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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 530 में से

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पृष्ठ 514

४१२ वरिवस्यारहस्ये
वस्तु प्रस्तुतमस्तु निस्तुलमहोःस्तोमास्तिवास्तु नो
हस्तन्यस्तसमस्तपुस्तकभरध्वस्तासदेनस्तति ।
शस्तस्वस्तिकृदस्तुदुस्तरतमः स्वस्तोकसौवस्तिकं
गीस्तोयस्तनयित्लुसुस्तनयुगं वास्तोष्पतिप्रस्तुतम् ॥
॥ इति श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीणसर्वतन्त्रस्वतन्त्रश्रीनृसिंहानन्दनाथ-
चरणारविन्दमिलिन्देन श्रीमद्गम्भीररायभारतीदीक्षितात्मजेन भास्कररायापरनाम्ना
भासुरानन्दनाथेन प्रणीतं सव्याख्यानं वरिवस्यारहस्यं सम्पूर्णम् ॥
——— ⁂ ———

  • सरोजिनी *
    गुरु शुश्रूषा से ही विद्या-प्राप्ति संभव है—गुरुसहायो गुरुशुश्रूषया विद्या' (याज्ञ.
    शि. ३०) इसीलिए ग्रन्थकार ने 'गुरुचरणैकसहायो'—एक मात्र गुरुश्री के श्री चरणों
    की सहायता लेकर । आचार्य भास्करराय ने गुरु को अत्यधिक महत्व प्रदर्शित करने
    के उद्देश्य से ही ग्रंथांत में गुरु के श्रीचरणों की भक्ति प्रदर्शित की है । ठीक भी
    है क्योंकि—'सर्वं गुरुमयं जगत्' (सारा संसार ही गुरुमय है ।) गुरु मनुष्य नहीं हैं
    प्रत्युत् शिव ही गुरु हैं—
    “गुरुरेकः शिवः प्रोक्तः सोऽहं देवि न संशयः ॥”१
    गुरु से अधिक कोई नहीं है—
    ‘न गुरोरधिकं शास्त्रं न गुरोरधिकं तपः ।
    न गुरोरधिकं मंत्र न गुरोरधिकं फलम् ॥
    न गुरोरधिका देवी न गुरोरधिकः शिवः ।
    न गुरोरधिका मुक्तिर्न गुरोरधिका. जपः ॥
    गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो महेश्वरः ।
    देव रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न कश्चन ॥२
    गुरु को मनुष्य समझने से करोड़ों कल्पों में भी शिष्य को सिद्धि प्राप्त नहीं
    हो पाती अतः गुरु को मानव न समझकर उन्हें शिवस्वरूप समझना चाहिए—
    “गुरौ मनुष्यता बुद्धिः शिष्याणां यदि जायते ।
    न हि तस्य भवेत् सिद्धिः कल्पकोटिशतैरपि ॥”
    तस्माद्देवेशि नियतं श्रीगुरुं शिवरूपिणम् ॥ (गु० गी०)३
    गुरु को ही ब्रह्मा (विश्व का स्रष्टा) विष्णु (विश्व का पालक एवं विश्व का

१-३. गुरुगीता ४. कुलार्णवतन्त्र