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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

४०० वरिवस्यारहस्ये
श्वेत एवं लोहित बिन्दुओं का सामरस्य है। ‘सूर्य’ काम है । यह ‘काम’ इसलिए
कहा जाता है क्योंकि इसमें कमनीयता है । ‘कला’ बिन्दुद्वय है जो कि चन्द्रमा एवं
अग्नि के रूप में स्थित है । ‘कला’ चन्द्राग्निशरीरी बिन्दु है । यह ‘कामकला
विद्या’ है जो कि देवी के चक्रों के क्रम का वर्णन करती है । जो कोई इसे जानता
है वह मुक्त एवं महात्रिपुरसुन्दरी स्वरूप हो जाता है—
‘इति कामकला विद्या देवी चक्रात्मिका सेयम् ।
विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरी रूपः ॥१
‘कामबीज’ का अतिशय महत्व है । देवी स्वयं कामबीजस्वरूपिणी है देव मंत्रों
में, विष्णु मंत्रों में परात्पर कामबीज विद्यमान है । कामबीज से विष्णु विग्रह का
प्रकटीकरण होता है—‘शून्यमध्ये स्थिता देवि काम बीज स्वरूपिणी । लकारसंयुता
या सा कृष्णमाता प्रगीयते । सर्वेषु विष्णुमंत्रेषु काम बीजं परात्परं । हृदि शून्ये
महेशानि विष्णोमंत्रं जपेत् प्रिये । ततो वै कामबीजान्तु जायते विष्णु विग्रहं ॥ अतः
काममदं विष्णुं हृदि भावय पार्वति ॥’२ ‘योगिनीहृदय’ में चक्र को भी कामकला
स्वरूप कहा गया है—‘चक्रं कामकलारूपं प्रसारपरमार्थतः ॥’
‘बीजात्’ = कामकलारूप बीज से यथा धान्यादि से । ‘मूलं’ = वृक्ष का
अंकुरादि भाग, जड़ एवं तना ॥ मंत्र ॥ ‘क्षेत्रस्य’ = शरीर का ॥ बीज—मूल—
वृक्षावयव (मानव का शरीराङ्ग) (बाह्य एवं आभ्यन्तर दोनों) । अन्तस्थ-बाह्य =
आन्तर भाग में स्थित एवं बाह्यभाग में स्थित । ‘विस्तारौ’ = “विस्तारो विग्रहो
व्यासः स च शब्दस्य विस्तरः’’ (अमरकोष) । स्तॄञ् आच्छादने (क्र्या० ३० से०)
‘प्रथने वाव शब्दे’ (३।३।३३) इति घञ् ॥
‘यद्यप्यनयोः’ = यद्यपि इन दोनों में । (आन्तर एवं बाह्य दोनों भागों में) ॥
‘साम्यं’ = समानता ॥ ‘समतुल्यः सदृक्षः सदृशः सदृक् । साधारणः समानश्च’
(अमर कोष) ॥ सादृश्य का भाव ॥ समानता का भाव ॥ ‘‘अन्तरङ्गनाशे
बाह्याङ्गसहित वृक्षनाशः, बाह्याङ्गमात्र नाशेऽपि न वृक्षस्य न वान्तरङ्गस्य नाशः ॥’’
‘प्राधान्यं’ = प्रधानता ॥ प्रामुख्य ॥ ‘प्रमुखं प्रथमेमुख्ये’ ।३
“प्रधानं स्यान्महामात्रे प्रकृतौ परमात्मनि ।
प्रज्ञायामपि च क्लीबमेकत्वे तूत्तमे सदा ॥’’४
क्लीबे प्रधानं प्रमुखं प्रवेकानुत्तमोत्त माः ।
मुख्यवर्यवरेण्याश्च प्रवह्रनिवरार्ध्यवत् ॥’’५
‘अङ्ग’ = शरीरावयव । ‘अङ्गंप्रतीकोऽवयवोऽपघनः ॥’ अगिगतौ’ (भ्वा० प०
से०) अच् (३।१।१३४)६ ‘अङ्गं’ गात्रे प्रतीकोपाययोः पुंभूम्नि नीवृति । क्लीबैकत्वे
त्वप्रधाने त्रिष्वङ्गवति चान्तिके ॥’’७
१. कामकलाविलास (पुण्यानन्दनाथ) २. कामधेनु तन्त्र (११ पटल)
३. हैम कोष ४. मेदिनी कोष
५-६. अमर कोष ७. मेदिनी कोष

द्वितीयोऽंशः ४०१
यद्यपीमान्याव श्यकतरत्वादत्र ग्रन्थे निबद्धानि, तथापि पाण्डित्यबलादेतद्-
ग्रन्थावलोकनादेव गुरुमनपेक्ष्य स्वीकारः पापायेत्याह-
सद्गुरुकुलतः कृपया लब्धा कामानियं सूते ।
निजबुद्धिमात्रजन्या पापं कन्या यथा स्वीया ॥ १६५ ॥
('श्रीविद्या' की गुरु-परम्परा से प्राप्ति की अनिवार्यता)
सद्गुरु के कुल द्वारा उसकी अनुकम्पा से सम्प्राप्त यह श्रीविद्या निःशेष
कामनाओं की पूर्ति उत्पन्न करती है । अपनी बुद्धि मात्र से उद्भूत (बिना गुरु की
सहायता से उद्भूत) यह (श्रीविद्या) अपनी आत्मजा की भाँति पाप (उत्पन्न करती
है) ॥ १६५ ॥

  • प्रकाश *
    पापं सूत इत्यन्वयः । सद्गुरोः 'सुन्दरः सुमुखः स्वस्थः' इत्यादितन्त्रराजोक्त-
    लक्षणविशिष्टस्य । कृपया सेवाजनितप्रसादेन,
    'पारंपर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः ।
    तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥'
    इति वचनात् । मरीचयो डाकिन्यादयः । विकुर्वन्ति धातुविकारप्रापणेन
    मारयन्तीत्यर्थः । कन्यापक्षे सद्गुरुः श्वशुरः ॥ १६५ ॥
  • सरोजिनी *
    श्रीविद्या को गुरु-परम्परा मात्र से ही प्राप्त करने पर बल दिया गया है
    क्योंकि श्रीविद्या के रहस्यों का उद्घाटन करने एवं रहस्य-साक्षात्कार कराने में मात्र
    गुरु ही समर्थ हैं क्योंकि वे ही गुरु भी हैं, शिव भी हैं, शिवा भी है और श्रीविद्या
    भी हैं क्योंकि विश्व को उपदेश देने के लिए आदि गुरु भगवान् शिव ने अपने को
    ही शिष्य एवं शास्ता के रूप में विभाजित करके शास्त्रोपदेश दिया—
    'गुरु शिष्य पदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः ।
    प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तंत्रं समवतारयत् ।। (स्वच्छन्द तन्त्र)
    ग्रंथकार का कथन है कि जो लोग पाण्डित्य-बल के अभिमान से श्रीविद्या को
    ग्रंथावलोकन मात्र से प्राप्त करने का अभिमान रखते हैं और इसको प्राप्त करने हेतु
    गुरु की आवश्यकता नहीं समझते वे पापभागी बनते हैं ।¹ शास्त्रों में कहा गया है
    कि ऐसे अभिमानी लोग जो परंपरा-प्राप्य इस गुह्य विद्या को मात्र अपने बुद्धि-बल
    से प्राप्त कर लेना चाहते हैं उन्हें डाकिनी आदि शक्तियाँ मार डालती हैं—
    “पारंपर्य-विहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः ।
    तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ।।”
    १. भास्कराचार्य—'प्रकाश'
    २६ वरि.

