विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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वाली के वियोग मे तारा विलाप ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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कीचक वध (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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कीचक वध ५७
रानी द्रौपदी रूप गुण में अद्वितीय थी कोई उनका सानी
न था। अपनी लावण्य रूपी प्रभु की इस अद्भुत देन को वे
कहां छिपी रख सकती थीं। उन्होंने अपना राजसी वेश छोड़ दिया
था, सब सुख सम्पत्ति पर लात मार दी थी परन्तु वे अपने रूप
को कैसे छिपा सकती थी या बदल सकती थी।
राजा विराट् की सेना का सेनापति था कीचक। वह बड़ा
वहादुर और रूपवान योद्धा था। तमाम राज्य पर उसकी धाक
जमी हुई थी। उसके भय से कोई चूं तक न करता था।
वलवान, वहादुर और रूपवान होते हुए भी कीचक में
एक जबर्दस्त अवगुण था। वह अवगुण था विषय वासना,
काम लोलुपता, परस्त्री गमन। जिस अवगुण के कारण उच्च
से उच्च पुरुष का पतन हो जाता है। जो अवगुण तमाम गुणों
को ले डूबता है। उसीमें कीचक की राक्षसी प्रवृत्ति थी।
अन्तःपुर में उसका आना जाना था। एक दिन मलिन-
वसना सती साध्वी द्रौपदी पर उसकी दृष्टि पड़ी। द्रौपदी को
देखते ही उस कामान्ध का मन चंचल हो उठा। उस दिन से
वह नित्य ही द्रौपदी के देखने की ताक भाक में रहने लगा।
धीरे धीरे उसकी नीचता बढ़ी। वह द्रौपदी से मुसकुरा मुसकुरा
कर बातें भी करने लगा। उस दुष्ट की दृष्टि उस पर गड़ गयी।
द्रौपदी नीचे को मुख किये हुए शुद्ध सरल निश्छल हृदय से
उसकी बातों का उत्तर दे दिया करती थी। वे उसको उसी
भाँति देखती थी जिस प्रकार कोई पुत्री अपने पिता को देखती है।
५८ भूमिका
एक दिन कामी कीचक ने एकान्त का मौका पाकर अपना
नीच प्रस्ताव उसके सामने रखा । वे सहम गईं, बोलीं—आप
इतने यशस्वी और प्रतापी मेरे पिता के समान होकर ये कैसी बाते
कर रहे हैं ? आगे से आप कभी इस प्रकार बात चीत करने का
साहस भी न करे ।
एक दिन फिर मौका पाकर कीचक ने द्रौपदी से कहा—
यदि सीधे रास्ते पर न आई तो जबर्दस्ती की जायगी ।
सती द्रौपदी की आखे क्रोध से लाल होगईं । उन्होंने बड़े
तीव्र शब्दो से कीचक को फटकारा और धिक्कारा ।
उनका उग्र रूप देखकर कीचक कुछ सहम गया फिर अभि-
मान वश अपने बल का स्मरण कर बलात्कार करने के लिये
द्रौपदी की ओर झपटा ।
कीचक ने आगे कदम बढ़ाया ही था कि कान मे आवाज
पड़ी–रे नीच कामी ! ठहर, देख तेरा काल मै आगया । कीचक ने
सामने देखा तो भीम एक पेड़ लिये आरहे थे । भीम ने आकर कीचक
को उठाकर दे पटका और उसकी जीवन लीला वही समाप्त करदी ।
इसी प्रकार अनेक पुरुष पर स्त्री की इच्छा करने से मारे
