वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८५
पूर्वकायेण चोपक्रमेत्। विषह्यत्वात् ॥ ९ ॥
प्रथम उपक्रम—प्रारम्भ में पत्नी के नाभि से ऊपर के अङ्गों का ही स्पर्श करना चाहिये,
क्योंकि इसे वह सह लेती है ॥ ९ ॥
दीपालोके विगाढयौवनायाः पूर्वसंस्तुतायाः। बालाया अपूर्वायाश्चान्ध-
कारे ॥ १० ॥
अन्धकार और प्रकाश—यदि पत्नी पूर्वपरिचिता या उन्मत्तयौवना हो, तो उसका
आलिङ्गन प्रकाश में भी किया जा सकता है, लेकिन यदि व्ह अपरिचिता या अप्राप्तयौवना हो तो
उसका आलिङ्गन अन्धकार में ही करना चाहिये ॥ १० ॥
अङ्गीकृतपरिष्वङ्गायाश्च वदनेन ताम्बूलदानम्। तदप्रतिपद्यमानां च सान्त्वनै-
र्वाक्यैः शपथैः प्रतियाचितैः पादपतनैश्च ग्राहयेत्। व्रीडायुक्तापि योषिदत्यन्तक्रुद्धापि
न पादपतनमतिवर्तते इति सार्वत्रिकम् ॥ ११ ॥
मुख से ताम्बूलदान—जब पत्नी आलिङ्गन को सहने लगे, तो पति को अपने मुख में
पान रखकर उसे देना चाहिये। यदि वह उसे अस्वीकार करे, तो प्रीतिपूर्ण मनुहारों से अनुरोध
करे, अपनी शपथ दिलाये, उससे ताम्बूल माँगे आदि। इतने पर भी मुख से पान न ले तो पैरों में
गिरकर उसे मनाना चाहिये। अत्यधिक लज्जाशील या कुपित स्त्री भी पति के पैरों में पड़ने का
अतिक्रमण नहीं कर सकती—यह प्रवृत्ति सभी स्थानों की स्त्रियों में समान रूप से मिलती
है ॥ ११ ॥
तद्दानप्रसङ्गेन मृदु विशदमकाहलमस्याश्चुम्बनम् ॥ १२ ॥
प्रथम चुम्बन—मुख से ताम्बूल देते समय उसका कोमल और निःशब्द चुम्बन कर लेना
चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र सिद्धामालापयेत् ॥ १३ ॥
वार्तारस—जब चुम्बन से पत्नी प्रसन्न होने लगे तो उससे रसपूर्ण वार्तालाप प्रारम्भ
कर दे ॥ १३ ॥
तच्छ्रवणार्थं यत्किचिदलपाक्षराभिधेयमजानन्निव पृच्छेत् ॥ १४ ॥
बोलने को विवश करने का उपाय—बातचीत को सुनती हुई पत्नी से थोड़े शब्दों में
कही जाने वाली बात को पति पूर्णतः अनजान बनकर पूछे ॥ १४ ॥
तत्र निष्प्रतिपत्तिमनुद्वेजयन् सान्त्वनायुक्तं बहुश एव पृच्छेत् ॥ १५ ॥
यदि वह तब भी चुप रहे, कोई उत्तर न दे, तो उसे बिना उद्विग्न किये ही चाटुकारिता भरे
वचनों से बार बार पूछे ॥ १५ ॥
यत्राप्यवदन्तीं निर्बध्नीयात् ॥ १६ ॥
यदि इसके पश्चात् भी वह चुप रहे, तो इसी प्रकार की रससिक्त बातों में उसे
फँसा ले ॥ १६ ॥
सर्वा एव हि कन्याः पुरुषेण प्रयुज्यमानं वचनं विषहन्ते। न तु लघुमिश्रामपि
वाचं वदन्ति। इति घोटकमुखः ॥ १७ ॥
८६ वात्स्यायन-कामसूत्र
सभी नवविवाहिता कन्याएँ पति द्वारा कही गयी प्रत्येक बात को सुन लेती हैं, किन्तु पूछी
गयी किसी भी बात का उत्तर नहीं देतीं—यह आचार्य घोटकमुख का अभिमत है ॥ १७ ॥
निर्बध्यमाना तु शिरःकम्पेन प्रतिवचनानि योजयेत्। कलहे तु न शिरः
कम्पयेत् ॥ १८ ॥
नवपरिणीता के उत्तर देने की रीति—पति द्वारा बार बार बोलने के लिये विवश किये
जाने पर, सिर हिलाकर हाँ या ना का उत्तर दे और यदि वह क्रुद्ध हो तो सिर भी न
हिलाये ॥ १८ ॥
इच्छसि मां नेच्छसि वा, किं तेऽहं रुचितो न रुचितो वेति पृष्टा चिरं स्थित्वा
निर्बध्यमाना तदानुकूल्येन शिरः कम्पयेत्। प्रपञ्च्यमाना तु विवदेत् ॥ १९ ॥
प्रेमजिज्ञासा का स्वरूप—'तुम मुझे चाहती हो या नहीं', 'मैं तुम्हें पसन्द आया या
नहीं'—इस प्रकार पति द्वारा पूछे जाने पर, पत्नी कुछ समय ठहरकर, आग्रह करने पर ही
अनुकूलतासूचक सिर हिलाये, और यदि क्रुद्ध हो तो झगड़ पड़े ॥ १९ ॥
संस्तुता चेत् सखीमनुकूलामुभयतोऽपि विस्रब्धां तामन्तरा कृत्वा कथां
योजयेत्। तस्मिन्नधोमुखी विहसेत्। तां चातिवादिनीमधिक्षिपेद्विदेच्च। सा तु परि-
हासार्थमिदमनयोक्तमिति चानुक्तमपि ब्रूयात्। तत्र तामपनुद्य प्रतिवचनार्थ-
मभ्यर्थ्यमाना तूष्णीमासीत। निर्बध्यमाना तु नाहमेवं ब्रवीमीत्यव्यक्ताक्षरमनवसितार्थं
वचनं ब्रूयात्। नायकं च विहसन्ती कदाचित् कटाक्षैः प्रेक्षेत। इत्यालाप-
योजनम् ॥ २० ॥
पूर्वपरिचिता के साथ वार्तालाप की रीति—यदि नवपरिणीता पत्नी पहले से परिचित
है तो अपने अनुकूल और दोनों की विश्वस्त सखी को माध्यम बनाकर इस प्रकार वार्ता प्रारम्भ
करे। इसमें पति की बातें सुनकर कन्या हँसती रहे और सखी के कुछ अधिक बोलने पर उस पर
यह आक्षेप लगाये कि तू बहुत बोलने लगी है और उससे विवाद करने लगे। सखी भी हँसी के
लिए कही और अनकही बातें भी कह डाले कि यह तो यहाँ तक कह रही थी कि जबसे उन्हें
देखा है तब से न दिन में चैन मिलता है और न रात में नींद आती है। यदि सखी को रोककर
उससे उत्तर देने का निवेदन किया जाये, तो 'मैंने ऐसे नहीं कहा' इस प्रकार अस्पष्ट शब्द और
अनिश्चित अर्थों वाले अक्षरों में उत्तर दे। कभी कभी नायक की ओर कटाक्षों से देखे। प्रारम्भ में
यह वार्तालाप की रीति हुई ॥ २० ॥
एवं जातपरिचया चानिर्वदन्ती तत्समीपे याचितं ताम्बूलं विलेपनं स्रजं
निदध्यात्। उत्तरीये वास्य निबध्नीयात् ॥ २१ ॥
प्रिय के पास ताम्बूल आदि रखना—इस प्रकार परिचय हो जाने पर नायिका, माँगने
पर ताम्बूल, चन्दन और माला, विना बोले ही, नायक के पास रख दे अथवा उसके उत्तरीय में
बाँध दे ॥ २१ ॥
तथायुक्तामाच्छुरितकेन स्तनमुकुलयोरुपरि स्पृशेत् ॥ २२ ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८७
कुचस्पर्श—नायिका के इस प्रकार ताम्बूल आदि रखने पर, नायक आच्छुरितक नामक
आलिङ्गन से, नायिका के दोनों स्तनरूपी अर्धोन्मीलित पुष्पों का स्पर्श करे ॥ २२ ॥
वार्यमाणश्च त्वमपि मां परिष्वजस्व ततो नैवमाचरिष्यामीति स्थित्या
परिष्वज्येत। स्वं च हस्तमानाभिदेशात् प्रसार्य निवर्तयेत्। क्रमेण चैना-
मुत्सङ्गेमारोप्याधिकमधिकमुपक्रमेत्। अप्रतिपद्यमानां च भीषयेत् ॥ २३ ॥
परवर्ती क्रियाएँ—यदि पत्नी स्तनों का स्पर्श न करने दे, तो 'तुम भी मेरा इसी प्रकार
आलिङ्गन करो, मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा' यह कहकर उसका आलिङ्गन करे। अपने हाथ को उसके
