मों में धन खर्च करते
हैं वे एक दिन निर्धन होकर अनेक प्रकार के कष्ट भोगते हैं और
एक एक पैसे को दूसरो के आगे हाथ फैलाते है, रोते पछताते
हैं। उनका जीवन बड़े कष्ट से व्यतीत होता है। इसी प्रकार जो
पुरुष शरीर के राजा कामदेव का अनादर करता अर्थात् बेकदरी
करके बुरे कर्मों में खर्च करता है। अर्थात् वीर्य को नष्ट करता
है उसे इसी जन्म में उसका फल भोग मिलता है।
कामदेव की बेकदरी करने से शरीर में अनेक प्रकार के रोग
उत्पन्न होजाते हैं जिससे नाना प्रकार के दुःख मिलते हैं। जो
पुरुष विवाह होते ही अनियमित स्त्री प्रसग करके वीर्य का सत्या-
नाश मारते हैं अर्थात् कामदेव का निरादर करते हैं अथवा विना
विवाह के ही कुसगति में पड़कर अनेक प्रकार के कुकर्मों से वीर्य
का सत्यानाश करते हैं वे अनेक प्रकार के रोगो में ग्रसित हो
जीवन भर दुख भोगते हैं।
जो पुरुष रात दिन विषयवासना की तृप्ति की ही इच्छा-पूर्ति
में लगे रहते हैं वे अपनी तथा अपनी स्त्री की आरोग्यता नष्ट करते
हैं और कामदेव जो शरीर का राजा है उसके बिगड़ जाने से

पत्नी का प्यार ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ७३
उन्हें ऐसा दण्ड मिलता है कि वे पीछे पछताते हैं और बड़ा कष्ट
भोगते हैं। फिर उन्हें स्त्री प्रसंग का कुछ भी आनन्द नही
मिलता और दाम्पत्य सुख का आनन्द नष्ट होजाता है।
आयुर्वेद बतलाता है.—
पुनर्दाराः पुनर्वित्तं पुनः क्षेत्रं पुनः सुतः ।
पुनः श्रेयस्करं कर्म न शरीरं पुनः पुनः ॥
इसका अर्थ यह है कि स्त्री धन सम्पत्ति और जायदाद तथा
सन्तान इत्यादि संसार के सब पदार्थ फिर से मिल जाते हैं परन्तु
मनुष्य शरीर फिर फिर से नहीं मिलता। इसलिये इस बहुमूल्य
शरीर की रक्षा के लिये आरोग्यता का सदैव ध्यान रखना मनुष्य-
मात्र का परम कर्त्तव्य है।
बहुतेरे मनुष्य यह समझते हैं कि जब हम इस जन्म मे
अपने पूर्व कर्मों का फल भोग रहे हैं तो अच्छा बुरा जो कुछ
कर रहे हैं उससे क्यों रुके क्योकि वह तो पूर्व जन्म का फल
है जो रोकने से भी नही रुक सकता। वास्तव मे उनके ऐसे विचार
भ्रम पूर्ण और गलत हैं। उन्हे यह अच्छी तरह समझ लेना
चाहिये जैसा कि ऊपर बताया गया है कि बहुतेरे कर्मों का फल
इसी जन्म में मिलता है। फिर हम जो फल भोग रहे हैं वे पिछले
कर्मों के है और जो कर्म कर रहे हैं वे अगले जन्म के लिये।
इसलिये इस जन्म और अगले जन्म का विचार कर शुभ कर्म
ही करना चाहियें।

