बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
ऊ ]
पुच्छलतारों के अवशेषों तथा ग्रह-नक्षत्रों की कक्षासन्धियों से रक्षा करना भी कहा है । वर्षोपसंहार यन्त्र से
विमानसे सम्बद्ध वायु ऊपर वेग से प्रगति करेगी उससे पुरोवात(वर्षा आनेवालीवायु)संघर्ष को प्राप्तकरके दो
टुकड़ों में विभक्त हो जावेगी जोकि जल की दो शक्तियां है द्रव (पतलापन) और प्राणन (गीला करनेवाली)
पुन विमान पर जल न द्रवित होगा—बहेगा—गिरेगा और न गीला कर सकेगा । महावात के आघात
से बचने को ऽथास्यवातनिरसन यन्त्र लगाना उस से वायु को त्रिमुखी—तीन टुकड़ों में कर दूर भगा
देना । विद्युत् के प्रभाव को दूर रखनेवाला शिर.कीलक यन्त्र विमान के मस्तक में लगाना जो कि छत्री
की भांति घूमता हुआ विद्युत् के प्रभाव को कोसों दूर रखता है । आतप (धूपताप) की क्षति से विमान
को बचाने के लिए आतपोपसंहार यन्त्र लगाना जिस से उष्णता का नाश शीतता का प्रसार हो । शक्त्या-
कर्षणयन्त्र से आकाशतरंगों वातसूत्रों से होने वाली क्षति से विमान को बचाना । एवं शब्द, उल्का,
पुच्छलतारों के अवशेषों और ग्रहों की कक्षासन्धियों के प्रभावों से विमान को बचाने के लिए विविध
यन्त्र लगाना । सूर्यकिरणों को स्वाधीन करने के लिये परिवेशक्रियायन्त्र लगाना आदि कहा गया है। एवं
सूर्यकिरणों को आकर्षित करके विविध उपयोग लेना भी कहा है । इसी प्रकार रूपाकर्षणयन्त्र रूपों का
..... के लिये, विश्वक्रियादर्पण, पञ्चारामुख्ययन्त्र, धूमप्रसारण, औष्ण्ययन्त्र (एञ्जिन), त्रिपुरविमान
..... बनाना और सीत्कारीयन्त्र बाहिर की वायु को खींचने के लिये लगाना जिस से त्रिपुर
विमान के लोग जल में भी श्वास ले सकें, वायु विद्युत् धूम के यथोचित उपयोगार्थ प्राणकुण्डलिनी यन्त्र
वेगमापक, उष्णतामापक चालमापकयन्त्र लगाए जावें एवं विद्युत् से चालित या विद्युत् के योगसे ३२ यन्त्र
प्रयुक्त किए जावें । विमान के प्रत्येक अङ्ग को भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहे से तैयार करके बनाना, लोहों का
खनि से ही प्राप्त होना नहीं किन्तु उसकी प्राप्ति के १२ स्थान बतलाए गए हैं । भूगर्भ में खनिज पदार्थों
की सहस्रों रेखा पंक्तियां कही हैं । इत्यादि बातें इस वैमानिक प्रकरण में अपने अपने स्थान पर मिलेंगी ।
धन्यवाद--
सर्वप्रथम हम ऋषि दयानन्द का महान् धन्यवाद करते हैं जिन्होंने ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका ग्रन्थ
और वेदभाष्य में स्थान स्थान पर विमानयान और उसके द्वारा आकाश में उड़ान पत्र यात्रा करने का
वर्णन ऐसे समय में किया जबकि किसी को इस युग में स्वप्न में भी इस बात की कल्पना न थी । उस
ऋषिके वचनों से प्रेरित हो विमानविषयक पुरातन ग्रन्थों की खोज में हम प्रवृत्त हुए । लगभग पन्द्रह वर्ष
पूर्व बड़ौदा राजकीय संस्कृत पुस्तकभवन (लाईब्रेरी) से हस्तलिखित इस वैमानिक प्रकरण का कुछ भाग
हमें प्राप्त हुआ था उसका हिन्दी अनुवाद 'विमानशास्त्र' नाम से हमने प्रकाशित भी कर दिया था उसी
के आधारपर अन्य खोज हुई वडोदा, पूना, उत्तर, दक्षिण आदि से यह श्लोकसामग्री हमें प्राप्तहुई, एतदर्थ
श्री विनयतोष जी भट्टाचार्य (P H D) अध्यक्ष राजकीय संस्कृत लाईब्रेरी बडोदा का हम धन्यवाद करते
हैं और श्री सुरेन्द्रनाथ जी गोयल एयर कमोडोर के सहयोग की भी हम सराहना करते हैं । पुन गुरुकुल-
कांगडी के अधिकारियों विशेषत गुरुकुल के कुलपति श्री पं० इन्द्र जी विद्यावाचस्पति का भी मैं अत्यधिक
हार्दिक धन्यवाद करता हूं जिन्होंने इस अनुवादकार्य के सम्पादनार्थ गुरुकुल में स्थान तथा पुस्तकभवन
† ऋषि दयानन्द ने वेदभाष्य में "शब्दायमानान् विमानान्-शब्द करते हुए विमान" ऐसा भी लिखा है
जैसा कि विमान उडते हुए शब्द करते हैं ।
ऋ]
(लाईब्रेरी) से पुस्तकों के उपयोग आदि की सर्व सुविधाएं हमें प्रदान करने की महती कृपा की है। अन्त
में सार्वदेशिक आर्यप्रतिनिधि सभा का भी मैं धन्यवाद करता हूँ जिसने मेरे द्वारा समर्पित इस भेंट का
स्वागत कर इसे प्रकाशित किया है। पुन रसायनाचार्य, आयुर्वेदाचार्य, खनिजशास्त्री, भूगर्भशास्त्री, खगोल-
विद्यावेत्ता ज्योतिषी एवं वैज्ञानिक विद्वान् महानुभाव इस का अवलोकन कर इस में आए विविध यन्त्रों
धातुप्रसङ्गों विद्युत् शक्तियों रेडियो-सकेतों राकेट जैसी बातों का विचार कर उनके सम्बन्ध में प्रशस्त
प्रकाश डालें और अपने विचार एव सम्मतिया हमारे पास भेजने की कृपा करें। एतदर्थ ही हम इस कार्य
मैं नि स्वार्थ लगे और इसे प्रकाशित किया है।
विज्ञप्ति—ग्रन्थ के सन्दिग्ध शब्दों और शब्दार्थों के आगे प्रश्न द्योतक चिह्न ? दे दिया गया है।
भवदीय—
स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक
१० ६-१६५८ ई०
वैमानिक प्रकरण में निर्दिष्ट पुरातन ग्रन्थों की सूची
१—क्रियासार
२—यन्त्रसर्वस्वम् ( भरद्वाजकृतम् )
३—शौनकीयम् ( शौनककृतम् )
४—लोहतन्त्रम्
५—दर्पणप्रकरणम्
६—विमानचन्द्रिका
७—व्योमानतन्त्रम्
८—यन्त्रकल्प
९—व्योमयानार्कप्रकाश
१०—खेटयानप्रदीपिका
११—यानविन्दु
१२—मणिभद्रकारिका
१३—लोहप्रकरणम्
१४—शक्तितन्त्रम्
१५—दर्पणशास्त्रम्
१६—लोहसर्वस्वम्
१७—धातुसर्वस्वम् ( बोधायनकृतम् )
१८—संस्काररत्नाकर
१९—मणिप्रकरणम्
२०—शब्दमहोदधि.