स्तनों से नाभिदेश तक ले जाकर हटा ले। तत्पश्चात् उसे क्रमशः अपनी गोद में बिठाने का प्रयत्न
करे, और फिर धीरे धीरे आगे की क्रियाएँ बढ़ाता जाये। यदि वह ना करे तो नखक्षत-दन्तक्षत
आदि की बात सुनाकर उसे भयभीत कर दें ॥ २३ ॥
अहं खलु तव दन्तपदान्यधरे करिष्यामि स्तनपृष्ठे च नखपदम्। आत्मनश्च स्वयं
कृत्वा त्वया कृतमिति ते सखीजनस्य पुरतः कथयिष्यामि। सा त्वं किमत्र वक्ष्यसीति
बालविभीषिकैर्बालप्रत्यायनैश्च शनैरेनां प्रतारयेत्।
आतंकित करने की रीति—यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगी तो मैं तुम्हारे अधर पर
दन्तक्षत और स्तनों पर नखक्षत बना दूँगा। मैं अपने शरीर पर स्वयं नखक्षत करके तुम्हारी
सखियों से कहूँगा कि तुम्हारी सखी ने मेरे शरीर पर ये नखक्षत बना दिये हैं। तब तुम उनके
सामने क्या कहोगी ? इस प्रकार बच्चों के समान पत्नी को डरा धमकाकर धीरे धीरे उसे अपने
कार्यों में लगा ले ॥ २४ ॥
द्वितीयास्यां तृतीयास्यां च रात्रौ किञ्चिदधिकं विस्रम्भिां हस्तेन
योजयेत् ॥ २५ ॥
द्वितीय और तृतीय रात्रि—इस प्रकार प्रथम रात्रि में विश्वास में आयी हुई नायिका को
दूसरी और तीसरी रात्रि में कुछ अधिक विश्वास में लेकर उसकी जाँघों आदि पर हाथ फेरना
चाहिये ॥ २५ ॥
सर्वाङ्गिकं चुम्बनमुपक्रमेत ॥ २६ ॥
हस्तयोजन ( हाथ फेरना ) के उपाय—यदि नायिका नाभि से नीचे के अङ्गों पर
हस्तयोजन न करने दे, तो मस्तक, नयन कपोल आदि का चुम्बन लेना प्रारम्भ कर दे ॥ २६ ॥
उर्वोश्चोपरि विन्यस्तहस्तः संवाहनक्रियायां सिद्धायां क्रमेणोरुमूलमपि
संवाहयेत्। निवारिते संवाहने को दोष इत्याकुलयेदेनाम्। तच्च स्थिरीकुर्यात्। तत्र
सिद्धाया गुह्यदेशाभिमर्शनम् ॥ २७ ॥
हस्तयोजनविधि—जाँघों के ऊपर हाथ रखकर संवाहन (मुट्ठी भरना) कर्म करता हुआ
नायक क्रमशः नायिका की जाँघों के जोड़ तक हाथ ले जाये। यदि नायिका ऐसा करने से मना
करे, तो 'इसमें क्या दोष है ?'—ऐसा कह दे और जाँघों को सहलाने के साथ ही आलिङ्गन और
चुम्बन से व्याकुल बना दे, लेकिन जाँघों का संवाहनकर्म स्थिरतापूर्वक करता रहे। यदि नायिका
इसमें रुचि लेने लगे तो हाथ धीरे धीरे योनि तक पहुँचा देना चाहिये ॥ २७ ॥
८८ वात्स्यायन-कामसूत्र
रशनावियोजनं नीवीविस्रंसनं वसनपरिवर्तनमूरुमूलसंवाहनं च। एते
चास्यान्यापदेशाः। युक्तयन्त्रां रञ्जयेत्। न त्वकाले व्रतखण्डनम्॥ २८॥
नीवीविस्रंसन (नाड़ा खोलना) आदि कार्य—जाँघों का संवाहन करते समय ही
करधनी खोलना, नाड़ा खोलना और कपड़े हटाना—ये कार्य भी होने चाहिये। ये सम्पूर्ण क्रियाएँ
नायिका के मन में प्रेम और विश्वास उत्पन्न करने के लिए हैं, असमय में ब्रह्मचर्य का खण्डन
करने के लिए नहीं। सम्भोग में उसका पूर्ण रञ्जन करे, लेकिन प्रथम तीन रात्रियों में ब्रह्मचर्य का
त्याग न करे॥ २८॥
अनुशिष्याच्च। आत्मानुरागं दर्शयेत्। मनोरथांश्च पूर्वकालिकाननुवर्णयेत्।
आयत्यां च तदानुकूल्येन प्रवृत्तिं प्रतिजानीयात्। सपत्नीभ्यश्च साध्वसमवच्छिन्द्यात्।
कालेन च क्रमेण विमुक्तकन्याभावामनुद्वेजयन्नुपक्रमेत्। इति कन्यावि-
स्रम्भणम्॥ २९॥
अन्य कार्य—प्रथम तीन रात्रियों में पत्नी को कामकला की शिक्षा देनी चाहिये। अपने
प्रेम को प्रकट करना चाहिये। अपने पहले मनोरथों को उसे सुनाना चाहिये। भविष्य में उसके
अनुकूल चलने की प्रतिज्ञा करनी चाहिये। उसके हृदय से सपत्नियों का भय निकाल देना
चाहिये। कालक्रम से जैसे जैसे उसका कन्याभाव दूर होता जाये, वैसे वैसे उसे विना उद्विग्न
किये ही अधिकाधिक उपक्रियाओं (आलिङ्गन, चुम्बन, नखक्षत, प्रहणन, सीत्कार आदि) का
उपयोग करता रहे। इस प्रकार कन्याविश्रम्भण प्रकरण पूर्ण हुआ॥ २९॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
एवं चित्तानुगो बालामुपायेन प्रसाधयेत्।
तथास्य सानुरक्ता च सुविस्रब्धा प्रजायते॥ ३०॥
प्रकरण का उपसंहार—इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं, उन्हें उद्धृत
करते हैं—इस प्रकार नवपरिणीता पत्नी के हृदय की प्रवृत्तियों को समझकर, उसे युक्तिपूर्वक
सिद्ध कर ले, तो वह विश्वस्त और अनुरक्त हो जायेगी॥ ३०॥
नात्यन्तमानुलोम्येन न चातिप्रातिलोम्यतः।
सिद्धिं गच्छति कन्यासु तस्मान्मध्येन साधयेत्॥ ३१॥
ध्यातव्य तथ्य—नवपरिणीता पत्नी से न तो दास बनकर सुख प्राप्त किया जा सकता है
और न उससे प्रतिकूल होकर ही, इसलिये उसे मध्यममार्ग (कभी प्रेम और कभी कठोरता) से ही
प्रसन्न करना चाहिये॥ ३१॥
आत्मनः प्रीतिजननं योषितां मानवर्धनम्।
कन्याविस्रम्भणं वेत्ति यः स तासां प्रियो भवेत्॥ ३२॥
विश्वस्त बनाने का फल—स्त्रियों के मन में अपने प्रति प्रीति उत्पन्न करना, उनका
सम्मान करना और नवपरिणीता में विश्वास जगाना—इन तीन बातों को जो जानता है, वही
स्त्रियों का प्रिय हो सकता है॥ ३२॥
अतिलज्जान्वितेत्येवं यस्तु कन्यामुपेक्षते।
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८९
सोऽनभिप्रायवेदीति पशुवत् परिभूयते ॥ ३३ ॥
लज्जाशील की उपेक्षा उचित नहीं—जो पति 'यह अत्यधिक लज्जाशील है' ऐसा
समझकर नवपरिणीता की उपेक्षा करता है, वह वास्तव में उसके हृदय का अभिप्राय न जानने के
कारण उससे पशु के समान तिरस्कृत होता है ॥ ३३ ॥
सहसा वाप्युपक्रान्ता कन्याचित्तमविन्दता।
भयं वित्रासमुद्वेगं सद्यो द्वेषं च गच्छति ॥ ३४ ॥
विना विश्वास जगाये समागम उचित नहीं—जो पति नवपरिणीता में विना विश्वास
जगाये, उसकी चित्तवृत्ति को विना जाने ही, सहसा सम्भोग कर बैठता है, तो उसके मन में शीघ्र
ही भय, कम्पन, उद्देश्य और द्वेष उत्पन्न हो जाता है ॥ ३४ ॥
सा प्रीतियोगमप्राप्ता तेनोद्वेगेन दूषिता।
पुरुषद्वेषिणी वा स्याद् विष्टा वा ततोऽन्यगा ॥ ३५ ॥
पति की प्रीति न पाकर नवपरिणीता ईर्ष्या और घृणा से भर उठती है। तत्पश्चात् वह या तो
