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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

प्रारंभिक भूमिका एवं वैमानिक मंगलाचरण (विमान-परिभाषा)

प्रियग्रन्थमालापुष्प ४१
ब्रह्ममुनिग्रन्थमाला—पुष्पसंख्या १७
महर्षिभरद्वाजप्रणीत
बृहद् विमानशास्त्र
अर्थात्
महर्षिभरद्वाजप्रणीत "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थान्तर्गत
यतिबोधानन्दकृतश्लोकबद्धवृत्तिसहित "वैमानिक प्रकरण"
जिस में—
पुरातन विमानकला का शिल्पकार ( लोहार-मिस्त्री ) से लेकर ब्रह्मा ( इञ्जिनियर ) पर्यन्त कार्य का वर्णन
दिया है, तथा रक्षाविधान अर्थात् शत्रु के द्वारा भूतल से फेंके हुए एवं भूमि के अन्तर्गुप्त प्रहारों से
और आकाश में विमानोंद्वारा किए गए आक्रमणों से रक्षा करने के उपाय साथ ही
आकाशीय पदार्थों वर्षा, वात, विद्युत्, शब्द, उल्का, पुच्छलतारों तथा ग्रहतारों की
कक्षासन्धियों से होने वाले आघातों से रक्षा करना एवं यन्त्रविधान
अर्थात् भिन्न भिन्न कलपुर्जों और अनेक आवश्यक रूपाकर्षक शब्दा-
कर्षक गतिमापक कालमापक आदि यन्त्रों के स्थापन तथा शकुन,
रुक्म, सुन्दर, त्रिपुर आदि विविध विमानों का अपूर्व
अद्भुत वर्णन है ।
सम्पादक एवं भाषानुवादक—
स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक
गुरुकुलकांगडी (हरिद्वार)
सम्पादन स्थान—
गुरुकुलकांगड़ी
प्रकाशक—
सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा
दयानन्द भवन, नई दिल्ली १
प्रथम संस्करण } माघ २०१५ वि० { मूल्य
१००० } फरवरी १९५६ ई० { तेरह रुपये

सार्वदेशिक प्रेस, दरियागंज, दिल्ली-७ में मुद्रित

प्रकाशकीय निवेदन
आर्य जगत् की शिरोमणि सार्वदेशिक आर्यप्रतिनिधि सभा की ओर से महर्षि भरद्वाजकृत
तीन सहस्र श्लोकों से युक्त बृहद् विमानशास्त्र के भाषाभाष्य को जनता के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे
बड़ी प्रसन्नता है ।
यह ग्रन्थ विमान-विद्याविषयक अलभ्य सामग्री से परिपूर्ण है जिसमें उक्त विद्या की बडी
सूक्ष्मता से विवेचना की गई है। इस ग्रन्थ में विमानों के बहुसंख्यक प्रकारों, नामों, उनके निर्माण
और संचालन के विविध उपायों के वर्णन को पढकर मनुष्य आश्चर्यचकित हुए विना नहीं रह सकता ।
निश्चय ही यह ग्रन्थ यन्त्रविद्या और विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी क्रान्ति का सन्देशहर सिद्ध होगा।
रामायण में आए पुष्पक विमान का वर्णन विज्ञान के पण्डितों द्वारा कपोलकल्पना और
धर्मभीरु भोले भाले जन-समाज के द्वारा दैव चमत्कार समझा जाता था । आधुनिक काल
में जब वेदोद्धारक आर्य समाज के प्रवर्त्तक महर्षि दयानन्द ने वेदों के आधार पर इस विद्या
की चर्चा की और अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका” में एक अध्याय इस विषय के
अर्पण किया तो वैज्ञानिकों को मुख्यतः पाश्चात्य विद्वन्मण्डली को विश्वास न हुआ। परन्तु भौतिक
विज्ञान और यन्त्रविज्ञान की ज्यों ज्यों प्रगति हुई त्यों त्यों महर्षि दयानन्द के कथन की प्रामाणिकता
और प्राचीन भारत में इस विद्या के पूर्ण विकास की सम्भावनाएं परिलक्षित होती गई और वे अमेरिका-
वासी विदुषी लिसेज ह्वीलर विल्लोक्ल के शब्दों में इन संभावनाओं को निम्न प्रकार अभिव्यक्त करने
के लिये विवश हुए :—
“हमने प्राचीन भारत के धर्म के विषय में सुना और पढा है। यह उन महान् वेदों की भूमि
है जहां अत्यन्त अद्भुत ग्रन्थ हैं जिन में न केवल पूर्ण जीवन के लिए ही उपयोगी धर्मतत्त्व बताए गए
हैं अपितु उन तथ्यों का भी प्रतिपादन किया गया है जिन्हें समस्त विज्ञान ने सत्य प्रमाणित किया
है । बिजली, रेडियम, एलैक्ट्रन्स विमान (हवाई जहाज) आदि सब चीजें वेदों के द्रष्टा ऋषियों को
ज्ञात प्रतीत होती हैं।”
अर्वाचीन काल में राइट बन्धुओं को वायु-यान के आविष्कार का श्रेय प्राप्त है । जब उनके
बनाए हुए विमान आकाश में उड़ने लगे तब विज्ञानवेत्ताओं को वैदिक ज्ञान विज्ञान की प्रामाणिकता
और महर्षि दयानन्द की स्थापनाओं की सत्यता को स्वीकार करना पडा ।
महर्षि भरद्वाजकृत प्रस्तुत ग्रन्थ में "निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः । नवनीतं समुद्धृत्य