२१—पटकल्प
२२—यन्त्रप्रकरणम्
२३—अगस्त्यलहरी ( आश्वलायनकृता )
२४—पटप्रदीपिका
२५—चारनिबन्धनग्रन्थ
२६—शक्तिसर्वस्वम्
२७—ऋतुकल्पः
२८—वर्गसर्वस्वम्
२९—मूलार्कप्रकाशिका
३०—चीरीपटकल्प
३१—शशनिर्यासचन्द्रिका
३२—नालिकानिर्णयः
३३—मणिकल्पप्रदीपिका
३४—बृहत्काण्डम्
३५—पट्टिकानिबन्धनम्
३६—खेटविलासग्रन्थ
३७—पार्थिवपाककल्पः
३८—उद्बिज्जत्त्वसारायणम्
३९—गतिनिर्णयाध्याय
४०—लोहतत्त्वप्रकरणम्
४१—सौदामिनीकला ( ईश्वरकृता )
४२—शब्दनिबन्धनम्
४३—निर्यांसकल्प
४४—नामार्थकल्पसूत्रम् ( अत्रिकृतम् )
४५—सर्वशब्दनिबन्धनम्
४६—खेटसर्वस्वम्
४७—द्रावकप्रकरणम्
४८—खेटयन्त्रम्
४९—लोहरत्नाकर
५०—निर्णयाधिकारः
५१—मूषकल्पः
५२—कुण्डकल्पः
५३—कुण्डनिर्णयः
५४—भस्त्रिकानिबन्धनम्
(ii)
[स्तम्भः १ / Column 1]
५५-मुकुरकल्पः
५६-दर्पणकल्पः
५७-पराङ्कुशः
५८-सम्मोहक्रियाकाण्डम्
५९-अंशुबोधिनी
६०-प्रपञ्चसारः
६१-शक्तिबीजम्
६२-शक्तिकौस्तुभम्
६३-यन्त्रकल्पतरुः ( लल्लप्रणीतः )
६४-मणिरत्नाकरः
६५-पटसंस्काररत्नाकरः
६६-विषनिर्णयाधिकार
६७-अशनकल्पः
६८-पाकसर्वस्वम्
६९-लोहाधिकरणम्
७०-बोधानन्दकारिका ( बोधानन्दकृता )
७१-लोहरहस्यम्
७२-परिभाषाचन्द्रिका
७३-विश्वम्भरकारिका ( विश्वभरकृता )
७४-संस्कारदर्पणम्
७५-प्रलयपटलम्
७६-षड्गर्भविवेकः
[स्तम्भः २ / Column 2]
७७-रघूदयः
७८-शक्तिसूत्रम् ( अगस्त्यकृतम् )
७९-शुद्धविद्याकलापम् ( आश्वलायनकृतम् )
८०-ब्रह्माण्डसारः ( व्यासप्रणीतः )
८१-अंशुमत्तन्त्रम् ( भरद्वाजकृतम् )
८२-छन्द कौस्तुभ ( पराशरप्रणीत )
८३-कौमुदी ( सिंहकोठकृता )
८४-हृपशक्तिप्रकरणम् ( अङ्गिरसकृतम् )
८५-करकप्रकरणम् ( अङ्गिरसकृतम् )
८६-आकाशतन्त्रम् ( भरद्वाजकृतम् )
८७-लोकसंग्रह ( विसरणकृत )
८८-प्रपञ्चलहरी ( वसिष्ठकृता )
८९-जीवसर्वस्वम् ( जैमिनिकृतम् )
९०-कर्मानिष्पार ( आपस्तम्बकृत ) ,
९१-रुकूहृदयम् ( अत्रिकृतम् )
९२-वायुतत्त्वप्रकरणम् ( शकटायनकृतम् )
९३-वैश्वानरतन्त्रम् ( नारदकृतम् )
९४-धूमप्रकरणम् ( नारदकृम् )
९५-ओषधिकल्पः ( अत्रिकृत )
९६-वाल्मीकिगणितम् ( वाल्मीकिकृतम् )
९७-लोहशास्त्रम् ( शाकटायनकृतम् )
☸ वैमानिक प्रकरण में आये आचार्यों के नाम ☸
१—नारायण मुनि १९—वाताप
२—शौनक २०—साम्ब
३—गर्ग २१—बोधानन्द
४—वाचस्पति २२—भरद्वाज
५—चाक्रायणि २३—सिद्धनाथ
६—धुण्डिनाथ २४—ईश्वर
७—विश्वनाथ २५—आश्वलायन
८—गौतम २६—व्यास
९—लल्ल २७—पराशर
१०—विश्वम्भर २८—सिंहकोष्ठ
११—अगस्त्य २९—अङ्गिरा
१२—चुडिल ३०—विसरण
१३—गोभिल ३१—वसिष्ठ
१४—शाकटायन ३२—जैमिनि
१५—अत्रि ३३—आपस्तम्ब
१६—कपर्दी ३४—बौधायन
१७—गालव ३५—नारद
१८—अग्निमित्र ३६—वाल्मीकि
बृहद् विमानशास्त्र
की
संक्षिप्त विषयसूचि
कापी संख्या १--
विषय पृष्ठ
महर्षिभरद्वाजकृत "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थ का एक प्रकरण यह "वैमानिक
प्रकरण" है जिसमें ऐसे ४० प्रकरण थे। "वैमानिक प्रकरण" का ८ अध्यायों
१०० अधिकरणों ५०० सूत्रों में निबद्ध होना कहा गया है। यन्त्रकला जैसे इस ग्रन्थमें
भी आस्तिकता का प्रदर्शन करने के लिये मोक्षम् को मुमुक्षुओं का विमान बतलाया।
वैमानिक प्रकरण से पूर्व 'विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानबिन्दु,
खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश' इन विमानविषयक छ शास्त्रों का विद्यमान
होना जोकि क्रमश नारायण, शौनक, गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि, धूण्डिनाथ
महर्षियों के रचे हुए थे। महर्षि भरद्वाज द्वारा वेद का निर्मन्थन कर "यन्त्रसर्वस्व"
ग्रन्थ को मक्खन के रूप में निकाल कर दिए जाने का कथन†। विमान शब्द का
अर्थ सूत्रकार महर्षि भरद्वाज तथा आचार्य विश्वम्भर आदि के अनुसार वि-पक्षी की
भांति गति के मान से एक देश से दूसरे देश एक द्वीप से दूसरे द्वीप और एक लोक
से दूसरे लोक को आकाश में उडान लेने-पहुँचने में समर्थ यान है। अपितु पृथिवी
जल और आकाश में तीनों स्थानों में गति करने वाला बतलाया गया (जिसे आगे त्रिपुर
विमान नाम दिया है)। विमान के ३२ रहस्यों का निर्देश करना, यथा-विमान का
अदृश्यकरण, शब्दप्रसारण, लङ्घन, रूपाकर्षण, शब्दाकर्षण, शत्रुओं पर धूमप्रसारण
शत्रु से बचाने को स्वविमान का मेघावृत करना, शत्रु के विमानों द्वारा घिर जाने पर
उन पर ज्वालाशक्ति को प्रसारित करना-फेंकना, दूर से आतेहुए शत्रुविमान पर ४०८७
तरङ्गे फेंक कर उड़ने में असमर्थ कर देना, शत्रुसेना पर असह्य महाशब्द संघातरूप
(शब्दबम) फेंक कर उसे भयभीत वधिर शिथिल तथा हृद्रोग से पीडित कर देना आदि।
आकाश में विमान के सम्मुख विमानविनाशक आकाशीय पाच आवर्त (बवण्डरों) का
† निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधि भरद्वाजो महामुनि ।
नवनीत समुद्धृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम् ।।१०।।
(ख)
विषय पृष्ठ
आना और उनसे विमान रक्षा का उपाय । विमान में विश्वक्रियादर्पण आदि
३१ यन्त्रों का स्थापन करना ॥ १-२४
कापी संख्या २ --
विमानचालक यात्रियों को ऋतुओं की २५ विषशक्तियों के प्रभाव स बचने