अपने पति या पुरुषमात्र से द्वेष करने लगती है अथवा अन्य पुरुष से अनुरक्त हो जाती है ॥ ३५ ॥
कन्याविस्रम्भण प्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
तृतीय अध्याय
बालोपक्रमण
धनहीनस्तु गुणयुक्तोऽपि, मध्यस्थगुणो हीनापदेशो वा; सधनो वा प्रातिवेश्यः
मातृपितृभ्रातृषु च परतन्त्रः, बालवृत्तिरुचितप्रदेशो वा कन्यामलभ्यत्वान्न
वरयेत् ॥ १ ॥
कन्या न मिलने के कारण—जो रूप, शील, ज्ञान और गुण-सम्पन्न होने पर भी धनहीन
है, जो गुणों की दृष्टि से मध्यम होकर भी निम्न कुल में उत्पन्न हुआ है, जो धनी होकर भी
पड़ोस का रहने वाला है, जो माता-पिता और भाई के अधीन है, जो अपनी बालवृत्ति के कारण
किसी भी घर में प्रवेश कर जाता है, ऐसे युवक को माता-पिता अपनी कन्या नहीं देते, फलतः
उन्हें गान्धर्वादि विवाहों से कन्याप्राप्ति का प्रयास करना चाहिये ॥ १ ॥
बाल्यात् प्रभृति चैनां स्वयमेवानुरञ्जयेत् ॥ २ ॥
कन्याप्राप्ति के उपाय—ऐसे व्यक्ति को चाहिये कि वे बाल्यावस्था से ही अपनी
मनोवाञ्छित कन्या को अनुरक्त रखें ॥ २ ॥
तथायुक्तश्च मातुलकुलानुवर्ती दक्षिणापथे बाल एव मात्रा च पित्रा च वियुक्तः
परिभूतकल्पो धनोत्कर्षादलभ्यां मातुलदुहितरमन्यस्मै वा पूर्वदत्तां साधयेत् ॥ ३ ॥
दक्षिण भारत में कन्या को अनुरक्त करने की रीति—दक्षिण भारत में जिन हीनताओं
३. कन्यासम्प्रयुक्तक एवं भार्याधिकारिक अधिकरण (विवाह, एकचारिणी वृत्त व गृह-प्रबन्धन)
९० वात्स्यायन-कामसूत्र
के कारण अभिभावक अपनी कन्याएँ नहीं देते, उन्हीं हीनताओं से युक्त, माता-पिता से रहित,
असहाय बालक अपने मामा के घर रहकर, धनोत्कर्ष के कारण सर्वथा अलभ्य ममेरी बहिन
(मामा की लड़की) को भी सिद्ध कर लेते हैं, भले ही उसका वाग्दान हो भी गया हो। इसी
प्रकार अन्य युवकों को भी वाञ्छित कन्या को सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ३ ॥
अन्यामपि बाह्यां स्पृहयेत् ॥ ४० ॥
मामा की बेटी के अतिरिक्त जो कन्या अपने माता-पिता के गोत्र की न हो, उसे भी इसी
प्रकार अनुरक्त करके गान्धर्वविवाह कर लेना चाहिये ॥ ४ ॥
बालायामेवं सति धर्माधिगमे संवननं श्लाघ्यमिति घोटकमुखः ॥ ५ ॥
यदि लड़की से बाल्यकाल से ही सच्चा प्रेम है, तो उसे वश में कर लेना—विवाह कर
लेना (श्लाघनीय ही है) ऐसा आचार्य घोटकमुख का मत है ॥ ५ ॥
तया सह पुष्पावचयं ग्रथनं गृहकं दुहितृकाक्रीडायोजनं भक्तपानकरणमिति
कुर्वीत। परिचयस्य वयसश्चानुरूप्यात् ॥ ६ ॥
बालक के प्रयास—वाञ्छित कन्या के साथ फूल चुनना, फूलों की मालाएँ बनाना,
मिट्टी के घरौंदे बनाना, गुड़ियों का खेल खेलना, भात बनाना, पेयपदार्थ तैयार करना—ये खेल
अपने परिचय और अवस्था के अनुरूप खेले ॥ ६ ॥
आकर्षक्रीडा पट्टिकाक्रीडा मुष्टिद्यूतक्षुल्लककादिद्यूतानि मध्यमाङ्गुलिग्रहणं
षट्पाषाणकादीनि च देश्यानि तत्सात्म्यात् तदामदासचेटिकाभिस्तया च सहानु-
क्रीडेत ॥ ७ ॥
रस्सा खींचना, दोनों हाँथों की अंगुलियों को एक-दूसरे में फँसाकर चक्कर लगाते हुए
खेलना, मुट्ठी में कोई वस्तु रखकर पूछना कि बता—इसमें क्या है ? बीच की अंगुलि को अन्य
अंगुलियों में छिपाकर पकड़वाना और गोटी खेलना—बाल्यकाल में इस देश्य खेलों को भी
वाञ्छित कन्या के साथ खेलना चाहिये ॥ ७ ॥
श्वेडितकानि, सुनिमीलितकामारब्धिकां लवणवीथिकामनिलताडितां
गोधूमपुञ्जिकामङ्गुलिताडितकाम् सखीभिरन्यानि च देश्यानि ॥ ८ ॥
आँखमिचौनी, कृष्णफलक्रीड़ा, लवणवीथिका, अनिलताडितका, गोधूमपञ्जिका,
अंगुलिताड़ितका तथा अपने अपने प्रदेश में प्रचलित खेलों को वाञ्छित कन्या के साथ खेलना
चाहिये ॥ ८ ॥
यां च विश्वास्यामस्यां मन्येत तया सह निरन्तरां प्रीतिं कुर्यात्। परिचयाँश्च
बुध्येत् ॥ ९ ॥
युवक के प्रयास—जिस कन्या से युवक प्रेम करना चाहता हो, उसकी विश्वस्त सखी से
निरन्तर प्रेम और परिचय बढ़ाता रहे ॥ ९ ॥
धात्रेयिकां चास्याः प्रियहिताभ्यामधिकमुपगृह्णीयात्। सा हि प्रीयमाणा
विदिताकाराप्यप्रत्यादिशन्ती तं तां च योजयितुं शक्नुयात्। अनभिहितापि
प्रत्याचार्यकम् ॥ १० ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९१
सखी को वशवर्ती बनाने का लाभ—नायिका की धाय की पुत्री या सखी को प्रिय
और हितकर बातों से अपने वशीभूत कर लेना चाहिये, क्योंकि वशीभूत हो जाने पर वह दोनों
के मनोभावों को जानकर, किसी से कहे बिना ही मिला देगी, मिलाने में तो वह आचार्य ही
होती है ॥ १० ॥
अविदिताकारापि हि गुणानेवानुरागात् प्रकाशयेत् । यथा प्रयोज्यानु-
रज्येत ॥ ११ ॥
सखी का कार्य—नायिका के मनोभावों को विना जाने ही वह नायक के अनुराग से
उसके गुणों को इस प्रकार प्रकाशित करे कि नायिका उस पर अनुरक्त हो जाये ॥ ११ ॥
यत्र यत्र च कौतुकं प्रयोज्यायास्तदनु प्रविश्य साधयेत् ॥ १२ ॥
नायक के कार्य—नायिका की जिस जिस वस्तु की कामना हो, नायक उसे समझकर
उसे वह वस्तु प्राप्त करा दे ॥ १२ ॥
क्रीडनकद्रव्याणि यान्यपूर्वाणि यान्यन्यासां विरलशो विद्येरँस्तान्यस्या
अयत्नेन सम्पादयेत् ॥ १३ ॥
जो अन्य सखियों के पास कम ही दिखते हों, ऐसे बहुमूल्य और दुर्लभ खिलौने नायिका
को सहजतापूर्वक लाकर दे ॥ १३ ॥
तत्र कन्दुकमनेकभक्तिचित्रमल्पकालान्तरितमन्यदन्यच्च सन्दर्शयेत् । तथा
सूत्रदारुगवलगजदन्तमयीर्दुहितृका मधूच्छिष्टपिष्टमृन्मयीश्च ॥ १४ ॥
खिलौने—नायक को चाहिये कि नायिका को ऐसी गेंद दिखाये जिसमें भिन्न भिन्न रंगों
की फाँके बनी हों, उनमें सुन्दर सुन्दर चित्र अङ्कित हों और जो लुढ़कने पर थोड़े थोड़े समय
बाद रङ्ग बदलती जायें। अन्य दूसरे प्रकार की गेंदें भी दिखाये। धागा, लकड़ी, सींग, हाथीदाँत,
मोम, मैदा और मिट्टी से बनी भिन्न भिन्न प्रकार की पुतलियाँ और गुड़िया दिखाये ॥ १४ ॥
भक्तपाकार्थमस्या महानसिकस्य च दर्शनम् ॥ १५ ॥
भात (भोजन) बनाने के लिये पाककला सिखानी चाहिये ॥ १५ ॥
काष्ठमेढ्रकयोश्च संयुक्तयोश्च स्त्रीपुंसयोरजैडकानां देवकुलगृहकाणां
