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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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( २ )
के साथ प्रमाण के रूप में इसको उद्धृत किया है। इस प्रकार यह ग्रन्थ योगशास्त्र एवं
आगमशास्त्र का एक उज्ज्वल रत्न है। इसकी प्रतिपाद्य विषयवस्तु का संक्षिप्त परिचय
प्रथम श्लोक की व्याख्या में तन्त्रावतार शीर्षक के अन्तर्गत (पृ० ६-७) दिया गया है। यहाँ
सर्वप्रथम प्रस्तुत संस्करण के सम्बन्ध में कुछ कह देना आवश्यक है।
प्रस्तुत संस्करण
काश्मीर ग्रन्थमाला के ८-९ ग्रन्थांक के रूप में दो टीकाओं के साथ इस ग्रन्थ का
प्रकाशन संवत् १९७५ में श्रीनगर से हुआ था। इनमें से प्रथम टीका (विवृति) शिवोपाध्याय
की और दूसरी (विज्ञानकौमुदी) भट्ट आनन्द की है। क्षेमराज ने भी विज्ञानोद्योत नाम की
व्याख्या इस पर लिखी थी। महेश्वरानन्द ने महार्थमंजरी की स्वोपज्ञ परिमल टीका (पृ०
१४६-१४७) में इसका उल्लेख किया है, किन्तु आज यह उपलब्ध नहीं होती। शिवोपाध्याय
की विवृति के १अन्तिम श्लोकों (पृ० १४३) से मालूम होता है कि उनके समय में १ से २४
श्लोक तक की ही क्षेमराज की व्याख्या उपलब्ध थी। इससे आगे के ग्रन्थ की कागज या
भूर्जपत्र पर लिखी हुई कोई पुस्तक उनको नहीं मिली। कालरूपी घुन ने उसको चाट लिया
अथवा वह अग्नि को समर्पित कर दी गई, इस बात को तो भगवान् ही जानते हैं। विज्ञानो-
द्योत के इस उपलब्ध अंश को शिवोपाध्याय की व्याख्या में सम्मिलित कर लिया गया है और
उक्त संस्करण के पृ० १६ पर लिखा गया है कि अब इसके आगे शिवोपाध्याय की विवृति
आरम्भ होती है। वस्तुतः इस वाक्य को प० २१ पर होना चाहिये था, जहाँ से कि २५वें
श्लोक की व्याख्या प्रारम्भ होती है, क्योंकि शिवोपाध्याय के ही कथन के अनुसार 'ऊर्ध्वे
प्राणः' इस चौबीसवें श्लोक तक की व्याख्या क्षेमराज की कृति है।
इस तरह से श्रीनगर संस्करण में इस ग्रन्थ की तीन टीकाओं का समावेश है।२
क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय प्रभृति ग्रन्थों में विज्ञानभैरव के श्लोकों को उद्धृत कर उनकी व्याख्या
की है। शिवोपाध्याय की व्याख्या में उन अंशों का भी उचित समावेश मिलता है। इससे
ऐसी प्रतीति होने लगती है कि शिवोपाध्याय के समय में भी विज्ञानोद्योत विद्यमान था।
हमने अपने संस्करण को प्रस्तुत करने में मुख्य सहायता इसी संस्करण से ली है।
खेद है कि भाषा की अनभिज्ञता के कारण हम इस ग्रन्थ के फ्रेंच संस्करण से कोई सहायता न
ले सके। जैसा कि पहले कहा गया है विज्ञानभैरव के श्लोक प्रमाण के रूप में अनेक ग्रन्थों
१. श्रुतं देव मयेत्यादिप्रश्नग्रन्थार्थबन्धनम् ।
ऊर्ध्वे प्राणादिपञ्चान्तं क्षेमराजकृतं शुभम् ॥
ततः परमुपाध्यायकुशकाशावलम्बनम् ।
यद्वृत्तिग्रन्थकाकपुस्तकं हस्तगोचरम् ॥
भूर्जात्मकं वा नायातं जग्धं कालघुणेन तत् ।
दग्धं वा वह्निना च्छिन्नमत्र साक्षी महेश्वरः ॥
२. विमर्शदीपिका के सम्बन्ध में आगे पृ० ३१ की १ टिप्पणी देखिये ।

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( ३ )
में उद्धृत हैं और कुछ स्थलों पर उनकी प्रकारानुकूल व्याख्या भी की गई है । लगभग आधे
से अधिक श्लोक इस तरह के मिलते हैं । इन सभी स्थलों का टिप्पणियों में उल्लेख कर दिया
गया है । पाठ-भेद के संकलन में और दोनों व्याख्याओं में भी इन उद्धरणों से और उद्धृत
स्थलों से आवश्यक सहायता ली गई है ।
संस्कृत की अन्वयार्था टीका में उक्त तीनों व्याख्याओं से सरलतम पंक्तियों को चुन-
कर और आवश्यकता के अनुसार उनमें नाममात्र का परिवर्तन कर अन्वय के अनुसार सजो
कर रखा गया है, जिससे कि श्लोक का अर्थ सरलता से समझा जा सके । कुछ विवादास्पद
स्थलों में टीकाओं के परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय स्थापित करने का भी प्रयास किया
गया है ।
रहस्यार्था टीका का प्रधान आधार क्षेमराज और शिवोपाध्याय की व्याख्या है । कुछ
श्लोकों के निगूढ अभिप्राय का इनमें विस्तार से वर्णन किया गया है । इन श्लोकों को उद्धृत
करने वाले आचार्यों ने भी इनके अन्तस्तल में प्रविष्ट होने का प्रयत्न किया है । इन सबकी
सहायता से राष्ट्रभाषा हिन्दी में इन श्लोकों के छिपे अभिप्राय को प्रकट करने का प्रयत्न
किया गया है । इसीलिये इसका नाम रहस्यार्था रखा गया है ।
पाठ-संकलन में शिवोपाध्याय के पाठ को 'क' संकेत से और भट्ट आनन्द के पाठ को
'ख' संकेत से दिखाया गया है । जिन स्थलों में यहाँ के श्लोक उद्धृत हैं, उनसे भी पाठ-
संकलन किया गया है । इनके संकेत के रूप में उस उस ग्रन्थ का प्रथम अक्षर लिया गया है ।
पाठ-संकलन की टिप्पणियों में देवनागरी अंकों का और अन्य टिप्पणियों में रोमन अंकों का
उपयोग हुआ है । पाठ-संकलन के बाद पास में ही स्थल निर्देश वाली टिप्पणियाँ दी गई हैं,
जिससे कि उक्त स्थल का पाठ-संकलन किस-किस ग्रन्थ से किया गया है, इसको जानने में
सुविधा हो ।
प्रायः प्रत्येक दर्शन और सम्प्रदाय के अपने पारिभाषिक शब्द होते हैं । उस उस दर्शन
और सम्प्रदाय के विषय में लिखते समय इन शब्दों का प्रयोग अनिवार्य रूप से करना पड़ता
है । प्रयोग-स्थल में ही इनके अभिप्राय को समझाने का प्रयत्न किया जाय तो इससे भाषा के
प्रवाह में बाधा पड़ती है । अतः ऐसे पारिभाषिक शब्दों के अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिये
यहाँ पर्याप्त मात्रा में टिप्पणियों का उपयोग किया गया है । यदि पाठकों का इससे कुछ भी
लाभ हुआ तो यह सारा प्रयत्न सार्थक माना जायगा ।
ग्रन्थ का स्वरूप
शिवोपाध्याय की टीका के अनुसार इस ग्रन्थ में १६३ और भट्ट आनन्द की टीका के
अनुसार १६१ श्लोक हैं । भट्ट आनन्द की टीका में ७७ संख्या के बाद के श्लोक में ७९ संख्या
लगा दी गई है । इस तरह से भट्ट आनन्द ने वस्तुतः १६० श्लोकों की ही व्याख्या की है ।
शिवोपाध्याय के ४४वें श्लोक के उत्तरार्ध और ४५वें श्लोक के पूर्वार्ध की, ८४वें और १४४वें
श्लोक की व्याख्या भट्ट आनन्द ने नहीं की । यह उचित भी है, क्योंकि 'निस्तरङ्गोप०'