[२]

यन्त्रसर्वस्वरूपकम्” श्लोक में इस विद्या का भण्डार वेद बताए गए हैं । उपर्युक्त उद्धरण से बढकर महर्षि
दयानन्द की इस स्थापना का कि “वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है" तथा विमानविद्या का स्थान
स्थान पर वेदों में वर्णन है और क्या प्रमाण हो सकता है ? जिस प्रकार इस ग्रन्थरत्न ने महर्षि दयानन्द
की वेदविषयक विशुद्ध विचारसरणि में वैदिक शोध के कार्य को प्रेरणा दी है उसी प्रकार यह
विमानविद्याविषयक अनुसंधानों और आविष्कारों को महती प्रेरणा प्रदान करेगा ।
श्री स्वामी ब्रह्ममुनि जी विद्यामार्तण्ड वैदिक अनुसन्धान का मूल्यवान् कार्य कर रहे हैं । प्रस्तुत भाष्य
उनके उसी प्रशंसनीय कार्यों का सुफल है जिसके लिए वे आर्य जगत् और विद्वत्समाज के धन्यवाद के
अधिकारी हैं । सार्वदेशिक सभा पर उनकी सदैव कृपा दृष्टि रहती है । सभा को उनके अनेक ग्रन्थों के
प्रकाशन का गौरव प्राप्त है, इस भाष्य को सभा की ओर से प्रकाशित करने का निष्प्रतिकार अवसर
प्रदान करके उन्होंने अपनी उसी कृपादृष्टि का परिचय दिया और सभा को उपकृत किया है ।
यह प्रकाशन बड़ा व्ययसाध्य था फिर भी सभा ने इसे प्रकाशित करके अपने एक महान
दायित्व की पूर्ति की है । आशा है जनता इससे यथोचित लाभ उठाएगी और शीघ्र सभा को व्ययभार
से मुक्त करके इसी प्रकार के अन्य उपयोगी प्रकाशनों को हाथ में लेने में समर्थ बनाएगी ।
स्वतन्त्र भारत में इस कोटि के अलभ्य एवं अत्यन्त मूल्यवान् ग्रन्थों का प्रकाशन हमारे राज्य
का एक विशिष्ट कर्त्तव्य है । सभा ने इस भाष्य को प्रकाशित करके राज्य और देश का ही एक बड़ा
कार्य सम्पन्न किया है जो हमारे देश के गौरव को बढाने वाला सिद्ध होगा । क्या हम आशा करें कि
राज्य और देश, सभा के इस कार्य का समुचित आदर करेगा ?