मृद्विदल-काष्ठविनिर्मितानां शुकपरभृतमदनसारिकालावकुक्कुटतित्तिरिपञ्जर-
काणां च विचित्राकृतिसंयुक्तानां जलभाजनानां च यन्त्रिकाणां वीणिकानां
पटोलिकानामलक्तकमनःशिलाहरितालहिङ्गुलकश्यामवर्णकादीनां तथा चन्दन-
कुङ्कुमयोः पूगफलानां पत्राणां कालयुक्तानां च शक्तिविषये प्रच्छन्नं दानं प्रकाश-
द्रव्याणां च प्रकाशम् । यता च सर्वाभिप्रायसंवर्धकमेनं मन्येत तथा प्रयति-
तव्यम् ॥ १६ ॥
एक ही लकड़ी पर बने स्त्री-पुरुष, बकरा-बकरी, गाय-बैल आदि के युगल, मिट्टी,
बाँस और लकड़ी से निर्मित देवमन्दिर, पिंजरों में स्थित तोता, कोयल, मैना, सारिका, लवा,
मुर्गा (कुक्कुट), तीतर आदि पक्षी, विचित्र आकृति वाले शङ्ख, सीपियाँ, कौड़ी आदि से निर्मित
पानी के बर्तन, वीणा, प्रसाधन की सामग्री, पटोलिका, महावर, मनःशिला, हरिताल, हिंगुल,
काम० ८
९२ वात्स्यायन-कामसूत्र
काला रङ्ग आदि, चन्दन, कुंकुम, सुपारी, पान आदि वस्तुएँ समय और शक्ति के अनुरूप,
अवसर देखकर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में अपनी प्रेमिका को देता रहे। इन पदार्थों को जिस प्रकार
भी सम्पूर्ण अभिप्रायों को बढ़ाने वाला समझे, उसी प्रकार उन्हें देने का प्रयास करना
चाहिये॥ १६॥
वीक्षणे च प्रच्छन्नमर्थयेत् तथा कथायोजनम्॥ १७॥
उपहारदान का प्रयोजन—नायिका से प्रच्छन्न रूप से मिलने का अनुरोध करे और ऐसी
ही कथावार्ताएँ सुनाये जिससे उसका अनुराग बढ़े॥ १७॥
प्रच्छन्नदानस्य तु कारणमात्मनो गुरुजनाद्भयं ख्यापयेत्। देयस्य चान्येन
स्पृहणीयत्वमिति॥ १८॥
यदि नायिका प्रच्छन्न रूप से वस्तुएँ देने का कारण पूछे तो अपने गुरुजन का भय बताये
अथवा कहे कि दी जाने वाली वस्तु को अन्य व्यक्ति भी चाहते हैं॥ १८॥
वर्धमानानुरागं चाख्यानके मनः कुर्वतीमन्वर्थाभिः कथाभिश्चित्तहारिणीभिश्च
रञ्जयेत्॥ १९॥
बढ़ते हुए अनुराग के समय यदि नायिका कथा सुनने में रुचि प्रदर्शित करे, तो नायक को
अवसरानुकूल मनोहर कथाओं से उसका मनोरञ्जन करना चाहिये॥ १९॥
विस्मयेषु प्रसह्यमानामिन्द्रजालैः प्रयोगैर्विस्मापयेत्। कलासु कौतुकिनीं
तत्कौशलेन गीतप्रियां श्रुतिहरैर्गीतैः। आश्वयुज्यामष्टमीचन्द्रके कौमुद्यामुत्सवेषु
यात्रायां ग्रहणे गृहाचारे वा विचित्रैरापीडैः कर्णपत्रभङ्गैः सिक्तकप्रधानैर्वस्त्रा-
ङ्गुलीयकभूषणदानैश्च। नो चेद्दोषकराणि मन्येत॥ २०॥
कौतुकप्रदर्शन—यदि नायिका की कौतुक देखने में रुचि हो, तो उसे इन्द्रजाल (जाल)
के खेल दिखाकर आश्चर्यचकित कर दे। यदि कलाओं का कौशल देखना चाहती हो तो
कलाकौशल दिखाकर प्रसन्न करे। कोजागरीव्रत, बहुला अष्टमी, कौमुदी पर्व आदि उत्सवों के
दिन,देवयात्रा और ग्रहण के दिन घर आने पर विचित्र प्रकार के आपीड, कर्णपत्रभङ्ग, मोम,
वस्त्र, अंगूठी, आभूषण आदि देकर उसे प्रसन्न करे, किन्तु ये वस्त्राभूषण तभी दे, जब इन्हें देने से
किसी प्रकार का दोष (कलह, अपयश आदि) न देखे॥ २०॥
अन्यपुरुषविशेषाभिज्ञतया धात्रेयिकास्याः पुरुषप्रवृत्तौ चातुःषष्टिकान्
योगान् ग्राहयेत्॥ २१॥
धाय की पुत्री या सखी नायक की प्रशंसा करते हुए कहे कि यह कामकला में निपुण हैं,
और उसे नायक से मिलवाकर कामकला के चौंसठ योगों को सिखवाये॥ २१॥
तद्ग्रहणोपदेशेन च प्रयोज्यायां रतिकौशलमात्मनः प्रकाशयेत्॥ २२॥
रतिकौशल का प्रकटीकरण—सखी द्वारा प्रशंसा किये जाने पर नायक को चाहिये कि
उनके उपदेश से नायिका पर अपना रतिकौशल प्रकट करे॥ २२॥
उदारवेषश्च स्वयमनुपहतदर्शनश्च स्यात्। भावं च कुर्वतीमिङ्गिताकारैः
सूचयेत्॥ २३॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९३
नायक का वेश और कार्य—नायिका के समक्ष नायक को भव्य वेशभूषा में ही रहना
चाहिये और सदैव उसकी दृष्टि में पड़ते रहना चाहिये। यह मुझ से प्रेम करती है या नहीं—इस
बात को सङ्केत और चेष्टाओं से समझ लेना चाहिये ॥ २३ ॥
युवतयो हि संसृष्टमभीक्ष्णदर्शनं च पुरुषं प्रथमं कामयन्ते। कामयमाना अपि तु
नाभियुञ्जत इति प्रायोवादः। इति बालायामुपक्रमाः ॥ २४ ॥
भव्य वेशभूषा का कारण—यह निश्चित बात है कि अधिकांश युवतियाँ अपने परिचित
और सदैव दिखने वाले पुरुषों को चाहती हैं, और चाहती हुई भी लज्जावश उनसे समागम नहीं
करता इस प्रकार बाला के उपक्रम पूर्ण हुए ॥ २४ ॥
तानिङ्गिताकारान् वक्ष्यामः ॥ २५ ॥
युवक द्वारा कन्या-प्राप्ति के प्रयासों में कहा गया है—'यह मुझसे प्रेम करती है या नहीं,
इस बात को सङ्केत और चेष्टाओं से समझना चाहिये।' इसलिए अब सङ्केत और चेष्टाओं को
बताते हैं। शास्त्रकार वात्स्यायन इसके निर्देश के लिए सूत्र देते हैं—
इङ्गिताकारसूचन प्रकरण—अब संकेत और चेष्टाओं को कहेंगे ॥ २५ ॥
सम्मुखं तं तु न वीक्षते। वीक्षिता व्रीडां दर्शयति। रुच्यमात्मानोऽङ्गमपदेशेन
प्रकाशयति। प्रमत्तं प्रच्छन्नं नायकमतिक्रान्तं च वीक्षते ॥ २६ ॥
देखने की रीति—अधिकांशतः युवतियाँ सम्मुख खड़े नायक को नहीं देखतीं। नायक
द्वारा देखे जाने पर लज्जा से मुख नीचा कर लेती है। अपने स्तन आदि मनोहर अंगों को किसी
बहाने से दिखाती हैं। यदि नायक उनकी ओर उन्मुख न हो, असावधान हो या दूर हो, तो जी
भरकर देखती हैं ॥ २६ ॥
पृष्टा च किञ्चित् सस्मितमव्यक्ताक्षरमनवसितार्थं च मन्दमन्दमधोमुखी
कथयति। तत्समीपे चिरं स्थानमभिनन्दति। दूरे स्थिता पश्यतु मामिति मन्यमाना
परिजनं सवदनविकारमाभाषते। तं देशं न मुञ्चति ॥ २७ ॥
बोलने की रीति—अधिकांशतः युवतियाँ नायक द्वारा कुछ पूछे जाने पर मन्द मन्द
मुस्काते हुए एवं मुख नीचा करके अस्पष्ट भाषा में ऐसा उत्तर देती हैं जिसका अर्थ शीघ्र ही समझ
में न आये। नायक के पास देर तक ठहरना पसन्द करती हैं। दूर खड़ी 'यह मुझ देखे' ऐसा
मानती हुई, अपने परिजनों के साथ मुख बनाकर बोलती हैं और उस स्थान को नहीं
छोड़तीं ॥ २७ ॥
यत्किञ्चिद् दृष्ट्वा विहसितं करोति। तत्र कथामवस्थानार्थमनुबध्नाति।