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( ४ )
(श्लोक १३६) प्रभृति श्लोक में धारणाओं की संख्या ११२ बताई गई है। यह निश्चित संख्या
भट्ट आनन्द की व्याख्या के अनुसार ही पूरी होती है। शिवोपाध्याय की व्याख्या में इनकी
संख्या बढ़ गई है। अतः प्रस्तुत संस्करण में उक्त तीनों श्लोकों का समावेश नहीं किया गया
है। इस तरह से यहां श्लोकों की संख्या १६० ही होनी चाहिये, किन्तु हैं १६१ श्लोक।
इसका कारण यह है कि १५३वें श्लोक में 'सकारण' इस पंक्ति का समावेश क्षेमराज द्वारा
शिवसूत्रविमर्शनी में उद्धृत वचन के अनुसार किया गया है। श्लोकों का क्रम भी उस उद्धरण
के अनुसार ही रखा गया है। इन सभी छोटी-मोटी बातों का विवरण पाठ-संकलन वाली
टिप्पणियों में देखना चाहिये।
ग्रन्थ और व्याख्याकारों का काल
विज्ञानभैरव प्रश्न-प्रतिवचनात्मक शैली में लिखा गया एक आगम ग्रन्थ है¹। प्रश्न
देवी अथवा भैरवी करती है और उसका उत्तर भगवान् भैरव देते हैं। इस तरह से इस ग्रन्थ
का प्रादुर्भाव रुद्रयामल भाव से, शिव और शक्ति के सामरस्य से होता है। प्रथम श्लोक की
व्याख्या में इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। ग्रन्थ के अन्तिम श्लोक के अनुसार इसमें
रुद्रयामल तन्त्र का सार संगृहीत है। रुद्रयामल तन्त्र का प्राचीन स्वरूप आज उपलब्ध नहीं है,
अतः उसके प्रादुर्भाव के काल के सम्बन्ध में हम कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। विज्ञान-
भैरव का प्राचीनतम उल्लेख वामननाथ के अद्वयसम्पत्तिवार्त्तिक में मिलता है। संवित्प्रकाश
आदि ग्रन्थों के रचयिता वामनदत्त और वामननाथ अभिन्न व्यक्ति हैं। इनके सम्बन्ध में हम
लुप्तागमसंग्रह के द्वितीय भाग के ²उपोद्घात में विस्तार से विचार करेंगे। ³‘काश्मीरेतिहास:’
नामक ग्रन्थ की समालोचना में हमने बताया है कि कश्मीर के प्रसिद्ध आलंकारिक आचार्य
तन्त्रशास्त्र के भी मर्मज्ञ विद्वान् रहे हैं। उसी परम्परा को यदि स्वीकार किया जाय तो हम
आलंकारिक वामन को अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ से अभिन्न मान सकते हैं। आलंकारिक
वामनाचार्य को कश्मीर के राजा जयापीड (७७९-८१३ ई०) के मन्त्री वामन से अभिन्न माना
जाता है। अद्वयसम्पत्तिकार को भी उनसे अभिन्न मान लेने पर ई० आठवीं शताब्दी के अन्त
तक विज्ञानभैरव का प्रादुर्भाव हो चुका था, ऐसा मान लेने में कोई बाधा नहीं प्रतीत होती।
आधुनिक इतिहासज्ञ कश्मीर के आगम ग्रन्थों के आविर्भाव का काल ई० सातवीं-
आठवीं शताब्दी में ही मानते हैं। ‘जल्स्येवोर्मयः’ (श्लो० १०८) इत्यादि श्लोक की व्याख्या
में शिवोपाध्याय ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका के आधार पर विज्ञानभैरव की दो धारणाओं की
रचना की बात कही है। इस कथन का खण्डन हम वहीं कर चुके हैं। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के
रचयिता भट्ट उत्पल हैं। इनका समय ई० नवीं शताब्दी का अन्तिम भाग और दसवीं शताब्दी
१. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की मातृकाओं (पृ० २२०, ७६६) में सिद्धयोगीश्वर इस ग्रन्थ
के प्रवक्ता माने गये हैं।
२. यह उपोद्घात अब प्रकाशित हो चुका है। पृ० ६५-६६ देखिये।
३. द्रष्टव्य—सारस्वती सुषमा, व० २८, अ० १, पृ० ७२-७३, संवत् २०३०।

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( ५ )
का प्रारम्भिक भाग माना गया है । विज्ञानभैरव को भट्ट उत्पल का परवर्ती ग्रन्थ कथमपि नहीं
माना जा सकता ।
'नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत' (८।४१-४४) प्रभृति नेत्रतन्त्र के और 'न सक्तमिह चेष्टासु'
(उप० ६९।२-७) प्रभृति योगवाशिष्ठ के श्लोकों में विज्ञानभैरव उपदिष्ट कुछ स्थूल भावनाओं
का निषेध है । इससे विज्ञानभैरव का प्रादुर्भाव इन दोनों ग्रन्थों से पहले हुआ, ऐसा कहा जा
सकता है ।
व्याख्याकारों में से क्षेमराज के सम्बन्ध में पर्याप्त लिखा जा चुका है१ । उसको यहाँ
दुहराने की आवश्यकता नहीं है । भट्ट आनन्द और शिवोपाध्याय भी कश्मीर के ही निवासी
हैं । इनके संबन्ध में कुछ अधिक ज्ञात नहीं होता । भट्ट आनन्द ने अपनी टीका के २अन्त में
(पृ० ६३) ग्रन्थ की समाप्ति का काल कलि संवत् ४७७४ की चैत्र प्रतिपदा बताया है । सं०
२०३४ के आरंभ में कलियुग के ५०७८ वर्ष बीत चुके हैं । तदनुसार भट्ट आनन्द ने आज से
३०४ वर्ष पूर्व, अर्थात् वि० १७३० में अपनी टीका समाप्त की थी । इस तरह से ई० १७वीं
शताब्दी के अन्तिम भाग में उनकी स्थिति माननी चाहिये ।
शिवोपाध्याय की स्थिति अठारहवीं शताब्दी में३ मानी गई गई है । ये कौशिक गोत्र के
थे और सुन्दरकण्ठ४ के शिष्य थे । कश्मीर५ के राजा सुखजीवन के राज्यकाल में इन्होंने इस
व्याख्या को पूरा किया था । इसके अतिरिक्त इनके अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं । जैसे कि—
परमार्थसारसंग्रहटीका, बहुरूपगर्भटीका, उपनयनतन्त्र, विद्यामन्त्रप्रकरण, पञ्चायतनपद्धति,
कूष्माण्डभाष्य, उच्चिवाहविवृतितन्त्र । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रवेश सूचियों में हमें ये
नाम उपलब्ध हुए हैं । इनकी परीक्षा अपेक्षित है ।

विज्ञानभैरव क्या है ?

यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यह विज्ञानभैरव क्या है ? इस ग्रन्थ का यह नाम
क्यों रखा गया ? क्षेमराज के विज्ञानोद्योत के मंगल श्लोक में इनका उत्तर मिलता है । वहाँ
विज्ञानभैरव का स्वरूप इस तरह से बताया गया है—
१. इस प्रसंग में लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग उपोद्घात (पृ० ७, टि० २) देखिये ।
२. वेदसप्तर्षिवेदान्त्ययुगाब्दमधुपक्षतौ ।
विज्ञानकौमुदीमेतां भट्टानन्दो व्यफासयत् ॥
३. द्रष्टव्य—श्रीजगदीशचन्द्र चटर्जी कृत काश्मीर शैविज्म, पृ० ३८, सन् १९६२ संस्करण ।
४. द्रष्टव्य—शिवोपाध्याय कृत विवृति, पृ० १४३-१४४ ।
५. सुखजीवनाभिधाने रक्षति काश्मीरमण्डले नृपतौ ।
अगमन्निःशेषत्वं विज्ञानोद्योतसंग्रहः सुगमः ॥ (पृ० १४४)

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( ६ )
भीरूणामभयप्रदो भवभयाक्रन्दस्य हेतुस्ततो
हृद्धाम्नि प्रथितश्च भीरवरुचामीशोऽन्तकस्यान्तकः ।
भीरं वायति यः स्वयोगिनिवहस्तस्य प्रभुर्भैरवो
विश्वस्मिन् भरणादिकृद् विजयते विज्ञानरूपः परः ॥
अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक (१।९५-१००) में बृहस्पतिपाद कृत शिवतनुशास्त्र के
श्लोकों को उद्धृत कर बताया है कि इनमें अन्वर्थ नामों से भगवान् भैरव की स्तुति की गई
है । 'भया सर्वं रवयति' (श्लो० १२७) इस श्लोक और उसकी व्याख्या में भी 'भैरव' पद का
विश्लेषण किया गया है । इन सब का अभिप्राय यह है कि भैरव इस विश्व का भरण, रवण
और वमन करने वाला है । वह इस संसार का भरण-पोषण करता है, सृष्टि और संहार
करता है । ऐसा करके वह स्वयं भी पुष्ट होता है, १प्रसन्न होता है । यह संसारी जीवों को
अभय-दान करने वाला है । संसारी जीवों के आक्रन्द (छटपटाहट) का कारण भी यही है और
त्राहि-त्राहि पुकारने वाले भक्त जनों के हृदय में प्रकट होकर उनका उद्धार भी यही
करता है, अर्थात् निग्रह और अनुग्रह ये दोनों भगवान् भैरव के ही व्यापार हैं । इसीलिये यह
पंचकृत्यकारी कहलाता है । यह काल का भी काल है । इसीलिये इसको कालभैरव कहते हैं ।
यह कालवंचक योगियों के चित्त में समाधि दशा में स्फुरित होता है और अज्ञानी जीवों के
हृदय में भी बाह्य और आन्तर इन्द्रियों (करणों) की अधिष्ठात्री देवियों (खेचरी, गोचरी,
दिक्‍चरी और भूचरी) के रूप में, जो कि संविद्देवीचक्र के नाम से प्रसिद्ध हैं, प्रकट होता है ।
भगवान् का यह स्वरूप महाभयानक है और परम सौम्य भी ।
यह भैरव विज्ञानस्वरूप है, बोधात्मक है, चिदात्मक है । सभी स्थानों में, बाह्य और
आन्तर सभी पदार्थों में भावस्वभाव (सत्स्वभाव) विज्ञानात्मा का भान (ज्ञान) विवेकहीन
सामान्य जन को भी होता है । 'मैं जानता हूँ, मैं करता हूँ' इस तरह के अहंविमर्श की प्रतीति
सभी को होती है । ये सारे विमर्श भैरवविमर्श से भिन्न नहीं हैं, इसलिये ये सारे विमर्श एक
ही हैं । विज्ञानात्मा भैरव से भिन्न और कुछ भी नहीं है । घट-पट आदि के ज्ञान का कोई
आधार नहीं है, क्योंकि विज्ञानभैरव से भिन्न घट-पट, चक्षु, आलोक (प्रकाश), इन्द्रिय प्रभृति
की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । ये सब कुछ भ्रमात्मक हैं, माया के कारण उत्पन्न हैं, अत
एव विकल्प-स्वरूप हैं, क्योंकि विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी पदार्थ की वास्तविक सत्ता
नहीं है ।
१. जगच्चित्रं समालिख्य स्वेच्छातूलिकयात्मनि ।
स्वयमेव समालोक्य प्रीणाति भगवान् शिवः ॥
योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ६४) में उद्धृत इस वचन में बताया गया है कि भगवान् शिव
की अपनी इच्छा (स्वातन्त्र्य शक्ति) ही तूलिका है । इस तूलिका से वह इस संसार को
ही अपने में चित्रित करते हैं । चित्रित करने के बाद वह स्वयं ही इसको देख कर प्रसन्न
होते हैं ।

