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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 248 में से

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पृष्ठ 118

९२ वात्स्यायन-कामसूत्र
काला रङ्ग आदि, चन्दन, कुंकुम, सुपारी, पान आदि वस्तुएँ समय और शक्ति के अनुरूप,
अवसर देखकर, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में अपनी प्रेमिका को देता रहे। इन पदार्थों को जिस प्रकार
भी सम्पूर्ण अभिप्रायों को बढ़ाने वाला समझे, उसी प्रकार उन्हें देने का प्रयास करना
चाहिये॥ १६॥
वीक्षणे च प्रच्छन्नमर्थयेत् तथा कथायोजनम्॥ १७॥
उपहारदान का प्रयोजन—नायिका से प्रच्छन्न रूप से मिलने का अनुरोध करे और ऐसी
ही कथावार्ताएँ सुनाये जिससे उसका अनुराग बढ़े॥ १७॥
प्रच्छन्नदानस्य तु कारणमात्मनो गुरुजनाद्भयं ख्यापयेत्। देयस्य चान्येन
स्पृहणीयत्वमिति॥ १८॥
यदि नायिका प्रच्छन्न रूप से वस्तुएँ देने का कारण पूछे तो अपने गुरुजन का भय बताये
अथवा कहे कि दी जाने वाली वस्तु को अन्य व्यक्ति भी चाहते हैं॥ १८॥
वर्धमानानुरागं चाख्यानके मनः कुर्वतीमन्वर्थाभिः कथाभिश्चित्तहारिणीभिश्च
रञ्जयेत्॥ १९॥
बढ़ते हुए अनुराग के समय यदि नायिका कथा सुनने में रुचि प्रदर्शित करे, तो नायक को
अवसरानुकूल मनोहर कथाओं से उसका मनोरञ्जन करना चाहिये॥ १९॥
विस्मयेषु प्रसह्यमानामिन्द्रजालैः प्रयोगैर्विस्मापयेत्। कलासु कौतुकिनीं
तत्कौशलेन गीतप्रियां श्रुतिहरैर्गीतैः। आश्वयुज्यामष्टमीचन्द्रके कौमुद्यामुत्सवेषु
यात्रायां ग्रहणे गृहाचारे वा विचित्रैरापीडैः कर्णपत्रभङ्गैः सिक्तकप्रधानैर्वस्त्रा-
ङ्गुलीयकभूषणदानैश्च। नो चेद्दोषकराणि मन्येत॥ २०॥
कौतुकप्रदर्शन—यदि नायिका की कौतुक देखने में रुचि हो, तो उसे इन्द्रजाल (जाल)
के खेल दिखाकर आश्चर्यचकित कर दे। यदि कलाओं का कौशल देखना चाहती हो तो
कलाकौशल दिखाकर प्रसन्न करे। कोजागरीव्रत, बहुला अष्टमी, कौमुदी पर्व आदि उत्सवों के
दिन,देवयात्रा और ग्रहण के दिन घर आने पर विचित्र प्रकार के आपीड, कर्णपत्रभङ्ग, मोम,
वस्त्र, अंगूठी, आभूषण आदि देकर उसे प्रसन्न करे, किन्तु ये वस्त्राभूषण तभी दे, जब इन्हें देने से
किसी प्रकार का दोष (कलह, अपयश आदि) न देखे॥ २०॥
अन्यपुरुषविशेषाभिज्ञतया धात्रेयिकास्याः पुरुषप्रवृत्तौ चातुःषष्टिकान्
योगान् ग्राहयेत्॥ २१॥
धाय की पुत्री या सखी नायक की प्रशंसा करते हुए कहे कि यह कामकला में निपुण हैं,
और उसे नायक से मिलवाकर कामकला के चौंसठ योगों को सिखवाये॥ २१॥
तद्ग्रहणोपदेशेन च प्रयोज्यायां रतिकौशलमात्मनः प्रकाशयेत्॥ २२॥
रतिकौशल का प्रकटीकरण—सखी द्वारा प्रशंसा किये जाने पर नायक को चाहिये कि
उनके उपदेश से नायिका पर अपना रतिकौशल प्रकट करे॥ २२॥
उदारवेषश्च स्वयमनुपहतदर्शनश्च स्यात्। भावं च कुर्वतीमिङ्गिताकारैः
सूचयेत्॥ २३॥