के लिये ऋतु ऋतु के अनुसार पहिनने और ओढ़ने के योग्य वस्त्रों और भिन्न भिन्न
भोजनों का विधान, अन्न भोजन के अभाव में मोदक आदि तथा कन्दमूलफलों एवं
उनके मुरब्बों रसों का विशेष सेवन करना । विमान में उपयुक्त ऊष्मप लोहों के सौम,
सौण्डाल और मौर्विक तीन बीज लोहों का वर्णन एवं शोधन तथा बीज लोहों की
उत्पत्ति में भूगर्भ की आकर्षण शक्ति तथा पृथिवी की बाहरी कक्षाशक्ति और सूर्यकिरणों
भूततन्मात्राओं एवं ग्रहों के प्रभाव को निमित्त बतलाना, तीन सहस्र भूगर्भस्थ खनिज-
रेखापंक्तियों का निर्देश तथा सातवें रेखापंक्तिस्तर में तीन खनिजगर्भकोशों में सौम,
सौण्डाल, मौर्विक लोहों की उत्पत्ति का कथन ॥ २५-४३
कापी संख्या ३ --
विमान के भिन्न भिन्न यन्त्रों, कीलों (पेंचों) को भिन्न भिन्न लोहों से बनाने
का विधान । लोहे की प्राप्ति के १२ प्रकार या स्थान बतलाए जिससे कि 'खनिज,
जलज, ओषधिज, धातुज, कृमिज, क्षारज, अण्डज, स्थलज, अपभ्रंशक, कृतक' नामोंसे
लोहे कहे गए हैं। बीज लोहे सौम, सौण्डाल, मौर्विक कहे और प्रत्येक के ग्यारह ग्यारह
भेद होने से ३३ भेद बतलाए हैं ॥ ४४-५५
कापी संख्या ४--
विविध अनर्थों के ज्ञानार्थ विमान में दर्पणयन्त्र 'विश्वक्रियादर्पण, शक्त्या-
कर्षण, वैरूप्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जुलादर्पण, गुहागर्भदर्पण, रौद्रीदर्पण लगाए
जाना ॥ ५६-७०
कापी संख्या ५--
विमान की भिन्न भिन्न १२ गतियां चलन, कम्पन, ऊर्ध्वगमन, अधोगमन,
मण्डलगति--चक्रगति--घूमगति, विचित्रगति, अनुलोमगति--दक्षिणगति, विलोम-
गति--वामगति, पराङ्मुखगति, स्तम्भनगति, तिर्यग्गति--तिरछीगति, विविधगति या
नानागति' विद्युत् के योग से या विद्युत्शक्ति से होती हैं। विद्युत् से चालित या
विद्युन्मय विश्वक्रियादर्श आदि ३२ यन्त्रों का वर्णन । शत्रु के द्वारा किए समस्त क्रिया-
कलाप को दिखलाने वाला विश्वक्रियाकर्षणादर्श यन्त्र का विधान ॥ ७१-८४
कापी संख्या ६--
शक्त्याकर्षण यन्त्र का विधान, जिसके द्वारा आकाशतरंगों और वातसूत्रों से
होने वाली क्षति से विमान बच जाता है तथा परिवेषक्रियायन्त्र का स्थान जो कि
( ग )
विषय पृष्ठ
विमान के मार्ग में आई सूर्यकिरणों को स्वाधीन करके विमान को निर्बाध गतिशील
करता है ॥ ८५ - ६६
कापी संख्या ७—
द्रावक तारों पर लपेटने के लिए गेण्डे आदि चर्म का विधान। वातसंयोजक,
धूमप्रसारण आदि यन्त्रों का निर्माण । ३२ मणिवर्गों के १२ वें वर्ग में कही १०३
मणियों का विमान में सूर्यकिरणाकर्षणार्थ उपयोग लेना । परिवेषक्रियायन्त्रद्वारा विमान
में वातसंयोजन धूमप्रसारण सूर्यकिरणाकर्षण आदि व्यवहार ॥ १००-११०
कापी संख्या ८—
ग्रहों के चार अतिचार आदि विरोधी गतियों के संघर्ष से आकाश में बहती
हुई विषशक्ति के आक्रमण या प्रभाव से विमान के अङ्गों को निष्प्रभाव रखने के लिए
अङ्गोपसंहारयन्त्र का विधान तथा भूगर्भ से उद्भूत और पृथिवी की बाह्यकक्षाओं से
प्रकट हुए अनिष्टों के निवारणार्थ विस्तृतास्यक्रियायन्त्र का स्थापन । शत्रुओं पर कृत्रिम
विविध धूमप्रकाश को वैरुप्यदर्पणद्वारा फेंक कर उन्हें विरूप करना मूर्च्छा आदि भिन्न
भिन्न रोगों में ग्रस्त करना ! आकाशीय वातावरण से विमान के अङ्गों तथा विशेषत
उपरि अङ्गों में शिथिलता आ जाने और उनपर मल लिप्त होजाने से बचाने को पद्मपत्र-
मुखयन्त्र का विधान ॥ १११-१२७
कापी संख्या ६—
ग्रीष्मकाल में उष्णकिरणों के मेल से कुलिका नाम की शक्ति विमान को
भस्म कर देने वाली उत्पन्न हो जाती है उसे कुण्टिणीशक्तियन्त्र के विविध अङ्गोंद्वारा
पी लिये जाने का वर्णन, तथा ग्रीष्म में विषयुक्त पञ्चशिखा नाम की घातिका शक्ति
उत्पन्न हो जाती है जो कि प्राणियों के जीवनरस का शोषण एवं अनेकविध रोगों का
निमित्त है उसे नष्ट करने के लिये पुष्पिणीयन्त्र (पुष्पाकार अरायन्त्र) लगाना, जो कि
उसके विषयुक्तप्रवाहों को बाहिर निकाल देता है। दो वायुओं के आवर्त्त--चक्रधूम
एवं सूर्यकिरणों के संसर्ग से वज्रसमान विद्युत् का पतन हो जाया करता है उससे बचने
के लिये पिञ्जुलादर्शयन्त्र का विमान में लगाना ॥ १२८-१४५
कापी संख्या १०--
शत्रु के द्वारा भूमि में दबाए--छिपाए हुए महागौलाग्नियन्त्र का गुहागर्भादर्श
यन्त्र ( दूरबीन जैसे यन्त्र) द्वारा सूर्यकिरणों (ऐक्सरे की भांति) पकड भूमि में प्रविष्ट कर
निर्यासपट पर प्रतिबिम्ब (फोटो) लेलेना ॥ १४६-१५४
कापी संख्या ११--
शत्रु पर अन्धकार फैलाने वाला तमोयन्त्र । आकाशीय १३ वातावरण में हुए
( घ )
विषय पृष्ठ
वातसंघर्ष से विमान को बचाने वाला पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र लगाना जिसके नालों से
वातविषशक्तिया विमान से खिंचकर बाहिर निकल जाती हैं । आवह आदि १२२ भेदों
में हैं ७६ वा वातायन प्रवाह है जहां ग्रीष्म ऋतु में विमान की वक्रगति से यात्रियों को
हानि की सम्भावना है विमान की वक्रगति को रोकने के लिये विमान के लिये विमान
के नीचे पार्श्वकेन्द्र में वातस्तम्भनाल कीलयन्त्र लगाना । वर्षा ऋतु में विद्युत् से उत्पन्न
अग्निशक्ति की शान्ति विद्युद्दर्पणयन्त्र से हो जाना बर्फ के समान ठण्डा हो जाना।