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( ७ )
इस तरह से अन्ततः सब कुछ चिन्मात्र, विज्ञानात्मक ही सिद्ध होता है । इस चिदा-
त्मक विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी की भी वास्तविक सत्ता नहीं है । यह चिदात्मक विज्ञान
चींटी से लेकर सदाशिव पर्यन्त सभी जीवों में समान रूप से विद्यमान है । इसलिए सभी पदार्थ
सर्वात्मक माने जाते हैं । व्याख्या में स्थान-स्थान पर इस सर्वात्मकता का प्रतिपादन किया
गया है ।
नील, सुख प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर भावों में चक्षु, मन प्रभृति बाह्य अथवा आन्तर
इन्द्रियों के माध्यम से सर्वत्र वह विज्ञानभैरव ही, परभैरव स्वरूप परमेश्वर का चित्प्रकाश
ही अभिव्यक्त होता है । यदि इसको विज्ञान (चैतन्य) से अतिरिक्त माना जाय तो इसकी
चेत्यता, अर्थात् ज्ञानविषयता भी नहीं बन सकेगी, ये ज्ञान के विषय भी न हो सकेंगे ।
दर्पण में प्रतिबिम्बित हो रहे नाना प्रकार के आभास जैसे दर्पणमात्र स्वभाव हैं, दर्पण के अति-
रिक्त इनकी कोई सत्ता नहीं है, दर्पण के कारण ही इनकी प्रतीति होती है, उसी तरह से
प्रकाशात्मक शिव में स्थित चैतन्यमात्र स्वभाव ही यह सारा जगत् है, प्रकाशात्मक चैतन्य से
अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है, चैतन्य (विज्ञान) के कारण ही यह भासित हो रहा है ।
जैसे घनीभूत प्रकाश ही सूर्यमंडल है, उसी तरह से घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत् के रूप में
भासित होने लगती है । इसका अभिप्राय यह है कि जैसे घनीभूत (जमा हुआ) घृत अथवा
हिम (बर्फ) ही पिघल कर तरल बन जाता है, उसी तरह से घनीभूत चिच्छक्ति ही जगत्
का रूप धारण कर लेती है । तरल पदार्थ जैसे घन द्रव्य से भिन्न नहीं है, उसी तरह से यह
जगत् भी उस चिच्छक्ति (विज्ञानभैरव) से अतिरिक्त नहीं है । बौद्ध दर्शन के विज्ञान से यह
विज्ञान इस रूप में भिन्न है कि यह क्षणिक नहीं है और न ज्ञेय-शून्य ही है, क्योंकि घट-पट
प्रभृति सभी ज्ञेय पदार्थों में भाव-स्वभाव विज्ञानभैरव का स्वरूप अनुवृत्त रहता है ।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि 'विज्ञानभैरव' पद प्रकाश-विमर्शात्मक शिव और
शक्ति के सामरस्य का बोधक है । इस परमार्थ स्थिति तक पहुँचाने के लिये प्रस्तुत ग्रन्थ में
११२ धारणाओं का उपदेश किया गया है, अतः ग्रन्थ का नाम भी विज्ञानभैरव रख दिया
जाय, यह सर्वथा उचित ही है ।
परम तत्त्व विषयक प्रश्न
विज्ञानभैरव ही वस्तुतः परम तत्त्व है, इस बात को स्वीकार करके ही प्रस्तुत ग्रन्थ
का आरंभ होता है। देवी का संशय भैरव के स्वरूप को लेकर उठता है कि उसका वास्तविक
स्वरूप क्या है ? देवी भगवान् शिव के सामने १आठ विकल्प उपस्थित करती है और पूछती है
१. 'चक्रारूढमनच्कं वा' यहाँ दो अलग-अलग विकल्प मानने पर प्रश्नों की संख्या ९ हो
जाती है । किन्तु शिव ने आठ ही विकल्पों का निषेध किया है, अतः प्रश्न भी आठ ही
माने जाने चाहिये । आधार कुण्डलिनी और प्राण कुण्डलिनी दोनों ही चक्रारूढ तत्त्व हैं,
अतः इनको एक ही मानना उचित है । अनच्क पद से प्राण कुण्डलिनी के पृथक् उल्लेख
की गतार्थता ब्राह्मणवशिष्ठ न्याय से की जा सकती है । ब्राह्मणों को निमन्त्रित किया

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( ८ )
कि इनमें से विज्ञानभैरव का वास्तविक स्वरूप क्या है ? भगवान् शिव इन सभी स्वरूपों को
नकार जाते हैं । इन प्रश्नों के सामान्य स्वरूप का विश्लेषण व्याख्या में कर दिया गया है ।
अतः यहाँ उन प्रश्नों से संबद्ध कुछ विशिष्ट विषयों पर ही विचार किया जायगा । ऐसा
प्रतीत होता है कि इन प्रश्नों के माध्यम से तत्कालीन विभिन्न आगम शास्त्रों में प्रचलित
परम तत्त्व के विभिन्न स्वरूपों पर प्रकाश डाला गया है ।
१. शब्दराशिमय
१कुलदर्शन में, जिसकी व्याख्या शाम्भव उपाय के नाम से तन्त्रालोक के तृतीय
आह्निक में विस्तार से की गई है, अनुत्तर तत्त्व से ही सारी सृष्टि का उन्मेष माना गया है ।
अनुत्तर (अकार) तत्त्व से ही स्वर-व्यंजनात्मक मातृका की और उससे सारे जगत् की सृष्टि
होती है । अकार को अकुल कहा जाता है और विसर्ग है कौलिकी शक्ति । इस कौलिकी
शक्ति से और इसकी अष्ट मातृका रूप कलाओं से यह सारा जगत् व्याप्त है । यह
अकुल तत्त्व शब्दब्रह्म स्वरूप है । परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के क्रम से
शब्द और अर्थ के रूप में यही भासित होता है । इस प्रकार पहले प्रश्न के २शब्दराशिमय
शब्द से कुल दर्शन और व्याकरण दर्शन की पार्श्व भूमि में विकसित सभी संप्रदायों का ग्रहण
किया जा सकता है ।
गया तो उसमें वशिष्ठ को भी निमन्त्रण मिल ही गया । अलग से वशिष्ठ के नाम लेने
का अभिप्राय उनकी महत्ता में है । इसी तरह से यहाँ अनच्क पद का पृथक् उल्लेख प्राण
कुण्डलिनी के महत्त्व का सूचक है ।
१. शिवोपाध्याय ने ८९ वें श्लोक की व्याख्या (पृ० ८०-८१) में कुलदर्शन का संक्षिप्त परिचय
दिया है । तदनुसार अनुत्तर अकार अकुल तत्त्व और विसर्ग कौलिकी शक्ति है। इसी को
शिवबिन्दु भी कहते हैं । इस शिवबिन्दु रूप विसर्ग से ही सारे जगत् की सृष्टि
होती है । इस विषय को तन्त्रालोक में ही देखना चाहिये । प्रस्तुत ग्रन्थ में ६५ और
६६ संख्या की धारणाएँ कुलदर्शन पर, विशेष कर अनुत्तर अकार पर आधृत हैं। अकार को
चतुष्कल भट्टारक कहा जाता है । रौद्री, वामा, ज्येष्ठा, अम्बा ये अकार की चार कलाएँ
हैं । महानयप्रकाश (पृ० २९-३०) में संकेतपद्धति के आधार पर इनका वर्णन मिलता
है । संकेतपद्धति के ये श्लोक अर्थरत्नावली (पृ० ३५), योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १७०)
प्रभृति अनेक ग्रन्थों में उद्धृत हैं। यहाँ (पृ० ९८) भी इसका एक श्लोक देखा जा
सकता है ।
२. स्वच्छन्दतन्त्र (भा० १, पृ० ६) की व्याख्या में क्षेमराज ने अह् प्रत्याहार स्वरूप मातृका
चक्र को भगवान् शब्दराशि के नाम से सम्बोधित किया है, क्योंकि इसी के गर्भ में सारे
संसार के समस्त शास्त्र विद्यमान हैं । सभी शास्त्र इन्हीं की सहायता से प्रगट होते हैं
(अकारहकारप्रत्याहारात्मा गर्भीकृताशेषविश्वसमग्रशास्त्रप्रसरप्रथमाङ्कुररूपो भगवान्
शब्दराशिः) ।