४०२ वरिवस्यारहस्ये
(‘मरीचयो डाकिन्यादयः । विकुर्वन्ति धातु-विकारप्रापणेन मारयन्तीत्यर्थः ।’)१
सारे मंत्र एवं सारी विद्यायें गुरुक्रम से ही सम्प्राप्त हैं—‘गुरुक्रमेण संप्राप्तः
संप्रदायार्थ ईरितः ।।’ ‘तथा मंत्राः समस्ताश्च विद्यायामंत्र संस्थिताः ।’’२
ग्रंथकार ने ‘सद्गुरु कृपा’ का महत्व प्रदर्शित करते हुए कहा है कि यह
श्रीविद्या मात्र गुरु-प्रसाद मात्र से फलवती होती है अन्यथा नहीं । गुरु शब्द स्वयं
इसका द्योतक है । ‘गुरु’ शब्द में से ‘ग’ अक्षर सिद्धि का एवं ‘र’ शब्द पापदहन
का एवं ‘उ’ अक्षर शंभु का द्योतक है—‘‘गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेक पापस्य
दाहकः । उकारः शंभुरित्युक्तस्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ।।’’३ इसीलिए ब्रह्मानन्द गिरि
का कथन है कि श्रीविद्या को गुरुमुख से ही ग्रहण करना चाहिए एवं गुरु से
दीक्षित होकर ही मंत्र-साधना में प्रवृत्त होना चाहिए—
‘गुरोर्मुखान्महाविद्यां गृह्णीयात् पापनाशिनीम् ।
तस्माद् यत्नाद् गुरु कृत्वा मंत्रसाधनमाचरेत् ।।४
कहा तो यहाँ तक गया है कि अधर्म-संलग्न व्यक्ति भी द्विजगुरु के मुख से
दीक्षित होने पर समस्त सिद्धियाँ एवं देवत्व प्राप्त कर लेता है—
अधर्मनिरतो भूत्वा कृत्वा द्विजगुरोर्मुखात् ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति शीघ्रं देवत्वमाप्नुयात् ।।५
‘सद्गुरुकुलतः कृपया लब्धा’ = सद्गुरु कुल की कृपा से सम्प्राप्त समस्त
गुह्य आध्यात्मिक विद्यायें गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हुई है । भगवान् भैरव भैरवी से,
इसी बात की पुष्टि करते हुए, कहते हैं—‘शृणु देवि महागुह्यं योगिनीहृदयं परम् ।
स्वप्रीत्या कथयाम्यद्य गोपनीयं विशेषतः । कर्णात्कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ।’६
कर्णाकर्णिकयैवेदं तंत्रमवनी तलं प्रति सम्यक् प्राप्तं ।।७
‘‘दिव्य-सिद्ध-मानव क्रमेण अतिरहस्यत्वात् कर्णपरम्परामात्र गम्यम् एव ।।’’८
‘मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि हि शास्त्राणि प्रथन्ते’ इति वचनादन्ते
मङ्गलमारचयति—
अकथासनं ह-लक्षान्तरं समासाद्य मामकं ज्ञानम् ।
मामकमेवानन्दं महं ददतो जयन्ति गुरुचरणाः ॥ १६६ ॥
(गुरु-चरणों की वन्दना)
अ क थ के आसन पर स्थित ह ल क्ष त्रिभुज के कोणों पर विद्यमान मदीय
आनन्द को ही मुझे प्रदान करने वाले मदीय गुरुचरणों की जय हो ॥ १६६ ॥
————————————————————————————————
१. भास्कराचार्य—‘प्रकाश’ २. दीपिका
३-५. शाक्तानन्द तरंगिणी ६. योगिनीहृदय
७. भास्करराय—‘सेतुबन्ध’ ८. अमृतानन्द योगी—‘दीपिका’

, त्+वा. Wait, what if it is मामकमप्याभिन्नम्? No, it's definitely त्. Wait, let's look at the letter before भिन्नम्: मामक-म-त्-म? Or मामक-म-त्-या? Wait, could it be मामकमन्त्राभिन्नम्? No, no 'न'. Could it be मामकमत्याभिन्नम्`?
Let's look at the Hindi explanation below to see if it explains this word!
Let's read the Hindi text:
इस श्लोक में निम्न शब्द विशिष्टार्थक हैं अतः प्रथमतः उन पर ही प्रकाश
डाला जा रहा है—
'अकथासनं', 'हलक्षान्तर', 'गुरुचरण:'—गुरु का स्थान 'सहस्रार'
(ब्रह्मरंध्रसरसीरुह) के भीतर विद्यमान श्वेत वर्ण के बारह दलों से युक्त 'द्वादशदल
कमल' में है और इसीलिए भगवान् शिव ने इसका निरतिशय महत्त्वाङ्कन करते हुए
कहा है—
...
'पादुका पंचक' में “अ” “क” “थ” रेखाओं एवं गुरुचरणों के