७४ आनन्द मन्दिर
कामदेव चरित्र
हमारे देश की जितनी प्राचीन गाथाएं हैं वे किसी न किसी
प्रकार के लक्ष्य से खाली नही है उनका लक्ष्य भी उन्चे आदर्शों
से भरा हुआ है !
मनुष्य के हृदय मे कामोद्दीपन करने वाले ( जिसके वेग
से वीर्य स्खलित होता है ) देवता का नाम कामदेव है ।
यह ऐसा बलवान् है कि इसके सामने बड़े बड़े देवता ऋषि
मुनि भी हार मान गये हैं। जब कोई ऋषि मुनि घोर तपस्या
करने लगता है अपने जीवन को सुखमय और आनन्द मय
बनाने लगता है तब इन्द्र आदि देवताओ को यह ईर्षा उत्पन्न
होती है कि कही यह तपस्या के प्रभाव के फल से मेरा पद् न
छीन लेवे इसलिये इन्द्र आदि सब देवता इकट्ठे होकर उस तपस्वी
का तप भग कराने के लिये कामदेव की शरण लेते हैं। वे पहिले
तो अपने यहां की अप्सराओ को भेजते है। वे तपस्वियो के पास
जाकर अपने हाव भाव सुन्दरता श्रृंगार आदि से उनकी तपस्या
भंग करती हैं। यदि अप्सराओ का कोई उपाय न चला तब
अन्त मे वे कामदेव की शरण लेते है।
इस विषय मे अनेक मनोरञ्जक कथाए प्राचीन ग्रन्थो में पाई
जाती है। इस विषय मे, एक बड़ा ही मनोरञ्जक उदाहरण रम्भा
और, शुकदेव मुनि की कथा का है। प्रसग वश यहां रम्भा और
शुकदेव मुनि का कुछ वृत्तान्त लिखा जाता है.—

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ७५
रम्भा और शुकदेव मुनि
एक समय व्यास जी के पुत्र शुकदेव मुनि तपस्या कर रहे
थे। इन्द्र को यह देखकर बड़ी ईर्षा उत्पन्न हुई। उन्होंने कामदेव
को बुलाकर शुकदेव जी की तपस्या भंग करने के लिये कहा. तब
कामदेव ने सलाह दी कि रम्भा नामक आप के यहां जो परम
सुन्दरी अप्सरा है, उसे भेजिये । इस कार्य को वह पूरा करेगी ।
राजा इन्द्र ने रम्भा को बुलाकर आज्ञा दी कि तुम जाकर
शुकदेव जी का तप नष्ट करदो। इन्द्र की आज्ञा पाकर रम्भा
सुन्दर शृंगार करके शुकदेव जी के पास आई। शुकदेव जी तपस्या
कर रहे थे, ब्रह्म के ध्यान में मग्न थे।
इन्द्र की भेजी हुई परम सुन्दरी रम्भा शुकदेव जी के पास
आकर सामने बैठ गई और शुकदेव जी का तप भंग करने के लिये
अनेक उपाय करने लगी। रम्भा बोली—हे मुने ! तप में क्या
रक्खा है तपस्या का फल स्वर्ग में नहीं है इसी लोक में मौजूद है।
जो सुख और आनन्द गृहस्थाश्रम में स्त्रियों से मिलता है वह
सुख स्वर्ग में कदापि नहीं मिलता, इस लिये तप करना व्यर्थ है।
शुकदेव जी बोले—
अचिन्त्य रूपोभगवन्निरञ्जनो,
विश्वम्भरो ज्ञानमयश्चिदात्मा ।