गये । चाहे कितना ही बलवान साहसी यशवान विद्वान पराक्रमी
कोई भी हो, अधर्म का फल उसे अवश्य मिलता है ।
जब देवताओ और बड़े बड़े योद्धाओ को भी पर स्त्री की
इच्छा करने से प्राणो तक का दण्ड मिला तो साधारण पुरुषो की
क्या गिनती है । इसलिये पर स्त्री गमन से दूर रहना चाहिये ।
BK Mitra
दाम्पत्य प्रेम राजा अज और रानी इन्दुमती मर्यादा सचित्र
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कामशास्त्र ५६
कामशास्त्र
जितने शास्त्र प्राचीन ऋषियो ने वनाये हैं, वे सव मनुष्यमात्र
की आरोग्यता तथा दीर्घजीवन के लिये वनाये हैं। सभी शास्त्रो
की शिक्षा मनुष्यमात्र के लिये समान उपयोगी है।
कामशास्त्र भी इसी का समर्थक है। कामशास्त्र मे भी
रतिक्रिया विधान और गर्भक्रिया विधान की ही शिक्षा दी गई
है परन्तु विषयी पुरुषों ने उसका नाम लेकर मनगढ़न्त
विषय वढ़ा दिये हैं। इस समय जितनी पुस्तके कामशास्त्र कोक-
शास्त्र सम्वन्धी निकल रही हैं। जिनको सव असली कोकशास्त्र
वतलाकर नोटिस देते हैं। पाठको ! को यह विचारना चाहिये कि
सव ही अपने कोकशास्त्र कामशास्त्र को असली वतलाते हैं
तो नकली कौनसा है। इससे समझ लेना चाहिये कि असली
एक भी नहीं है सव मनगढ़न्त हैं।
विषयी लोग धोखे में आकर चौरासी आसनो का नाम सुन-
कर कोकशास्त्र मगा लेते हैं और ठगे जाते है। क्योकि उनमे सच्चे
श्रासनादि के चित्र तो निकलते नहीं, बहुत सी झूठी सच्ची मन
गढ़न्त वाते भरी रहती हैं। ग्राहक हाथ मलकर रह जाते हैं। इस
लिये ऐसी वातो से हमेशा वचना चाहिये। कोई भी वस्तु मगाने
से पूर्व उसकी असलियत के विषय मे पूरी तरह से निर्णय कर
लेना चाहिये तब मंगाना चाहिये। केवल पुस्तक के नाम मात्र
से उद्वेग में न आ जाना चाहिये।
६२ भूमिका
सावधान ! सावधान !! सावधान !!!
कोकशास्त्र के आसनों की अभिलाषा से कोकशास्त्र मंगाने
वालों को सावधान होजाना चाहिए । जिस प्रकार के आसनों की
इच्छा से असली कोकशास्त्र के भ्रम में कोकशास्त्र मंगाते हैं उन
आसनों के प्रकाशित करने का किसी को मजाल नहीं है क्योंकि
असभ्यता पूर्ण चित्रों के छापने की सरकार से मुमानियत है । यदि
कोई कानून के खिलाफ चित्र या लेख छापे तो वह दण्ड का
भागी होगा । इसलिये कोई छाप ही नहीं सकता परन्तु नोटिस
इस ढंग से देते हैं कि नोटिस वालों की बातों में आकर विषयी
लोग पुस्तक मंगा ही लेते हैं और उन पुस्तकों में व्यर्थ के मन
गढन्त प्रयोगों को पढ़ सुनकर अपने शरीर का सत्यानाश मार
बैठते हैं । वे आसन जिनकी खोज मे विषयी लोग रहते हैं शरीर
को बड़ी भारी हानि पहुँचाने वाले हैं । ऐसे आसन (विपरीत आदि
रति) से पुरुष को ही नहीं स्त्री को भी बड़ी भारी हानि पहुँचती
है और सन्तान भी रोगी निर्बल तथा कम आयुवाली होती है ।
इसलिये सब विषयी पुरुषो को सावधान रहना चाहिये