४०४ वरिवस्यारहस्ये
ज्योतियों में श्रेष्ठ है तथा इसमें विश्व भी संनिहित है । इस त्रिकोण में 'वामारेखा'
अग्निरूपा, 'ज्येष्ठा' चन्द्ररूपा एवं 'रौद्री' सूर्यरूपा है । 'वामारेखा' दक्षिण से पूर्व
उत्तर पूर्व कोण तक 'ज्येष्ठा'- उत्तर पूर्व से आरंभ होकर उत्तर पश्चिम तक जाती
है एवं 'रौद्री' उत्तर-पश्चिम से आरंभ करके वामा रेखा में मिल जाती है । ये तीनों
बिन्दु 'त्रिपुरा' 'त्रिपुरसुन्दरी' के नाम से भी प्रख्यात है । गुरु के श्रीचरणों से लाल
रङ्ग के समान अमृत बराबर निकलता रहता है । जो साधक इस प्रकार गुरु के
चरण कमल में अपने आत्मा को लीन करता है वह सभी प्रकार के महाबंधनों
और पापों से मुक्त हो जाता है । गुरुश्री के चरण कमल वृक्ष के नये पत्ते के
समान लाल है और उनके नख चन्द्रमा के प्रकाश के समान प्रकाशमान है । यह
कमल अमृतरूपी सरोवर में प्रस्फुटित हुआ है ।
पंचक का संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है—१. द्वादश दल कमल २. अ,
क, थ मिश्रित त्रिकोण ३. नाद, बिन्दु एवं मणिपीठ ४. हंस ५. त्रिकोण या—
१. द्वादशदल कमल २. अ, क, थ से मिश्रित त्रिकोण ३. नाद, बिन्दु ४.
मणिपीठ एवं मण्डल ५. इससे ऊपर 'हंसः' ।।१ शास्त्रों में कहा गया है कि अपने
गुरु का ध्यान करो । वे गुरु स्वयं भगवान् शिव हैं वे मंत्र (या मंत्रमाया) से युक्त
एवं प्रोद्दीप्त उस 'हंसपीठ' पर आसीन हैं जो द्वादशदल कमल की कर्णिका में
स्थित है । यह चन्द्रमण्डल के निकट एवं 'ह' 'ल' 'क्ष' वर्णों से संपूजित है । ये
'ह' 'ल' 'क्ष' वर्ण त्रिकोण में 'अ' 'क' 'थ' रेखायें हैं । गुरु का जो आसन
(मणिपीठ) है वह मंत्रमयपीठ है । इसका मंत्र गुरुमंत्र है जो वाग्भव बीज या 'ऐं'
के रूप में स्थित है । जिस 'द्वादशदल कमल' में गुरुदेव रहते हैं । उसके जो
बारह दल है वे निम्नलिखित हैं—स, ह, ख, फ्रें, ह, स, क्ष, म, ल, व, र, यूं
(अर्थात् इनमें से एक-एक वर्ण प्रत्येक कमल-दल पर अंकित है ।) 'गुरुगीता' में
कहा गया है कि जिस कमल में गुरु का ध्यान किया जाय यह भी भावना की
जाय कि उस कमल के चारों ओर 'हं' एवं 'सः' वर्ण उस कमल के दल के रूप
में उसे घेरे हुए हैं अर्थात् हं एवं सः वर्ण छ बार पुनरावृत्ति करते हुए उस कमल
के बारह दलों के रूप में प्रस्तुत होते हैं ।
'कङ्कालमालिनी' तंत्र में ब्रह्मरंध्र एवं गुरु का स्थान इस प्रकार बताया गया
है—१. सहस्रार की कर्णिका (Pericarp) में 'अन्तरात्मा' स्थित है । २. अन्तरात्मा
के ऊपर गुरु स्थित है । .३. गुरु के ऊपर 'सूर्यमण्डल', 'चन्द्रमण्डल' एवं
'महावायु' स्थित हैं । इसके ऊपर ब्रह्मरंध्र है । किन्तु सारांश यह है कि गुरुधाम
द्वादशदल पद्म है ।
एक हजार दलों वाले, वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण से सुशोभित एवं संपूजित,
अधोमुखी, उदयकालीन सूर्य के समान रक्ताभ मञ्जरियों वाले सहस्रदल कमल के
भीतर उसकी कर्णिका में जो 'द्वादशदलकमल' स्थित है वही गुरु का वास्तविक
धाम है । यह द्वादशदलपद्म 'चित्रीणी नाड़ी' (कुण्डलिनी के सहस्रार में जाने के
मार्ग) के अन्तिम भाग पर स्थित है ।

द्वितीयोंऽशः ४०५
'अ-क-थ'—'पादुकापंचक' में कहा गया है—
“तस्य कन्दलितकर्णिकापुटे, क्लृप्तरेखमकथादिरेखया ।
कोणलक्षित ह ल क्ष मण्डली, भावलक्ष्यम् बलालयं भजे ।।१
'अ' = अ से प्रारंभ होने वाले १६ स्वरों से—'वामा' = (अ से अः) ।।
'क' = क से प्रारंभ होने वाले १६ अक्षरों से—'ज्येष्ठा' = (क से त) ।।
'थ' = थ से प्रारंभ होने वाले १६ अक्षरों से—'रौद्री' = (थ से स) ।।
शक्ति का स्थान इन्हीं तीन रेखाओं से निर्मित (अ-क-थ रेखाओं से निर्मित)
त्रिकोण है । 'कामकला' त्रिकोणात्मक है । तीन शक्तियाँ—वामा, ज्येष्ठा एवं
रौद्री—ही त्रिकोण की तीन रेखायें हैं । ये तीनों रेखायें बिन्दुत्रय से उद्भूत होती
हैं। 'कामकला' शक्ति की निवास भूमि है—निलय है । यामल में कहा गया है
कि—'कामकला' बिन्दुत्रय है, शक्तित्रय है, त्रिमुख अभिव्यक्ति है । 'कामकला'
त्रिशक्तिरूपा (तीन शक्तियों से गठित) है ।२ ये तीन (अ, क, थ) वर्ण तीन
रेखायें हैं जो कि त्रिकोण के तीनों कोणों का निर्माण करती हैं । ('त्रिबिन्दुः सा
त्रिमूर्तिः सा त्रिशक्तिः सा सनातनी ।')
“ह लक्षान्तरं”—इस त्रिकोण (अ-क-थ रेखाओं से निर्मित त्रिकोण) के भीतर
ही 'ह' 'ल' 'क्ष' वर्ण स्थित हैं । 'सात्वत तंत्र' में कहा गया है—“अ-क-थ रेखायें
'ह' 'ल' एवं 'क्ष' वर्णों को चारों ओर से घेरे हुए हैं” यह त्रिकोण 'बिन्दु' (जिससे
समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है) से उद्भूत होता है ।
'अ-क-थ' के विषय में काली ऊर्ध्वाम्नाय में कहा गया है कि—१. अ से
विसर्ग तक के वर्ण ब्रह्मा की रेखा (जो प्रजापति की रेखा है) का निर्माण करते
हैं । २. क से त तक के समस्त वर्ण विष्णु की परात्पर रेखा का निर्माण करते
हैं । ३. थ से स तक के समस्त वर्ण शिव की रेखा का निर्माण करते हैं । ये
तीनों रेखायें तीन बिन्दुओं से उद्भूत होती हैं ।
'जयन्ति गुरु चरणाः'—गुरुचरणों की जय हो । गुरु का इतना महत्व क्यों?
परमात्मा ही मूल गुरु है—पतञ्जलि ने योगसूत्रों में कहा है—“पूर्वेषामपि गुरुः
कालेनानवच्छेदात्”३ अर्थात् परमात्मा सबके पूर्वजों का भी गुरु है क्योंकि उसका
काल से अवच्छेद नहीं है । योगवार्तिककार कहते हैं—'पूर्वेषां पूर्वपूर्वसर्गाद्युत्पन्नानां
ब्रह्मविष्णुमहेश्वरादीनामपि गुरुः पिताऽन्तर्यामी विद्यया ज्ञानचक्षुः'४ आचार्य हयग्रीव का
कथन है कि “गुरु विष्णु, शङ्कर, ब्रह्मा, सूर्य एवं शक्ति युक्त है”—“हरिहर
ब्रह्मसूर्यशक्त्यात्मको गुरुः ।।'५ आचार्य अगस्त्य का कथन है कि—“गुरु ही समस्त
देवताओं की आत्मा हैं । गुरुशासन वेदशासन है । गुरुचरण तीर्थ एवं पवित्र गङ्गा
१. पादुका पंचक २. यामल
३. योगसूत्र (समाधिपाद १।२६) ४. विज्ञानभिक्षु—'योगवार्तिक'
५. शाक्तदर्शनम् (५।३)