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( ९ )
२. नवात्मा
नेत्रतन्त्र में नवात्म मन्त्रराज (मृत्युंजय भट्टारक) को ही परम तत्त्व माना गया है।
योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २५७) में भी स्वच्छन्दसंग्रह नामक ग्रन्थ के प्रमाण पर नवात्म मन्त्र
का उद्धार किया गया है। तन्त्रालोककार (१।१११) ने और उसके टीकाकार जयरथ ने
ब्राह्मी प्रभृति आठ मातृकाओं के मध्यवर्ती भैरव स्वरूप को नवात्मा बताया है। अन्यत्र
१वामा प्रभृति शक्तियों के स्वरूप श्रीचक्र को नवात्मा कहा गया है। महानयप्रकाश के
टीकाकार शितिकण्ठ ने श्रुति२ के वचन को उद्धृत कर नवात्मस्वरूप महार्थ (परम तत्त्व) की
व्याख्या की है। दूसरे प्रश्न में इन्हीं में से किसी नवात्मस्वरूप की चर्चा माननी चाहिये।
३. त्रिशिरोभैरव
त्रिशिरोभैरव तो निश्चित ही इसी नाम के तन्त्र के द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व है।
इस ग्रन्थ का उल्लेख तन्त्रालोक और उसकी टीका में अनेक स्थलों पर हुआ है।
४. शक्तित्रयात्मक
नर-शक्ति-शिवात्मक तत्त्वत्रय का नेत्रतन्त्र के २१वें अधिकार में वर्णन मिलता है
और परा-परापरा-अपरात्मक शक्तित्रय का प्रत्यभिज्ञा दर्शन के ग्रन्थों में। परा प्रभृति शक्तियों
का वर्णन तन्त्रालोक में भी मिलता है और स्वयं विज्ञानभैरव में भी। इसकी व्याख्या
पृ० १२-१३ पर देखी जा सकती है। इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक अथवा मातृ-मान-मेयात्मक
शक्तित्रय का प्रतिपादन त्रिपुरा सम्प्रदाय के ग्रन्थों में मिलता है। देवी के इस चौथे प्रश्न
का सम्बन्ध इन्हीं में से किसी सम्प्रदाय से हो सकता है।
५. नादबिन्दुमय
पाँचवाँ प्रश्न नाद और बिन्दु के सम्बन्ध में किया गया है। प्रपंचसार, शारदातिलक,
रत्नत्रय प्रभृति ग्रन्थों में नाद और बिन्दु को शिव और शक्ति से उसी तरह से अभिन्न माना
गया है, जैसे कि प्रकाश और विमर्शात्मक शिव तथा शक्ति से शब्द और अर्थ को अभिन्न
माना जाता है। शास्त्रों की नादरूपता के सम्बन्ध में पृ० ७ पर एक टिप्पणी दी गई है।
प्रणव की १२ मात्राओं में भी बिन्दु और नाद की स्थिति है। नादभट्टारक३ और प्राणशक्ति के
नदन व्यापार की भी ग्रन्थ में यथास्थान चर्चा हुई है। आगम और तन्त्र की विभिन्न शाखाओं
१. द्रष्टव्य—नित्याषोडशिकार्णव, उपोद्घात, पृ० ९१-९२।
२. स एव नवात्मेति व्यवहृतः । तथा च श्रुतौ—"सावित्रनाचिकेतचातुहौंत्रिकमन्त्रोपधान-
क्रमेण अधश्चिति-मध्यमचिति-उत्तमचितिभिश्च तस्य चयनस्य शिरसा अंसद्वयेन पक्षद्वयेन
श्रोणिद्वयेन पुच्छेन च—इत्यष्टानां मध्यगो नवम आत्मा उपधातव्यः" (पृ० १८) । इस
श्रुति का स्थल अन्वेषणीय है।
३. नादभट्टारक, मन्त्रभट्टारक, विज्ञानभैरवभट्टारक, मृत्युञ्जयभट्टारक प्रभृति में प्रयुक्त
भट्टारक शब्द अतिशय आदर का सूचक है।

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( १० )
में नाद और बिन्दु की अपनी-अपनी व्याख्याएँ हैं । नादकारिका१ में नाद को मालिनी,
महामाया, समना, अनाहत बिन्दु, अघोषा वाक्, ब्रह्मकुण्डलिनी बताया है । त्रिपुरा दर्शन२ में
भगवती त्रिपुरसुन्दरी के निष्कल स्वरूप की स्थिति महाबिन्दु में मानी गई है । नाद और
बिन्दु शब्द के प्रसंग में नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात (पृ० ६३ और ९३) में हमने कुछ
लिखा है । इस विषय पर भविष्य में विस्तृत विवेचन करने का हमारा विचार है३ । प्रस्तुत
प्रश्न में पूछा गया है कि क्या यह परम तत्त्व नाद-बिन्दुमयं है ?
६. प्रणवकलामय
छठा प्रश्न अर्धचन्द्र, निरोधिका (निरोधिनी) प्रभृति से सम्बद्ध है । प्रणव की १२
कलाओं के प्रसंग में इनका ग्रन्थ में जहाँ-तहाँ उल्लेख हुआ है । प्रणव की १२ कलाओं का
विवेचन स्वच्छन्दतन्त्र (४।२५४-२८६) में एकादशपदिका के प्रकरण में और नेत्रतन्त्र के
२१वें अधिकार (पृ० २८५-२९६) में भी मिलता है । इनमें से बिन्दु से लेकर उन्मना पर्यन्त
९ कलाओं का प्रणव के समान कामकला प्रभृति बीजाक्षरों, नवात्म प्रभृति पिण्ड४ मन्त्रों तथा
ह्रींकार (शाक्त प्रणव), हूँकार (शैव प्रणव) प्रभृति बीज मन्त्रों के उच्चारण में भी होता
है । योगिनीहृदय के 'दीपाकारोऽर्धमात्रश्च' से लेकर 'तथोन्मनी । निराकारा'५ (१।२८-३५)
पर्यन्त श्लोकों में इनका आकार, स्वरूप, उच्चारण काल और स्थान वर्णित है । योगिनीहृदय
के आधार पर यह विषय वरिवस्यारहस्य में भी प्रतिपादित है । इस ग्रन्थ के अड्यार संस्करण
के अन्त में दिये गये एक चित्र में इनके आकार को दिखाया गया है ।
योगिनीहृदय के अनुसार बिन्दु का स्वरूप दीपक के समान प्रभास्वर है । ललाट में
गोल बिंदी के रूप में इसकी भावना की जाती है और इसका उच्चारण काल ६अर्धमात्रा है ।
१. “सिद्धो नादः परसुमङ्गला मालिनी महामाया । समनाऽनाहतबिन्दुरघोषा वाग् ब्रह्म-
कुण्डलिनीतत्त्वम् ।। विद्याख्यं चेत्युक्तस्तैस्तैः शब्दैस्तदागमेष्वित्थम् ।” शतरत्नसंग्रह
(पृ० ४०) में नादकारिका के नाम से उद्धृत ये पंक्तियाँ अष्टप्रकरण में मुद्रित नादकारिका
में उपलब्ध नहीं होतीं । इसके लिये लु० सं० उपोद्घात (पृ० १३९, टि० १) देखिये ।
२. द्रष्टव्य—योगिनीहृदयदीपिका (१।२७-२८) ।
३. लु० सं० उपोद्घात (पृ० १३९-१४३) मूल एवं टिप्पणियों में नाद और बिन्दु विषयक
सामग्री देखिये ।
४. पिण्ड मन्त्र, बीज मन्त्र आदि के परिचय के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात
(पृ० ६९, टि० २) द्रष्टव्य ।
५. योगिनीहृदय में प्रथम पटल के ३४वें श्लोक के बाद 'निराकारा महाबिन्दौ तदूर्ध्वं शून्य
एव च' इस श्लोकार्ध की स्थिति मानी जानी चाहिये । दीपिका में इसकी व्याख्या
मिलती है ।
६. 'अर्धमात्रास्थिता' (१।७४) प्रभृति दुर्गा सप्तशती के श्लोक की व्याख्या (गुप्तवती) में
भास्करराय ने—"अनुच्चार्या अर्धचन्द्रनिरोधिन्यादिध्वन्यष्टकरूपा" ऐसा कह कर अर्ध-
मात्रा में ही इन सबकी स्थिति मानी है ।

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( ११ )
ह्रस्व स्वर का उच्चारण काल 'मात्रा' कहलाता है। इसका आधा काल बिन्दु के उच्चारण
में लगता है। अर्धचन्द्र का आकार बिन्दु के आधे भाग के जैसा होता है। दीपक के समान
प्रभास्वर स्वरूप के अर्धचन्द्र की भावना बिन्दुस्थान ललाट में ही कुछ ऊपर की ओर की
जाती है। इसका उच्चारण काल मात्रा का चतुर्थ भाग है। निरोधिका (निरोधिनी) का
आकार तिकोना है। यह चाँदनी के समान चमकता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का
आठवाँ भाग है। उज्ज्वल मणि के समान कान्ति वाले नाद का आकार दो बिन्दु और उसके
बीच में खिंची सीधी रेखा के समान है। इसका उच्चारण काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है।
विद्युत् के समान कान्ति वाले नादान्त का आकार हल सरीखा है और इसकी बायीं तरफ एक
बिन्दु रहता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का बत्तीसवाँ भाग है। दो बिन्दुओं में से बायें
बिन्दु से एक सीधी स्थिर रेखा खींचने पर शक्ति की आकृति बनती है। व्यापिका (व्यापिनी)
का आकार बिन्दु के ऊपर बने त्रिकोण का सा है। एक सीधी रेखा के ऊपर और नीचे बिन्दु
बैठा देने से समना का और एक बिन्दु के ऊपर सीधी रेखा खींचने से उन्मना का आकार
बनता है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त कलाओं का स्वरूप द्वादश आदित्यों के एक साथ
उदित होने पर उत्पन्न हुए प्रकाश के समान है । शक्ति का उच्चारण काल मात्रा का ६४वाँ
भाग, व्यापिका का १२८वाँ भाग, समना का २५६वाँ भाग और उन्मना १ का ५१२वाँ भाग
होता है। अन्य आचार्यों के मत से उन्मनी कला मन से अतीत २ होती है। अतः इसका कोई
आकार नहीं होता। विज्ञानभैरव के ४२वें श्लोक में 'शून्या' शब्द से उन्मनी का ही ग्रहण
किया गया है।
७. चक्रारूढ या अनच्क
सातवाँ प्रश्न है कि वह परम तत्त्व चक्रारूढ है या अनच्क ? सार्धत्रिवलय भुजगाकार
कुलात्मिका कुण्डलिनी मूलाधार में सोई रहती है। जाग्रत् होने पर यह सुषुम्णा मार्ग से षट्-
चक्रों का भेदन कर सहस्रार स्थित अकुल चक्र में विराजमान शिव के साथ सामरस्य लाभ
१. द्रष्टव्य—पं० श्रीगोपीनाथ कविराज कृत 'तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि' (पृ० ३०८)।
योगिनीहृदय के टीकाकारों में यहाँ मतभेद है। भास्करराय ने समना और उन्मना का
भी उच्चारण काल मात्रा का २५६वाँ भाग ही माना है। अमृतानन्द ने उन्मना को
निराकारा, अर्थात् निरुच्चारा माना है। यह उचित नहीं प्रतीत होता, क्योंकि प्रस्तुत
स्थल में सकल, सकल-निष्कल और निष्कल स्वरूपों का वर्णन है। उन्मना पर्यन्त सकल-
निष्कल स्वरूप है और यहाँ उन्मना का आकार भी वर्णित है। जब आकार वर्णित है,
तो उसका उच्चारण काल भी होना ही चाहिये और प्रकरण के अनुसार उन्मना का
उच्चारण काल समना से अधिक सूक्ष्म होना चाहिये। उन्मना में मन की स्थिति नहीं
रहती, ऐसा मानना भी उचित नहीं है। वस्तुतः उन्मना में मन का लय हो जाता है,
इसीलिए उसको उन्मना कहते हैं। हमारे मत से 'मनोन्मन्यास्तथोन्मनी' इस पद का
सम्बन्ध निराकार (निष्कल) महाबिन्दु से होना चाहिये।
२. द्रष्टव्य—तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि, पृ० ३०८।