७६ आनन्द मन्दिर

विशोधितो येन हृदिच्छणांनो,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
अर्थात्—हे रम्भे ! सुनो, जिसका रूप हृदय मे चिन्तन
करने से भी ध्यान मे नही आता। जो सर्व शक्तिमान, सब जगह
विराज मान है। जो विश्वका पालन करने वाला, ज्ञान, मय, चैतन्य,
विश्व व्यापी, आनन्द का सागर है। ऐसे परमात्मा का जिसने क्षण-
मात्र भी अपने हृदय में ध्यान नही किया उसका जीवन व्यर्थ गया।
रम्भा बोली—
हे मुने ! आदि काल से ही यह नियम चला आता है कि
स्त्री का सुख स्वर्ग से भी अधिक है सुनिये.—
स्वर्गेऽपि दुर्लभं ह्येतदनुरागः परस्परम् ।
पति पत्नी का परस्पर प्रेम स्वर्गका भी दुर्लभ पदार्थ है जिसके
पत्नी नही है उसका जीवन व्यर्थ है ।
शुकदेव जी बोले—
चतुर्भुजश्चक्रधरो गदायुधः,
पीताम्बरः कौस्तुभ मालया लसन् ।
ध्यानेधृतौ येन न बोधकाले,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
अर्थात्—शुकदेव जी कहते हैं, चार भुजाओ वाले चक्रधारी

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ७७

गदाधारी, पीताम्बरधारी, कौस्तुभमणि की माला से सुशोभित ऐसे
भगवान् को जिसने बोध काल में स्वस्थ जाग्रत अवस्था में ध्यान
में धारण नहीं किया उस नर का जीवन व्यर्थ ही गया।
रम्भा बोली —
विचित्र वेषा नवयौवनाढ्या,
लवङ्ग कर्पूर सुवासि देहा।
नालिंगिता येन दृढं भुजाभ्यां,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
हे मुने ! विचित्र वेष ( शृंगार ) वाली, युवावस्था से पूर्ण,
सुन्दर यौवनवती, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थों से सुवासित
शरीर वाली स्त्री पाकर जिस पुरुष ने उसे आलिंगन कर आनन्द
भोग नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया।
शुकदेव मुनि कहने लगे—
विश्वम्भरो ज्ञानमयः परेशो,
जगन्मयोऽनन्तगुण प्रकाशः ।
नाराधितोनोऽपिकृतंनयोगे,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
अर्थात्—जगत् के पालक पोषक ज्ञानमय, जगद् रूप, अनन्त
गुणों को प्रकाशित करने वाले, परमात्मा का जिसने ध्यान नहीं

किया और योग मे ध्यान न दिया उस मनुष्य का जीवन
व्यर्थ गया ।
रम्भा बोली—
चन्द्रानना सुन्दर गौर वर्णा,
व्यक्तस्तनी भोग विलास दक्षा ।
नान्दोलिता वैशयनेषु येन,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
हे मुने ! चन्द्रमा के समान मुख वाली, सुन्दर और गौर वर्ण
वाली, भोग विलास मे चतुर, प्यारी पत्नी का जिसने सेवन नही किया
उस मनुष्य का जीवन व्यर्थ गया ।
शुकदेव जी बोले—
स्वरूपं शरीरं नवीनं कलत्रं,
धनं मेरुतुल्यं वचश्चारुचित्रम् ।
हरेरंघ्रियुग्मे मनश्चेन्नलग्नं,
ततःकिं ततःकिं ततःकिं ततःकिम् ॥
शुकदेव मुनि कहते है कि जिसने विष्णु भगवान के चरणो में
मन् नही लगाया उसके सुन्दर नवीन यौवनवती स्त्री तथा सुमेर
पर्वत के समान धन, सुन्दर विचित्र वाणी आदि सब प्रकार के
सुख भोग होने से क्या हुआ अर्थात् कुछ भी नही हुआ । ऐसा
मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गया इस लिये यह सब निरर्थक है ।