दयानन्द भवन, रामलीला मैदान, रामगोपाल
नई दिल्ली—१ प्रधान मन्त्री
माघ कृष्णा २०१५ वि० सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली
तदनुसार २-२-१९५६ ई०

✽ भूमिका ✽
बाल्मीकिरामायण का पुष्पक विमान आबालवृद्ध प्रसिद्ध एवं लोकविदित ही है†, पुनः
महाराजा भोज के “समराङ्गणसूत्रधार” ग्रन्थ में भी पारे से उडने वाले विमान का उल्लेख है‡, ऐसे ही
“युक्तिकल्पतरु” में भी विमान की चर्चा आती है☸। अतएव विमानकला आर्यों एवं आर्यावर्त (भारत)
की पुरातनकला है। उसी पुरातनकलापरम्परा में यह प्रस्तुत ग्रन्थ भी जानना चाहिए। आर्य आस्तिक थे
उनका प्रत्येक कार्य आस्तिकभाव से ओत प्रोत रहता था—ईश्वर की स्तुति से प्रारम्भ होता था, ऐसा ही
आचार इस ग्रन्थ में भी उपलब्ध होता है—
यद्विमानगतास्सर्वे यान्ति ब्रह्म परं पदम् ।
तन्नत्वा परमानन्दं श्रुतिमस्तकगोचरम् ॥१॥
(मङ्गलाचरणश्लोक• १)
माण्डूक्ये च यदोङ्कारः परापरविभागतः ।
विमानत्वेन मुनिना तदेवात्राभिर्वणितं ॥१५॥
वाचकं प्रणवो ह्यत्र विमान इति वर्णितं ॥१६॥
तमारुह्य यथाशास्त्रं गुरूक्तेनैव वर्त्मना ।
ये विशन्ति ब्रह्मपदं ब्रह्मचर्यादिसाधनात् ।
† यस्य तत्पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम् ।
वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम् ॥
(वाल्मीकि० रा० आरण्य० ४८।६)
‡ लघु दारूमयं महाविहङ्गं दृढसुश्लिष्टतनु विधाय तस्य ।
उदरे रसयन्त्रमादधीत ज्वलनाधारमधोऽस्य चाग्निपूर्णम् ॥
(समराङ्गण० यन्त्रवि० ३१।९५)
☸ व्योमयानं विमानं वा पूर्वमासीन्महीभुजाम् ॥
(युक्तिकल्पतरु० यानप्र० ५०)

आ]
तदत्र मङ्गलश्लोकरूपेण प्रतिपादितः ॥२०॥
(वृत्तिकार)
पुरातन ऋषि महर्षि चाहे वे धर्मप्रवर्तक हों किसी विद्या या कला के आविष्कारक हों वे सभी
अपने विषय को वेद से अनुमोदित या आविष्कृत हुआ घोषित करते हैं। धर्मप्रवर्तक मनुमहाराज
कहते हैं “धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति ” (मनु० २।१३) धर्म का ज्ञान करने के इच्छुकों के
लिये परम प्रमाण वेद है । राजनीति के व्यवस्थापक वे ही मनुमहाराज कहते हैं “सेनापत्यं च... राज्यं च
वेदशास्त्रविदर्हति" (मनु०१२।१००) सेनाके स्वामी होने और राज्यशासन करनेकी योग्यता वेदका वेत्ता
प्राप्त कर सकता है । तथा “वेदो ह्यथर्वणश्चिकित्सां प्राह” (चरक० सू० ३०।२०) चिकित्सा को अथर्व-
वेद कहता है । इसी प्रकार इस प्रस्तुत विमानकला के प्रवर्तक या आविष्कारक महर्षि भरद्वाज ने भी
वेद से विमानकला का आविष्कार किया है “निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः । नवनीतं समुद्धृत्य
यन्त्रसर्वस्वरूपकम्” (वृत्तिकार १०) भरद्वाज महामुनि ने वेद समुद्र का निर्मन्थन करके “यन्त्रसर्वस्व”
ग्रन्थ (जिसका एक भाग यह वैमानिक प्रकरण है) मक्खनरूप में निकालकर दिया है । वेद में विमान-
कला के विधायक अनेक मन्त्र हैं, उदाहरणार्थ दो तीन मन्त्र यहां प्रस्तुत करते हैं—
वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् ।
वेदा नाव समुद्रियाः ॥ [ऋ० १।२५।७]
जो आकाशमें उड़ते हुए पक्षियों के स्वरूप को जानता है वह समुद्रिय-आकाशीय † नौकाओं
को–विमानों को जानता है ।
तुग्रो ह भुज्युमश्विनोदमेघे रयिं न कश्चिन्ममृवां अवाहाः ।
तमूहथुनौ॑भिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोदकाभिः ॥
[ऋ० १।११६।३]
बाहिर से सामान लानेवाला लाटू पोत (जहाज) जलतरङ्गों के उत्पातपूर्ण समुद्र मे कदाचित्
डूबता हुआ भोगसामग्री के अध्यक्ष को मरते हुए धन को छोड़ते हुए की भांति छोड़ देता है तब उस
व्यापाराध्यक्ष को अश्विनौ–ज्योतिर्मय और रसमय दो शक्तिया जलसम्पर्करहित बलवती ‘अन्तरिक्षप्रुद्भि ’
आकाश में उड़नेवाली नौकाओं से वहन करती हैं–उडा ले जाती हैं ।
स्यन्दनस्य मूर्धिन चक रथस्य येमथुः ।
परि द्यामन्यदीयते ॥
[ऋ० १।३०।१६]
अबाध्य रथ–विमान की मूर्धा में लगा अन्यत चक्र जो और चक्रों से अलग है–भूमिवाले
चक्रों से अलग है जिसे दो अश्विनौ शक्तियां नियन्त्रित करती है जो कि ‘द्यां परि-ईंयते’ आकाश में
घूमता है ।
† “समुद्र मन्तरिक्षनाम” (निघ० १।३)