बालस्याङ्कगतस्यालिङ्गनं चुम्बनं च करोति। परिचारिकायास्तिलकं च रचयति।
परिजनानवष्टभ्य तास्तांश्च लीला दर्शयति ॥ २८ ॥
भावप्रेरित चेष्टाएँ—जहाँ नायक खड़ा हो, वहाँ कुछ भी देखकर हँसती रहती हैं। वहाँ
खड़े रहने के लिये बातें प्रारम्भ कर देती हैं। गोद में स्थित बालक का आलिङ्गन और चुम्बन
करने लगती हैं। परिचारिका से अपना तिलक ठीक कराती हैं तथा परिजनों सहारा लेकर
भावप्रेरित चेष्टाएँ दिखाने लगती हैं ॥ २८ ॥
९४ वात्स्यायन-कामसूत्र
तन्मित्रेषु विश्वसिति। वचनं चैषां बहु मन्यते करोति च। तत्परिचारकैः सह
प्रीतिं सङ्कथां द्यूतमिति च करोति। स्वकर्मसु च प्रभविष्णुरिवैतान्नियुङ्क्ते। तेषु च
नायकसङ्कथामन्यस्य कथयत्स्ववहिता तां शृणोति ॥ २९ ॥
नायक के सहचरों एवं अनुचरों के साथ व्यवहार—नायक के मित्रों पर विश्वास
करती है। उनकी बातों का समादर करती है और तदनुकूल ही व्यवहार करती है। उसके नौकरों
के साथ प्रीतिपूर्ण वार्तालाप करती है और उनके साथ ताश, शतरंज आदि खेलती है। उसके
नौकरों को स्वामी के समान आदेश देती है। यदि वे नायकविषयक बातें करते हैं तो उन्हें
एकाग्रचित्त होकर सुनती है ॥ २९ ॥
धात्रेयिकया चोदिता नायकस्योदवसितं प्रविशति। तामन्तरा कृत्वा तेन सह
द्यूतं क्रीडामालापं चायोजयितुमिच्छति। अनलङ्कृता दर्शनपथं परिहरति।
कर्णपत्रमङ्गुलीयकं स्रजं वा तेन याचिता सधीरमेव गात्रादवतार्य सख्या हस्ते
ददाति। तेन च दत्तं नित्यं धारयति। अन्यवरसङ्कथासु विषण्णा भवति। तत्पक्षकैश्च
सह न संसृज्यत इति ॥ ३० ॥
नायक से सम्पर्क की वाञ्छा—धाय की पुत्री या सखी कहने पर नायक के घर चली
जाती है। उस सखी को माध्यम बनाकर नायक के साथ द्यूत, खेल, वार्तालाप आदि करना
चाहती है। नायक के सामने विना श्रृंगार किये नहीं आती। यदि वह कर्णफूल, अँगूठी या माला
माँगता है, तो गम्भीरतापूर्वक शरीर से उतारकर सखी के हाथ पर रख देती है। नायक द्वारा दी
गयी अँगूठी, माला आदि वस्तुओं को नित्य धारण करती है। दूसरे नायकों की कथा से विमुख
हो जाती है और उनके पक्ष वालों के साथ संसर्ग नहीं करती ॥ ३० ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
दृष्टैतान् भावसंयुक्तानाकारानिङ्गितानि च।
कन्यायाः सम्प्रयोगार्थं ताँस्तान् योगान्विचिन्तयेत् ॥ ३१ ॥
उपसंहार—इस प्रकार कन्या के भावसंयुक्त सङ्केतों और चेष्टाओं को देखकर ही, उसके
साथ समागम के लिये समुचित उपायों को प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ३१ ॥
बालक्रीडनकैर्बाला कलाभिर्यौवने स्थिता।
वत्सला चापि संग्राह्या विश्वास्यजनसंग्रहात् ॥ ३२ ॥
बाला नायिकाओं को बालक्रीड़ा से, तरुणी को कामकलाओं से और प्रौढ़ा को उसकी
विश्वस्त सखियों से सम्पर्क करके वश में किया जा सकता है ॥ ३२ ॥
बालोपक्रम एवं इंगिताकारसूचन नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९५
चतुर्थ अध्याय
एकपुरुषाभियोगादि प्रकरण
दर्शिताङ्गिकारां कन्यामुपायैरभियुञ्जीत ॥ १ ॥
उपाय—कन्या के भावों और चेष्टाओं को अपने अनुकूल देखकर उसे उपायों से प्राप्त
करना चाहिये ॥ १ ॥
द्यूते क्रीडनकेषु च विवदमानः साकारमस्याः पाणिमवलम्बेत ॥ २ ॥
साधिकार करग्रहण—शतरंज, द्यूत (ताश आदि) तथा अन्य खेलों में विवाद करता
हुआ नायक, नायिका का हाथ साधिकार पकड़ ले ॥ २ ॥
यथोक्तं च स्पृष्टकादिकमालिङ्गनविधिं विदध्यात् ॥ ३ ॥
आलिङ्गन—स्पृष्टक, विद्धक, उद्घृष्टक और पीड़ितक—इन आलिङ्गन-प्रकारों का
अवसर के अनुरूप विधिपूर्वक उपयोग करे ॥ ३ ॥
पत्रच्छेद्यक्रियायां च स्वाभिप्रायसूचकं मिथुनमस्या दर्शयेत् ॥ ४ ॥
पत्रच्छेद्य से अभिप्रायज्ञापन—पत्रच्छेद्य क्रिया में अपने अभिप्राय को ज्ञापित करने
वाला हंसमिथुन आदि बनाकर नायिका को दिखाये ॥ ४ ॥
एवमन्यद् विरलशो दर्शयेत् ॥ ५ ॥
मिथुनदर्शन—कभी-कभी मिथुन (युगल) चित्र भी दिखाने चाहिये ॥ ५ ॥
जलक्रीडायां तद्दूरतोऽप्सु निमग्नः समीपमस्या गत्वा स्पृष्ट्वा चैनां तत्रैवोन्म-
ज्जेत् ॥ ६ ॥
जलक्रीड़ा में अभिप्रायज्ञापन—जलक्रीड़ा में नायिका से दूर पानी में डुबकी लगाकर,
उसके समीप पहुँचकर और उसे छूकर ही पानी से बाहर निकले ॥ ६ ॥
नवपत्रिकादिषु च सविशेषभावनिवेदनम् ॥ ७ ॥
नवपत्रिका में अभिप्रायज्ञापन—नवपत्रिका आदि देश्य खेलों में अपने अभिप्राय का
निवेदन करना चाहिये ॥ ७ ॥
आत्मदुःखस्यानिवेदेन कथनम् ॥ ८ ॥
दुःखनिवेदन—अपने दुःख को, बिना किसी वेदना के कहना चाहिये ॥ ८ ॥
स्वप्नस्य च भावयुक्तस्यान्यापदेशेन ॥ ९ ॥
स्वप्नकथन—किसी बहाने से भावयुक्त स्वप्न की बातें कहनी चाहिये ॥ ९ ॥
प्रेक्षणके स्वजनसमाजे वा समीपोपवेशनम् । तत्रान्यापदिष्टं स्पर्शनम् ॥ १० ॥
बहाने से अङ्गस्पर्श—खेल आदि देखते समय या स्वजनगोष्ठी में नायक, नायिका के
पास ही बैठे और किसी बहाने से उसका अङ्गस्पर्श करे ॥ १० ॥
अपाश्रयार्थं च चरणेन चरणस्य पीडनम् ॥ ११ ॥
चरणपीड़न—उसके अङ्गों पर अपना अङ्ग रखने के लिये, उसके पैर को अपने पैर से
दबाये ॥ ११ ॥
ं भावं च तत्रोपलक्षयेत् । यथा पारदारिके वक्ष्यामः ॥ २१ ॥-> completely clear. Line 34: विदितभावस्तु व्याधिमपदिश्यैनां वार्ताग्रहणार्थं स्वमुदवसितमानयेत् ॥ २२ ॥` -> completely clear.
Every single other sutra is the standard, 100% correct Kamasutra sutra text!
Now look at Sutra 12 in the Kamasutra (3.2.12):
The standard sutra is:
ततः शनैरेकैकामङ्गुलिमभिमृशेत् ॥ १२ ॥
Wait, why does the print look slightly odd on रेकैका?
Wait, look at रेकैका:
Is it रे then कै then का?
Wait, look at रे: in this font, does रे have anything?
Wait, let me look at रे in other places:
Line 3: धीरे धीरे -> धी रे धी रे.
Look at रे in धीरे: it is a simple र with े!
Now look back at Line 2:
Wait! After नै, look at that letter:
Is it क?
Wait, why would it be क?