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( १२ )
करती है। तन्त्र और योगशास्त्र के सभी पाठक षट्चक्रों और उनमें विद्यमान वर्णों की स्थिति
से परिचित हैं। पूर्णानन्द के षट्चक्रनिरूपण में और सौन्दर्यलहरी की लक्ष्मीधरा टीका में
इनका विशद विवेचन मिलता है। नाडीचक्र प्रभृति षट्चक्रों का निरूपण नेत्रतन्त्र (७।२८-२९)
में भी है। किन्तु विज्ञानभैरव में इनकी कोई चर्चा नहीं है। इनके स्थान पर यहाँ बारह
चक्रों या क्रमों की चर्चा आई है। इस विषय पर आगे विचार किया जायगा।
इन चक्रों की मूलाधार या हृदय से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त भावना की जाती है।
मूलाधार में जैसे कुण्डलिनी का निवास है, उसी तरह से हृदय में भी सार्धत्रिवलया प्राण-
कुण्डलिनी रहती है। मध्यनाडी सुषुम्णा के भीतर चिदाकाश (बोधगगन) रूप शून्य का निवास
है। उससे प्राणशक्ति निकलती है। इसी को अनच्क कला भी कहते हैं। इसमें अनच्क (अच्
= स्वर से रहित) हकार का निरन्तर नदन होता रहता है। यह नादभैरव की उन्मेष दशा है,
जिससे कि प्राणकुण्डलिनी की गति ऊर्ध्वोन्मुख होती है, जो श्वास-प्रश्वास, प्राण-अपान की
गति की भी कारण स्वरूप है और जहाँ इनकी एकता का अनुसन्धान किया जा सकता
है। मध्यनाडी स्थित बिना क्रम के स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने वाली यह प्राणशक्ति ही
अनच्क कला कहलाती है। अजपा जप में इसी का स्फुरण होता है। प्राण और अपान व्यापार
से भिन्न, श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से अलग, स्वाभाविक रूप से निरन्तर चल रहे प्राण (हृदय)
के स्पन्दन व्यापार (धड़कन) को ही यहाँ अनच्क कला कहा गया है। स्पन्दकारिका में प्रति-
पादित स्पन्द तत्त्व यही है। वामननाथ ने भी इसका वर्णन किया है। (पृ० १०१)। नेत्रतन्त्र
(सप्तम अधिकार) में सूक्ष्म उपाय के प्रसंग में प्राण-चार के नाम से इसकी व्याख्या की गई
है। इस तरह से सातवें प्रश्न का अभिप्राय यह है कि क्या परम तत्त्व का स्वरूप मूलाधार या
हृदय में स्थित कुण्डलिनी शक्ति से अभिन्न है ?
८. शक्तिस्वरूप
आठवाँ और अन्तिम प्रश्न है कि क्या यह तत्त्व शक्तिस्वरूप है ? शिवदृष्टि की टीका
(पृ० ९४) में उत्पल ने शक्तिपारम्यवादी स्वयूथ्य (अपने गोल के) संप्रदाय का उल्लेख किया
है। उनके मत से संवित्स्वरूपा शक्ति ही परम तत्त्व है। इस संप्रदाय में यह परम शक्ति ही
शिव को शास्त्रों का उपदेश करती है। १ क्रमदर्शन में शक्ति को ही परम तत्त्व माना गया है।
क्रमदर्शन के आगम ग्रन्थ शक्ति के द्वारा शिव को उपदिष्ट हैं। प्रस्तुत अन्तिम प्रश्न में इसी
शक्ति के संबन्ध में पूछा गया है कि क्या यही परम तत्त्व है।
ऊपर शक्ति के परा, परापरा और अपरा ये तीन भेद बताये गये हैं। इनके संबन्ध
१. शाक्त उपाय के प्रतिपादक शास्त्र को क्रम दर्शन कहा गया है। अनेक स्थानों पर इसकी
चर्चा हो चुकी है। ७६ वें श्लोक की व्याख्या में इस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है।
५३-५८ धारणाएँ क्रम दर्शन का अनुवर्तन करती हैं।

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( १३ )
में भी देवी पुनः प्रश्न करती है कि परापर और अपरा का १सकल स्वरूप बन सकता है, किन्तु
परा देवी को भी यदि सकल (साकार) माना जायगा तो उसका परत्व ही नष्ट हो जायगा ।
अतः परा का स्वरूप निष्कल (निराकार) ही मानना पड़ेगा और जब यह निष्कल है, तब
पूजा, ध्यान आदि की स्थिति कैसे बन सकेगी ? क्योंकि पूजा आदि तो सकल स्वरूप की ही
की जा सकती है ?
परम तत्त्व का स्वरूप
इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् शिव कहते हैं कि इन्द्रजाल या माया से निर्मित अथवा
स्वप्न में देखी गई वस्तु की जैसे कोई वास्तविक सत्ता नहीं है, उसी तरह से भगवान् के सकल
स्वरूप की भी कोई सत्ता नहीं है । मिथ्या आडम्बर में रुचि रखने वाले अज्ञानी जीवों के
लिये ही शास्त्रों में सकल स्वरूप वर्णित है । भगवान् शिव ऊपर वर्णित सभी स्वरूपों को
नकार देते हैं और कहते हैं कि अज्ञानी जीवों को गलत रास्ते पर जाने से रोकने के लिये
शास्त्रों में सकल स्वरूप का वर्णन किया गया है । भगवान् के निष्कल स्वरूप का वर्णन नहीं
हो सकता । यह तो निर्विकल्प बोधस्वरूप है । केवल स्वानुभवगम्य है । यह सारा विश्व उसी
का विलास है । ऐसी स्थिति में उससे भिन्न किसी की परमार्थ सत्ता न होने से कौन किसकी
पूजा करेगा और कौन किस पर अनुग्रह करेगा ? भगवान् भैरव का यह परमार्थ स्वरूप ही
परा देवी का निष्कल-स्वरूप है । अग्नि और उसकी दाहक शक्ति जैसे अलग-अलग नहीं है,
उसी तरह से बोधभैरव और उसकी परा शक्ति भी अलग अलग नहीं है । जैसे दाहक शक्ति
की सहायता से अग्नि की पहचान हो जाती है, उसी तरह से परा शक्ति की सहायता से शिव
को भी पहचाना जा सकता है । शिव की यह परा शक्ति शिव तक पहुँचने का मुख (द्वार)
है । जैसे मुख को देखकर व्यक्ति पहचाना जाता है, उसी तरह से परा शक्ति की सहायता से
शिव का स्वरूप पहचान में आता है । जैसे दीपक या सूर्य के प्रकाश से हमको दिशाओं का
ज्ञान होता है, उसी तरह से २शक्ति से शिव का ज्ञान होता है ।
भगवान् भैरव के इतना कहने पर देवी उनके द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व की प्राप्ति
का उपाय पूछती है कि किन उपायों का सहारा लेकर परा देवी की सहायता से उस परम
१. यावदुच्चार्यते वाचा यावल्लेख्येऽपि तिष्ठति ।
तावत् स सकलो ज्ञेयो निष्कलो भेदवर्जितः ॥
स्वच्छन्दतन्त्र (७।२३८-२३९) के इस श्लोक में बताया गया है कि जब तक इसका
उच्चारण किया जा सकता है और जब तक इसको लिखा जा सकता है, या चित्रित
किया जा सकता है, तभी तक यह सकल रहता है । निष्कल स्वरूप भेदातीत है । इसका
अभिप्राय यह है कि सकल स्वरूप ही भेदातीत स्थिति में पहुँच कर निष्कल हो जाता है ।
२. शिव और शक्ति के स्वरूप के संबन्ध में ग्रन्थ की व्याख्या करते समय पर्याप्त लिखा
जा चुका है । अब यहाँ उसको दोहराने की आवश्यकता नहीं है ।