४०६ वरिवस्यारहस्ये
है । गुरुपाद की धूल ही भस्म है । गुरु की पूजा ही समस्त देवताओं की पूजा
है । गुरु का स्मरण ही समस्त देवताओं का स्मरण है । गुरु समस्त आत्मोपहित
जीवों के मूल शिक्षक (उपदेशक) हैं । गुरु का दर्शन ही समस्त देवताओं का
दर्शन है । वे तारक एवं संसारोद्धारक हैं । यदि गुरु को संतुष्ट कर लिया जाय तो
सारे देवता संतुष्ट हो जाते हैं क्योंकि गुरु की तुष्टि सर्वदेवतुष्टि है । अपना सिर
गुरु के चरणों में, अपने कान गुरु के वाक्यों में, अपने नेत्र गुरु के दर्शन में एवं
अपनी वाणी पंचदशी मंत्र में, चित्त बीज में, हाथ तर्पण में एवं शरीर श्रीपादुका के
अर्चन में लगा रहना चाहिए ।।''१
एक स्थल पर कहा गया है कि गुरु सर्वकारणभूता शक्ति है—
“ॐ श्रीगुरुः सर्वकारणभूता शक्तिः ॥”
'योगिनीतंत्र' में कहा गया है कि जिसे आदिनाथ एवं महाकाल कहा गया है
वही, शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, ऐन्दव, महाशैव एवं सौर—आदि समस्त
सम्प्रदायों में एवं समस्त मंत्रों या मंत्रशास्त्रों में, गुरु कहा गया है ।
आदिनाथो महादेवि ! महाकालो हि यः स्मृतः ।
गुरुः स एव देवेशि ! सर्वमंत्रेऽधुना परः ।
शैवे शाक्ते वैष्णवे चं गाणपत्ये तथैन्दवे ।
महाशैवे च सौरे च स स गुरुर्नत्र संशयः ॥''२
'गुरुगीता' में गुरु के कुछ विशिष्ट लक्षण बताये गए हैं जो निम्न हैं—
१. गुरु केवल एक है ('एक एव गुरुर्देवि')
२. वे ही अनेक रूपों में विद्यमान हैं ('सर्वत्र परिगीयते') ॥
३. समस्त जगत् गुरु-मय है (सर्वं गुरुमयं जगत् ।)३
४. गुरु मात्र एक हैं और वे हैं भगवान् शिव ('गुरुरेकः शिवः प्रोक्तः')४
५. भगवती पार्वती (शक्ति) एवं मंत्र भी गुरु हैं ('गुरुस्त्वमसि देवेशि मन्त्रोऽपि
गुरुरुच्यते' ।)५
६. मंत्र, गुरु एवं देवता—इन तीनों में कोई भेद (पृथकता) नहीं है—(अतो
मंत्रे गुरौ देवे न भेदश्च प्रजायते ।)६
७. गुरु का ध्यान सदैव सहस्रारपद्म में ही करना चाहिए ('कदाचित्तु सहस्रार-
पद्मे ध्येयो गुरुः सदा ।।' 'शिरस्याधः सहस्रारे पद्मे निज गुरुं स्मरेत्' ।।)७
८. कभी-कभी गुरु का ध्यान हृदय में एवं कभी-कभी (गुरु के सन्मुख होने
पर) सामने दृष्टिमार्ग में भी कर लेना चाहिए (कदाचिद् हृदयांभोजे
१. अगस्त्य—'शक्तिसूत्र' २. योगिनी तन्त्र
३-७. गुरुगीता

द्वितीयोंऽशः ४०७
कदाचित् दृष्टि गोचरे ।)१
९. गुरु के शरीर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, पार्वती, इन्द्रादिक देवता,
कुबेरादिक यक्षगण, सिद्धगण, गन्धर्वगण गंगादिक नदियाँ, नागगण एवं
समस्त स्थावरजंगम आदि सभी निवास करते हैं ।
१०. गुरु ही पिता, माता, देवता, महेश्वर हैं (गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो
महेश्वरः ।)२
११. यदि कोई गुरु को मनुष्य मान ले तो करोड़ों कल्पों में भी उसे साधना
में सफलता नहीं मिल सकती । (‘गुरौ मनुष्यता बुद्धिः शिष्याणां यदि
जायते । न हि तस्य भवेत् सिद्धिःकल्पकोटिशतैरपि’ ।)३
१२. मंत्र एवं गुरुदेव में कभी पृथकता नहीं माननी चाहिए (मंत्रे वा गुरुदेवे वा
न भेदं यस्तु कल्पयेत् ।)४
१३. न तो गुरु से बढ़कर कोई शास्त्र है न तो तप । न तो गुरु से बढ़कर
कोई मंत्र है और न तो कोई फल । न तो गुरु से बढ़कर कोई देवी है
और न तो शिव । न तो गुरु से बढ़कर कोई मुक्ति है औन न तो
जप—
‘‘न गुरोरधिकं शास्त्रं, न गुरोरधिकं तपः ।
न गुरोरधिकं मंत्रं, न गुरोरधिकं फलम् ।
न गुरोरधिका देवी, न गुरोरधिकः शिवः ।
न गुरोरधिका मुक्तिर्न गुरोरधिको जपः ।।’’५
इसीलिए 'गुरुगीता' में कहा गया है कि साधक का मूल कर्तव्य है—
गुरु-सेवा, गुरु-ध्यान, गुरु-स्तोत्र का पाठ, गुरु का जप, गुरु-पूजा, गुरु की तुष्टि
एवं 'गुरु की भक्ति—
‘‘गुरुसेवा गुरुध्यानं . गुरुस्तोत्रं गुरोर्जपः ।
गुरोः पूजा गुरोस्तृप्तिः गुरोर्भक्तिर्नृणां यदि ।।’’
क्योंकि—
‘‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुः देवो महेश्वरः ।
गुरुस्तस्माद् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।।’’
गुरु के प्रकार—कूर्मपुराण में दस प्रकार के गुरुओं का वर्णन किया है जो
निम्न है—‘‘उपाध्यायः पिता माता ज्येष्ठो भ्राता महीपतिः । मातुलः श्वशुरश्चैव
मातामहपितामहौ । वर्णज्येष्ठः पितृव्यश्च सर्वे ते गुरवः स्मृताः ।।'’६ कुलगुरु तीन
प्रकार के हैं—१. दिव्यौघ २. सिद्धौघ ३. मानवौघ ।।
──────────────────────────────────────────────
१-५. गुरुगीता ६. कौर्म० उत्तरा (१२।२६)