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९७
गृह-आमन्त्रण—नायिका को इच्छुक जान लेने के पश्चात् सिरदर्द आदि का बहाना
करके वार्तालाप के लिये उसे अपने घर पर बुलवाये ॥ २२ ॥
आगतायाश्च शिरःपीडने नियोगः। पाणिमवलम्ब्य चास्याः साकारं नयन-
योर्ललाटे च निदध्यात् ॥ २३ ॥
आयी हुई नायिका को सिर दबाने में लगा दे। उसका हाथ अपने हाथों में पकड़कर अपने
मस्तक और नेत्रों से लगाये ॥ २३ ॥
औषधापदेशार्थं चास्याः कर्म विनिर्दिशेत् ॥ २४ ॥
जब सिर दबा दे, तो दर्द-निवारक औषधि लगाने के लिये कहे ॥ २४ ॥
इदं त्वया कर्तव्यम्। नह्येतदृते कन्याया अन्येन कार्यमिति गच्छन्ती पुनरा-
गमनानुबन्धमेनां विसृजेत् ॥ २५ ॥
यह कार्य तुम्हें ही करना है, क्योंकि इसे कुमारिका के अतिरिक्त किसी अन्य से नहीं
कराया जाता। यदि वह जाने लगे तो पुनः आने का वचन लेकर ही जाने दे ॥ २५ ॥
अस्य च योगस्य त्रिरात्रं त्रिसन्ध्यं च प्रयुक्तिः ॥ २६ ॥
कन्यासाध्य इस योग को तीन बार रात्रि या सन्ध्या के समय ही प्रयोग करना
चाहिये ॥ २६ ॥
अभीक्ष्णदर्शनार्थमागतायाश्च गोष्ठीं वर्धयेत् ॥ २७ ॥
इस प्रपञ्च का उद्देश्य—बार बार देखने के लिये आयी हुई नायिका के साथ रोचक
वार्ताएँ करनी चाहिये ॥ २७ ॥
अन्याभिरपि सह विश्वासानार्थमधिकमधिकं चाभियुञ्जीत। न तु वाचा
निर्वदेत् ॥ २८ ॥
नायिका को विश्वास दिलाने के लिये अन्यान्य वार्ताएँ करता रहे, किन्तु अपने मुख से
उद्देश्य स्पष्ट न करे ॥ २८ ॥
दूरगतभावोऽपि हि कन्यासु न निर्वेदेन सिध्यतीति घोटकमुखः ॥ २९ ॥
युवतियों का प्रेम और विश्वास कितना भी ऊँचा पहुँच जाये, किन्तु विरक्ति से उनकी
सिद्धि नहीं होती, अतएव उनकी प्राप्ति के लिये निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिये—यह आचार्य
घोटकमुख का मत है ॥ २९ ॥
यदा तु बहुसिद्धां मन्येत तदैवोपक्रमेत् ॥ ३० ॥
जब अनेक उपायों द्वारा नायिका को सिद्ध समझ ले, तभी उसके साथ सम्भोग के लिये
तत्पर होना चाहिये ॥ ३० ॥
प्रदोषे निशि तमसि च योषितो मन्दसाध्वसाः सुरतव्यवसायिन्यो रागवत्यश्च
भवन्ति। न च पुरुषं प्रत्याचक्षते। तस्मात्तत्कालं प्रयोजयितव्या इति
प्रायोवादः ॥ ३१ ॥
समागमकाल—प्रदोष काल में, रात्रि में और अन्धकार में स्त्रियों में भय कम रहता है,
९८ वात्स्यायन-कामसूत्र
उनका अनुराग बढ़ता है और वे सम्भोग की अभिलाषा करती हैं। ऐसे समय वे पुरुष के प्रस्ताव
को मना नहीं कर पातीं। अतएव ऐसे ही समय नायिका को सम्भोग के लिये तैयार करना
चाहिये॥ ३१॥
एकपुरुषाभियोगानां त्वसम्भवे गृहीतार्थया धात्रेयिकया सख्या वा
तस्यामन्तर्भूतया तमर्थमनिर्वदन्त्या सहैनामङ्कमानाययेत्। ततो यथोक्तमभि-
युञ्जीत॥ ३२॥
नायिका से दूर रहने के कारण यदि अकेले अभियोग सम्भव न हो, तो उसकी धाय की
पुत्री या सखी को, जो इस प्रेम-प्रसङ्ग से परिचित हो, माध्यम बना ले, और वह नायिका को
बिना बताये ही, नायक के घर ले आये। तत्पश्चात् पूर्वोक्त विधि से सम्भोग करना चाहिये॥ ३२॥
स्वां वा परिचारिकामादावेव सखीत्वेनास्याः प्रणिदध्यात्॥ ३३॥
अथवा अपनी परिचारिका को उसकी सखी बनाकर पहले से ही उसके पास छोड़
दे॥ ३३॥
यज्ञे विवाहे यात्रायामुत्सवे व्यसने प्रेक्षणक्षकव्यापृते जने तत्र तत्र च
दृष्टेङ्गिताकारां परीक्षितभावामेकाकिनीमुपक्रमेत॥ ३४॥
यज्ञ, विवाह, यात्रा, उत्सव और विपत्ति के समय सभी व्यक्ति व्यग्र (व्यस्त) हो जाते हैं।
ऐसे अवसर पर जिस युवती ने हाव-भाव और चेष्टाओं से अनुकूलता दिखा दी हो, और जिसके
भावों की परीक्षा कर ली गयी हो, उसे गान्धर्व विधि से प्राप्त कर ले॥ ३४॥
न हि दृष्टभावा योषितो देशे काले च प्रयुज्यमाना व्यावर्तन्त इति वात्स्यायनः।
इत्येकपुरुषाभियोगाः॥ ३५॥
जिनके भावों की अनेक बार परीक्षा की जा चुकी हो, ऐसी युवतियाँ देश और काल के
अनुरूप प्रयोग की जायें, तो वे कदापि मना नहीं करतीं—यह महर्षि वात्स्यायन का अभिमत
है॥ ३५॥
एकपुरुषाभियोग नामक प्रकरण पूर्ण॥
मन्दापदेशा गुणवत्यपि कन्या धनहीना कुलीनापि समानैरयाच्यमाना
मातापितृवियुक्ता वा ज्ञातिकुलवर्तिनी वा प्राप्तयौवना पाणिग्रहणं स्वयम-
भीप्सेत॥ ३६॥
प्रयोज्योपावर्तन प्रकरण : विवाह न हो पाने के कारण—हीन कुल में उत्पन्न हुई हो
या गुण सम्पन्न होने पर उसके अभिभावक विवाह न कर रहे हो, अथवा कुलीन होने पर भी
निर्धनता के कारण समानता वाले विवाह न कर रहे हों, अथवा आभिजात्य कुल में उत्पन्न होने
पर भी माता पिता से रहित हो, जाति और कुल के उच्च होने पर भी यौवन आने पर ऐसी कन्या
को स्वयं विवाह कर लेना चाहिये॥ ३६॥
सा तु गुणवन्तं शक्ते सुदर्शनं बालप्रीत्याभियोजयेत्॥ ३७॥
समान पति चुनने के उपाय—ऐसी युवती किसी ऐसे गुणवान्, शक्तिशाली और सुन्दर
युवक से विवाह करे जो बालसखा हो॥ ३७॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९९
यं वा मन्येत मातापित्रोरसमीक्षया स्वयमप्ययमिन्द्रियदौर्बल्यान्मयि प्रवर्तिष्यत
इति प्रियहितोपचारैरभीक्ष्णसंदर्शनेन च तमावर्जयेत् ॥ ३८ ॥
वर में दर्शनीय गुण—ऐसी युवती जिसको यह समझे कि यह माता-पिता की समीक्षा
(आलोचना) की चिन्ता किये बिना, अपने इन्द्रिय-दौर्बल्य के कारण स्वयं ही मुझसे अनुरक्त हो
जायेगा, उसे प्रिय और हितकर उपचारों से और हाव-भावों से अपनी ओर आकृष्ट करे ॥ ३८ ॥
माता चैनां सखीभिर्धात्रेयिकाभिश्च सह तदभिमुखीं कुर्यात् ॥ ३९ ॥
माता का कर्तव्य—माता को चाहिये कि वह युवती की धाय की पुत्री या सखियों के
साथ उसको उस युवक की ओर अग्रसर करे ॥ ३९ ॥
पुष्पगन्धताम्बूलहस्ताया विजने विकाले च तदुपस्थानम्, कलाकौशल-
प्रकाशने वा सम्वाहने शिरसः पीडने चौचित्यदर्शनम्। प्रयोज्यस्य सात्म्ययुक्ताः
कथायोगाः बालायामुपक्रमेषु यथोक्तमाचरेत् ॥ ४० ॥
बाह्य उपचार—युवती को चाहिये कि एकान्त और कुसमय (रागोद्दीपन या रात्रिकाल)
में पुष्प, गन्ध, ताम्बूल आदि से नायक का सत्कार करे। औचित्यपूर्वक कलाकौशल, अङ्गमर्दन
या शिर दबाने की अपनी कुशलता प्रकटित करे। नायक की रुचि के अनुरूप वार्तालाप करे और
बालोपक्रम प्रकरण (तृतीय अधिकरण, तृतीय अध्याय) में नायक के जो उपाय बताये गये हैं,
उन्हें भी प्रयोग में लाये ॥ ४० ॥
न चैवान्तरापि पुरुषं स्वयमभियुञ्जीत। स्वयमभियोगिनी हि युवतिः सौभाग्यं
जहातीत्याचार्याः ॥ ४१ ॥
सम्भोग के लिए पहल घातक—अत्यधिक कामातुर होने पर भी सम्भोग के लिये स्वयं
पहल न करे, क्योंकि सम्भोग के लिये स्वयं ही अभियोग करने वाली युवती अपना सौभाग्य नष्ट
कर देती है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ४१ ॥
