वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ वात्स्यायन-कामसूत्र
रशनावियोजनं नीवीविस्रंसनं वसनपरिवर्तनमूरुमूलसंवाहनं च। एते
चास्यान्यापदेशाः। युक्तयन्त्रां रञ्जयेत्। न त्वकाले व्रतखण्डनम्॥ २८॥
नीवीविस्रंसन (नाड़ा खोलना) आदि कार्य—जाँघों का संवाहन करते समय ही
करधनी खोलना, नाड़ा खोलना और कपड़े हटाना—ये कार्य भी होने चाहिये। ये सम्पूर्ण क्रियाएँ
नायिका के मन में प्रेम और विश्वास उत्पन्न करने के लिए हैं, असमय में ब्रह्मचर्य का खण्डन
करने के लिए नहीं। सम्भोग में उसका पूर्ण रञ्जन करे, लेकिन प्रथम तीन रात्रियों में ब्रह्मचर्य का
त्याग न करे॥ २८॥
अनुशिष्याच्च। आत्मानुरागं दर्शयेत्। मनोरथांश्च पूर्वकालिकाननुवर्णयेत्।
आयत्यां च तदानुकूल्येन प्रवृत्तिं प्रतिजानीयात्। सपत्नीभ्यश्च साध्वसमवच्छिन्द्यात्।
कालेन च क्रमेण विमुक्तकन्याभावामनुद्वेजयन्नुपक्रमेत्। इति कन्यावि-
स्रम्भणम्॥ २९॥
अन्य कार्य—प्रथम तीन रात्रियों में पत्नी को कामकला की शिक्षा देनी चाहिये। अपने
प्रेम को प्रकट करना चाहिये। अपने पहले मनोरथों को उसे सुनाना चाहिये। भविष्य में उसके
अनुकूल चलने की प्रतिज्ञा करनी चाहिये। उसके हृदय से सपत्नियों का भय निकाल देना
चाहिये। कालक्रम से जैसे जैसे उसका कन्याभाव दूर होता जाये, वैसे वैसे उसे विना उद्विग्न
किये ही अधिकाधिक उपक्रियाओं (आलिङ्गन, चुम्बन, नखक्षत, प्रहणन, सीत्कार आदि) का
उपयोग करता रहे। इस प्रकार कन्याविश्रम्भण प्रकरण पूर्ण हुआ॥ २९॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
एवं चित्तानुगो बालामुपायेन प्रसाधयेत्।
तथास्य सानुरक्ता च सुविस्रब्धा प्रजायते॥ ३०॥
प्रकरण का उपसंहार—इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक प्राप्त होते हैं, उन्हें उद्धृत
करते हैं—इस प्रकार नवपरिणीता पत्नी के हृदय की प्रवृत्तियों को समझकर, उसे युक्तिपूर्वक
सिद्ध कर ले, तो वह विश्वस्त और अनुरक्त हो जायेगी॥ ३०॥
नात्यन्तमानुलोम्येन न चातिप्रातिलोम्यतः।
सिद्धिं गच्छति कन्यासु तस्मान्मध्येन साधयेत्॥ ३१॥
ध्यातव्य तथ्य—नवपरिणीता पत्नी से न तो दास बनकर सुख प्राप्त किया जा सकता है
और न उससे प्रतिकूल होकर ही, इसलिये उसे मध्यममार्ग (कभी प्रेम और कभी कठोरता) से ही
प्रसन्न करना चाहिये॥ ३१॥
आत्मनः प्रीतिजननं योषितां मानवर्धनम्।
कन्याविस्रम्भणं वेत्ति यः स तासां प्रियो भवेत्॥ ३२॥
विश्वस्त बनाने का फल—स्त्रियों के मन में अपने प्रति प्रीति उत्पन्न करना, उनका
सम्मान करना और नवपरिणीता में विश्वास जगाना—इन तीन बातों को जो जानता है, वही
स्त्रियों का प्रिय हो सकता है॥ ३२॥
अतिलज्जान्वितेत्येवं यस्तु कन्यामुपेक्षते।