वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ८७
कुचस्पर्श—नायिका के इस प्रकार ताम्बूल आदि रखने पर, नायक आच्छुरितक नामक
आलिङ्गन से, नायिका के दोनों स्तनरूपी अर्धोन्मीलित पुष्पों का स्पर्श करे ॥ २२ ॥
वार्यमाणश्च त्वमपि मां परिष्वजस्व ततो नैवमाचरिष्यामीति स्थित्या
परिष्वज्येत। स्वं च हस्तमानाभिदेशात् प्रसार्य निवर्तयेत्। क्रमेण चैना-
मुत्सङ्गेमारोप्याधिकमधिकमुपक्रमेत्। अप्रतिपद्यमानां च भीषयेत् ॥ २३ ॥
परवर्ती क्रियाएँ—यदि पत्नी स्तनों का स्पर्श न करने दे, तो 'तुम भी मेरा इसी प्रकार
आलिङ्गन करो, मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा' यह कहकर उसका आलिङ्गन करे। अपने हाथ को उसके
स्तनों से नाभिदेश तक ले जाकर हटा ले। तत्पश्चात् उसे क्रमशः अपनी गोद में बिठाने का प्रयत्न
करे, और फिर धीरे धीरे आगे की क्रियाएँ बढ़ाता जाये। यदि वह ना करे तो नखक्षत-दन्तक्षत
आदि की बात सुनाकर उसे भयभीत कर दें ॥ २३ ॥
अहं खलु तव दन्तपदान्यधरे करिष्यामि स्तनपृष्ठे च नखपदम्। आत्मनश्च स्वयं
कृत्वा त्वया कृतमिति ते सखीजनस्य पुरतः कथयिष्यामि। सा त्वं किमत्र वक्ष्यसीति
बालविभीषिकैर्बालप्रत्यायनैश्च शनैरेनां प्रतारयेत्।
आतंकित करने की रीति—यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगी तो मैं तुम्हारे अधर पर
दन्तक्षत और स्तनों पर नखक्षत बना दूँगा। मैं अपने शरीर पर स्वयं नखक्षत करके तुम्हारी
सखियों से कहूँगा कि तुम्हारी सखी ने मेरे शरीर पर ये नखक्षत बना दिये हैं। तब तुम उनके
सामने क्या कहोगी ? इस प्रकार बच्चों के समान पत्नी को डरा धमकाकर धीरे धीरे उसे अपने
कार्यों में लगा ले ॥ २४ ॥
द्वितीयास्यां तृतीयास्यां च रात्रौ किञ्चिदधिकं विस्रम्भिां हस्तेन
योजयेत् ॥ २५ ॥
द्वितीय और तृतीय रात्रि—इस प्रकार प्रथम रात्रि में विश्वास में आयी हुई नायिका को
दूसरी और तीसरी रात्रि में कुछ अधिक विश्वास में लेकर उसकी जाँघों आदि पर हाथ फेरना
चाहिये ॥ २५ ॥
सर्वाङ्गिकं चुम्बनमुपक्रमेत ॥ २६ ॥
हस्तयोजन ( हाथ फेरना ) के उपाय—यदि नायिका नाभि से नीचे के अङ्गों पर
हस्तयोजन न करने दे, तो मस्तक, नयन कपोल आदि का चुम्बन लेना प्रारम्भ कर दे ॥ २६ ॥
उर्वोश्चोपरि विन्यस्तहस्तः संवाहनक्रियायां सिद्धायां क्रमेणोरुमूलमपि
संवाहयेत्। निवारिते संवाहने को दोष इत्याकुलयेदेनाम्। तच्च स्थिरीकुर्यात्। तत्र
सिद्धाया गुह्यदेशाभिमर्शनम् ॥ २७ ॥
हस्तयोजनविधि—जाँघों के ऊपर हाथ रखकर संवाहन (मुट्ठी भरना) कर्म करता हुआ
नायक क्रमशः नायिका की जाँघों के जोड़ तक हाथ ले जाये। यदि नायिका ऐसा करने से मना
करे, तो 'इसमें क्या दोष है ?'—ऐसा कह दे और जाँघों को सहलाने के साथ ही आलिङ्गन और
चुम्बन से व्याकुल बना दे, लेकिन जाँघों का संवाहनकर्म स्थिरतापूर्वक करता रहे। यदि नायिका
इसमें रुचि लेने लगे तो हाथ धीरे धीरे योनि तक पहुँचा देना चाहिये ॥ २७ ॥