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( १४ )
तत्त्व तक पहुँचा जा सकता है ? इसके उत्तर में भगवान् शिव ११२ धारणाओं का उपदेश
करते हैं।
धारणाओं का वर्गीकरण
११२ धारणाओं को विज्ञानभैरव (श्लोक ११६) में 'निस्तरंग उपदेश' के नाम से
कहा गया है। इनके लिये धारणा शब्द का प्रयोग भट्ट आनन्द ने किया है। उन्होंने धारणा
शब्द का अर्थ कहीं नहीं दिया। दर्शन ग्रन्थों में इस शब्द के अनेक तरह के अर्थ किये गये हैं।
सर्वदर्शनसंग्रह में अन्य अर्थों के साथ एक अर्थ यह भी दिया है कि १नाभिचक्र, हृदय पुण्डरीक,
नासाग्र प्रभृति आध्यात्मिक स्थानों में, हिरण्यगर्भ, इन्द्र, प्रजापति प्रभृति इष्ट देवों के सकल
स्वरूप में अथवा बाह्य देश में अन्य सभी विषयों से हटाकर चित्त को स्थिर करना ही धारणा
कहलाती है। विज्ञानभैरव की धारणाओं में इस लक्षण की पूरी संगति बैठती है।
प्रत्यभिज्ञा दर्शन में स्वात्मस्वरूप की प्रत्यभिज्ञा (पहचान) के लिये चार उपाय वर्णित
हैं। ये हैं—आणव, शाक्त, शाम्भव उपाय और चौथा अनुपाय। टीकाकारों ने प्रायः सभी
धारणाओं का इन्हीं चार उपायों में समावेश किया है। वास्तव में देखा जाय तो इसमें प्रायः
सभी पूर्ववर्ती यौगिक पद्धतियों का सुन्दर संग्रह किया गया है। भगवद्गीता और त्रिपिटकों
में प्रतिपादित प्राणापान२ प्रक्रिया आदि का, ३शून्यवाद और ४विज्ञानवाद का, ५कुल और
६क्रम दर्शन में प्रकाशित योग विधियों का ही नहीं, ७शब्दयोग, ८नादयोग, ९हठयोग में प्रद-
शित विधियों का ही नहीं, अपितु १०बालकों की चक्करघानी, ११क्रान्तिकारियों की सी सहन-
१. “नाभिचक्र-हृदयपुण्डरीक-नासाग्रादावाध्यात्मिके हिरण्यगर्भ-वासव-प्रजापतिप्रभृतिके बाह्ये
वा देशे चित्तस्य विषयान्तरपरिहारेण स्थिरीकरणं धारणा” (आनन्दाश्रम संस्करण,
पृ० १४०)।
२. धारणा संख्या १-४, २८-२९, ४१ देखिये।
३. धारणा संख्या २०-२३, ३४, ६४, ६७, ७७, ९४, ९६ द्रष्टव्य।
४. धारणा संख्या ७४ देखिये।
५. धारणा संख्या ६५-६६ द्रष्टव्य।
६. धारणा संख्या ५३-५८ देखिये।
७. धारणा संख्या १७-१८ देखिये।
८. धारणा संख्या १५-१६, १९ द्रष्टव्य।
९. धारणा संख्या ३, ८, १३-१४, ५२, ८८ द्रष्टव्य।
१०. धारणा संख्या ८६ देखिये।
११. धारणा संख्या ६८ द्रष्टव्य।

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( १५ )
शक्ति की परीक्षा, १अद्भुत, २भयानक, ३आनन्द दायक स्थितियां, ४तिमिर भावना, ५चला-
सन प्रभृति में भी धारणा को स्थिर करने की बात यहाँ कहो गई है और बताया गया है कि
इनमें से किसी एक भी धारणा में मन को स्थिर करने पर व्यक्ति जीवन्मुक्त हो जाता है ।
जीवन्मुक्ति से अभिप्राय यहाँ विश्वाहन्ता के विकास से है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि
विज्ञानभैरव भारतीय मनीषा के द्वारा बटोरी गई सभी उत्कृष्ट मणियों का एक उज्ज्वल
संग्रह है । यहाँ हम सबसे पहले उपाय-चतुष्टय का परिचय प्रस्तुत करते हैं ।
त्रिविध उपाय और समावेश
उच्चारकरणध्यानवर्णस्थानप्रकल्पनैः ।
यो भवेत् स समावेशः सम्यगाणव उच्यते ॥
उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् ।
यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥
अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः ।
जायते यः समावेशः शाम्भवोऽसावुदाहृतः ॥
मालिनीविजय तन्त्र (२।२१-२३) के इन तीन श्लोकों में संक्षेप में आणव, शाक्त
और शाम्भव उपाय तथा उनकी सहायता से प्राप्त होने वाली त्रिविध समावेश (समाधि)
दशाओं का वर्णन किया गया है। अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक में तृतीय से लेकर द्वादश आह्निक
तक अत्यन्त विस्तार से और तन्त्रसार (पृ० १०-११४) में अपेक्षाकृत कम विस्तार से, महे-
श्वरानन्द ने महार्थमंजरी की चार कारिकाओं (५६-५९) तथा उनकी परिमल व्याख्या (पृ०
१३८-१५३) में संक्षेप में इस विषय को समझाया है। इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर ऊपर के
श्लोकों की व्याख्या करते हुए हम यहाँ इनका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय देते हैं ।
आणव उपाय
उच्चार, करण, ध्यान, वर्ण और स्थान-कल्पना का अभ्यास आणव उपाय है । इनमें
से किसी एक के अभ्यास से प्राप्त होने वाली एकाग्रता को आणव समावेश दशा कहते हैं ।
अणु अर्थात् परिमित प्रमाता परिमित स्वरूप वाले बुद्धि, प्राण, देह, देश, प्रभृति को
उपाय के रूप में स्वीकार करता है, इसलिये इसको आणव उपाय कहा जाता है। इनमें से
ध्यान बुद्धि का व्यापार है । प्राण स्थूल और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार का होता है । स्थूल
प्राण का व्यापार उच्चार है। यह प्राण आदि की वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है । सूक्ष्म
प्राण को वर्ण शब्द से कहा जाता है । शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में
१. धारणा संख्या ४२,८९,९२ देखिये ।
२. धारणा संख्या १०५ देखिये ।
३, धारणा संख्या ४०,४५-५० देखिये
४. धारणा संख्या ६०-६३ द्रष्टव्य ।
५. धारणा संख्या ५९ द्रष्टव्य ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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( १६ )
रखने का नाम करण है। घट-स्थापन, मण्डल-निर्माण, मंदिर, मूर्ति, चित्र आदि की रचना
जैसी विधियों का समावेश स्थान-कल्पना में होता है। अपि च, सगुण स्वरूप में चित्त की एका-
ग्रता को ध्यान कहते हैं। १प्राण, अपान आदि वायु की श्वास-प्रश्वास, क्षुत्२ (छींक) प्रभृति
वृत्तियाँ उच्चार३ कहलाती हैं। प्राण के उच्चार के साथ स्वाभाविक रूप से उच्चरित होने
वाले४ सकार और हकार वर्ण कहे जाते हैं। ये सभी वर्णों और मन्त्रों का बोध कराते हैं।
अथवा वर्ण शब्द ५काले-पीले आदि रंगों का भो बोधक है।
त्रिशिरोभैरव के आधार पर तन्त्रालोक (भा० ३, आ० ५, पृ० ४३८-४४३) में
करण के सात भेद बताये गये हैं। इनके नाम हैं—ग्राह्य,६ ग्राहक, संवित्ति, ७संनिवेश,
व्याप्ति,८ आक्षेप और त्याग। तन्त्रालोक के १६ वें आह्निक में ग्राह्य और ग्राहक का, ११ वें
आह्निक में संवित्ति का, १५ वें आह्निक में व्याप्ति का, २९ वें आह्निक में त्याग और आक्षेप
का और ३२ वें आह्निक में संनिवेश (मुद्रा) का विस्तार से वर्णन किया गया है। जिज्ञासु
जनों को इनका वहीं अवलोकन करना चाहिये।
९प्राणशक्ति, अर्थात् हृदय के स्पन्दनात्मक सामान्य व्यापार में, शरीर में विद्यमान
नाडियों तथा चक्रों में तथा बाहर लिंग, चत्वर, प्रतिमा प्रभृति में स्थान-कल्पना की विधि
संपन्न की जाती है। सामान्य स्पन्द तत्त्व के उन्मेष के बाद ही उनमें षडध्व का स्फुरण होता
१ प्राण और अपान की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया पर १-४, २८-२९, ४१ धारणाएँ वर्णित हैं।
२. धारणा संख्या ९२ का क्षुत् प्रभृति से संबन्ध है।
३. स्वच्छन्दतन्त्र की टीका (प० ७, पृ० ३०६) में क्षेमराज ने किसी मुद्रा (करण) या बन्ध
में बैठकर मन्त्र के जप करने को उच्चार बताया है (उच्चारः करणबन्धादिपूर्व मन्त्रो-
दीरणम्)।
४. इस स्थिति को अजपा जप कहा गया है। प्राणापान अथवा प्राणशक्ति से संबद्ध धार-
णाओं में इसकी अनुभूति होती है। पृ० २७, ४५, ७६, ९१-९२, १६६-१७३ में
इस विषय पर पर्याप्त विचार किया गया है।
५. धारणा संख्या ६३ में कृष्ण वर्ण की भावना वर्णित है। तिमिर भावना (६०-६२ धार-
णाएँ) का भी इसी में समावेश किया जा सकता है। बौद्ध योगशास्त्र में कसिण भावना
के अन्तर्गत नील, पीत प्रभृति कसिणों का उल्लेख मिलता है। द्रष्टव्य—बौद्ध-धर्म-दर्शन,
पृ० ७६।
६. धारणा संख्या ८१ द्रष्टव्य। इस धारणा का उल्लेख विज्ञानभैरव के ही श्लोक में सामान्य
सा परिवर्तन कर योगवासिष्ठ (नि० पृ० ४३१८) में भी किया गया है।
७. धारणा संख्या ३, ८, १३-१४, ५२-५८, ८८ द्रष्टव्य।
८. धारणा संख्या २४, ३०, ३९, ७९-८०, ८२-८५, ९०-९१, ९३, ९८, ११०-११२
द्रष्टव्य।
९. धारणा संख्या ५-८, १०, ३१, ४३-४४ द्रष्टव्य।

