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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 248 में से

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पृष्ठ 117

३. कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण ९१
सखी को वशवर्ती बनाने का लाभ—नायिका की धाय की पुत्री या सखी को प्रिय
और हितकर बातों से अपने वशीभूत कर लेना चाहिये, क्योंकि वशीभूत हो जाने पर वह दोनों
के मनोभावों को जानकर, किसी से कहे बिना ही मिला देगी, मिलाने में तो वह आचार्य ही
होती है ॥ १० ॥
अविदिताकारापि हि गुणानेवानुरागात् प्रकाशयेत् । यथा प्रयोज्यानु-
रज्येत ॥ ११ ॥
सखी का कार्य—नायिका के मनोभावों को विना जाने ही वह नायक के अनुराग से
उसके गुणों को इस प्रकार प्रकाशित करे कि नायिका उस पर अनुरक्त हो जाये ॥ ११ ॥
यत्र यत्र च कौतुकं प्रयोज्यायास्तदनु प्रविश्य साधयेत् ॥ १२ ॥
नायक के कार्य—नायिका की जिस जिस वस्तु की कामना हो, नायक उसे समझकर
उसे वह वस्तु प्राप्त करा दे ॥ १२ ॥
क्रीडनकद्रव्याणि यान्यपूर्वाणि यान्यन्यासां विरलशो विद्येरँस्तान्यस्या
अयत्नेन सम्पादयेत् ॥ १३ ॥
जो अन्य सखियों के पास कम ही दिखते हों, ऐसे बहुमूल्य और दुर्लभ खिलौने नायिका
को सहजतापूर्वक लाकर दे ॥ १३ ॥
तत्र कन्दुकमनेकभक्तिचित्रमल्पकालान्तरितमन्यदन्यच्च सन्दर्शयेत् । तथा
सूत्रदारुगवलगजदन्तमयीर्दुहितृका मधूच्छिष्टपिष्टमृन्मयीश्च ॥ १४ ॥
खिलौने—नायक को चाहिये कि नायिका को ऐसी गेंद दिखाये जिसमें भिन्न भिन्न रंगों
की फाँके बनी हों, उनमें सुन्दर सुन्दर चित्र अङ्कित हों और जो लुढ़कने पर थोड़े थोड़े समय
बाद रङ्ग बदलती जायें। अन्य दूसरे प्रकार की गेंदें भी दिखाये। धागा, लकड़ी, सींग, हाथीदाँत,
मोम, मैदा और मिट्टी से बनी भिन्न भिन्न प्रकार की पुतलियाँ और गुड़िया दिखाये ॥ १४ ॥
भक्तपाकार्थमस्या महानसिकस्य च दर्शनम् ॥ १५ ॥
भात (भोजन) बनाने के लिये पाककला सिखानी चाहिये ॥ १५ ॥
काष्ठमेढ्रकयोश्च संयुक्तयोश्च स्त्रीपुंसयोरजैडकानां देवकुलगृहकाणां
मृद्विदल-काष्ठविनिर्मितानां शुकपरभृतमदनसारिकालावकुक्कुटतित्तिरिपञ्जर-
काणां च विचित्राकृतिसंयुक्तानां जलभाजनानां च यन्त्रिकाणां वीणिकानां
पटोलिकानामलक्तकमनःशिलाहरितालहिङ्गुलकश्यामवर्णकादीनां तथा चन्दन-
कुङ्कुमयोः पूगफलानां पत्राणां कालयुक्तानां च शक्तिविषये प्रच्छन्नं दानं प्रकाश-
द्रव्याणां च प्रकाशम् । यता च सर्वाभिप्रायसंवर्धकमेनं मन्येत तथा प्रयति-
तव्यम् ॥ १६ ॥
एक ही लकड़ी पर बने स्त्री-पुरुष, बकरा-बकरी, गाय-बैल आदि के युगल, मिट्टी,
बाँस और लकड़ी से निर्मित देवमन्दिर, पिंजरों में स्थित तोता, कोयल, मैना, सारिका, लवा,
मुर्गा (कुक्कुट), तीतर आदि पक्षी, विचित्र आकृति वाले शङ्ख, सीपियाँ, कौड़ी आदि से निर्मित
पानी के बर्तन, वीणा, प्रसाधन की सामग्री, पटोलिका, महावर, मनःशिला, हरिताल, हिंगुल,
काम० ८