कोकशास्त्र के आसनो की खोज मे न पडना चाहिये और कोकशास्त्र
कामशास्त्र आदि जो मनगढ़त विषयों से भरे पड़े हैं उनके व्यर्थ के
प्रयोगों के चक्कर मे पड़कर अपने धन को अपने शरीर को कदापि
बर्बाद न करना चाहिये क्योंकि विषय की लोलुपता मे शास्त्र
विपरीत रतिक्रिया आदि करने से कभी कभी भयंकर बीमारियां
हो जाती हैं । जिससे बहुत हानि की संभावना रहती है ।
कामशास्त्र में क्या है ६१
कामशास्त्र का उद्देश्य
कामशास्त्र का उद्देश्य रतिक्रिया की उत्तम विधि है जिससे
सन्तान आरोग्य और दीर्घ जीवी हो तथा पति पत्नी प्रेम
पूर्वक रहकर रतिक्रिया का आनन्द भोगते हुये स्वयं आरोग्य और
दीर्घजीवी हो। आरोग्य और दीर्घ जीवी सन्तान उत्पन्न कर सकें।
परतु कामशास्त्र की आड़ मे लोग मनगढ़ंत विषय लिखकर
कामशास्त्र को वदनाम कर रहे हैं इसी कारण सज्जन पुरुष काम-
शास्त्र और कोकशास्त्र से घृणा करते हैं, इस नाम से ही चिढ़ते है।
केवल विषयी ऐसी पुस्तके मंगाते हैं।
जो पुस्तके कामशास्त्र सम्बन्धी कोकशास्त्र आदि अनेक
नामो से प्रकाशित हुई हैं उनमे दो एक को छोड़ करके सभी
बहुत गन्दी हैं, सभी विषय उनमे ऐसे भर दिये गये हैं कि वे
स्त्री पुरुषों के देखने योग्य वास्तव में नहीं हैं। इसी कारण श्रेष्ठ
लोगो को ऐसी पुस्तकों से घृणा होगई है।
कामशास्त्र में क्या है
कामशास्त्र का लक्ष्य तो पाठकों को मालूम ही होगया
अब यहां यह भी बतलादेना आवश्यक है कि कामशास्त्र में
६२ भूमिका
उत्पन्न कर सके। विपरीत रति तथा अनियम रतिक्रिया के अनिष्ट-
कारी विषय वासनाओ और मनगढन्त अहित कर आसनो
से बचे रहकर उनसे होने वाले अनेक रोगों से बचे ।
यों तो जितने शास्त्र हैं सब मनुष्य मात्र के हित के लिये
बने हैं परन्तु उनमे ऋषियो के बताए हुए नियमों पर कितने
मनुष्य चलते हैं यह सभी को मालूम है । धर्म्म शास्त्र वैद्यकशास्त्र
आदि के नियमो पर न चलने वाले अनेक प्रकार के रोगो तथा
कुकर्मों में फसकर अनेक कष्ट भोगते हैं
इसी प्रकार कामशास्त्र के विषय को न जानकर रतिक्रिया
तथा विधान में कुछ ज्ञान न होने से गर्भाधान क्रिया ठीक नहीं
कर सकते और शीघ्रही वीर्य क्षीणता, रज क्षीणता, प्रमेह, स्वप्नदोष,
शीघ्रपात, सिथिलता और नपुंसकता के दास बन जाते हैं और
स्त्री को भी शीघ्रही रोगी निर्बल और दुर्बल बना देते हैं। जवानी
में ही बुढ़ापे की सी दशा होजाती है जिसके कारण स्त्री पुरुष दोनों
का जीवन दुःखमय व्यतीत होता है।
कामशास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता
इस लिये विवाह होते ही स्त्री पुरुष सब को ही कामशास्त्र
का कुछ ज्ञान अवश्य होजाना चाहिये जिससे पति पत्नी दोनों
अनियम से बचते रहे। यो तो इस विषय की शिक्षा किसी को
नहीं दी जाती। पशु पक्षी मनुष्य और प्राणी मात्र सबको ही प्रकृति