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( १७ )
है। कार्यकारण स्थल में क्रम से और कुहनप्रयोग (इन्द्रजाल से निर्मित पदार्थ) आदि में अक्रम
से सभी पदार्थों की कलना करने वाला परमेश्वर का काल नामक स्वरूप सबसे पहले भासित
होता है। भगवान् का स्वरूप भेदावस्था में काली शक्ति और भेदावस्था में प्राणशक्ति
के नाम से जाना जाता है। संवित्स्वरूपा काली शक्ति में अपनी इच्छा से क्रम और अक्रम
रूप से नाना रूपों में भासित होने के लिये क्रिया शक्ति का उन्मेष होता है। इस क्रिया
शक्ति का प्रथम उन्मेष प्राण व्यापार है। 'प्राक् संवित् प्राणे परिणता' कल्लट के इस वचन
में यही बात प्रतिपादित है। यह प्राणशक्ति अपने प्राण, अपान आदि पाँच रूपों में जीव को
आप्यायित किये रहती है। इसी के रहने पर यह चेतन कहलाता है। इस क्रिया शक्ति के पूर्व
भाग में कालाध्वा और उत्तर भाग में देशाध्वा की स्थिति है। कालाध्वा में पर, सूक्ष्म और स्थूल
रूप वर्ण, मन्त्र और पद की तथा देशाध्वा में कला, तत्त्व और भुवन की स्थिति है। शब्द और
अर्थ स्वरूप शिव और शक्ति में व्याप्यव्यापक भाव से पर, सूक्ष्म और स्थूल रूप से विद्यमान
वर्ण, पद, मन्त्र और कला, तत्त्व, भुवन नामक षडध्व का विवेचन हम ५५-५६ संख्या के श्लोकों
की व्याख्या में कर चुके हैं। इस तरह से प्रक्रिया भेद से यहाँ देशाध्वा और कालाध्वा के रूप में
षडध्व का प्रतिपादन किया गया है। यह सारा षडध्वात्मक जगत् इस क्रिया शक्ति का ही उन्मेष
है। सारे षडध्वात्मक जगत् में बाहर-भीतर सब जगह प्राणशक्ति का स्पन्द सतत प्रवृत्त है, तो
भी हृदय प्रभृति स्थानों में ही इसके स्फुरण की अनुभूति होती है। १प्राणशक्ति के स्फुरण में
ईश्वर की शक्ति, जीव की शक्ति और उसका प्रयत्न इन तीनों की उपयोगिता है। हृदय
प्रभृति स्थानों में स्पन्दमान इस प्राणशक्ति में चित्त को विलीन कर देना भी स्थान-कल्पना
नामक आणव उपाय का अंग है। इसी तरह से शरीर के भीतर विद्यमान नाडी, चक्र प्रभृति
स्थानों में और लिंग, चत्वर, प्रतिमा आदि में चित्त को नियोजित करना भी स्थान-कल्पना के
अन्तर्गत है। वस्तुतः बुद्धि, प्राण देह प्रभृति की कोई पारमार्थिक सत्ता नहीं है। ये सब विक-
ल्पात्मक हैं। तो भी इनके सहारे २परमार्थ स्वरूप तक पहुँचा जा सकता है। इन विकल्पात्मक
स्थूल उपायों को ही यहाँ आणव उपाय कहा गया है।
शाक्त उपाय
सत्तर्क, सदागम और सद्गुरु की सहायता से जब साधक उक्त उच्चार, करण प्रभृति
विकल्प व्यापारों का शोधन कर लेता है, अर्थात् इन सब में स्वात्मस्वरूप का ही दर्शन करने
लगता है, तो उसके चित्त में विश्वाहन्ता का विकास होता है। वह जान जाता है कि यह
सारा विश्व मेरा ही स्वरूप है, मेरा शुद्ध स्वात्मस्वरूप तो इससे भी परे है। इस तरह
१. धारणा संख्या ११२ द्रष्टव्य ।
२. अपारमार्थिकेऽप्यस्मिन् परमार्थः प्रकाशते । (तन्त्रा० ५।७)
बुद्धौ प्राणे तथा देहे देशे वा जडता स्थिता ।
तां तिरोधाय मेधावी संविद्रश्मिमयो भवेत् ॥
(तन्त्रा० ५।१० विवेक में उद्धृत)

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सर्वात्म्य भावना के सहारे साधक के चित्त में शुद्ध¹ विकल्पों की सृष्टि होने लगती है, अर्थात्
वह सभी जागतिक पदार्थों को अपने शुद्ध स्वरूप से पृथक् नहीं देखता, उन सब में अपने शुद्ध
स्वरूप की ही भावना करता है ।
शाम्भव उपाय
यह सारा जगत् शिवमय है, विज्ञानभैरव स्वरूप है । यह जगत् बोधगगन में उसी
प्रकार प्रकाशित हो रहा है, जैसे कि दर्पण में मुँह का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है । जिसकी
कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और जो किसी दूसरे पदार्थ में संक्रान्त होकर ही प्रकाशित होता
है, उसको प्रतिबिम्ब² कहते हैं । जैसे कि दर्पण आदि में दिखाई पड़ने वाली प्रतिकृति की कोई
स्वतन्त्र सत्ता नहीं है और दर्पण आदि में संक्रान्त होने पर वह दिखाई पड़ती है । बिम्ब की
स्वतन्त्र सत्ता होती है । यह बिना किसी की सहायता के प्रकाशित होता है । जैसे कि मुख
स्वयं भासित होता है । इसको प्रकाशित करने के लिये दर्पण जैसे पदार्थ की आवश्यकता नहीं
पड़ती । यह विश्व भी दर्पण में प्रतिबिम्बित नगरी के समान शिवमय दर्पण में भासित हो
रहा है ।
यहाँ एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि दर्पण में भासित हो रहा प्रतिबिम्ब (मुख की
प्रतिकृति) बिना बिम्ब (मुख) के प्रकाशित नहीं होता । इसी तरह से दर्पणस्थानीय शिव में
प्रकाशित हो रहे प्रतिबिम्बस्थानीय इस जगत् के बिम्ब की भी सत्ता होनी चाहिये । आप
यह बताइये कि यह बिम्बस्थानीय पदार्थ क्या है ? शास्त्रकारों ने इसका उत्तर यह दिया है
कि वस्तु के स्वभाव के संबन्ध में प्रश्न करना व्यर्थ है । आग गरम होती है । पानी ठंडा
होता है । यह इनका स्वभाव है । इस तरह से शिव का यह स्वभाव है कि वह अपने में ही
अपने विज्ञानमय स्वरूप को जगत् के रूप में भासित होने देता है । ईश्वर की स्वातन्त्र्य शक्ति
का ही यह सारा खेल है कि शिवमय दर्पण में बिना किसी बिम्ब की सत्ता के भी यह जगत्
रूपी प्रतिबिम्ब भासित होता है । इस दृष्टि से विचार करने पर शिव के निर्विकल्प स्वरूप
के अतिरिक्त इस जगत् की कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । इस निर्विकल्प शून्य³ स्थिति में
अपने चित्त को समाहित करने का प्रयास ही शाम्भव उपाय है ।
त्रिविध समावेश
इन तीनों उपायों के उदाहरण के रूप में २४ वें श्लोक की छः प्रकार की व्याख्या की
गई है । उनको और यथास्थान दी गई टिप्पणियों को देखने से इन उपायों के स्वरूप को
१. धारणा संख्या ३९, ७०-७६, ९७ द्रष्टव्य ।
२. तन्त्रसार में अभिनवगुप्त ने प्रतिबिम्ब का लक्षण यह किया है—‘‘यद भेदेन भासितु-
मशक्तमन्यव्यामिश्रत्वेनैव भाति तत् प्रतिबिम्बम्, मुखरूपमिव दर्पणे’’ (पृ० १०) । तन्त्रा-
लोक में बिम्ब का लक्षण इस प्रकार है—‘‘अन्यामिश्रं स्वतन्त्रं सद्भासमानं मुखं
यथा’’ (३।५३) ।
३. धारणा संख्या ३६, ८४-८५, ८७, १०१-१०८, ११०-११२ देखिये ।