४०८ वरिवस्यारहस्ये
'दिव्यौघ' यथा प्रह्लादानन्दनाथ, सकलानन्दनाथ आदि ।। 'सिद्धौघ' = भगवान्
शिव ।। 'मानवौघ' = दीक्षागुरु ।।
गुरुओं के अन्य भेद—गुरुओं के अन्य भेद निम्नानुसार है—१. सांसिद्धिक
(अकल्पित) २. कल्पित ३. कल्पिताकल्पित ४. अकल्पितकल्पक ।।
१. 'सांसिद्धिक गुरु'—इन गुरुओं में 'सतर्क' ('शुद्धविद्या') ज्येष्ठा नाम्नी
भगवादिच्छा की प्रेरणा से शिष्य के चित्त में सद्गुरु प्राप्ति की शुभेच्छा । शुद्ध
विद्या का विकास स्वयमेव उत्पन्न हो जाता है । इन्हें बाह्य दीक्षा एवं बाह्य अभिषेक
की आवश्यकता नहीं होती । ये संवित्ति देवताओं द्वारा ही दीक्षित एवं अभिषिक्त
होते हैं । इन्हें बाह्य गुरु अपेक्षित नहीं है । शुद्ध विद्या की ज्योति के प्रभाव के
कारण ऐसा कोई तत्त्व या सत्य हो ही नहीं सकता जो कि इन्हें समझ में न आ
सके । यही प्रातिभ महाज्ञान इन्हें प्राप्त रहता है । इनका ज्ञान—स्वभावज ज्ञान,
स्वभावसिद्ध ज्ञान या 'भित्तिहीन' स्वयंभू ज्ञान कहलाता है । इनके समस्त बंधन
शिथिल हो जाते हैं । इनमें पूर्णशिवभाव का आविर्भाव होता है । इनका प्रयोजन
मात्र दूसरों पर अनुग्रह करना होता है । योगभाष्यकार का 'ईश्वर' के प्रति कथित
यह वाक्य—"तस्य आत्मानुग्रहाभावेऽपि भूतानुग्रह एव प्रयोजनम् ॥"१ चूँकि ये
किसी अन्य गुरु से दीक्षित होकर सिद्धि नहीं पाते प्रत्युत् स्वतः पा लेते हैं अतः
'अकल्पित' कहलाते हैं । 'प्रातिभ ज्ञान' एवं 'अकल्पित गुरु' दोनों अकृत्रिम हैं ।
बौद्ध संप्रदाय में श्रावक एवं 'अनाचार्यक' में यही भेद है कि 'अनाचार्यक' को ज्ञान
पाने के लिए किसी अन्य गुरु की अपेक्षा नहीं होती उसे अपने भीतर से स्वयं
ज्ञान प्राप्त हो जाता है । 'अकल्पित गुरु' अनाचार्यक से श्रेष्ठ होता है ।
२. 'अकल्पित कल्पक गुरु'—सांसिद्धिक गुरु होने पर भी जिनके स्वयंभू
ज्ञान में पूर्णता नहीं होती और स्वयं की प्रतिभा से शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं
उन्हें अकल्पित कल्पक गुरु कहते हैं ।
३. 'कल्पिताकल्पित गुरु'—जो 'कल्पित' होने पर भी गुरु की अपेक्षा न
रखते हुए अपनी प्रतिभा के बल पर लोकोत्तर शास्त्रीय तत्त्व का रहस्यावगाहन कर
लेते हैं वे 'कल्पिताकल्पित' कहलाते हैं इनमें कल्पितांश की अपेक्षा अकल्पितांश
ही प्रधान होता है ।
४. 'कल्पित गुरु'--किसी अकल्पित या अन्य गुरु से दीक्षा लेकर
शास्त्रार्थ-ज्ञान प्राप्त करने वाले और बाद में अभिषेक प्राप्त होने पर परानुग्रह आदि
का अधिकार पाने वाले एवं पाशोच्छेदन में समर्थ ये ही गुरु 'कल्पित' गुरु
कहलाते हैं । कल्पित एवं अकल्पित दोनों गुरु शिष्य का पाशोच्छेदन कर सकते
हैं तथापि 'अकल्पित गुरु' के समक्ष गुरु निष्क्रिय हो जाते हैं अतः 'अकल्पित
गुरु' ही श्रेष्ठतम् गुरु होता है ।
ऐसे भी गुरु होते है जो ज्ञान देकर शिष्य को माया से पार तो कर सकते हैं
१. योगसूत्र पर 'व्यासभाष्य'

द्वितीयोंऽशः ४०९
किन्तु वे भोग या विज्ञान नहीं दे सकते, ये अधिकार नहीं दे सकते। ये मुक्त तो
हो सकते हैं किन्तु दूसरों को मुक्त नहीं कर सकते । ऐसा गुरु 'ज्ञानी गुरु'
कहलाते हैं । ये योगी नहीं होते । ये सद्गुरु नहीं है । 'सद्गुरु' वे ही गुरु हैं जो
ज्ञानी एवं योगी दोनों हैं । ये शिष्य को भोग-मोक्ष, पूर्णत्व, एवं विज्ञान सभी प्रदान
कर सकते हैं ।
जैनानुशासन में जो मंत्र प्रसिद्ध हैं उसमें गुरुओं के ५ प्रकार बताए गए हैं
जो निम्न हैं-“णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो
उवज्झायाणं”१
सद्गुरु एवं असद्गुरु—'मालिनीविजय' में कहा गया है-“...सयियासुः
शिवेच्छया । भुक्ति-मुक्ति प्रसिद्धयर्थं नीयते सद्गुरुं प्रति ॥”२ सारांश यह कि सद्गुरु
का आश्रय ग्रहण किये बिना प्राणी भोग-मोक्ष दोनों की अभिन्नभाव से प्राप्ति नहीं
कर सकता । और पूर्णत्व (मुक्ति) प्राप्त नहीं कर सकता । भाव यह है कि-
सद्गुरु एवं भोग-मोक्ष का दान- 'गुरु' भोग-मोक्ष प्रदायक होता है । भोक्ता
जब भोग्य के साथ एकीभूत हो जाता है तब उस एकीभाव को 'भोग' कहते हैं
एवं उसी को 'मोक्ष' कहते हैं । भोग एवं मोक्ष की साम्यावस्था ही 'जीवन्मुक्ति' एवं
'परमपद' है-
'तस्या भोक्त्याः स्वतन्त्राया भोग्यैकैकार एव यः ।
स एव भोगः सा मुक्तिः स एव परमं पदम् ॥३
भोग एवं मोक्ष की अनुभूति का सामरस्य ही 'जीवन्मुक्ति' है । यही त्रिक
दर्शन की विशेषता है ।४ 'श्रीरत्नदेव' में भी कहा गया है-“भुक्तिर्वाप्यथ मुक्तिश्च
नान्यत्रैकपदार्थतः । भुक्तिमुक्तौ उभेदेवि! विशेषे परिकीर्तिते ॥” यह वह अवस्था है
जिसे विश्वात्मकता कहते हैं । विश्वात्मकता आत्मा का स्वभाव है तथा- 'सर्वो ममायं
विभवः' की आत्मानुभूति है । इस भोग एवं मोक्ष की एकता बौद्ध भी स्वीकार
करते थे । सहजिया कहते थे कि वायु के आवागमन-मार्ग तथा चन्द्र-सूर्य के पथ
को अवरुद्ध करने पर उस घोर तिमिर में बोधिचित्त (मन) को दीपक बनाया जा
सके तो 'महासुख' की प्राप्ति होती है । तब अवधूती जिन रत्न नामक अधऊर्ध्व
पद्म का स्पर्श करती है जिससे भव-निर्वाण दोनों की एक साथ सिद्धि होती है ।
(भवभोग = पञ्च प्रकारक काम गुण ॥ निर्वाण = महामुद्रासाक्षात्कारं ।)
सद्गुरु और पूर्णत्व—जो गुरु परमेश्वर के साक्षात्कार से समुत्पन्न ज्ञान के
साथ तादात्म्यभाव प्राप्त नहीं कर सका है-उसके साथ एकीभूत नहीं हो सका

१. जैनागम में 'पञ्चपरमेष्ठी' प्रसिद्ध है-१. अरिहन्त, २. सिद्ध, ३. आइरियाणं
(आर्य), ४. उवज्झायाणं (उपाध्याय), ५. सव्वसाहूणं (सर्वसाधु)
२. मालिनीविजय तन्त्र ३. प्रबोधपञ्चदशिका
४. महेश्वरानन्द- 'महार्थ मंजरी' (पृ० १७१)

