वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० वात्स्यायन-कामसूत्र
के कारण अभिभावक अपनी कन्याएँ नहीं देते, उन्हीं हीनताओं से युक्त, माता-पिता से रहित,
असहाय बालक अपने मामा के घर रहकर, धनोत्कर्ष के कारण सर्वथा अलभ्य ममेरी बहिन
(मामा की लड़की) को भी सिद्ध कर लेते हैं, भले ही उसका वाग्दान हो भी गया हो। इसी
प्रकार अन्य युवकों को भी वाञ्छित कन्या को सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ३ ॥
अन्यामपि बाह्यां स्पृहयेत् ॥ ४० ॥
मामा की बेटी के अतिरिक्त जो कन्या अपने माता-पिता के गोत्र की न हो, उसे भी इसी
प्रकार अनुरक्त करके गान्धर्वविवाह कर लेना चाहिये ॥ ४ ॥
बालायामेवं सति धर्माधिगमे संवननं श्लाघ्यमिति घोटकमुखः ॥ ५ ॥
यदि लड़की से बाल्यकाल से ही सच्चा प्रेम है, तो उसे वश में कर लेना—विवाह कर
लेना (श्लाघनीय ही है) ऐसा आचार्य घोटकमुख का मत है ॥ ५ ॥
तया सह पुष्पावचयं ग्रथनं गृहकं दुहितृकाक्रीडायोजनं भक्तपानकरणमिति
कुर्वीत। परिचयस्य वयसश्चानुरूप्यात् ॥ ६ ॥
बालक के प्रयास—वाञ्छित कन्या के साथ फूल चुनना, फूलों की मालाएँ बनाना,
मिट्टी के घरौंदे बनाना, गुड़ियों का खेल खेलना, भात बनाना, पेयपदार्थ तैयार करना—ये खेल
अपने परिचय और अवस्था के अनुरूप खेले ॥ ६ ॥
आकर्षक्रीडा पट्टिकाक्रीडा मुष्टिद्यूतक्षुल्लककादिद्यूतानि मध्यमाङ्गुलिग्रहणं
षट्पाषाणकादीनि च देश्यानि तत्सात्म्यात् तदामदासचेटिकाभिस्तया च सहानु-
क्रीडेत ॥ ७ ॥
रस्सा खींचना, दोनों हाँथों की अंगुलियों को एक-दूसरे में फँसाकर चक्कर लगाते हुए
खेलना, मुट्ठी में कोई वस्तु रखकर पूछना कि बता—इसमें क्या है ? बीच की अंगुलि को अन्य
अंगुलियों में छिपाकर पकड़वाना और गोटी खेलना—बाल्यकाल में इस देश्य खेलों को भी
वाञ्छित कन्या के साथ खेलना चाहिये ॥ ७ ॥
श्वेडितकानि, सुनिमीलितकामारब्धिकां लवणवीथिकामनिलताडितां
गोधूमपुञ्जिकामङ्गुलिताडितकाम् सखीभिरन्यानि च देश्यानि ॥ ८ ॥
आँखमिचौनी, कृष्णफलक्रीड़ा, लवणवीथिका, अनिलताडितका, गोधूमपञ्जिका,
अंगुलिताड़ितका तथा अपने अपने प्रदेश में प्रचलित खेलों को वाञ्छित कन्या के साथ खेलना
चाहिये ॥ ८ ॥
यां च विश्वास्यामस्यां मन्येत तया सह निरन्तरां प्रीतिं कुर्यात्। परिचयाँश्च
बुध्येत् ॥ ९ ॥
युवक के प्रयास—जिस कन्या से युवक प्रेम करना चाहता हो, उसकी विश्वस्त सखी से
निरन्तर प्रेम और परिचय बढ़ाता रहे ॥ ९ ॥
धात्रेयिकां चास्याः प्रियहिताभ्यामधिकमुपगृह्णीयात्। सा हि प्रीयमाणा
विदिताकाराप्यप्रत्यादिशन्ती तं तां च योजयितुं शक्नुयात्। अनभिहितापि
प्रत्याचार्यकम् ॥ १० ॥