आकाशीय ३०४ शब्दों में मेघतरङ्ग वायु विद्युत् की कड़क से ८ वें स्तर में श्रोत्र-
विदीर्णता और बधिरता आदि हानि से बचने को शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र लगाना ॥ १५५-१७३
कापी संख्या १२-
आकाश में रोचिषी आदि १२ उल्काएं विद्युत् से भरी हैं उक्त उल्काओ
में स्थित विद्युत् के प्रहार से विमान को बचाने के लिये विद्युदुद्वादशकयन्त्र लगाना ।
विमान में स्थित धूम, विद्युत् और वायु को नियन्त्रित करने और उपयोग में लेने के
लिये प्राणकुण्डलिनी यन्त्र लगाना । जिससे विमान की विविध गतिया सिद्ध होती हैं ॥ १७४-१८३
कापी संख्या १३-
आकाश में ग्रहों के प्रभाव से विमानपथरेखा में शीतरसधारा शीतधूमधारा
शीतवायुधारा वेगसे आ जाया करती हैं जोकि विमानके कलपुर्जो को शिथिल और यात्रियों
को रुग्ण तथा विमानपथ को अदृश्य कर दिया करती हैं उन्हें निष्फल करने या उनके
प्रहार से बचने के लिये शक्त्युद्गमयन्त्र लगाना । शत्रुद्वारा दम्भोलि (तारपीडो जैसे)
आदि विघातक आठ यन्त्र स्वविमान के मार्ग में फेंके हुओं से बचाने के लिये
स्वविमान की वक्रगति देने के निमित्त वक्रप्रसारणयन्त्र लगाना । विद्युत्शक्ति को सर्वत्र
विमानाङ्गों में प्रेरित करने के लिये विद्युत-शक्ति से पूर्ण तारों से घिरा पिञ्जरा जैसा
शक्तिपञ्जरयन्त्र लगाना। मेघों से विद्युत् के पतन की आशङ्का पर विमान के शिर पर
छत्री के आकार का घूमता हुआ शिर कीलकयन्त्र लगाना जिससे विद्युत् का प्रभाव
कोसों दूर रहे । विविध शब्दों भाषा भाषणो बाजे स्वर सङ्कल्प आदि को खींचनेवाला
शब्दाकर्षणयन्त्र लगाना ॥ १८४-१८६
कापी संख्या १४-
भिन्न भिन्न भय आदि अवसरों पर जैसे वैसे रंग के वस्त्र का प्रसारण होना
आठों दिशाओं में ग्रहों और किरणो की सन्धियों में ऋतुकाल सम्बन्धी १५ कौबेर-
विद्युत् शक्तिपूर्ण वायुए हैं उनसे यात्रियों को विविध कष्ट सम्भावनीय हैं उनसे बचाने
के लिये दिशाम्पतियन्त्र लगाना ॥ १८६-२१२
कापी संख्या १५-
ग्रहों के सञ्चार मार्गों में ग्रहों के परस्पर, एक रेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि में
( ङ )
विषय पृष्ठ
ज्वालामुखीविषशक्ति है जिससे यात्री मर जाते तक हैं उस विषशक्ति के नाशार्थ पट्टिका-
भ्रकयन्त्र लगाना । शरद् और हेमन्त ऋतु की शीतता को निवृत्त करने के लिये
सूर्यशक्त्यपकर्षण यन्त्र लगाना । शत्रु के विमानोंद्वारा अपना विमान घिर जाने पर
उनके ऊपर अपस्मारधूमप्रसारणार्थ अपनी रक्षा के अर्थ अपस्मारधूमप्रसारणाख्ययन्त्र
लगाना । अभ्रमण्डलों एवं वायुप्रवाहों के सङ्घर्ष में विमान को अविचलित रखने के
लिये स्तम्भनयन्त्र का होना । अग्निहोत्रार्थ और पाकार्थ वैश्वानरनालयन्त्र भी लगाना ॥ २१३-२२८
कापी संख्या १६--
मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक ( यान्त्रिक ) नाम से विमानों के तीन जातिभेद ।
त्रेतायुग में मान्त्रिक--मन्त्रप्रभाव योगसिद्धि से, द्वापर में तान्त्रिक-तन्त्रप्रभाव-
औषध युक्ति से, कलियुग में कृतक-यान्त्रिक-यन्त्रकलापरायण। मान्त्रिक विमान के
२५ प्रकार "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थ में महर्षि भरद्वाज के अनुसार, किन्तु "मणिभद्रिका"
ग्रन्थ में गौतम के अनुसार ३२ हैं ॥ २२६-२३६
कापी संख्या १७--
तान्त्रिक विमान के भेद ५६ कहे हैं । कृतक अर्थात् यान्त्रिक-यन्त्रकला से
चालित विमान २५ प्रकार के हैं । कृतक ( यान्त्रिक) विमानों में प्रथम शकुन विमान
है उसके पीठ पक्ष पुच्छ आदि २८ अङ्गों का वर्णन और रचना भिन्न भिन्न ओषधि
खनिज पदार्थों के पुट से बनाए हुए भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहों से करना । शकुन विमान
की पीठ पर तीन बड़े कमरे बनाना, प्रथम में विमान के अङ्गयन्त्रों और उपकरणों को
रखना दूसरे में स्तम्भ के साथ यात्रियों के बैठने को घर ( Compartments )
तीसरे में विमान के सिद्ध यन्त्र आदि साधन । शकुन विमान में चार औष्ण्य यन्त्र
( ऐञ्जिन ), चार वाताकर्षण यन्त्र वायु को खींचने के लिये, भूमि पर सञ्चार करने
को भी चक्र लगाना ॥ २३७-२५२
कापी संख्या १८--
दूसरा सुन्दर विमान है, उसमें धूमोद्गम आदि ८ विशेष अङ्ग हों । पात्र में
धूमाञ्जन तैल, हिंगुल तैल, शुक्ततुण्डि तैल, कुलटी ( मन शिला ) का तैल भरना ।
विद्युत् के संयोजनार्थ मणिपीठ के अन्दर नालमार्ग से दो तार लगाना, नालस्तम्भ के
अन्दर धूम को रोकने और फेंकने के अर्थ छिद्रसहित घूमने वाले तीन चक्र नाल सहित
लगाना तैलधूम और जलधूम की नालें उन्हें बाहर निकालने को लगाना एवं ४० यन्त्र
सुन्दर विमान में लगाना । शुण्डाल--शुण्ड जैसा यन्त्र १ बालिश्त मोटा १२ बालिश्त
लम्बा ऊंचा हो जिससे विमान दौड़ता है। दूध गोन्द वाले वृक्षों के दूध गोन्द तथा
विशेष निर्दिष्ट लोहे आदिको मिला कर शुण्डाल का बनाया जाना । शुण्डाल से धूम
निकालने और वायुको खींचने के द्वारा विमान का चलाना । संघर्षण,पाकजन्य,जलपात,
( घ )
विषय पृष्ठ
सांयोजक, किरणजन्य आदि ३२ विद्युद्यन्त्र होते हैं परन्तु विमान में सांयोजक विद्यु-
