वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९३
नायक का वेश और कार्य—नायिका के समक्ष नायक को भव्य वेशभूषा में ही रहना
चाहिये और सदैव उसकी दृष्टि में पड़ते रहना चाहिये। यह मुझ से प्रेम करती है या नहीं—इस
बात को सङ्केत और चेष्टाओं से समझ लेना चाहिये ॥ २३ ॥
युवतयो हि संसृष्टमभीक्ष्णदर्शनं च पुरुषं प्रथमं कामयन्ते। कामयमाना अपि तु
नाभियुञ्जत इति प्रायोवादः। इति बालायामुपक्रमाः ॥ २४ ॥
भव्य वेशभूषा का कारण—यह निश्चित बात है कि अधिकांश युवतियाँ अपने परिचित
और सदैव दिखने वाले पुरुषों को चाहती हैं, और चाहती हुई भी लज्जावश उनसे समागम नहीं
करता इस प्रकार बाला के उपक्रम पूर्ण हुए ॥ २४ ॥
तानिङ्गिताकारान् वक्ष्यामः ॥ २५ ॥
युवक द्वारा कन्या-प्राप्ति के प्रयासों में कहा गया है—'यह मुझसे प्रेम करती है या नहीं,
इस बात को सङ्केत और चेष्टाओं से समझना चाहिये।' इसलिए अब सङ्केत और चेष्टाओं को
बताते हैं। शास्त्रकार वात्स्यायन इसके निर्देश के लिए सूत्र देते हैं—
इङ्गिताकारसूचन प्रकरण—अब संकेत और चेष्टाओं को कहेंगे ॥ २५ ॥
सम्मुखं तं तु न वीक्षते। वीक्षिता व्रीडां दर्शयति। रुच्यमात्मानोऽङ्गमपदेशेन
प्रकाशयति। प्रमत्तं प्रच्छन्नं नायकमतिक्रान्तं च वीक्षते ॥ २६ ॥
देखने की रीति—अधिकांशतः युवतियाँ सम्मुख खड़े नायक को नहीं देखतीं। नायक
द्वारा देखे जाने पर लज्जा से मुख नीचा कर लेती है। अपने स्तन आदि मनोहर अंगों को किसी
बहाने से दिखाती हैं। यदि नायक उनकी ओर उन्मुख न हो, असावधान हो या दूर हो, तो जी
भरकर देखती हैं ॥ २६ ॥
पृष्टा च किञ्चित् सस्मितमव्यक्ताक्षरमनवसितार्थं च मन्दमन्दमधोमुखी
कथयति। तत्समीपे चिरं स्थानमभिनन्दति। दूरे स्थिता पश्यतु मामिति मन्यमाना
परिजनं सवदनविकारमाभाषते। तं देशं न मुञ्चति ॥ २७ ॥
बोलने की रीति—अधिकांशतः युवतियाँ नायक द्वारा कुछ पूछे जाने पर मन्द मन्द
मुस्काते हुए एवं मुख नीचा करके अस्पष्ट भाषा में ऐसा उत्तर देती हैं जिसका अर्थ शीघ्र ही समझ
में न आये। नायक के पास देर तक ठहरना पसन्द करती हैं। दूर खड़ी 'यह मुझ देखे' ऐसा
मानती हुई, अपने परिजनों के साथ मुख बनाकर बोलती हैं और उस स्थान को नहीं
छोड़तीं ॥ २७ ॥
यत्किञ्चिद् दृष्ट्वा विहसितं करोति। तत्र कथामवस्थानार्थमनुबध्नाति।
बालस्याङ्कगतस्यालिङ्गनं चुम्बनं च करोति। परिचारिकायास्तिलकं च रचयति।
परिजनानवष्टभ्य तास्तांश्च लीला दर्शयति ॥ २८ ॥
भावप्रेरित चेष्टाएँ—जहाँ नायक खड़ा हो, वहाँ कुछ भी देखकर हँसती रहती हैं। वहाँ
खड़े रहने के लिये बातें प्रारम्भ कर देती हैं। गोद में स्थित बालक का आलिङ्गन और चुम्बन
करने लगती हैं। परिचारिका से अपना तिलक ठीक कराती हैं तथा परिजनों सहारा लेकर
भावप्रेरित चेष्टाएँ दिखाने लगती हैं ॥ २८ ॥