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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 513, कुल 530 में से

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द्वितीयोऽंशः ४११
कहकर गुरु को ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के समतुल्य कहा गया है किन्तु आगे इन
तीनों देवों से भी बड़ी सत्ता ब्रह्म को गुरु का पर्याय घोषित किया गया है । गुरु
तीनों लोकों में सर्वोपरि है—"न गुरोरधिकः कश्चित्त्रिषु लोकेषुविद्यते ।।" अर्थात्
“तीनों लोकों में गुरु से बढ़कर कोई अन्य व्यक्ति नहीं है ।।"
गुरु एवं शिव में अभेद—शिवपुराण के 'कैलाससंहिता' में कहा गया है—
'यथा गुरुस्तथैवेशो यथैवेशस्तथा गुरुः ।
पूजनीयो महाभक्त्या न भेदो विद्यतेऽनयोः ॥'
'यो गुरुः स शिवः प्रोक्तो यः शिवः स गुरुः स्मृतः ।
तस्माद्धि श्रीगुरोर्भक्तिर्भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ।।'
'गुरुचरणा:'—गुरुश्री के श्रीचरण ।। 'गुरु' = गृ शब्दे, क्र्यादि, एवं 'गृ
निगरणे' तुदादिगण की धातु को कृग्रोरुच्च (१।२५) इस उणादि सूत्र से 'कु' प्रत्यय
और उकारान्ता देश होने पर 'उरण रपरः' (१।१।५१) इससे उरादेशान्तर
'कृत्तद्धितसमासाश्च' (१।२।४६) इससे प्रातिपदिक संज्ञा के पश्चात् 'सु' विभक्ति
आने पर 'गुरुः' शब्द निष्पन्न होता है । गुरु की निरुक्ति निम्नानुसार है—१.
गृणति, उपदिशति धर्ममिति गुरुः । गिरत्यज्ञानमिति गुरुः । “यद्वा गीर्यतेस्तूयते
देवगंधर्वादिभिरितिगुरुः ।।" आचार्य शङ्कर कहते हैं—
“अविद्याहृदयग्रंथिबंधमोक्षो यतो भवेत् ।
तमेव गुरुरित्याहुर्गुरुशब्देन योगिनः ॥”१ (२५७)
भगवान् मनु कहते हैं—
'निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि ।
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते ॥'२ (२।१४२)
गुरुचरणैकसहायो भास्कररायो जनन्मातुः ।
वरिवस्यातिरहस्यं वीरनमस्यं प्रजग्रन्थ ॥ १६७ ॥
(प्रस्तुत ग्रंथ-प्रणयन के पीछे गुरु-कृपा का प्रतिपादन)
एक मात्र गुरु-चरणों की सहायता लेकर भास्करराय ने जगन्माता का, वीरों
द्वारा भी पूज्य, (पूजा-विधान के अत्यन्त रहस्यात्मक पक्ष पर प्रकाश डालने वाला)
रहस्य-ग्रंथ वरिवस्यातिरहस्य प्रणीत किया ॥ १६७ ॥

  • प्रकाश *
    वीरैः, अहमि रणाङ्गण इदमो वैरिणो नाशं कुर्वाणैः परापञ्चाशिकादौ प्रसिद्धैः ।
    इति सर्वमनवद्यम् ॥ १६७ ॥
    १. शंकराचार्य—'सर्ववेदान्तसिद्धान्तसार संग्रह' २. मनुस्मृति