विवाह विज्ञान-कालशास्त्र ७६
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रम्भा बोली—
आनन्द रूपा तरुणीलतांगी,
सद्धर्मसंसाधन सृष्टिरूपा ।
कामार्थदा यस्य गृहे न नारी,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
हे मुने ! स्त्री पुरुष को आनन्द देने वाली, मनको मोहित
करने वाली, युवावस्था से पूर्ण अंगवाली, पतिव्रता, सृष्टि की आदि
धर्म्म को साधने वाली, सन्तान उत्पन्न करने वाली पुरुषो की
सब कामनाओ को पूर्ण अर्थात् काम अर्थ को देने वाली सुन्दर
पत्नी जिसके घरमें नहीं है, उस नर का जीवन व्यर्थ है ।
शुकदेव जी बोले—
पत्न्यार्जितं सर्वं सुखं विनश्वरं,
दुःखप्रदं कामिनि भोग सेवितम् ।
एवं विदित्वा न धृतोहि योगो,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
पत्नी के विषय भोग से होने वाले सब सुखो को अनित्य
और दुखदाई जानकर जिसने योगाभ्यास धारण कर परमात्मा
का ध्यान नहीं किया उसका जीवन व्यर्थ गया, उसने इस शरीर
को नष्ट कर दिया ।

जन्मनोपि)
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥"

It is definitely:
"श्रीवत्सलक्ष्मा" or "श्रीवत्सलक्ष्म्या"?
Wait, what is printed in this book?
The prompt asks to transcribe the text FROM THE IMAGE.
So we must transcribe WHAT IS ACTUALLY PRINTED, while being aware of the correct Sanskrit to interpret ambiguous characters.
Wait, let's look at whether it is printed as 'स्तार्क्ष्यध्वजः' or 'स्तादर्यध्वजः'.
Wait, look at the letter in 'स्तार्क्ष्यध्वजः':
Wait, is it 'क्ष्य'?
In many old fonts, 'क्ष' is composed of:
A top bar, a little vertical, a loop that is very small or flattened against the stem, so it looks like a 'द' with a tail, or 'क्ष' where the top loop broke off!
Wait, look at the letter:
Is there a space between that letter and 'य'?
No! It is joined to 'य'!
Wait, 'द' + 'य' is 'द्य', NOT 'द' followed by 'य'!
In Devanagari, 'द' + 'य' is ALWAYS written as the conjunct 'द्य' (like in विद्या, यद्यपि)!
Nobody writes 'द' with full body followed by 'य' in a conjunct, UNLESS they are two separate letters: 'द' and 'र्य'!
Wait, if it's two separate

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द्वितीय खण्ड: स्त्री एवं पुरुष का शारीरिक व मानसिक मनोविज्ञान

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८१
रम्भा बोली—
समस्तशृंगार विनोद शीला,
लीलावती कोकिल कण्ठनाला ।
विलासिता नो नव यौवनाढ्या,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
सम्पूर्ण शृंगार करने मे चतुर और अपने हावभाव आदि
प्रसन्नता से पति को प्रसन्न करने तथा हास्य क्रीड़ा आदि मे पति
को मोहित करने वाली, कोयल के समान मधुर कण्ठवाली, युवा-
वस्था को प्राप्त हुई ऐसी अपनी प्यारी पत्नी के साथ आनन्द
पूर्वक जिस पति ने जीवन व्यतीत न किया उसका जीवन व्यर्थ है।
रम्भा और शुकदेव जी के इस प्रकार हुए वार्तालाप का
पूरा वर्णन करने मे पुस्तक बढ़ जावेगी इसलिये इतना ही
लिखना उचित समझा। इस रम्भा और शुकदेव जी के सम्वाद से
भी इस बात की पुष्टि होती है कि इस ससार मे मनुष्य के लिये
दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग से भी बढ़कर है। जिन्हें अभाग्य वश दाम्पत्य
सुख का साधन नहीं है वे परमात्मा का भजन करे। मनुष्य के
लिये दोही साधन है, गृहस्थाश्रम अथवा ईश्वर भक्ति। इन्ही
दो मे सुख है रम्भा ने जो कुछ कहा है ठीक ही कहा है और
शुकदेव जी ने भी ठीक ही कहा है। सारांश यह कि जिसे दाम्पत्य
सुख का भोग प्राप्त नही, न जिसने ईश्वर भक्ति ही की है उसका
जीवन व्यर्थ है। कामदेव के विषय मे शिव जी की कथा पढिये।
६