तत्रयुक्तानां त्वभियोगानामानुलोम्येन ग्रहणम् ॥ ४२ ॥
नायक के प्रयासों को स्वीकृति—यदि नायक अभियोगों का प्रयोग करे, अर्थात्
रमणेच्छा प्रकटित करे, तो उन्हें अनुकूलता से स्वीकार करे ॥ ४२ ॥
परिष्वक्ता च न विकृतिं भजेत्। श्लक्ष्णमाकारमजानतीव प्रतिगृह्णीयात्।
वदनग्रहणे बलात्कारः ॥ ४३ ॥
आभ्यन्तर उपचार—नायक के आलिङ्गन-चुम्बन आदि करने पर अपना राग प्रकट न
होने दे। नायक के स्निग्ध व्यवहार को मुग्धभाव वाला (अनजान) बनकर ही स्वीकार करे,
और ऐसा व्यवहार करे कि नायक बलपूर्वक मुखचुम्बन कर ले ॥ ४३ ॥
रतिभावनामभ्यर्थ्यमानायाः कृच्छ्राद् गुह्यसंस्पर्शनम् ॥ ४४ ॥
यदि नायक शिश्न को स्पर्श करने के लिये प्रेरित करे, तो कठिनतापूर्वक उसका स्पर्शमात्र
ही करे ॥ ४४ ॥
अभ्यर्थितापि नातिविवृता स्वयं स्यात्। अन्यत्रानिश्चयकालात् ॥ ४५ ॥
महत्त्वपूर्ण परामर्श—नायक के प्रार्थना करने पर भी नायिका को अपने भाव और अङ्ग
१०० वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रत्यङ्गों को नहीं दिखाना चाहिये, क्योंकि वह कब और कैसे विवाह करेगा, यह अभी निश्चित
नहीं है ॥ ४५ ॥
यदा तु मन्येतानुरक्तो मयि न व्यावतिष्यत इति, तदैवैनमभियुञ्जानं
बालभावमोक्षाय त्वरेत् ॥ ४६ ॥
जब नायिका पूर्णतः आश्वस्त हो जाये कि नायक पूरे मनोयोग से मुझ पर अनुरक्त है और
वह प्रत्येक स्थिति में मुझसे विवाह करेगा ही, तभी एकान्त में प्रयत्नशील नायक को अपना
कौमार्य भङ्ग करने दे ॥ ४६ ॥
विमुक्तकन्याभावा च विश्वास्येषु प्रकाशयेत्। इति प्रयोज्यस्योपा-
वर्तनम् ॥ ४७ ॥
गान्धर्व विवाह के पश्चात् जब नायिका अपना कौमार्य भंग करा ले, तो अपनी विश्वस्त
सखियों से यह बता दे। इस प्रकार प्रयोज्य ( नायक ) को अपनी ओर आकृष्ट करने की
विधि पूर्ण हुई ॥ ४७ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
कन्याभियुज्यमाना तु ये मन्येताश्रयं सुखम्।
अनुकूलं च वश्यं च तस्य कुर्यात्परिग्रहम् ॥ ४८ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक दे रहे हैं—
सुखों का आश्रय, अनुकूल और वश्य—अपने उपायों से वर का चयन करती हुई
कन्या, जिसे सुखों का आश्रय, चित्तवृत्ति के अनुकूल चलने वाला और यथोक्तकारी (कहने के
अनुसार करने वाला) माने, उसी से विवाह करे ॥ ४८ ॥
अनपेक्ष्य गुणान् यत्र रूपमौचित्यमेव च।
कुर्वीत धनलोभेन पतिं सापत्नकेष्वपि ॥ ४९ ॥
अर्थलिप्सा—यदि युवती को अर्थलिप्सा हो, धन को ही वह सर्वस्व मानती हो तो रूप,
औचित्य और नायकोचित गुणों की ओर ध्यान न देकर, सपत्नियों के होते हुए भी, धनवान् को
ही अपना पति चुन ले ॥ ४९ ॥
तत्र युक्तगुणं वश्यं शक्तं बलवदर्थिनम्।
उपायैरभियुञ्जानं कन्या न प्रतिलोमयेत् ॥ ५० ॥
विशेष महत्त्वपूर्ण—जो युवक गुण सम्पन्न हो, अपनी चित्तवृत्ति के अनुकूल हो, प्रत्येक
प्रकार से समर्थ हो, प्रबल आकर्षण रखता हो, और प्राप्ति का उपाय भी कर रहा हो, ऐसे युवक
को पतिरूप में पाने का लोभ कन्या को कदापि नहीं छोड़ना चाहिये ॥ ५० ॥
वरं वश्यो दरिद्रोऽपि निर्गुणोऽप्यात्मधारणः।
गुणैर्युक्तोऽपि न त्वेवं बहुसाधारणः पतिः ॥ ५१ ॥
एकनिष्ठ ही वरणीय—चित्तवृत्ति के अनुरूप चलने वाला पति अच्छा है, भले ही वह
दरिद्र ही क्यों न हो, गुणविहीन हो, केवल परिवार का पेट पालने में समर्थ (निर्धन) हो, परन्तु
अनेक सपत्नियों वाला, गुणसम्पन्न और धनवान् पति अच्छा नहीं ॥ ५१ ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०१
प्रायेण धनिनां दारा बहवो निरवग्रहाः ।
बाह्ये सत्युपभोगेऽपि निर्विस्त्रम्भा बहिःसुखाः ॥ ५२ ॥
धनवान् की पत्नी बनने में दोष—धनवानों के घरों में प्रायः अनेक पत्नियाँ होती हैं,
किन्तु वे प्रायः सभी स्वच्छन्द हुआ करती हैं; क्योंकि उन्हें भौतिक सुखों के साधन (भवन,
वाहन, वस्त्राभूषण आदि) तो प्राप्त होते हैं, लेकिन सुरतरूप आन्तरिक सुख प्राप्त नहीं
होता ॥ ५२ ॥
नीचो यस्त्वभियुञ्जीत पुरुषः पलितोऽपि वा।
विदेशगतिशीलश्च न स संयोगमर्हति ॥ ५३ ॥
नीच, वृद्ध और प्रवासी वरणीय नहीं—यदि नीच जाति या अधम स्वभाववाला
व्यक्ति, वृद्ध व्यक्ति या निरन्तर प्रवास में रहने वाला व्यक्ति भी विवाह के लिये आमन्त्रित करे तो
उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसे व्यक्ति ही सम्प्रयोग के योग्य नहीं होते ॥ ५३ ॥
यदृच्छयाभियुक्तो यो दम्भद्यूताधिकोऽपि वा।
सपत्नीकश्च सापत्यो न स संयोगमर्हति ॥ ५४ ॥
बलात्कारी, कपटी, जुआरी वरणीय नहीं—जो स्त्री की इच्छा न होने पर भी केवल
अपनी इच्छा से सम्भोग करता है, जो कपटी और जुआरी है, और जो पत्नी और बच्चों वाला
है, उससे कदापि विवाह नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसा व्यक्ति सम्प्रयोग के योग्य नहीं
होता ॥ ५४ ॥
गुणसाम्येऽभियोक्तृणामेको वरयिता वरः।
तत्राभियोक्तरि श्रैष्ठ्यमनुरागात्मको हि सः ॥ ५५ ॥
अवरणीयों में अनुरागशील ही उत्तम—यदि कन्या को प्राप्त करने का प्रयास करने
वाले कई व्यक्ति हों, तो कन्या उसी का वरण करे जो उससे सच्चा अनुराग रखता हो। प्रयास
करने वालों में निश्छल अनुराग रखने वाला ही श्रेष्ठ होता है ॥ ५५ ॥
एकपुरुषाभियोगादि प्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न ॥
पञ्चम अध्याय
विवाहयोगप्रकरण
प्राचुर्येण कन्याया विविक्तदर्शनस्यालाभे धात्रेयिकां प्रियहिताभ्यामुपगृह्योप-
सर्पेत् ॥ १ ॥
कन्यासिद्धि की विधि—यदि कन्या का एकान्त में अधिक दर्शन सम्भव न हो, तो धाय
की पुत्री या उसकी सखी को प्रिय और हितकर कार्यों द्वारा उपकृत करके उसके समीप
भेजे ॥ १ ॥
१०२ वात्स्यायन-कामसूत्र
सा चैनामविदिता नाम नायकस्य भूत्वा तद्गुणैरनुरञ्जयेत्। तस्याश्च
रुच्यान्नायकगुणान् भूयिष्ठमुपवर्णयेत् ॥ २ ॥
निसृष्टार्था दूती के कार्य—वह नायक से अपरिचित सी बनकर उस नायिका को नायक
के गुणों पर अनुरक्त कर दे। इसके लिये वह नायक के उन्हीं गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करे
जो नायिका को रुचिकर लगते हों ॥ २ ॥
अन्येषां वरयितॄणां दोषानभिप्रायविरुद्धान् प्रतिपादयेत् ॥ ३ ॥
अन्य प्रतिद्वन्द्वियों में दोषदर्शन—अन्य नायकों (जिनमें लड़की की रुचि हो या जिनसे
विवाहविषयक बातें चल रहीं हों) के उन दोषों को प्रकट करे, जिन्हें वह पसन्द न करती हो या
जिनसे वह घृणा करती हो ॥ ३ ॥
मातापित्रोश्च गुणानभिज्ञतां लुब्धतां च चपलतां च बान्धवानाम् ॥ ४ ॥
अभिभावकों की भर्त्सना—दूती नायिका से कहे कि तुम्हारे माता-पिता और भाई-
बन्धु गुणों को नहीं समझते, वे लोभी हैं, इसलिये गुणसम्पन्न वर को न खोजकर गुणविहीन