[ ५ ]
इसी प्रकार ‘वातरंहा, त्रिवन्धुरेण, त्रिवृता रथेन, त्रिचक्रेण’ इत्यादि विशेषणों से युक्त
विमानकालद्योतक अन्य अनेक मन्त्र हैं।
कहीं कहीं वेदमन्त्रों की प्रतीक भी विषयप्रसङ्ग में इस ग्रन्थ में आ जाती है। यथा “यद् द्याव
इन्द्र ते शतम्” (ऋ० ८।१०।५), “नमस्ते रुद्र मन्यवे” (यजु० १६।१) एवं कुछ ब्राह्मणग्रन्थों के वचन
भी आ जाते हैं।
यह ‘वैमानिकप्रकरण’ “यन्त्रसर्वस्व” ग्रन्थ का एक भाग है जिसमें ऐसे ही यन्त्रविषयक
४० प्रकरण थे। “यन्त्रसर्वस्व” ग्रन्थ के रचयिता महर्षि भरद्वाज होने से इस “वैमानिक प्रकरण” के
भी रचयिता महर्षि भरद्वाज हुए। महर्षि भरद्वाज से पूर्व विमानकलासम्बन्धी शास्त्रों के रचयिता अन्य
भी हुए हैं जैसे नारायणमुनि, शौनक,गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि,धुण्डिनाथ जोकि क्रमशः विमानचन्द्रिका,
व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानविन्दु, खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश। इन विमानविषयक शास्त्रों
के रचयिता थे†। विमान के बनाने वाले विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु, मय आदि हुए हैं‡।
यह “वैमानिक प्रकरण” ८ अध्यायों १०० अधिकरणों और ५०० सूत्रों मे महर्षि भरद्वाज ने
रचा था, जैसा कि महर्षि भरद्वाज ने स्वयं अपने मङ्गलाचरण वचन मे कहा है—
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं शताधिकरणैस्तथा ।
अष्टाध्यायसमायुक्तमतिगूढं मनोहरम् ॥
† पूर्वाचार्यांश्च तद्ग्रन्थान् द्वितीयश्लोकेतोऽब्रवीत् ।
विश्वनायोचेतनामानि तेषां वक्ष्ये यथाक्रमम् ॥३३॥
नारायण शौनकश्च गर्गो वाचस्पतिस्तथा ।
चाक्रायणिर्धुण्डिनाथश्चेति शास्त्रकृतस्स्वयम् ॥३४॥
विमानचन्द्रिका व्योमयानतन्त्रस्तथैव च ।
यन्त्रकल्पो यानबिन्दु खेटयानप्रदीपिका ॥३५॥
व्योमयानार्कप्रकाशाख्येति शास्त्राणि षट् क्रमात् ।
नारायणादिमुनिभि प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥३६॥
विचार्यैतानि विधिवद् भरद्वाज कृपानिधि ।
वैमानिकप्रकरणं सर्वलोकोपकारकम् ।
पारिभाषिकरूपेण रचयामास विस्तरात् ॥३७॥
(वृत्तिकार )
‡ विश्वकर्मा छायापुरुषमनु मयादि .................. ।
(वृत्तिकार )
कृतं स्वयं साध्विति विश्वकर्मणा ।
दिव गते वायुपथे प्रतिष्ठितं व्यराजतादित्यपथस्य लक्ष्मवत् ।
(वाल्मीकि रा० सुन्दर० ८।१२)

