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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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(ख)
विषय पृष्ठ
आना और उनसे विमान रक्षा का उपाय । विमान में विश्वक्रियादर्पण आदि
३१ यन्त्रों का स्थापन करना ॥ १-२४
कापी संख्या २ --
विमानचालक यात्रियों को ऋतुओं की २५ विषशक्तियों के प्रभाव स बचने
के लिये ऋतु ऋतु के अनुसार पहिनने और ओढ़ने के योग्य वस्त्रों और भिन्न भिन्न
भोजनों का विधान, अन्न भोजन के अभाव में मोदक आदि तथा कन्दमूलफलों एवं
उनके मुरब्बों रसों का विशेष सेवन करना । विमान में उपयुक्त ऊष्मप लोहों के सौम,
सौण्डाल और मौर्विक तीन बीज लोहों का वर्णन एवं शोधन तथा बीज लोहों की
उत्पत्ति में भूगर्भ की आकर्षण शक्ति तथा पृथिवी की बाहरी कक्षाशक्ति और सूर्यकिरणों
भूततन्मात्राओं एवं ग्रहों के प्रभाव को निमित्त बतलाना, तीन सहस्र भूगर्भस्थ खनिज-
रेखापंक्तियों का निर्देश तथा सातवें रेखापंक्तिस्तर में तीन खनिजगर्भकोशों में सौम,
सौण्डाल, मौर्विक लोहों की उत्पत्ति का कथन ॥ २५-४३
कापी संख्या ३ --
विमान के भिन्न भिन्न यन्त्रों, कीलों (पेंचों) को भिन्न भिन्न लोहों से बनाने
का विधान । लोहे की प्राप्ति के १२ प्रकार या स्थान बतलाए जिससे कि 'खनिज,
जलज, ओषधिज, धातुज, कृमिज, क्षारज, अण्डज, स्थलज, अपभ्रंशक, कृतक' नामोंसे
लोहे कहे गए हैं। बीज लोहे सौम, सौण्डाल, मौर्विक कहे और प्रत्येक के ग्यारह ग्यारह
भेद होने से ३३ भेद बतलाए हैं ॥ ४४-५५
कापी संख्या ४--
विविध अनर्थों के ज्ञानार्थ विमान में दर्पणयन्त्र 'विश्वक्रियादर्पण, शक्त्या-
कर्षण, वैरूप्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जुलादर्पण, गुहागर्भदर्पण, रौद्रीदर्पण लगाए
जाना ॥ ५६-७०
कापी संख्या ५--
विमान की भिन्न भिन्न १२ गतियां चलन, कम्पन, ऊर्ध्वगमन, अधोगमन,
मण्डलगति--चक्रगति--घूमगति, विचित्रगति, अनुलोमगति--दक्षिणगति, विलोम-
गति--वामगति, पराङ्मुखगति, स्तम्भनगति, तिर्यग्गति--तिरछीगति, विविधगति या
नानागति' विद्युत् के योग से या विद्युत्शक्ति से होती हैं। विद्युत् से चालित या
विद्युन्मय विश्वक्रियादर्श आदि ३२ यन्त्रों का वर्णन । शत्रु के द्वारा किए समस्त क्रिया-
कलाप को दिखलाने वाला विश्वक्रियाकर्षणादर्श यन्त्र का विधान ॥ ७१-८४
कापी संख्या ६--
शक्त्याकर्षण यन्त्र का विधान, जिसके द्वारा आकाशतरंगों और वातसूत्रों से
होने वाली क्षति से विमान बच जाता है तथा परिवेषक्रियायन्त्र का स्थान जो कि