८२ आनन्द मन्दिर
कामदेव और शिवजी
शिवजी की पहिली स्त्री सती का देहान्त होजाने पर शिवजी
को बड़ा दुःख हुआ। इनका विचार फिरसे विवाह करने का न
था इसलिये पत्नी की मृत्यु के बाद वे तपस्या करने लगे। शिवजी
सब देवो के देव महादेव कहलाते है। उनकी शक्ति भी महान
है, इसलिये वे घोर तपस्या करने में लगगये।
कामदेव बड़े ठाट बाट के साथ अपनी स्त्री रति को लेकर
शिवजी का तप भग करने गया। शिवजी तपस्या में थे, पार्वती के
पिता ने पार्वती जी को शिवजी की सेवा के लिये भेजा था। जब
पार्वती शिवजी के पास पहुँची तो अच्छा अवसर देखकर कामदेव
ने शिवजी पर अपना वाण चलाने की तैय्यारी की। शिवजी को
मालूम होगया, उन्हे कामदेव पर बड़ा क्रोध आया। शिवजी के
तीन नेत्र थे, तीसरा नेत्र महान क्रोध आने पर वे खोलते थे। शिव ने
क्रोध से उसी तीसरे नेत्र से कामदेव की ओर देखा। नेत्र खुलते
ही उसमें से बडी विकट अग्नि की लपट निकली। उस लपट के
निकलते ही कामदेव भस्म होने लगा। उसकी स्त्री रति वहीं खड़ी
थी। रति अपने पति कामदेव को जलते देखकर पति के जीवनदान
की शिवजी से प्रार्थना करने लगी परन्तु जब कामदेव भस्म हो गया
तो रति अचेत हो पृथ्वी पर गिर पड़ी। वहुत देर के बाद जब
उसको होश आया तब वह विलाप कर रोने लगी। उसका विलाप
पत्थर के हृदय को भी पिघला देने वाला था।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८३
अपने प्राणप्यारे पति की मृत्यु का पतिप्राणा स्त्रियों को
जो दुःख होता है उसे देखने वालों का भी हृदय फटने लगता
है क्योंकि संसार में स्त्रियों के लिये पति से बढ़कर कोई दूसरा
प्यारा नहीं है। विलाप करते करते रति सती होने को तैयार हो
गईं, कामदेव तो जलकर भस्म होगया था, शरीर का वहां नाम
निशान तक नहीं रहा था केवल राख रह गई थी, उसी को शरीर
में लगाकर वे सती होने को तैयार हुई। तब आकाश वाणी हुई
हे कामदेव की प्यारी स्त्री ! तुम अपने प्राणों को नष्ट मत करो
तुम्हारा पति कुछ दिन में फिर मिलेगा, सन्तोष रखो। पति के
विछोह का दुःख तुमको अधिक दिन नहीं भोगना पड़ेगा।
हे सुन्दरी ! शीघ्रही वह दिन आने वाला है जब
शिवजी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके साथ विवाह
करेंगे और विवाह करके प्रसन्न होंगे तब तुम्हारे पति कामदेव
को फिर से जीवित करदेंगे। तुम सन्तोष रखो। शिवजी देवों के
भी महादेव हैं, उन्हें मारने और जिलादेने की पूरी सामर्थ्य है।
इस समय तुम्हारा पति ब्रह्मा के शाप से शिवजी के क्रोध से
भस्म हुआ है वह फिर जीवित होगा। इस प्रकार आकाश वाणी
को सुनकर कामदेव की स्त्री रति को धैर्य हुआ। उसने सती
होने का विचार छोड़ दिया परन्तु पति के ध्यान मे शोकाग्नि से
दिन प्रतिदिन शरीर को क्षीण करती हुई उस दिन की प्रतीक्षा
करने लगी।
पार्वती की तपस्या पूरी हुई और शिवजी ने पार्वती से