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समझने में सहायता मिलेगी । इन उपायों का सहारा लेकर साधक आणव, शाक्त और
शाम्भव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है । भगवद्गीता (९।२३ तथा १२।३-५) में बताया
गया है कि अन्य देवताओं की उपासना करने से और अक्षर ब्रह्म की उपासना करने से भी
भगवत्पद की ही प्राप्ति होती है, किन्तु इनमें अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ।
इसी तरह से आणव प्रभृति विभिन्न उपायों का सहारा लेने पर भी साधक को एक ही परम
पद की प्राप्ति होती है । फल की प्राप्ति में कोई भेद नहीं रहता । उपायों के अनुष्ठान में ही
तरतमभाव रहता है । उपायों की भिन्नता में शक्तिपात के तीव्र, मध्य, मन्द आदि भेदों को
ही कारण माना जाता है । ऐसा कहा जा सकता है कि मन्द शक्तिपात होने पर आणव
उपाय का, मध्य शक्तिपात में शाक्त उपाय का और तीव्र शक्तिपात में शाम्भव उपाय का
सहारा लेने में साधक समर्थ हो जाता है । इन सबका प्रयोजन स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित
होना है । अनुपाय प्रक्रिया से भी वही स्वात्मस्वरूप प्रकाशित होता है और आणव उपाय से
भी । इस प्रकार आलम्बन का भेद होने पर भी समावेश दशा में कोई भेद नहीं रहता ।
आणव समावेश, शाक्त समावेश और शाम्भव समावेश दशा एक ही है । उपायों के भेद के
कारण समावेश दशा में भेद आरोपित कर लिया जाता है । इसी अभिप्राय को व्यक्त करते
हुए अभिनवगुप्त ने तन्त्रसार (पृ० ४३) में कहा है—
नैषां परफलविधौ कापि हि भिदा ।
अनुपाय प्रक्रिया
अनुपाय पद की निरुक्ति हम व्याख्या (पृ० ३) में कर चुके हैं । वहाँ यह भी बता
चुके हैं कि सिद्ध साहित्य में प्रचलित 'सहज' शब्द को हम अनुपम शब्द का पर्याय मान सकते
हैं । किन्तु इस कथन को सिद्ध करने के लिये प्रमाण अपेक्षित हैं ।
तन्त्रसार (पृ० ८-९) में अनुपाय प्रक्रिया का विवेचन इस तरह से किया गया है—तीव्र
शक्तिपाद के होने पर साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में
लीन हो जाता है । उपाय के रूप में वह षडंग १ योग में प्रतिपादित तर्क नामक अंग का
सहारा लेता है । वह सोचता है कि स्वयंप्रकाश स्वात्मस्वरूप ही तो परमेश्वर है । इसके
लिए किसी उपाय की क्या आवश्यकता है ? यह स्वात्मस्वरूप नित्य, स्वयं-प्रकाश, निरावरण
तत्त्व है । इसलिये किसी उपाय से इसके स्वरूप की प्राप्ति (लाभ) या प्रतीति (ज्ञप्ति) होगी,
अथवा किसी आवरण को हटाया जायगा, इन सब बातों का कोई प्रसंग नहीं है । इस स्वात्म-
स्वरूप में लीन (अनुप्रवेश) होने का भी कोई प्रसंग नहीं है, क्योंकि शुद्ध स्वात्मस्वरूप के
अतिरिक्त उसमें प्रविष्ट होने वाले की अलग से कोई सत्ता नहीं है । फिर उपाय भी तो उससे
अलग नहीं हैं । इसलिए यह सारा जगत् चिन्मात्र सार है। काल इसकी कलना नहीं कर सकता ।
देश इसको परिच्छिन्न नहीं कर सकता । उपाधि इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती । इसकी कोई
आकृति नहीं है । शब्दों की सहायता से इसको समझा नहीं जा सकता और न किसी प्रमाण की
१. षडंग योग और तर्क का परिचय आगे दिया जा रहा है ।

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ही यहाँ प्रवृत्ति हो सकती है। स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप ही काल से लेकर प्रमाण
पर्यन्त ऊपर बताये गये सभी तत्त्वों को स्वरूप प्रदान करने वाला है। मैं इस स्वात्मस्वरूप से
भिन्न नहीं हूँ और इस अहमात्मक स्वात्मस्वरूप में ही यह सारा विश्व प्रतिबिम्बित हो रहा
है। इस तरह की प्रत्यभिज्ञा के जाग्रत् होने पर साधक नित्योदित पारमेश्वर स्वरूप में समा-¹
विष्ट हो जाता है। इसके लिये मन्त्र, पूजा, ध्यान, चर्या आदि की कोई आवश्यकता नहीं
रहती !
इस प्रकरण का उपसंहार अभिनवगुप्त ने इस श्लोक के साथ किया है—
उपायजालं न शिवं प्रकाशयेद् घटेन किं भाति सहस्रदीधितिः ।
विवेचयन्नित्यमुदारदर्शनः स्वयंप्रकाशं शिवमाविशेत् क्षणात् ॥
इसकी व्याख्या हम पृ० १३५ पर कर चुके हैं।
श्लो० १२०-१२१ की व्याख्या में मालिनीविजय प्रभृति ग्रन्थों के प्रमाण पर इस अनु-
पाय प्रक्रिया का विशद विवेचन किया गया है। स्वच्छन्दतन्त्र, संकेतपद्धति, तन्त्रालोक,
महार्थमंजरी प्रभृति अनेक ग्रन्थों में इसका प्रतिपादन किया गया है। आगे हम यह सिद्ध
करने का प्रयास करेंगे कि उपक्रम, उपसंहार प्रभृति षड्विध लिंग की मीमांसक पद्धति से इस
शास्त्र का विनियोग अनुपाय प्रक्रिया के प्रतिपादन में ही है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह
अनुपाय प्रक्रिया सहज योग से भिन्न नहीं है।
अभिनवगुप्त प्रभृति ने इन उपायों का जिस तरह का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है,
उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि उन्होंने आणव उपाय में क्रम और कुल दर्शन से
भिन्न समस्त तान्त्रिक और यौगिक विधियों का समावेश किया है। शाक्त उपाय के रूप में
क्रमदर्शन की, शाम्भव उपाय के रूप में उन्होंने कुलदर्शन की व्याख्या की है और प्रत्यभिज्ञा
दर्शन को अनुपाय प्रक्रिया माना है।
हमने ऊपर बताया था कि यहाँ प्रदर्शित सभी धारणाओं का उक्त उपाय-चतुष्टय
में समावेश किया जा सकता है, किन्तु इस ग्रन्थ में अन्य अनेक योग-विधियों का भी समावेश
है। उपर्युक्त प्रतिपादन से हमारी यह बात पुष्ट हो जाती है। अब हम विज्ञानभैरव में
वर्णित धारणाओं के प्रमुख विषयों का यहाँ वर्णन करना चाहते हैं। सबसे पहले हम प्राणशक्ति
को लेते हैं।
प्राणशक्ति या प्राणकुण्डलिनी
अनच्क पद की और आणव उपाय की व्याख्या के प्रसंग में प्राणशक्ति के सम्बन्ध में
कहा जा चुका है। इसको कुण्डलिनी इसलिये कहते हैं कि मूलाधार स्थित कुण्डलिनी की तरह
इसकी भी आकृति कुटिल होती है। जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति
१. धारणा संख्या ४१, ९७-९९, १०९ देखिये ।

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हकार की लिखावट की तरह टेढ़ी-मेढ़ी होती है । अतः प्राणशक्ति अपनी इच्छा से ही प्राण के
अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेती है । प्राणशक्ति की यह वक्रता (कुटिलता=
घुमावदार आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इच्छा-शक्ति का ही खेल है। प्राणशक्ति का एक लपेटा
वाम नाडी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है । इस तरह से उसके दो
वलय (घेरे) बनते हैं । सुषुम्णा नाम की मध्य नाडी सार्ध कहलाती है । इस प्रकार यह प्राण-
शक्ति भी सार्धत्रिवलया है । वस्तुतः मूलाधार स्थित कुण्डलिनी में भी प्राणशक्ति का ही
निवास है, किन्तु हृदय में उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति होने से ब्राह्मणवशिष्ठ न्याय से उसका यहाँ
पृथक् उल्लेख कर दिया गया है । इसका प्रयोजन अजपा (हंस गायत्री) जप को सम्पन्न करना
है । इस विषय पर ग्रन्थ में विशेष कर १५१ वें श्लोक की व्याख्या में पर्याप्त लिखा जा
चुका है ।
भर-पेट भोजन-पानी पाने से मोटी अकल के आरामतलबी आदमी का शरीर ही
नहीं, प्राणशक्ति भी मोटी हो जाती है । बाद में सद्गुरु का उपदेश पाकर जब वह योगाभ्यास
में लग जाता है, कुम्भक प्रभृति प्राणायामों का अभ्यास करता है, तो धीरे-धीरे उसके शरीर
के मोटापे के साथ ही प्राणशक्ति भी कृश होती जाती है, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाती है ।
श्रोत्र, चक्षु, नासिका, मुख, गुह्य, उपस्थ प्रभृति प्राण और अपान आदि वायुओं के निकलने
के मार्गों को रोक देने पर वायु की गति ऊपर की ओर उठने लगती है । मूलाधार में अथवा
हृदय में विद्यमान प्राणशक्ति यौगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्णा मार्ग से अथवा मध्यदशा के
विकास के कारण द्वादशान्त तक जाते-जाते अत्यन्त सूक्ष्म होकर अन्त में प्रकाश में विलीन
हो जाती है । आधार से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही इस
प्राणशक्ति के द्वादशान्त में प्रविष्ट हो जाने पर स्वात्मस्वरूप का अनुभव होने लगता है ।
योगशास्त्र की परिभाषा में इसको १ पिपीलस्पर्श वेला कहा जाता है, जिसमें कि प्राण के ऊपर
उठते समय जन्माग्र से लेकर मूल, कन्द प्रभृति स्थानों का स्पर्श होने पर उसी तरह की
अनुभूति होती है, जैसी कि देह पर चींटी के चलने से होती है । इसी अवस्था में योगी इसकी
परीक्षा कर पाते हैं कि प्राण आज अमुक स्थान से चलकर अमुक स्थान तक उठा । इस स्थिति
तक पहुँच जाने पर योगी का चित्त परम आनन्द से भर जाता है और वह इसी अन्तर्मुख वृत्ति
में रम जाता है ।
सुषुम्णा (मध्यधाम)
मध्यनाडी सुषुम्णा २ की अभी चर्चा आई है । इसी को शून्यातिशून्य पदवी और
१. धारणा संख्या ४३ देखिये ।
२. तन्त्रालोक (५।१२१) में आणव उपाय के प्रसंग में लिंग पद की व्याख्या की गई है ।
इसकी व्याख्या करते हुए जयरथ ने एक श्लोक उद्धृत किया है, जिसके अनुसार उपस्थ
को सौषुम्न पद माना गया है—
आनन्दस्यन्दि यद् गीतं सर्वप्रसवकारणम् ।
उपस्थाख्येयमेतत्तु सौषुम्नं रूपमुच्यते ॥