वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संहारक (महेश)) तीनों कहा गया है । इससे भी बढ़कर उन्हें साक्षात् परब्रह्म भी
कहा गया है—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥”
मोक्ष का मूल 'ज्ञान' है, उसका मूल महेश्वर हैं, उनका मूल पंचाक्षर मंत्र है
और इस पंचाक्षर का भी मूल गुरु की वाणी है—'मोक्षस्य मूलं यज्ज्ञानं तस्य मूलं
महेश्वरः । तस्य पंचाक्षरो मंत्रो मूलमंत्र गुरोर्वचः ॥'४
ग्रन्थकार गुरुचरणों मात्र की सहायता लेने कृतकृत्य होने की बात इस लिए
कहते हैं क्योंकि कोई भी विद्या बिना गुरु के सिद्ध नहीं होती । करोड़ों ग्रंथों का
अध्ययन करने पर भी बिना गुरु-कृपा के कोई सिद्धि संभव नहीं—
१. “गुरुवक्त्रेण लभ्येत् नाधीतागम कोटिभिः ॥”१
२. मुक्तिदा गुरुवागेका विद्याः सर्वा विडम्बकाः ॥२
३. देहस्थाः सर्वविद्याश्च देहस्थाः सर्वदेवताः ।
देहस्थाः सर्वतीर्थानि गुरुवाक्येन लभ्यते ॥३
॥ इस प्रकार वरिवस्यारहस्य के द्वितीयोंऽश की डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी कृत
'सरोजिनी' नामक हिन्दी टीका पूर्ण हुई ॥
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१-२. कुलार्णवतन्त्र ३. ज्ञानसंकलिनी तन्त्र