४१० वरिवस्यारहस्ये
है—वह 'गुरु' नहीं है । मुक्ति के दो पक्ष हैं—१. पशुत्व की निवृत्ति २. शिवत्व
की प्राप्ति ।। उपर्युक्त गुरु 'सद्गुरु' इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनमें शिष्य की
पशुत्व-निवृत्ति की क्षमता नहीं होती किन्तु फिर भी शिष्य भगवान् की 'वामा'
नामक शक्ति की प्रेरणा से उस गुरु के प्रति प्रगाढ़ भक्ति में लीन रहता है ।
स्वस्वरूप प्राप्त करने के लिए व्याकुल साधक, भगवदिच्छा होने पर शक्तिपात के
कारण पवित्रीभूत होकर, भगवान् की 'ज्येष्ठा' नामक शक्ति की प्रेरणा से
सद्गुरु-प्राप्त्येच्छा से विह्वल होकर (इस सदिच्छा = 'शुद्धविद्या' के विकास या
'सत्तर्क'—की शक्ति से अनुप्राणित होकर) पूर्णत्वरूप मुक्ति प्राप्त करता है ।
आगम सम्मत यह 'पूर्णत्व' न तो सांख्य का कैवल्य है और न तो वेदान्त
की मुक्ति । वेदान्त की मुक्ति 'विज्ञान कैवल्य' के बराबर भी नहीं है ।१ वेदान्त की
मुक्ति सवेद्य प्रलयाकल की अवस्था के समतुल्य है क्योंकि वेदान्त की मुक्ति में
आणवमल विद्यमान रहता है । विज्ञान कैवल्य में आणवमल ध्वंसोन्मुख रहता है ।
न्याय आदि दर्शनों का 'अपवर्ग' आत्मा का सर्वविशेषोच्छेद होने के कारण अपवेद्य
प्रलयाकल के समान है तथा वैष्णवादि का मोक्ष आगम की दृष्टि में प्रलयाकल की
दशा के समान है । विज्ञान कैवल्य में केवली की कर्ममुक्ति होने के कारण
पुनरावृत्ति नहीं होती किन्तु वेदान्त के मोक्ष में पुनरावर्तन निवृत्त नहीं होता ।२
'सत्तर्क' मोक्ष का विधायक है । 'सत्तर्क' का प्राकट्य—१. गुरु द्वारा या २. शास्त्र
द्वारा या ३. स्वतः, होता है । स्वपरामर्श ही प्रधान है ।३
'अकथासनं'—अ क थ ही गुरु का आसन है । 'सहस्रार कमल' की
कर्णिका के मध्य स्थित त्रिकोण रेखा है ये आदि कादि थादि षोडशार्णत्रय रूप हैं।
उसके मध्य कोणों में हकारादित्रय स्थित हैं । यहीं गुरु का ध्यान करने का स्थान
है । यही है गुरु का आसन ।४
अ, क, थ—सहस्रदल कमल के दलों पर पञ्चाशत वर्ण अंकित हैं । उस
अक्षरकर्णिका में गोलाकार चन्द्रमण्डल है । उस चन्द्रमण्डल के ऊपर एक
ऊर्ध्वमुखी द्वादशदल कमल है । उसकी कर्णिका में अ-क-थ आसन स्थित है । यह
त्रिकोण यंत्र है । इस यंत्र के चारों ओर सुधासागर होने से यह मणिद्वीप सदृश है ।
इस द्वीप के मध्य में 'मणिद्वीप' है । इसमें नाद-बिन्दु के ऊपर 'हंसपीठ' है ।
'हंसपीठ' के ऊपर 'गुरुपादुका' है । यह स्थान ही गुरुदेव परमशिव का आसन है।
गुरु का महत्त्व—लोकत्रय में सर्वोच्च देवता ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश हैं ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
१. जयरथ—तन्त्रालोक टीका (४।३१)
२. द्वैत एवं अद्वैत दोनों आगम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं ।
३. शिष्य में गुरु वाक्य से जो बोध उत्पन्न होता है उसमें शिष्य की प्रज्ञा ही
मूल कारण है—'शिष्यप्रज्ञैव बोधस्य कारणं गुरुवाक्यतः' (योगवाशिष्ठ १।१२८-१६३)
४. भास्कराचार्य—'प्रकाश' (श्लोक १६६)

द्वितीयोऽंशः ४११
कहकर गुरु को ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के समतुल्य कहा गया है किन्तु आगे इन
तीनों देवों से भी बड़ी सत्ता ब्रह्म को गुरु का पर्याय घोषित किया गया है । गुरु
तीनों लोकों में सर्वोपरि है—"न गुरोरधिकः कश्चित्त्रिषु लोकेषुविद्यते ।।" अर्थात्
“तीनों लोकों में गुरु से बढ़कर कोई अन्य व्यक्ति नहीं है ।।"
गुरु एवं शिव में अभेद—शिवपुराण के 'कैलाससंहिता' में कहा गया है—
'यथा गुरुस्तथैवेशो यथैवेशस्तथा गुरुः ।
पूजनीयो महाभक्त्या न भेदो विद्यतेऽनयोः ॥'
'यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः ।
तस्माद्धि श्रीगुरोर्भक्तिर्भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ।।'
'गुरुचरणा:'—गुरुश्री के श्रीचरण ।। 'गुरु' = गृ शब्दे, क्र्यादि, एवं 'गृ
निगरणे' तुदादिगण की धातु को कृग्रोरुच्च (१।२५) इस उणादि सूत्र से 'कु' प्रत्यय
और उकारान्ता देश होने पर 'उरण रपरः' (१।१।५१) इससे उरादेशान्तर
'कृत्तद्धितसमासाश्च' (१।२।४६) इससे प्रातिपदिक संज्ञा के पश्चात् 'सु' विभक्ति
आने पर 'गुरुः' शब्द निष्पन्न होता है । गुरु की निरुक्ति निम्नानुसार है—१.
गृणति, उपदिशति धर्ममिति गुरुः । गिरत्यज्ञानमिति गुरुः । “यद्वा गीर्यतेस्तूयते
देवगंधर्वादिभिरितिगुरुः ।।" आचार्य शङ्कर कहते हैं—
“अविद्याहृदयग्रंथिबंधमोक्षो यतो भवेत् ।
तमेव गुरुरित्याहुर्गुरुशब्देन योगिनः ॥”१ (२५७)
भगवान् मनु कहते हैं—
'निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते ॥'२ (२।१४२)
गुरुचरणैकसहायो भास्कररायो जनन्मातुः ।
वरिवस्यातिरहस्यं वीरनमस्यं प्रजग्रन्थ ॥ १६७ ॥
(प्रस्तुत ग्रंथ-प्रणयन के पीछे गुरु-कृपा का प्रतिपादन)
एक मात्र गुरु-चरणों की सहायता लेकर भास्करराय ने जगन्माता का, वीरों
द्वारा भी पूज्य, (पूजा-विधान के अत्यन्त रहस्यात्मक पक्ष पर प्रकाश डालने वाला)
रहस्य-ग्रंथ वरिवस्यातिरहस्य प्रणीत किया ॥ १६७ ॥

  • प्रकाश *
    वीरैः, अहमि रणाङ्गण इदमो वैरिणो नाशं कुर्वाणैः परापञ्चाशिकादौ प्रसिद्धैः ।
    इति सर्वमनवद्यम् ॥ १६७ ॥
    १. शंकराचार्य—'सर्ववेदान्तसिद्धान्तसार संग्रह' २. मनुस्मृति

