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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ८१
रम्भा बोली—
समस्तशृंगार विनोद शीला,
लीलावती कोकिल कण्ठनाला ।
विलासिता नो नव यौवनाढ्या,
वृथागतं तस्य नरस्य जीवनम् ॥
सम्पूर्ण शृंगार करने मे चतुर और अपने हावभाव आदि
प्रसन्नता से पति को प्रसन्न करने तथा हास्य क्रीड़ा आदि मे पति
को मोहित करने वाली, कोयल के समान मधुर कण्ठवाली, युवा-
वस्था को प्राप्त हुई ऐसी अपनी प्यारी पत्नी के साथ आनन्द
पूर्वक जिस पति ने जीवन व्यतीत न किया उसका जीवन व्यर्थ है।
रम्भा और शुकदेव जी के इस प्रकार हुए वार्तालाप का
पूरा वर्णन करने मे पुस्तक बढ़ जावेगी इसलिये इतना ही
लिखना उचित समझा। इस रम्भा और शुकदेव जी के सम्वाद से
भी इस बात की पुष्टि होती है कि इस ससार मे मनुष्य के लिये
दाम्पत्य प्रेम स्वर्ग से भी बढ़कर है। जिन्हें अभाग्य वश दाम्पत्य
सुख का साधन नहीं है वे परमात्मा का भजन करे। मनुष्य के
लिये दोही साधन है, गृहस्थाश्रम अथवा ईश्वर भक्ति। इन्ही
दो मे सुख है रम्भा ने जो कुछ कहा है ठीक ही कहा है और
शुकदेव जी ने भी ठीक ही कहा है। सारांश यह कि जिसे दाम्पत्य
सुख का भोग प्राप्त नही, न जिसने ईश्वर भक्ति ही की है उसका
जीवन व्यर्थ है। कामदेव के विषय मे शिव जी की कथा पढिये।
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