द्यन्त्र का लगाया जाना अगस्त्य के शक्तितन्त्र के अनुसार कहा जाना ॥ २५३-२६६
कापी संख्या १९----
विद्युत्-शक्ति पूरक पात्र बनाने का प्रकार, विमानको भूमि से ऊपर उठानेके
लिए वातप्रसारणयन्त्र (वायुके फेंकनेवाला यन्त्र) लगाना, २६०० कक्ष्यागति (अश्वगति)
से वात को फेंकना, वायु के निकलने से विमान का वेग से दौड़ना । सुन्दरविमान
का आवरण भी शकुनविमान की भांति राजलोहे से बनाया जाना, कमरे और शेष ३२
अंग भी वैसे ही बनाना । विमान के चलने में धूम आदि निकालने का वेगप्रमाण
गणित शास्त्र से निश्चित किया जाना, एक चुटकी बजाने जितने काल में धूमोद्गम
यन्त्र (एन्जिन) से औष्म्य वेग ३४८० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण में हो जाने पर विमान
का एक घड़ी में ४०० योजन अर्थात् एक घण्टे में ४००० कोस (लगभग ८०००
मील) परिमाण से गति करना ॥ २७०-२८०
कापी संख्या २०----
तीसरे रुक्मविमान का राजलोहे से बनना और पाकविशेष से रुक्म अर्थात्
स्वर्ण रंग वाला बन जाना अत एव उसका रुक्म विमान नाम से कहा जाना । १२
बालिश्त लम्बा चौडा लोहपिण्ड चक्र श्रृंखला तन्त्री (जञ्जीर) द्वारा अन्य चक्रों से युक्त
होने पर गतिशील होता है, अंगूठे द्वारा बटनका दबाने से सब कलायन्त्रों का चल
पडना और विद्युत् के योग से धूम का ५०० लिंक (डिग्री) वेग हो जाना चकताइडन-
स्तम्भ के आकर्षण से विमान का वेग से उड़ना । रुक्म विमान में अभ्रक की भित्तिया
आदि बनाया जाना ॥ पृष्ठ २८१-३०१
कापी संख्या २१-
त्रिपुर विमान अपने तीन आवरणों से पृथिवी जल आकाश में चलने वाला
होने से त्रिपुर विमान नाम से प्रसिद्ध होना । प्रथम भाग से पृथिवी पर दूसरे भाग से
जल में तीसरे भाग से आकाश में गमन करता है । त्रिपुर विमान में किरणजन्य
विद्युत् से काम लेना । त्रिपुर विमान के ऊपर नीचे चक्रों में शक्ति होने से उसका
पर्वतों पर चढ़ने तिरछे चलने में समर्थ होना । त्रिपुर विमान में अभ्रक का विशेष
प्रयोग करना, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र नाम से अभ्रक के चार भेद कहे गए, श्वेत
ब्राह्मण रक्त क्षत्रिय पीत वैश्य और कृष्ण शूद्र अभ्रक बतलाया है । ब्राह्मण अभ्रक के
१६, क्षत्रिय अभ्रक के १२, वैश्य अभ्रक के ७ और शूद्र अभ्रक के १५ भेद । त्रिपुर
विमान में दिशाओं में घूमने वाले घर लगाना । उसका प्रथम आवरण सब से बड़ा
दूसरा उससे छोटा तीसरा और भी छोटा होना । प्रथम आवरण के ऊपर नीचे मुख-
वाले पेंचों में घूमने वाले हस्त चक्रों-मण्डूक हस्तचक्रों का लगाया जाना उनका विद्युत्-
तारों से युक्त हो जल में गति करना ॥ पृष्ठ ३०२-३१८
( छ )
विषय पृष्ठ
कापी संख्या २२-
जल में गमनार्थ प्रथम आवरण का संकोच कर लेना दूसरे आवरण के नीचे
यन्त्रों को ले आना क्षीरीपट का आवरण में उपयोग । ऊपर की वायु को चूसने के लिए
सीत्कारी यन्त्र का लगाना जिससे सर्वत्र वायु प्राप्त हो । विमान में वेणीतन्त्री—चिन्ता-
सूचिका डोरी लगाना । भाषणाकर्षक दिशाप्रदर्शक, शीतोष्णत्वमापक यन्त्र भी लगाना
कहा है । अत्यन्त वर्षा, वात, धूप आदि के प्रतीकार करने वाले यन्त्र भी लगाना । इस
प्रकार वर्षोपसंहार यन्त्र, भ्रास्यवातनिरसन यन्त्र, आतपोपसंहारयन्त्र लगाने बतलाए
हैं । वर्षोपसंहार यन्त्र कौञ्चिक (कृत्रिम) लोहे से बनाना इस यन्त्र से विमानसम्बन्धी
ऊर्ध्वगामी वायु के साथ पुरोवात-वर्षावात (पुर्वा हवा) का संघर्ष हो जाने से पुरोवात दो
टुकडों में विभक्त हो जाती है जो कि जल की दो शक्तियों द्रव (पतलापन) और प्राएन
( गीलापन ) हैं जिससे विमान पर जल बरस न सकेगा और उसे गीला
हस्तलिखितग्रन्थप्रदर्शित विषयानुक्रमणिका
अध्याय १
१—मङ्गलाचरणम् ।
२—विमानशब्दार्थाधिकरणम् ।
३—यन्तृ (तृ ?) त्वाधिकरणम् ।
४—मार्गाधिकरणम् ।
५—आवर्ताधिकरणम् ।
६—अङ्गाधिकरणम् ।
७—वस्त्राधिकरणम् ।
८—आहाराधिकरणम् ।
६—कर्माधिकाराधिकरणम् ।
१०—विमानाधिकरणम् ।
११—जात्यधिकरणम् ।
१२—वर्णाधिकरणम् ।
अध्याय २
१३—संज्ञाधिकरणम् ।
१४—लोहाधिकरणम् ।
१५—संस्काराधिकरणम् ।
१६—दर्पणाधिकरणम् ।
१७—शक्त्यधिकरणम् ।
१८—यन्त्राधिकरणम् ।
१६—तैलाधिकरणम् ।
२०—ओषध्यधिकरणम् ।
२१—वाताधिकरणम् ।
२२—भाराधिकरणम् ।
२३—वेगाधिकरणम् ।
२४—चकाधिकरणम् ।
अध्याय ३
२५—भ्रामण्यधिकरणम् ।
२६—कालाधिकरणम् ।
२७—विकल्पाधिकरणम् ।
२८—संस्काराधिकरणम् ।
२६—प्रकाशाधिकरणम् ।
प्रकाशाधिकरणम् ❊ ।
३०—उष्णाधिकरणम् ।
३१—शैत्याधिकरणम् ।
३२—आन्दोलना (न ?) धिकरणम् ।
३३—तिर्यङ्गाधिकरणम् ।
३४—विश्वतोमुखाधिकरणम् ।
३५—धूमाधिकरणम् ।
३६—प्राणाधिकरणम् ।
३७—सन्ध्यधिकरणम् ।
अध्याय ४
३८—आहाराधिकरणम् ।
३६—लगाधिकरणम् ।
४०—वगाधिकरणम् ।
४१—हगाधिकरणम् ।
४२—लहगाधिकरणम् ।
४३—लवगाधिकरणम् ।
❊ हस्तलेख में कापी करने वाले के प्रमाद से पुनरुक्ति है ।
[२]
४४-प्लवहङ्गाधिकरणम् ।
४५-वान्तर्गमनाधिकरणम् ।
४६-वान्तर्लङ्गाधिकरणम् ।
४७-अन्तर्लक्ष्याधिकरणम् ।
४८-बहिर्लक्ष्याधिकरणम् ।
४६-वाह्याभ्यन्तर्लक्ष्याधिकरणम् ।
अध्याय ५
५०-तन्त्राधिकरणम् ।
५१-विस्तृतप्रसारणाधिकरणम् ।