धनवान् को चाहते हैं ॥ ४ ॥
याश्चान्या अपि समानजातीयाः कन्याः शकुन्तलाद्याः स्वबुद्ध्या भर्त्तारं प्राप्य
सम्प्रयुक्ता मोदन्ते स्म ताश्चास्या निदर्शयेत् ॥ ५ ॥
स्वयंवरण के उदाहरण—अन्य सजातीय कन्याओं और शकुन्तला आदि, जो अपनी
बुद्धि से वर चुनकर, सम्प्रयोग को प्राप्त होकर, आनन्दित रही थीं, की कहानियाँ सुनाये और उसे
स्वयंवरण के लिये प्रेरित करे ॥ ५ ॥
महाकुलेषु सापत्नकैर्बाध्यमाना विद्विष्टाः दुःखिताः परित्यक्ताश्च
दृश्यन्ते ॥ ६ ॥
नायिका को समझाये कि बड़े घरों में सपत्नियों द्वारा पीड़ित, विद्वेष का शिकार बनी,
दुःखी और पतिपरित्यक्ता स्त्रियाँ भी देखी जाती हैं ॥ ६ ॥
आयतिं चास्य वर्णयेत् ॥ ७ ॥
नायक की प्रशंसा—दूती जिस नायक से उसका विवाह कराना चाहे, उसके उज्ज्वल और
मङ्गलमय भविष्य का वर्णन करे ॥ ७ ॥
सुखमनुपहतमेकचारितायां नायकानुरागं च वर्णयेत् ॥ ८ ॥
उसका अक्षुण्ण सुख और नायक का एकचारिता (एकपत्नीव्रत) में अनुराग भी
दिखाये ॥ ८ ॥
समनोरथायाश्चास्या अपायं साध्वसं व्रीडां च हेतुभिरवच्छिन्द्यात् ॥ ९ ॥
जब दूती यह देख ले कि नायिका उसकी ओर आकृष्ट हो रही है, तो समुचित हेतुओं से
उसके भय और सङ्कोच को दूर कर दे ॥ ९ ॥
दूतीकल्पं च सकलमाचरेत् ॥ १० ॥
उसे चाहिये कि दूती के समस्त कर्मों का प्रयोग करे ॥ १० ॥
३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण १०३
त्वामजानतीमिव नायको बलाद् ग्रहीष्यतीति तथा सुपरिगृहीतं स्यादिति
योजयेत् ॥ ११ ॥
नायिका को बता दे कि नायक तुम्हें अपरिचित के समान हर ले जायेगा। इस प्रकार तुम
उसकी पत्नी भी बन जाओगी और तुम्हें कोई दोष भी नहीं देगा—यह अन्त में योजना
करे ॥ ११ ॥
प्रतिपन्नामभिप्रेतावकाशवर्तिनीं नायकः श्रोत्रियागारादग्निमानाय्य कुशाना-
स्तीर्य यथास्मृति हुत्वा च त्रिः परिक्रमेत् ॥ १२ ॥
विधिवत् विवाह आवश्यक—दूती द्वारा बहकायी गयी और नायक द्वारा हरण कर ली
गयी नायिका जब नायक के साथ निर्जन स्थान में पहुँच जाये, तो किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण के
घर से अग्नि लाकर, स्मृतिशास्त्र (धर्मशास्त्र) के अनुसार हवन करके नायक और नायिका,
दोनों अग्नि की तीन परिक्रमा करे ॥ १२ ॥
ततो मातरि पितरि च प्रकाशयेत् ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् पति और पत्नी, दोनों अपने अपने अभिभावकों को विवाह की सूचना दे
दें ॥ १३ ॥
अग्निसाक्षिका हि विवाहा न निवर्तन्त इत्याचार्यसमयः ॥ १४ ॥
अग्नि की साक्षी में किये गये विवाह अमान्य नहीं होते—ऐसा आचार्यों का संकेत
हैं ॥ १४ ॥
दूषयित्वा चैनां शनैः स्वजने प्रकाशयेत् ॥ १५ ॥
गुप्तरूप से दूषित कर विवाह—वाञ्छित कन्या को दूषित कर धीरे से उसके परिवार
वालों को बता देना चाहिये ॥ १५ ॥
तद्बान्धवाश्च यथा कुलस्याघं परिहरन्तो दण्डभयाच्च तस्मा एवैनां दद्युस्तथा
योजयेत् ॥ १६ ॥
नायिका के बान्धव, जिस प्रकार, कुल के कलंक को दूर करते हुए और राजदण्ड से
आतङ्कित होकर उसे नायक को दे दें, वैसी ही योजना करनी चाहिये ॥ १६ ॥
अनन्तरं च प्रीत्युपग्रहेण रागेण तद्बान्धवान् प्रीणयेदिति ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब छलछद्म से कन्या नायक को पत्नीरूप में प्राप्त हो जाये, तो प्रेमपूर्ण
अनुरोधों, उपहारों और उपकारों से कन्या के बन्धु-बान्धवों को प्रसन्न कर ले ॥ १७ ॥
गान्धर्वेण विवाहेन वा चेष्टेत ॥ १८ ॥
अथवा गान्धर्व विवाह की ही चेष्टा करे और इस नीच कर्म में प्रवृत्त ही न हो ॥ १८ ॥
अप्रतिपद्यमानायामन्तश्चारिणीमन्यां कुलप्रमादं पूर्वसंसृष्टां प्रीयमाणां चोपगृह्य
तया सह विषह्यमवकाशमेनामन्यकार्यापदेशनानाययेत् ॥ १९ ॥
मध्यस्थों के माध्यम से गुप्त विवाह—जो नायिका स्वयं पाणिग्रहण कराने में असमर्थ
हो, तो दोनों (वर एवं कन्या) पक्षों से अन्तरङ्ग सम्बन्ध रखने वाली किसी कुलवधू को धन का
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लोभ देकर और मध्यस्थ बनाकर, किसी बहाने से उसके साथ नायिका को निर्धारित स्थान पर
बुलाये ॥ १९ ॥
ततः श्रोत्रियागारादग्निमिति समानं पूर्वेण ॥ २० ॥
तत्पश्चात् किसी वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अग्नि मँगाकर पूर्वोक्त रीति से
विवाह कर ले ॥ २० ॥
आसन्ने च विवाहे मातरमस्यास्तदभिमतदोषैरनुशयं ग्राहयेत् ॥ २१ ॥
माता की सहमति से गुप्त विवाह—यदि नायिका का सम्बन्ध कहीं निश्चित हो गया हो,
तो विवाह-तिथि के निकट आने पर निश्चित वर के दुर्गुणों का वर्णन कर, कन्या की माता के मन
मस्तिष्क को विकृत कर दे, और जब वह उस वर को अपनी पुत्री देने को मना कर दे, तो नायक
की प्रशंसा करके उसके लिए तैयार कर ले ॥ २१ ॥
ततस्तदनुमतेन प्रातिवेश्याभवने निशि नायकमानीय श्रोत्रियागारादग्निमिति
समानं पूर्वेण ॥ २२ ॥
इसके पश्चात् उसकी माता की अनुमति से, पड़ोसी के घर पर, रात्रि के समय नायक को
बुलाकर और वेदपाठी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर से अग्नि लाकर पूर्ववत् विवाह कर ले ॥ २२ ॥
भ्रातरमस्या वा समानवयसं वेश्यासु परस्त्रीषु वा प्रसक्तमसुकरेण
साहाय्यदानेन प्रियोपग्रहैश्च सुदीर्घकालमनुरञ्जयेत् । अन्ते च स्वाभिप्रायं
ग्राहयेत् ॥ २३ ॥
भाई की सहमति से विवाह—वेश्या या परस्त्री पर पूर्णतः आसक्त, समान अवस्था वाले
कन्या के भाई को दुर्लभ सहायता और प्रिय उपहारों से दीर्घकाल तक आकृष्ट और अनुरक्त करे
और अन्त में अपना अभिप्राय प्रकट कर दे ॥ २३ ॥
प्रायेण हि युवानः समानशीलव्यसनवयसां वयस्यानामर्थे जीवितमपि
त्यजन्ति। ततस्तेनैवान्यकार्यात् तामानाययेत्। विषह्यं सावकाशमिति समानं
पूर्वेण ॥ २४ ॥
यह सुनिश्चित तथ्य है कि प्रायः युवक समान शील, व्यसन और अवस्था वाले युवकों के
लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर डालते हैं। अतएव भाई को ही माध्यम बनाकर किसी बहाने
से नायिका को बुला ले और किसी निरापद स्थान पर पूर्ववत् अग्नि की साक्षी में विवाह कर
ले ॥ २४ ॥
अष्टमीचन्द्रिकादिषु च धात्रेयिका मदनीयमेनां पाययित्वा किञ्चिदात्मनः
कार्यमुद्दिश्य नायकस्य विषह्यं देशमानयेत्। तत्रैनां मदात् संज्ञामप्रतिपद्यमानां
दूषयित्वेति समानं पूर्वेण ॥ २५ ॥
पैशाचविवाह—अष्टमी, चन्द्रिका आदि उत्सवों पर धाय की पुत्री या सखी नायिका को
मदिरा आदि पिलाकर, अपने किसी कार्य के बहाने निरापद स्थान पर ले आये। वहाँ मदिरापान
के कारण स्थिति न समझ पाने वाली नायिका को नायक से दूषित कराकर उसके बन्धु-बान्धवों
से प्रकट कर दिया जाये ॥ २५ ॥