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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 248 में से

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पृष्ठ 112

८६ वात्स्यायन-कामसूत्र
सभी नवविवाहिता कन्याएँ पति द्वारा कही गयी प्रत्येक बात को सुन लेती हैं, किन्तु पूछी
गयी किसी भी बात का उत्तर नहीं देतीं—यह आचार्य घोटकमुख का अभिमत है ॥ १७ ॥
निर्बध्यमाना तु शिरःकम्पेन प्रतिवचनानि योजयेत्। कलहे तु न शिरः
कम्पयेत् ॥ १८ ॥
नवपरिणीता के उत्तर देने की रीति—पति द्वारा बार बार बोलने के लिये विवश किये
जाने पर, सिर हिलाकर हाँ या ना का उत्तर दे और यदि वह क्रुद्ध हो तो सिर भी न
हिलाये ॥ १८ ॥
इच्छसि मां नेच्छसि वा, किं तेऽहं रुचितो न रुचितो वेति पृष्टा चिरं स्थित्वा
निर्बध्यमाना तदानुकूल्येन शिरः कम्पयेत्। प्रपञ्च्यमाना तु विवदेत् ॥ १९ ॥
प्रेमजिज्ञासा का स्वरूप—'तुम मुझे चाहती हो या नहीं', 'मैं तुम्हें पसन्द आया या
नहीं'—इस प्रकार पति द्वारा पूछे जाने पर, पत्नी कुछ समय ठहरकर, आग्रह करने पर ही
अनुकूलतासूचक सिर हिलाये, और यदि क्रुद्ध हो तो झगड़ पड़े ॥ १९ ॥
संस्तुता चेत् सखीमनुकूलामुभयतोऽपि विस्रब्धां तामन्तरा कृत्वा कथां
योजयेत्। तस्मिन्नधोमुखी विहसेत्। तां चातिवादिनीमधिक्षिपेद्विदेच्च। सा तु परि-
हासार्थमिदमनयोक्तमिति चानुक्तमपि ब्रूयात्। तत्र तामपनुद्य प्रतिवचनार्थ-
मभ्यर्थ्यमाना तूष्णीमासीत। निर्बध्यमाना तु नाहमेवं ब्रवीमीत्यव्यक्ताक्षरमनवसितार्थं
वचनं ब्रूयात्। नायकं च विहसन्ती कदाचित् कटाक्षैः प्रेक्षेत। इत्यालाप-
योजनम् ॥ २० ॥
पूर्वपरिचिता के साथ वार्तालाप की रीति—यदि नवपरिणीता पत्नी पहले से परिचित
है तो अपने अनुकूल और दोनों की विश्वस्त सखी को माध्यम बनाकर इस प्रकार वार्ता प्रारम्भ
करे। इसमें पति की बातें सुनकर कन्या हँसती रहे और सखी के कुछ अधिक बोलने पर उस पर
यह आक्षेप लगाये कि तू बहुत बोलने लगी है और उससे विवाद करने लगे। सखी भी हँसी के
लिए कही और अनकही बातें भी कह डाले कि यह तो यहाँ तक कह रही थी कि जबसे उन्हें
देखा है तब से न दिन में चैन मिलता है और न रात में नींद आती है। यदि सखी को रोककर
उससे उत्तर देने का निवेदन किया जाये, तो 'मैंने ऐसे नहीं कहा' इस प्रकार अस्पष्ट शब्द और
अनिश्चित अर्थों वाले अक्षरों में उत्तर दे। कभी कभी नायक की ओर कटाक्षों से देखे। प्रारम्भ में
यह वार्तालाप की रीति हुई ॥ २० ॥
एवं जातपरिचया चानिर्वदन्ती तत्समीपे याचितं ताम्बूलं विलेपनं स्रजं
निदध्यात्। उत्तरीये वास्य निबध्नीयात् ॥ २१ ॥
प्रिय के पास ताम्बूल आदि रखना—इस प्रकार परिचय हो जाने पर नायिका, माँगने
पर ताम्बूल, चन्दन और माला, विना बोले ही, नायक के पास रख दे अथवा उसके उत्तरीय में
बाँध दे ॥ २१ ॥
तथायुक्तामाच्छुरितकेन स्तनमुकुलयोरुपरि स्पृशेत् ॥ २२ ॥