५२-व्याप्त्यधिकरणम् ।
५३-स्तम्भनाधिकरणम् ।
५४-मोहनाधिकरणम् ।
५५-विकाराधिकरणम् ।
५६-दिङ्निदर्शनाधिकरणम् ।
५७-अदृश्याधिकरणम् ।
५८-तिर्य्यग्वाधिकरणम् ।
५६-भारवहनाधिकरणम् ।
६०-घण्टारवाधि ( दि ? ) करणम् ।
६१-शुकभ्रमणाधिकरणम् ।
६२-चक्रगत्यधिकरणम् ।
अध्याय ६
६३-वर्गविभाजनाधिकरणम् ।
६४-ग्रामनिर्णयाधिकरणम् ।
६५-शक्त्युद्गमाधिकरणम् ।
६६-सूतवाहाधिकरणम् ।
६७-धूमयानाधिकरणम् ।
६८-शिखोद्गमाधिकरणम् ।
६६-अंशुवाहाधिकरणम् ।
७०-तारमुखाधिकरणम् ।
७१-मणिवाहाधिकरणम् ।
७२-मरुत्सखाधिकरणम् ।
७३-शक्तिगर्भाधिकरणम् ।
७४-गारुडाधिकरणम् ।
अध्याय ७
७५-सिंहिकाधिकरणम् ।
७६-त्रिपुराधिकरणम् ।
७७-गूढचाराधिकरणम् ।
७८-कूर्माधिकरणम् ।
७६-उत्तालिय्यधिकरणम् ।
८०-माण्डलिकाधिकरणम् ।
८१-आन्दोलिकाधिकरणम् ।
८२-ध्वजाङ्गाधिकरणम् ।
८३-वृन्दावनाधिकरणम् ।
८४-वैरिञ्चिकाधिकरणम् ।
८५-जलदाधिकरणम् ।
अध्याय ८
८६-दिङ्निर्णयाधिकरणम् ।
८७-ध्वजाधिकरणम् ।
८८-कालाधिकरणम् ।
८६-विस्तृतक्रियाधिकरणम् ।
६०-अङ्गोपसंहाराधिकरणम् ।
६१-तम प्रसारणाधिकरणम् ।
६२-वातकुण्डल्यधिकरणम् ।
६४-रूपाकर्षणाधिकरणम् ।
६५-प्रतिबिम्बाकर्षणाधिकरणम् ।
६६-गमागमाधिकरणम् ।
६७-आवासस्थानाधिकरणम् ।
६८-शोधनाधिकरणम् ।
६६-परिच्छेदाधिकरणम् ।
१००-रक्षणाधिकरणम् ।
इति विषयसूचिका समाप्ता ॥
विज्ञप्ति—यह सूचिका बडोदा राजकीय संस्कृत पुस्तक-भवन से प्राप्त हुई है ।
कापो संख्या १—
यन्त्रसर्वस्वे
✻ वैमानिकप्रकरणम् ✻
मङ्गलाचरणम्
यद्विमानगतास्सर्वे यान्ति ब्रह्म परं पदम् ।
तन्नत्वा परमानन्द श्रु [शृ ?] तिमस्तकगोचरम् ॥ ✕
पूर्वाचार्यकृतान् शास्त्रानवलोक्य यथामति ।
सर्वलोकोपकाराय सर्वानर्थविनाशकम् ॥
त्रयीहृदयसन्दो [ब्दो ?] हमारूपं सुखप्रदम् ।
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं शताधिकरणैस्तथा ॥
अष्टाध्यायसमायुक्तमतिगूढं मनोहरम् ।†
जगतामतिसन्धानकारणं शुभदं नृणाम् ॥
अनायासाद् व्योमयानस्वरूपज्ञानसाधनम् ।
वैमानिकप्रकरणं कथ्यतेऽस्मिन् यथामति ॥
मङ्गलाचरणवचनों की बोधानन्दकृत व्याख्या —
व्याख्यानश्लोकाः +
महादेवं महादेवीं वाणीं गणपतिं गुरुम् ।
शास्त्रकारं भरद्वाजं प्रणिपत्य यथामति ॥ १ ॥
✕ गुजराती मे 'ऋ' का 'रु' उच्चारण करते है अत यहा 'श्रुति' का 'शृति' उच्चारणक्षमता से लिपिप्रमाद
है जो कि वृत्तिकार के पश्चात् किसी गुजराती कापी करने वाले का काम है।
† भरद्वाज महर्षि ने 'वैमानिक प्रकरण' को पाच सौ सूत्रो, सो अधिकरणो ओर आठ अध्यायो मे लिखा है
यह इस कथन से स्पष्ट होता है।
- मङ्गलाचरण वचन महर्षि भरद्वाज के है 'महादेव ' से व्याख्यानश्लोक वृत्तिकार बोधानन्द यति के है।
२ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
स्वतस्सिद्धन्यायशास्त्रं वाल्मीकिगणितं तथा ।
परिभाषाचन्द्रिकां च पञ्चान्नामार्थकल्पकम् ॥ २ ॥
पञ्चवारं विचार्यैथ तत्प्रमाणानुसारतः ।
बालानां सुखबोधाय बोधानन्दयतीश्वरः ॥ ३ ॥
सङ्ग्रहाद् वैमानिकाधिकरणस्य यथाविधि ।
लिलेख बोधानन्दवृत्त्याख्यां व्याख्यां मनोहराम् ॥ ४ ॥
व्याख्या लक्षणरीत्यास्य पाणिनीया[य्या ?] ❀दिमानतः ।
पारिभाषिकरूपत्वाद् व्याख्यातुं नैव शक्यते ॥ ५ ॥
महान् देव परमेश्वर महती देवतारूप वाणी-वेदवाणी, निज गुरुवर गणपति को तथा 'यन्त्र-
सर्वस्व' नामक शास्त्र एवं तद्ग्रन्थ 'वैमानिक प्रकरण' के रचयिता महर्षि भरद्वाज को श्रद्धापूर्वक एवं
यथावत् प्रणाम करके स्वत सिद्ध न्यायशास्त्र तथा वाल्मीकि गणित और परिभाषाचन्द्रिका ग्रन्थ को पुन
नामार्थकल्प ग्रन्थ को पांच बार विचार करके तथा उनके प्रमाणानुसार विद्यार्थियों के सुखबोध-सरल
ज्ञान के लिए मुझ बोधानन्द यतीश्वर ने वैमानिक प्रकरण की बोधानन्दवृत्ति नाम की मनोहर व्याख्या
को सङ्क्षेप से यथाविधि लिखा है । इस ग्रन्थ की व्याख्या पारिभाषिकरूप होने से पाणिनीय आदि
के अनुसार लक्षणरीति से स्पष्ट नहीं की जा सकती है+ ॥ १-५ ॥
प्रारिप्सितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नेन यथाक्रमम् ।
परिसमाप्तिप्रचयगमनाभ्यां यथाविधि ॥ ६ ॥
शिष्टाचारपरिप्राप्तमङ्गलाचरणं स्वतः ।
अनुष्ठाय यथाशास्त्रं शिष्याशिक्षार्थमादरात् ॥ ७ ॥
यद्विमानगतास्सर्वेत्युक्तश्लोकाद्यथाक्रमात् ।
स्वेष्टदेवनमस्काररूपमङ्गलमातनोत् ॥ ८ ॥
अर्थात्सूचयति ग्रन्थादनुबन्धचतुष्टयम् ।
ब्रह्मानुग्रहसल्लब्धवेदराशिं कृपाकरः ॥ ९ ॥
प्रारम्भ करने में अभीष्ट ग्रन्थ की यथाक्रम निर्विघ्नरूप से यथाविधि परिसमाप्ति और विस्तार
प्रचार के लिये एवं शिष्यों की शिक्षा के अर्थ शास्त्रानुसार आदर से शिष्टाचारपरम्परा से प्राप्त मङ्गला-
चरण का स्वयं अनुष्ठान करके 'यद्विमानगतास्सर्वे' उक्त श्लोक से क्रमानुसार निज इष्टदेव का नमस्कार-
रूप मङ्गल का महर्षि भरद्वाज ने सेवन किया है। परमेश्वर के अनुग्रह से समस्त वेदज्ञान को प्राप्त
हुआ, दयालु ग्रन्थकार निज ग्रन्थ से अनुबन्धचतुष्टय को प्रकरण एवं प्रसङ्ग से सूचित करता है ॥१-६॥
निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः ।
नवनीतं समुद्धृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम् ॥ १० ॥
