विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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में उद्धृत हैं और कुछ स्थलों पर उनकी प्रकारानुकूल व्याख्या भी की गई है । लगभग आधे
से अधिक श्लोक इस तरह के मिलते हैं । इन सभी स्थलों का टिप्पणियों में उल्लेख कर दिया
गया है । पाठ-भेद के संकलन में और दोनों व्याख्याओं में भी इन उद्धरणों से और उद्धृत
स्थलों से आवश्यक सहायता ली गई है ।
संस्कृत की अन्वयार्था टीका में उक्त तीनों व्याख्याओं से सरलतम पंक्तियों को चुन-
कर और आवश्यकता के अनुसार उनमें नाममात्र का परिवर्तन कर अन्वय के अनुसार सजो
कर रखा गया है, जिससे कि श्लोक का अर्थ सरलता से समझा जा सके । कुछ विवादास्पद
स्थलों में टीकाओं के परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय स्थापित करने का भी प्रयास किया
गया है ।
रहस्यार्था टीका का प्रधान आधार क्षेमराज और शिवोपाध्याय की व्याख्या है । कुछ
श्लोकों के निगूढ अभिप्राय का इनमें विस्तार से वर्णन किया गया है । इन श्लोकों को उद्धृत
करने वाले आचार्यों ने भी इनके अन्तस्तल में प्रविष्ट होने का प्रयत्न किया है । इन सबकी
सहायता से राष्ट्रभाषा हिन्दी में इन श्लोकों के छिपे अभिप्राय को प्रकट करने का प्रयत्न
किया गया है । इसीलिये इसका नाम रहस्यार्था रखा गया है ।
पाठ-संकलन में शिवोपाध्याय के पाठ को 'क' संकेत से और भट्ट आनन्द के पाठ को
'ख' संकेत से दिखाया गया है । जिन स्थलों में यहाँ के श्लोक उद्धृत हैं, उनसे भी पाठ-
संकलन किया गया है । इनके संकेत के रूप में उस उस ग्रन्थ का प्रथम अक्षर लिया गया है ।
पाठ-संकलन की टिप्पणियों में देवनागरी अंकों का और अन्य टिप्पणियों में रोमन अंकों का
उपयोग हुआ है । पाठ-संकलन के बाद पास में ही स्थल निर्देश वाली टिप्पणियाँ दी गई हैं,
जिससे कि उक्त स्थल का पाठ-संकलन किस-किस ग्रन्थ से किया गया है, इसको जानने में
सुविधा हो ।
प्रायः प्रत्येक दर्शन और सम्प्रदाय के अपने पारिभाषिक शब्द होते हैं । उस उस दर्शन
और सम्प्रदाय के विषय में लिखते समय इन शब्दों का प्रयोग अनिवार्य रूप से करना पड़ता
है । प्रयोग-स्थल में ही इनके अभिप्राय को समझाने का प्रयत्न किया जाय तो इससे भाषा के
प्रवाह में बाधा पड़ती है । अतः ऐसे पारिभाषिक शब्दों के अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिये
यहाँ पर्याप्त मात्रा में टिप्पणियों का उपयोग किया गया है । यदि पाठकों का इससे कुछ भी
लाभ हुआ तो यह सारा प्रयत्न सार्थक माना जायगा ।
ग्रन्थ का स्वरूप
शिवोपाध्याय की टीका के अनुसार इस ग्रन्थ में १६३ और भट्ट आनन्द की टीका के
अनुसार १६१ श्लोक हैं । भट्ट आनन्द की टीका में ७७ संख्या के बाद के श्लोक में ७९ संख्या
लगा दी गई है । इस तरह से भट्ट आनन्द ने वस्तुतः १६० श्लोकों की ही व्याख्या की है ।
शिवोपाध्याय के ४४वें श्लोक के उत्तरार्ध और ४५वें श्लोक के पूर्वार्ध की, ८४वें और १४४वें
श्लोक की व्याख्या भट्ट आनन्द ने नहीं की । यह उचित भी है, क्योंकि 'निस्तरङ्गोप०'