गर्भविधान की शिक्षा स्वय देती है।
मनुष्य और पशु पक्षी सबको ही रतिक्रिया गर्भाधान के
कामशास्त्र के ज्ञान की आवश्यकता ६३
लिये है अन्तर इतना है कि मनुष्य के सिवाय अन्य जीवों की रति-
क्रिया केवल गर्भाधान के ही लिये है आगे उसके अच्छे, बुरे रोगी
निरोगी अल्पायु या दीर्घायु होने का उन्हें कुछ भी ज्ञान नहीं।
आनन्द और सुख वे कुछ नहीं जानते। जब तक दूसरा बच्चा
न हो और पक्षियों मे जब तक वह स्वयं उड़ने लायक न होजाय
तब तक ही उसे खिलाने पिलाने का ज्ञान और प्रेम नर मादा
को रहता है। पशुओं के जब दूसरा बच्चा हो गया फिर पहिले की
कुछ भी परवाह नहीं रहती, कुछ भी प्रेम नहीं फिर तो वह पास
आता है तो माता मारने और काटखाने को दौड़ती है।
वात्सल्य प्रेम और जीवन भर उनकी आरोग्यता की चिन्ता
रखना उन्हें योग्य बनाना यह मनुष्यो मे ही है। इसलिये परमात्मा
ने मनुष्यों को ही इस योग्य बनाया है क्योकि सृष्टि की उन्नति
अवनति मनुष्यों पर ही निर्भर है और मनुष्य ही सृष्टि की सर्व-
श्रेष्ठ शोभा है। यदि मनुष्य न होता तो सृष्टि की कुछ भी शोभा
न होती इस लिये इस बात की अत्यन्त आवश्यकता है कि मनुष्य
आरोग्य रहकर दीर्घ जीवी हो और आरोग्य दीर्घजीवी सन्तान
उत्पन्न कर मनुष्य जीवन का आनन्द भोगे।
परमात्मा ने वेद भी इसी लिये बनाये हैं कि वेदों से सृष्टि
का ज्ञान हो। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह उस ज्ञान को
प्राप्त कर उत्तम जीवन व्यतीत करे। संसार में वेद प्राणिमात्र
के विशेष कर मनुष्य मात्र के हित के ही लिये बनाये गये हैं। पशु
पक्षियों को उनकी आवश्यकता नहीं है।
२
६४ भूमिका
धर्म्म-शास्त्रादि भी इसी लिये ऋषियो ने बनाये हैं कि धर्म्म
शास्त्रो से मनुष्य धर्म्म मार्ग पर चले। स्त्री पुरुष अपने धर्म्म
कर्त्तव्य जानकर अधर्म्मों से बचे। संसार मे धनवान कीर्तिवान होकर
धार्मिक जीवन व्यतीत करे।
ऐसी पुस्तको की अधिक विक्री देखकर कुछ सज्जन पुरुषों ने
भी कोकशास्त्र कामशास्त्र आदि नाम रखकर पुस्तके निकाली हैं
उन्होने इस बात का ध्यान अवश्य रक्खा है कि अधिक गन्दा
विषय न आने पावे परन्तु यथार्थ मे वे पुस्तके भी कामशास्त्र के विषय
को पूरा नही करती हैं।
हमने यही सब बाते विचार कर वर्त्तमान नवयुवक दम्पतियों
की दशा देखकर और आयुर्वेद के अनुसार उत्तम कामशास्त्र की
पुस्तको का अभाव देख कर इस “आनन्द मन्दिर विवाह विज्ञान”
कामशास्त्र को मनुष्य मात्र के हित के लिये वेद शास्त्र वैद्यक और
कामशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थो से उपयोगी विषयो को चुनकर इसको
तय्यार किया है आशा है सब सज्जन इसे आदि से अन्त तक
पढ़कर लाभ उठावेगे।
कर्नलगंज } सबकी आरोग्याकांक्षिणी
इलाहाबाद } यशोदादेवी
५
आनन्द
मन्दिर
पहला अध्याय
—:—