- यहां हस्तलेख में 'पाणिनीय्यादिमानत' प्रयोग से 'नीय्य' यकारद्वित्व है और ऐसा अनेक स्थलों पर
आया है, हो सकता है यह शैली दाक्षिणात्य हो ।
- इस ग्रन्थ का समस्त हिन्दी भाषा का अनुवाद हमारा ( स्वामी ब्रह्ममुनि का ) है ।
ब्रह्म विमान ] [ ३
प्रायच्छत्सर्वलोकानामीप्सितार्थफलप्रदम् ।
तस्मिन् चत्वारिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम् ॥ ११ ॥
नानाविमानवैचित्र्यरचनाक्रमबोधकम् ।
अष्टाध्यायैर्विभाजित शताधिकरणैर्युतम् ॥ १२ ॥
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम् ।
वैमानिकप्रकरणमुक्तं भगवता स्फुटम् ॥ १३ ॥
महर्षि भरद्वाज ने उस वेदरूप समुद्र का निर्मन्थन करके सब मनुष्यों के अभीष्ट फलप्रद्
'यन्त्रसर्वस्व' ग्रन्थरूप मक्खन को निकाल कर दिया । चालीस अधिकारों-प्रकरणों से युक्त उस 'यन्त्रसर्वस्व'
ग्रन्थ मे भिन्न भिन्न विमानों की विचित्रता और रचनाक्रम का बोधक आठ अध्यायों से विभाजित सौ
अधिकरणों वाला पांच सौ सूत्रों से युक्त आकाशयान विमान प्रधानरूप से जिसमे वर्णित है ऐसा
'वैमानिक प्रकरण' भगवान् भरद्वाज ऋषि ने सम्प्रदर्शित किया एवं स्पष्ट कहा है ॥ १०-१३ ॥
तत्रादौ मङ्गलश्लोकतत्पर्य (यस् ?) सनिरूप्यते ।
उत्तरे तापनीये च शैव्यप्रश्ने च काठके (टके ?) ॥ १४ ॥
माण्डूक्ये च यदोङ्कार परापरविभागतः
उक्त स्यादारुरुक्षूणा ब्रह्मप्राप्त्यर्थमादरात् ॥ १५ ॥
विमानत्वेन मुनिना तदेवात्राभिवर्णितम् ।
वाच्यार्थलक्ष्यार्थभेदान्द्वि(द्वि?)धा भिद्यते श्रु (श्रु?)तो ॥१६॥
तुरीय एव लक्ष्यार्थ प्रणवस्येति कीर्तित ।
तदेवाखण्डैकरसं परमात्मेति चोच्यते ॥ १७ ॥
एत(क ?)दालम्बन ष्ठलमित्यादि व (धृ ?) तिमानतः ।
गमनार्थ साधकाना भक्त्या तत्परम पदम् ॥ १८ ॥
अब प्रथम मङ्गलश्लोकों का तात्पर्य निरूपण किया जाता है उत्तर तापनीय, शैव्य प्रश्न,
कठप्रोक्त और माण्डूक्य उपनिषद् में जो ओङ्कार 'ओम्' पर अपर विभाग से वर्णित है वह आरोहण
करने को उत्सुक की ब्रह्मप्राप्ति के अर्थ आदर से कहा गया है। भरद्वाज मुनि ने इस मङ्गलाचरण में
उसी ओम् ब्रह्म का विमान रूप से वर्णन किया है, उक्त ओम् रूप ब्रह्म वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ के
भेद से उपनिषद् रूप श्रुति में दो प्रकारों में विभक्त हो जाता है। प्रणव अर्थात् ओम् का तुरीयरूप
अर्थात् चतुर्थ अमात्र रूप या वस्तुरूप ही लक्ष्यार्थ है ऐसा कहा है वही अखण्ड एकरस परमात्मा है
ऐसा भी कहा है। यही आज्ञारूप आलम्बन श्रेष्ठ है 'एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्' इत्यादि
उपनिषद् वचनों के प्रमाणानुसार उपासकों का भक्ति से प्राप्त करने योग्य वह परम पद है ॥ १४-१८ ॥
वाचक ( ) प्रणवो ह्यत्र विमान इति वर्णितः ।
तमारुह्य यथाशास्त्रं गुरुक्तेनैव वर्त्मना ॥ १६ ॥
ये विशन्ति ब्रह्मपदं ब्रह्मचर्यादिसाधनात् ।
तदद्य मङ्गलश्लोकरूपेण प्रतिपादित ॥ २० ॥
४ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
यहां वाचकरूप ओम् ही विमान है ऐसा वर्णित किया है गुरुद्वारा उपदिष्ट मार्ग से उस पर
शास्त्रानुसार आरोहण कर जो उपासक जन ब्रह्मचर्य आदि साधन द्वारा ब्रह्मपद को प्राप्त होते हैं वह ऐसा
ब्रह्मपद यहां मङ्गलश्लोकरूप वचन से विमान प्रतिपादित किया है ॥ १६—२० ॥
तदर्थबोधकपदान्यष्ट श्लोके स्मृतानि हि ।
द्वितीय (य्य ? )† पदतस्तेषु सम्यगुक्ता मुमुक्षव ॥ २१ ॥
स एव कर्तृवाची स्याज्जीववाचीति चोच्यते ।
यद्विमानगतेप्यत्र वाचक प्रणवस्मृत ॥ २२ ॥
विमानत्वेनात्र सम्यक्तदेव प्रतिपादित ।
एष एवादिमपदो भवेत् कर्तृविशेषणम् ॥ २३ ॥
तुरीयपदत प्रोक्तमवाङ्मानसगोचरम् ।
अखण्डेकरस ब्रह्म प्राप्तव्यस्थानमुत्तमम् ॥ २४ ॥
उक्तमेतत्कर्मपदमिति श्लोकान्वयक्रमात् ।
प्रणवाख्यविमानेन गमन यत्प्रकीर्तितम् ॥ २५ ॥
तत्तृतीयपदेनोक्त वाच्यलक्ष्यैक्यबोधकम् ।
क्रियापदमिति प्रोक्तम (क्त ञ्च?)न्वयक्रमत (त?) स्फुटम् ॥२६॥
विशेषणपदानि स्यु कर्मणस्त्रीण्यथाक्रमम् । +
प्रसिद्धि (द्ध?) द्योतनार्थाय पञ्चम पदमीरितम् ॥ २७ ॥
तथैव सप्तपद नित्यानन्दप्रबोधकम् ।
सर्ववेदान्तमानत्वबोधार्थ चाष्टम पदम् ॥ २८ ॥
उसके अर्थबोधक आठ पद यहां श्लोक में स्मरण किए गये हैं—कहे हैं, उनमें द्वितीय पद
से मुमुक्षु भली प्रकार कहे हैं। वह ही ओम् कर्तृवाची अर्थात् जगत्कर्ता परमेश्वर का वाचक है और
जीववाची अर्थात् जीव का वाचक भी कहा जाता है ‡, यहां जिस विमानपदप्राप्ति पर भी ओम् वाचक
निश्चित है। यहां मङ्गलाचरण में विमानरूप से वह ही भली प्रकार प्रतिपादित किया है वह ही आदि
का पद अर्थात् ब्रह्मात्मा का प्रथम पाद या ओम् में अकार कर्तृविशेषण है। तुरीय पद अर्थात्—ब्रह्मात्मा
के चतुर्थ पाद या ओम् के अमात्ररूप से वाणी और मन के व्यवहार से रहित अर्थात्—अवर्णनीय और
अचिन्त्य अखण्ड एकरस उत्तम प्राप्तव्य स्थानरूप ब्रह्म कहा है। यह कर्मपद इस प्रकार श्लोकान्वय क्रम
में कह दिया ओम् रूप विमान से गमन करना पहुँचना या प्राप्त करना जो कहा गया है। तृतीय पद से
† यहा द्वितीय' मे यकारद्वय पूर्व की भांति दाक्षिणात्य हो सकता है।