४१२ वरिवस्यारहस्ये
वस्तु प्रस्तुतमस्तु निस्तुलमहोःस्तोमास्तिवास्तु नो
हस्तन्यस्तसमस्तपुस्तकभरध्वस्तासदेनस्तति ।
शस्तस्वस्तिकृदस्तुदुस्तरतमः स्वस्तोकसौवस्तिकं
गीस्तोयस्तनयित्लुसुस्तनयुगं वास्तोष्पतिप्रस्तुतम् ॥
॥ इति श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीणसर्वतन्त्रस्वतन्त्रश्रीनृसिंहानन्दनाथ-
चरणारविन्दमिलिन्देन श्रीमद्गम्भीररायभारतीदीक्षितात्मजेन भास्कररायापरनाम्ना
भासुरानन्दनाथेन प्रणीतं सव्याख्यानं वरिवस्यारहस्यं सम्पूर्णम् ॥
——— ⁂ ———

  • सरोजिनी *
    गुरु शुश्रूषा से ही विद्या-प्राप्ति संभव है—गुरुसहायो गुरुशुश्रूषया विद्या' (याज्ञ.
    शि. ३०) इसीलिए ग्रन्थकार ने 'गुरुचरणैकसहायो'—एक मात्र गुरुश्री के श्री चरणों
    की सहायता लेकर । आचार्य भास्करराय ने गुरु को अत्यधिक महत्व प्रदर्शित करने
    के उद्देश्य से ही ग्रंथांत में गुरु के श्रीचरणों की भक्ति प्रदर्शित की है । ठीक भी
    है क्योंकि—'सर्वं गुरुमयं जगत्' (सारा संसार ही गुरुमय है ।) गुरु मनुष्य नहीं हैं
    प्रत्युत् शिव ही गुरु हैं—
    “गुरुरेकः शिवः प्रोक्तः सोऽहं देवि न संशयः ॥”१
    गुरु से अधिक कोई नहीं है—
    ‘न गुरोरधिकं शास्त्रं न गुरोरधिकं तपः ।
    न गुरोरधिकं मंत्र न गुरोरधिकं फलम् ॥
    न गुरोरधिका देवी न गुरोरधिकः शिवः ।
    न गुरोरधिका मुक्तिर्न गुरोरधिका. जपः ॥
    गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    देव रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन ॥२
    गुरु को मनुष्य समझने से करोड़ों कल्पों में भी शिष्य को सिद्धि प्राप्त नहीं
    हो पाती अतः गुरु को मानव न समझकर उन्हें शिवस्वरूप समझना चाहिए—
    “गुरौ मनुष्यता बुद्धिः शिष्याणां यदि जायते ।
    न हि तस्य भवेत् सिद्धिः कल्पकोटिशतैरपि ॥”
    तस्माद्देवेशि नियतं श्रीगुरुं शिवरूपिणम् ॥ (गु० गी०)३
    गुरु को ही ब्रह्मा (विश्व का स्रष्टा) विष्णु (विश्व का पालक एवं विश्व का

१-३. गुरुगीता ४. कुलार्णवतन्त्र

द्वितीयोंऽशः ४१३
संहारक (महेश)) तीनों कहा गया है । इससे भी बढ़कर उन्हें साक्षात् परब्रह्म भी
कहा गया है—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥”
मोक्ष का मूल 'ज्ञान' है, उसका मूल महेश्वर हैं, उनका मूल पंचाक्षर मंत्र है
और इस पंचाक्षर का भी मूल गुरु की वाणी है—'मोक्षस्य मूलं यज्ज्ञानं तस्य मूलं
महेश्वरः । तस्य पंचाक्षरो मंत्रो मूलमंत्र गुरोर्वचः ॥'४
ग्रन्थकार गुरुचरणों मात्र की सहायता लेने कृतकृत्य होने की बात इस लिए
कहते हैं क्योंकि कोई भी विद्या बिना गुरु के सिद्ध नहीं होती । करोड़ों ग्रंथों का
अध्ययन करने पर भी बिना गुरु-कृपा के कोई सिद्धि संभव नहीं—
१. “गुरुवक्त्रेण लभ्येत् नाधीतागम कोटिभिः ॥”१
२. मुक्तिदा गुरुवागेका विद्याः सर्वा विडम्बकाः ॥२
३. देहस्थाः सर्वविद्याश्च देहस्थाः सर्वदेवताः ।
देहस्थाः सर्वतीर्थानि गुरुवाक्येन लभ्यते ॥३
॥ इस प्रकार वरिवस्यारहस्य के द्वितीयोंऽश की डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी कृत
'सरोजिनी' नामक हिन्दी टीका पूर्ण हुई ॥
───❊───


१-२. कुलार्णवतन्त्र ३. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र

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श्लोकार्धानुक्रमणिका
पृष्ठाङ्काः
अ
अकथादिकषोडशा० २८९
अकथासनं ह-लक्षान्तरं ४०२
अकारैर्दशसंख्याकैः २७३
अकुलादिकोन्मनान्त २०३
अखिलार्थबोधनियमोः ३८६
अत्यल्पमिदं कथितं ३७३
अथ तार्तीये वर्णद्वितयं २३९
अथ रोधिनी तदूर्ध्वं १४६
अथ वा सकलार्थेष्वपि ३८३
अथातः पूर्णगायत्र्याः २२५
अध्ययनार्थकतेङः ३६१
अध्युष्टनिमेषोत्तर० २०३
अन्तःकरणचतुष्क० १८१
अन्त्यप्रथमे मध्यचतुर्थे २५४
अन्यतमैकावगतौ ३८३
अन्येषां वर्णानां मात्रा १२३
अन्वयितव्योऽक्षरशः ३५६
अयमेव कूटयोरपि ३५६
अर्थमजानानां नाना २२२
अर्थमयी शब्दमयी २७
अर्थानादरभाजां २२३
अर्था भवन्ति योगात् ३४८
अर्थोऽप्यखण्डरूपोः ३८२
पृष्ठाङ्काः
अस्याः स्वाभिन्नत्वं ३२४
अहंकारौ शिवशक्ती २५४
आ
आकारः स्वं रूपं ३८८
आकृतिगणपाठेन ३६६
आ केदारादुदीच० २
आद्ये दश मध्ये ताः १६४
आधारोत्थित नादोः १४६
आधारोत्थितनादस्य १९२
आनन्दैकघनत्वं यद् १८४
आन्तरवृत्तेर्लयतोः १८२
आ प्राचः कामरूपाद् २
आवरणदेवतानाम् २८३
आसेचनकव्याप्त्यादि० ३८२
आस्तामन्या वृत्तिः ३८१
इ
इच्छादित्रिसमष्टि २८४
इति तु श्रीविद्यायाः ३४४
इत्थं गुणगणकथनात् ३७१
इत्थं नामत्रिशतीवाच्योः २४६
इत्थं ब्रह्म तटस्थ० ३७२
इत्थं माता विद्या चक्रं ३१४
इत्येवं बोधयितुं ३७३