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हेमन्त ऋतु ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
विवाह विज्ञान कामशास्त्र
आनन्द मन्दिर
आनन्द और सुख
सुखं वाञ्छन्ति सर्वेहि तच्चधर्म्म समुद्भवम् ।
तस्माद्धर्म्मः सदा कार्य्यः सर्ववर्णैः प्रयत्नतः ॥
( दक्ष सहिता )
सब ही सुख और आनन्द की इच्छा करते है परन्तु शुभ
कार्य्यों के विना किसी को भी सुख प्राप्त नही होता अतएव यदि
सुख और आनन्द भोगने की इच्छा है तो यत्न सहित धर्म्मा-
५
६६ आनन्द मन्दिर
चरण करना सब वर्णों का अर्थात् मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है।
तस्याः स्तनौ यदि घनौ जघनं विहारि ।
वक्त्रं च चारु तव चित्त किमाकुलत्वम् ॥
पुण्यं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा ।
पुण्यैर्विना न हि भवन्ति समीहितार्थाः ॥
भर्तृहरि
हे कामेच्छुक पुरुषो ! पराई सुन्दर युवती स्त्री को देखकर
चित्त को क्यो विचलित करते हो । महात्माओ की आज्ञा पालन
करो । जो उपाय उन्होने बतलाए हैं उन उपायो मे सुन्दर भार्या
और सब सांसारिक सुखो के प्राप्त करने के सरल उपाय हैं।
श्लोक का भी यही अर्थ है—
जिस स्त्री के स्तन पुष्ट और जंघाए विहार करने योग्य हैं,
मुख सुन्दर है। उसे देखकर हे चित्त ! क्यो व्याकुल होता है, यदि
उनमे तेरी वांछा है तो पुण्य कर क्योकि पुण्य के विना मनोरथ
सिद्ध नही होते ।
ऋषियो ने ठीक बतलाया है:—
शुभ्रं सद्म सविभ्रमा युवतयः श्वेतातपत्रोज्ज्वला ।
लक्ष्मीरित्यनुभूयतेस्थिरमिव स्फीतेशुभे कर्मणि ॥
इसका अर्थ यह है कि:—
उत्तम स्वच्छ घर, अच्छे हाव भाव वाली सुन्दर स्त्री और
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ६७
लक्ष्मी अर्थात् धन सम्पत्ति तब ही स्थिरता पूर्वक अर्थात् अधिक
काल तक आनन्द सहित भोग में आती हैं जब पुण्य भी अधिक
किये हों अर्थात् शुभ कर्मों की भी अधिकता हो ।
शास्त्रकारों का वचन है:—
विच्छिन्ने नितरामनङ्ग कलह-
क्रीड़ानुटत्तन्तुके ।
मुक्ताजालमिव प्रयाति झटिति-
भ्रश्यद्दिशो दृश्यताम् ॥
कामदेव की क्रीड़ा की कलह से टूटे हुए मोतियों के हार की
समान सब सुख भोग शीघ्र ही छिन्न भिन्न हो जाते हैं अर्थात्
नष्ट हो जाते हैं ।
तात्पर्य यह कि जब पुण्य क्षय हो जाता है यानी किये हुए शुभ
कर्मों का फल भोग पूरा हो जाता है तब मनुष्य के सब सुख इस
प्रकार से छिन्न भिन्न हो जाते हैं जैसे पति पत्नी में रति क्रीड़ा की
कलह से मोतियों का हार टूट जाने से हार के मोती छिन्न भिन्न
हो जाते हैं, इधर उधर बिखर जाते हैं ।
इसीलिये ऋषियों ने बतलाया है कि सांसारिक सुख भोग
और सुन्दर स्त्री स्थिरता से अर्थात् अधिक काल तक तभी भोग
में आते हैं जब कि शुभकर्म भी अधिक किये हों । इसलिये
मनुष्य को चाहिये कि सुख भोगों के साथ ही साथ शुभकर्मों की