- यहा 'त्रीण्यथाक्रमम्' त्रीणि यथाक्रमम् मे त्रीणि के अन्तिम इकार का लोप पुरातन छान्दस है।
‡ ओम् को जीववाची भी कहना यह वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके श्लोक का अनुवाद
किया है।
ब्रह्म विमान ] [ ५
वह वाच्य लक्ष्य की एकता का बोधक कहा है वह अन्वयक्रम से क्रियापद स्पष्ट कहा गया है । तीन
विशेषण पद कर्म के यथाक्रम है पाचवा पद प्रसिद्धि दर्शाने के अर्थ कहा गया है । उसी प्रकार सातवा
पद नित्यानन्द का बोधक है और आठवा पद समस्त वेदान्त-उपनिषद् वचनों द्वारा माननीयता के दर्शाने
के अर्थ है ॥ २१—२८ ॥
नत्वेति यत्पद प्रोक्त नत्प्रह्रीभावबोधकम् ।
एतेन तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थोक्तमभूत्क्रमात् ॥ २९ ॥
यद्विमानगतेत्यत्र त्वंपदत्वेन वर्णितम् ।
तत्पदार्थत्वेन ब्रह्मपर पदमितीरितम् ॥ ३० ॥
नत्वैक्यपरामर्शार्थोऽसि पदार्थबोधक ।
इत्थ श्लोकात्तत्त्वमसि वाक्यार्थस्सन्निरूपित ॥ ३१ ॥
तदैक्यानुसन्धानरूपमङ्गलमातनोत् ।
एव विधाय विधिवन्मङ्गलाचरण मुनि ॥ ३२ ॥
पूर्वाचार्याश्च तद्ग्रन्थान् द्वितीयश्लोक्तोब्रवीत् ।
विश्वनाथोक्तनामानि तेषा वक्ष्ये यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
नारायण (णो ?) शौनकश्च गर्गो वाचस्पतिस्तथा ।
चाक्रायणिर्धुण्डिनाथश्चेति शास्त्रकृतस्स्वयम् ॥३४॥
विमानचन्द्रिका व्योमयानतन्त्रस्तथैव च ।
यन्त्रकल्पो यानबिन्दु खेटयानप्रदीपिका ॥ ३५ ॥
व्योमयानार्कप्रकाशश्चेति शास्त्राणि षट् क्रमात् ।
नारायणादिमुनिभि प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥ ३६ ॥
विचार्यैतानि विधिवद् भरद्वाज कृपानिधि ।
वैमानिकप्रकरण सर्वलोकोपकारकम् ।
पारिभाषिकरूपेण रचयामास विस्तरात् ॥ ३७ ॥
मङ्गल वचनों में 'नत्वा' यह पद जो भरद्वाज ऋषि ने कहा है वह आदर-विनय भाव का
दर्शक है इससे 'तत्त्वमसि' आदि उपनिषद् वाक्यार्थो से कहा हुआ ब्रह्म क्रम से समझना चाहिये ।
'यद्विमान गत०' यहा त्वं पदरूप से उपनिषद् वचन में 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' कहा गया है 'तत्' पदार्थ-
रूप से ब्रह्मपरक पद है ऐसा कहा है । 'नत्वा' यह ऐक्य परामर्श ( जीवब्रह्म की एकता ) के साथ सम्बन्ध
रखने वाला 'असि' का पदार्थबोधक है इस प्रकार श्लोक से 'तत्त्वमसि' वाक्य का अर्थ निरूपित किया
है+। भरद्वाज मुनि ने इस प्रकार विधिवत् मङ्गलाचरण करके उस ऐक्यार्थ के अनुसन्धानरूप मङ्गल
का विस्तार किया है ॥ पूर्व आचार्यों और उनके ग्रन्थों को दूसरे श्लोक से कहा है, विश्वनाथ आचार्य के
- यहा जीवब्रह्म की एकता का सिद्धान्त वृत्तिकार बोधानन्द का है हमारा नही हमने तो उसके वचनो का
अनुवाद किया है ।
६ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
द्वारा कहे हुए उनके नामों को मै क्रम से कहूँगा । नारायण, शौनक, गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि और
धुण्ढिनाथ ये ऋषि स्वयं शास्त्रकार हैं । विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानबिन्दु, खेटयान-
प्रदीपिका और व्योमयानार्कप्रकाश ये छः शास्त्र क्रम से विशेष ज्ञानवेत्ता नारायण आदि मुनियों ने कहे
हैं । दयानिधि भरद्वाज ऋषि ने इन शास्त्रों को भली प्रकार विचार कर सर्वलोकोपकारक 'वैमानिक
प्रकरण' पारिभाषिक रूप से विस्तार से रचा है ❁ ॥ २६—३७ ॥
अथ विमानशब्दार्थविचार .—
वेगसाम्याद् विमानोऽण्डजानामिति ।। अ० १ । सू० १ ॥
सूत्रशब्दार्थ—अण्डजों अर्थात् पक्षियों के वेगसाम्य से विमान कहलाता है ।
बोधानन्दवृत्ति —
अण्डजेत्यत्र सूत्रेस्मिन् गृध्राद्या पक्षिण स्मृता ।
आकाशगमने तेषां वेगशक्ति स्ववेगत ।। १ ।।
य समर्थो विशेषेण मातुं गणितसंख्यया ।
स विमान इति प्रोक्तो वेगसाम्याच्च शास्त्रत ।। २ ।।
यद्वा—
गृध्रादिपक्षिणा वेगसाम्य यस्यास्ति वेगत ।
स विमान इति प्रोक्त (क्तो ?) आकाशगमने क्रमात् ।।३।।
इस सूत्र में "अण्डजानाम्" पद से गृध्र आदि पक्षी कहे गये हैं आकाशगमन मे उनकी
वेगशक्ति को जो स्ववेग से गणितसंख्या द्वारा विशेषरूपेण मापने तुलित करने में समर्थ हो वह वि-मान
पक्षी के मान होने से अर्थात् वेगसाम्य से और शास्त्रानुसार ( शब्दशास्त्रानुसार ) विमान कहा गया है ।
अथवा आकाशगमन में गृध्र आदि पक्षियों के वेग की समता क्रमशः जिसके वेग से हो सकती है वह
विमान कहा गया है + ॥ १—३ ॥
इत्थम्भावेति x शब्दस्स्याद् (दस्याद् ?) विमानार्थविनिर्णये—
लल्लोपि—
विसोप ( म ) ान गमने येषामस्ति खमण्डले ।
ते विमाना इति प्रोक्ता यानशास्त्रविशारदै ।। ४ ।।
- महर्षि भरद्वाज के रचे 'वैमानिक प्रकरण' से पूर्व विमानशास्त्र के ग्रन्थ 'विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र,
यन्त्रकल्प, यानबिन्दु, खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश' ये छह थे ।
- ऋग्वेद मे भी श्येन की उपमा उडने मे विमान यान को दी है "आ वा रथो अश्विना श्येनपत्वा सुमृलीक
स्ववा यात्वर्वाङ् ।” ( ऋ० १।११८।१ )
x इत्थम्भाव इति—इत्थम्भावेति सन्धिराषं पुरातनप्रयोगो वा ।