४१६ वरिवस्यारहस्ये
पृष्ठाङ्काः
इत्येवं वर्णानां स्थानं १४६
इन्द्रियदशकव्यवहृति १८०
इन्द्रियदशकेनान्तःकरण २८५
ई
ईकारः प्रश्लिष्टः सृष्टि० ३६४
ईकारस्तस्यार्थः कीर्तिः ३६४
ई दीप्ताविति धातो ३६४
ई व्याप्ताविति धातो ३६३
ईश्वरवाचीकारो वक्ति ३७१
उ
उच्चरिते नादे सति २०३
उत्पत्तिस्थानं तद्यत्नोः ३८७
उन्मन्यन्तर्लीनं विभाव १४६
उन्मन्यां नीरूपं षष्ठं १८५
उपमेयश्चक्रीवान् २२२
उभयाङ्गसङ्गजन्यं ३१६
उभयोः समरसभाव ३५८
ऊ
ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वय० १४६
ऋ
ऋषयश्छन्दोदैवत० ३८८
ए
एकलवोना ऊनत्रिंश० १६४
एकस्यानेकार्था दृष्टा ३८३
एकस्यानेकार्थे विनियोगा ३८६
एकादश वाक्कूटे सार्धा १३७
एकारेण च तत्परचक्रे ३१०
एकैकस्मिन् कर्मणि १६८
पृष्ठाङ्काः
एतत्त्रयसमष्ट्यात्म २४१
एतत्त्रितयाभिन्नः स्व० ३१२
एतत् पिण्डद्वितयं २५४
एतस्मादयमर्थो बोद्धव्य ३८२
एतामुत्सृज्य जडैः ३९६
एते सम्यक् कलयति ३६४
एतौ लौ नयने यस्य ३७०
एवं द्वादशसंख्यैर्घटना ३००
एवं नवभिर्योगाद् ग्रह २८४
एवं षड्भिर्योगाच्छ्री २९८
एवं सप्तत्रिंशत्संख्याक० २७६
एवमवस्थाशून्यविषु० २०४
एवमवान्तरवाक्यैः० ३७३
एष महातत्त्वार्थः ३४३
एषां गमनं प्रापण० ३६४
एषाहंपदतुर्यस्वर० २५४
ऐ
ऐक्येन नादमयता० १९०
क
ककारत्रयवाच्यास्तु २७२
कण्ठे च कण्ठतालुनि १३८
कत्रितयादीकाराद् ३१०
कथमिव तस्मिञ्ज्ञाते ३
कन दीप्ताविति धातोः ३६१
कमु कान्ताविति धातोः ३६४
कल्याण्येकाक्षर्यावी० ३४६
कहयोर्लसयोरर्थो ३५८
कामकलाभिश्चतसृभिः २६८
कामयते स ककारः २२९
कामो योनिः कमला ७६

श्लोकार्धानुक्रमणिका ४१७
पृष्ठाङ्काः
कूटद्वितये शेषं पूर्व २४१
को विधिरेकारो हरिः ३६८
कौलिकार्थो रहस्यार्थः २२५
क्रमशःऽग्रिमकूटयुगे ३६८
क्रोधीशः श्रीकण्ठारूढः ८०
क्वचनावान्तरवाक्यं ३८५
ग
गणपग्रहभादीनां ३०७
गणेशग्रहनक्षत्र० २९४
गायत्र्यर्थस्त्रिपुरोप० २४१
गुरुचरणैकसहायः ४११
घ
घटिता च परादिवाग्० २८९
च
चक्रं विद्याक्षरैरेव ३०१
चतुरश्राणि लकारैः ३१०
छ
छन्दसि सर्वविधीनां ३६६
ज
जन्यजनकयोर्भेदः २८०
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्याख्य० ३७२
जीवात्मपरमात्मभ

४१८ वरिवस्यारहस्ये
पृष्ठाङ्काः
त्र
त्रिकूटवाच्यं मायायाः २४६
त्रिपदी त्रिवर्णबोध्या २३९
त्रिभिः कूटैः क्रमाद्वाच्यम् २४१
त्रिरावृत्तैरियं विद्या २४८
त्रैलोक्यमोहनाद्यैः २९६
द
दुर्लभमान्तरमङ्गं ३९४
देव्या रूपान्तरत्वाच्च ३०१
देव्या रूपान्तरत्वेन २९४
द्वादशषोडशदशभिः ३१६
द्विस्वरमध्यगतस्य ३६८
द्वितीयीकं कूटं कथितं ८०
द्वितीयीकं नादं तार्तीये० १४६
द्वैतीयीकद्वैतीयीक० ३५६
ध
धातोर्बह्वर्थत्वाद् बहुल ३६६
न
नक्षत्रत्वं च दशाकाराणां २९०
नरपतिरविकाष्ठा० २८६
नव च मनोरथांश्च २०४
नाडीनादार्णानां संयोगः १९२
नादः प्राथमिकस्तु १४६
नादस्तु पद्मरागवद् १४६
नादान्तव्यापिकयोश्च० १८५
नादान्तस्तडिदाभ स० १४६
नादान्तावधि नादः १९९
नादाश्चक्रत्रितय त्रि० १७०
नामार्थः शब्दरूपार्थश्चार्थः २२५
२७ वरि.
पृष्ठाङ्काः
नामैकदेशमात्रे नाम० ३४६
नामोपस्थितिगम्यः ३४६
नार्थज्ञानविहीनं २२२
निखिलजगत्संहर्त्री० ३६४
निजबुद्धिमात्रजन्या ४०१
नैसर्गिकी स्फुरत्ता वि० ११
न्यासा ध्यानं नियमाः ३८८
प
पञ्चचतुःशक्त्यनला ३००
पञ्चतुस्त्रिद्वयेकगशब्द० २६४
पञ्चभिर्नागकूर्माद्यैः २८७
पञ्चानामपि भेदाभावः ३१४
पञ्चाशद्भिर्वर्णैरभिन्न० ३१६
परमशिवे निष्कलता २८२
पीठानि पुनर्गणिता० २०७
पुटधामतत्त्वपीठा० १६५
पुरुषार्थानिच्छद्भिः २२३
पृथ्वी मही लकार० २३६
प्र
प्रकृतिपुरुषगुण० २८५
प्रकृते तु सर्वबोधस्येष्ट ३८३
प्रतिपदमर्थविशेषा० ३८२
प्रतिपाद्योऽत्रा कण्ठाद् ३४९
प्रत्यक्षरस्वरूपाः शाक्तार्थे १६८
प्रथमेन तुल्यमन्त्यं १२२
प्रथमेऽष्टादश वर्णाः १२२
प्रलयाग्निनिभं प्रथमं १४०
प्राणविहीनेव तनुः ०९६
प्राणात्ममानसानां १८४
प्राथमिककूटनादे १९०

हार्द १९९
रौद्रीक्रिये शिवापर्णे २४१
ल
लक्षणया तत्र तिरोधाना० ३७१
व
वरिवस्यारहस्यं ४११

Everything is verified and accurate.श्लोकार्धानुक्रमणिका ४१९
पृष्ठाङ्काः
प्रादुर्भूते हिरण्यद्विरद० १
प्रह्लादाभीष्टदाने १
ब
बहुतरसमासयोगात् ३६७
बाह्यान्यङ्गानि पुनः ३८८
बिन्दुत्रयनादत्रय० २९०
बिन्दुभिस्त्रिभिरुच्यन्ते २७५
बिन्दुरहितहल्ललेखा १२३
बिन्दूद्गच्छत्त्र्यश्राकार० १४६
बिन्दूभवति तमिन्दुं २५४
बिन्दोरर्ध मात्रा परे १२३
बिन्द्वर्धचन्द्ररोधिन्यः ८९
बिन्द्वादि कसमनन्तं १४६
बिन्द्वादिनवकयोस्तु १४६
बिन्द्वादीनां नवानां तु ८९