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विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 256 में से

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पृष्ठ 22

( ११ )
ह्रस्व स्वर का उच्चारण काल 'मात्रा' कहलाता है। इसका आधा काल बिन्दु के उच्चारण
में लगता है। अर्धचन्द्र का आकार बिन्दु के आधे भाग के जैसा होता है। दीपक के समान
प्रभास्वर स्वरूप के अर्धचन्द्र की भावना बिन्दुस्थान ललाट में ही कुछ ऊपर की ओर की
जाती है। इसका उच्चारण काल मात्रा का चतुर्थ भाग है। निरोधिका (निरोधिनी) का
आकार तिकोना है। यह चाँदनी के समान चमकता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का
आठवाँ भाग है। उज्ज्वल मणि के समान कान्ति वाले नाद का आकार दो बिन्दु और उसके
बीच में खिंची सीधी रेखा के समान है। इसका उच्चारण काल मात्रा का सोलहवाँ भाग है।
विद्युत् के समान कान्ति वाले नादान्त का आकार हल सरीखा है और इसकी बायीं तरफ एक
बिन्दु रहता है। इसका उच्चारण काल मात्रा का बत्तीसवाँ भाग है। दो बिन्दुओं में से बायें
बिन्दु से एक सीधी स्थिर रेखा खींचने पर शक्ति की आकृति बनती है। व्यापिका (व्यापिनी)
का आकार बिन्दु के ऊपर बने त्रिकोण का सा है। एक सीधी रेखा के ऊपर और नीचे बिन्दु
बैठा देने से समना का और एक बिन्दु के ऊपर सीधी रेखा खींचने से उन्मना का आकार
बनता है। शक्ति से लेकर समना पर्यन्त कलाओं का स्वरूप द्वादश आदित्यों के एक साथ
उदित होने पर उत्पन्न हुए प्रकाश के समान है । शक्ति का उच्चारण काल मात्रा का ६४वाँ
भाग, व्यापिका का १२८वाँ भाग, समना का २५६वाँ भाग और उन्मना १ का ५१२वाँ भाग
होता है। अन्य आचार्यों के मत से उन्मनी कला मन से अतीत २ होती है। अतः इसका कोई
आकार नहीं होता। विज्ञानभैरव के ४२वें श्लोक में 'शून्या' शब्द से उन्मनी का ही ग्रहण
किया गया है।
७. चक्रारूढ या अनच्क
सातवाँ प्रश्न है कि वह परम तत्त्व चक्रारूढ है या अनच्क ? सार्धत्रिवलय भुजगाकार
कुलात्मिका कुण्डलिनी मूलाधार में सोई रहती है। जाग्रत् होने पर यह सुषुम्णा मार्ग से षट्-
चक्रों का भेदन कर सहस्रार स्थित अकुल चक्र में विराजमान शिव के साथ सामरस्य लाभ
१. द्रष्टव्य—पं० श्रीगोपीनाथ कविराज कृत 'तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि' (पृ० ३०८)।
योगिनीहृदय के टीकाकारों में यहाँ मतभेद है। भास्करराय ने समना और उन्मना का
भी उच्चारण काल मात्रा का २५६वाँ भाग ही माना है। अमृतानन्द ने उन्मना को
निराकारा, अर्थात् निरुच्चारा माना है। यह उचित नहीं प्रतीत होता, क्योंकि प्रस्तुत
स्थल में सकल, सकल-निष्कल और निष्कल स्वरूपों का वर्णन है। उन्मना पर्यन्त सकल-
निष्कल स्वरूप है और यहाँ उन्मना का आकार भी वर्णित है। जब आकार वर्णित है,
तो उसका उच्चारण काल भी होना ही चाहिये और प्रकरण के अनुसार उन्मना का
उच्चारण काल समना से अधिक सूक्ष्म होना चाहिये। उन्मना में मन की स्थिति नहीं
रहती, ऐसा मानना भी उचित नहीं है। वस्तुतः उन्मना में मन का लय हो जाता है,
इसीलिए उसको उन्मना कहते हैं। हमारे मत से 'मनोन्मन्यास्तथोन्मनी' इस पद का
सम्बन्ध निराकार (निष्कल) महाबिन्दु से होना चाहिये।
२. द्रष्टव्य—तान्त्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि, पृ० ३०८।