बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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पुच्छलतारों के अवशेषों तथा ग्रह-नक्षत्रों की कक्षासन्धियों से रक्षा करना भी कहा है । वर्षोपसंहार यन्त्र से
विमानसे सम्बद्ध वायु ऊपर वेग से प्रगति करेगी उससे पुरोवात(वर्षा आनेवालीवायु)संघर्ष को प्राप्तकरके दो
टुकड़ों में विभक्त हो जावेगी जोकि जल की दो शक्तियां है द्रव (पतलापन) और प्राणन (गीला करनेवाली)
पुन विमान पर जल न द्रवित होगा—बहेगा—गिरेगा और न गीला कर सकेगा । महावात के आघात
से बचने को ऽथास्यवातनिरसन यन्त्र लगाना उस से वायु को त्रिमुखी—तीन टुकड़ों में कर दूर भगा
देना । विद्युत् के प्रभाव को दूर रखनेवाला शिर.कीलक यन्त्र विमान के मस्तक में लगाना जो कि छत्री
की भांति घूमता हुआ विद्युत् के प्रभाव को कोसों दूर रखता है । आतप (धूपताप) की क्षति से विमान
को बचाने के लिए आतपोपसंहार यन्त्र लगाना जिस से उष्णता का नाश शीतता का प्रसार हो । शक्त्या-
कर्षणयन्त्र से आकाशतरंगों वातसूत्रों से होने वाली क्षति से विमान को बचाना । एवं शब्द, उल्का,
पुच्छलतारों के अवशेषों और ग्रहों की कक्षासन्धियों के प्रभावों से विमान को बचाने के लिए विविध
यन्त्र लगाना । सूर्यकिरणों को स्वाधीन करने के लिये परिवेशक्रियायन्त्र लगाना आदि कहा गया है। एवं
सूर्यकिरणों को आकर्षित करके विविध उपयोग लेना भी कहा है । इसी प्रकार रूपाकर्षणयन्त्र रूपों का
..... के लिये, विश्वक्रियादर्पण, पञ्चारामुख्ययन्त्र, धूमप्रसारण, औष्ण्ययन्त्र (एञ्जिन), त्रिपुरविमान
..... बनाना और सीत्कारीयन्त्र बाहिर की वायु को खींचने के लिये लगाना जिस से त्रिपुर
विमान के लोग जल में भी श्वास ले सकें, वायु विद्युत् धूम के यथोचित उपयोगार्थ प्राणकुण्डलिनी यन्त्र
वेगमापक, उष्णतामापक चालमापकयन्त्र लगाए जावें एवं विद्युत् से चालित या विद्युत् के योगसे ३२ यन्त्र
प्रयुक्त किए जावें । विमान के प्रत्येक अङ्ग को भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहे से तैयार करके बनाना, लोहों का
खनि से ही प्राप्त होना नहीं किन्तु उसकी प्राप्ति के १२ स्थान बतलाए गए हैं । भूगर्भ में खनिज पदार्थों
की सहस्रों रेखा पंक्तियां कही हैं । इत्यादि बातें इस वैमानिक प्रकरण में अपने अपने स्थान पर मिलेंगी ।
धन्यवाद--
सर्वप्रथम हम ऋषि दयानन्द का महान् धन्यवाद करते हैं जिन्होंने ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका ग्रन्थ
और वेदभाष्य में स्थान स्थान पर विमानयान और उसके द्वारा आकाश में उड़ान पत्र यात्रा करने का
वर्णन ऐसे समय में किया जबकि किसी को इस युग में स्वप्न में भी इस बात की कल्पना न थी । उस
ऋषिके वचनों से प्रेरित हो विमानविषयक पुरातन ग्रन्थों की खोज में हम प्रवृत्त हुए । लगभग पन्द्रह वर्ष
पूर्व बड़ौदा राजकीय संस्कृत पुस्तकभवन (लाईब्रेरी) से हस्तलिखित इस वैमानिक प्रकरण का कुछ भाग
हमें प्राप्त हुआ था उसका हिन्दी अनुवाद 'विमानशास्त्र' नाम से हमने प्रकाशित भी कर दिया था उसी
के आधारपर अन्य खोज हुई वडोदा, पूना, उत्तर, दक्षिण आदि से यह श्लोकसामग्री हमें प्राप्तहुई, एतदर्थ
श्री विनयतोष जी भट्टाचार्य (P H D) अध्यक्ष राजकीय संस्कृत लाईब्रेरी बडोदा का हम धन्यवाद करते
हैं और श्री सुरेन्द्रनाथ जी गोयल एयर कमोडोर के सहयोग की भी हम सराहना करते हैं । पुन गुरुकुल-
कांगडी के अधिकारियों विशेषत गुरुकुल के कुलपति श्री पं० इन्द्र जी विद्यावाचस्पति का भी मैं अत्यधिक
हार्दिक धन्यवाद करता हूं जिन्होंने इस अनुवादकार्य के सम्पादनार्थ गुरुकुल में स्थान तथा पुस्तकभवन
† ऋषि दयानन्द ने वेदभाष्य में "शब्दायमानान् विमानान्-शब्द करते हुए विमान" ऐसा भी लिखा है
जैसा कि विमान उडते हुए शब्द करते हैं ।