[ ई ]
वैमानिकप्रकरणं कथ्यतेऽस्मिन् यथामति ।
समस्त सूत्रपाठ कहा है यह तो पता नहीं लगता, हां प्रारम्भ से क्रमशः १४ सूत्र तो इस में
दिए हुए हैं, क्वचित् क्वचित् बीच में भी दिए हुए मिलते हैं और अव्यवस्थितरूप में किन्तु वृत्तिकार
बोधानन्द के वृत्तिश्लोक ही मिलते हैं । वृत्तिकार बोधानन्द यति हैं। लगभग तीन सहस्र श्लोक इस में
हैं और यह ग्रन्थ २३ कापियों में प्राप्त हुआ है । इस ग्रन्थ का काल क्या है यह कुछ नहीं बताया जा
सकता है, मूलहस्त लेख हमें नहीं मिला किन्तु प्रतिलिपि (Transcript) हमें मिला है। ट्रांसक्रिप्ट
कापी १६१८ ई० की हमें बडोदा राजकीय संस्कृत लाईब्रेरी में मिली थी पुन १६१६ ई० की
प्रतिलिपि (Transcript) यह अब मिली जो आज से ४० वर्ष पूर्व की है, इस कापी के मोटे काग़ज़
पुराने ढंग के हैं जो अन्य पक्के काग़ज़ की पट्टियों में चिपके हुए हैं । पूना कालिज ( से प्राप्त कापी ) के
फिल्म फोटो भी प्राप्तहुए हैं उनपर लिखा है “गो वेङ्कटाचल शर्मा १६-८-१६१६, ३-६-१६१६ तारीखें प्रति-
लिपिकर्त्ता ने दी हैं । सूत्रों में ही क्या श्लोकों में भी भाषा पुरानी जचती है, ‘एध’ धातु का प्रयोग बढने
अर्थ में नहीं किन्तु प्राप्त होने अर्थ में आता है” नाशमेधते, लयमेधते । सन्धियां भी आधुनिक ही नहीं
आतीं। पतत्यदा, त्रयाम०, एकमध्यदि, यन्त्राण्यथाक्रमम्, केन्द्रे ष्वात०‡ आदि प्रयोग आते हैं । ‘लोह-
तन्त्र, दर्पणप्रकरण, शक्तितन्त्र’ आदि लगभग १०० पुरातन ग्रन्थों के उल्लेख भी दिए हैं। नारायण गालव
आदि ३६ आचार्यों के नाम भी विमानकलाविषयक शास्त्रनिर्मातृत्व और मतप्रदर्शन के प्रसङ्ग में आए हैं
जिनकी सूचि साथ में दी है । विमान में अनेक अप्रसिद्ध नवीन अद्भुत यन्त्र बनाकर रखने का विधान
भी किया है । इस से ग्रन्थ की पुरातनता प्रतीत होती है ।
विमान शब्द का अर्थ—
महर्षि भरद्वाज के सूत्र और अन्य आचार्य विश्वम्भर आदि के मत में वि—पक्षी की भांति गति
के मान से एक देश से दूसरे देश एक द्वीप से दूसरे द्वीप और एक लोक से दूसरे लोक को जो आकाश
में उड़कर जानेवाला यान हो वह विमान कहा जाता है❉। एक लोक से दूसरे लोक में विमान पहुंचने
† महादेवं महादेवीं वाणीं गणपतिं गुरुम् ।
शास्त्रकारं भरद्वाजं प्रणिपत्य यथामति ॥ १ ॥
बालानां सुखबोधाय बोधानन्दयतीश्वरः ।
सङ्ग्रहाद् वैमानिकप्रकरणस्य यथाविधि ॥
लिलेख बोधानन्दवृत्त्याख्यां व्याख्यां मनोहराम् ॥४॥
(वृत्तिकार )
‡ पतित यदा, त्रि याम० एकमपि यदि, यन्त्राणि यथाक्रमम्, केन्द्रेषु वात०।
✱ वेगसाम्याद् विमानोण्डजानामिति ॥ भ० १ । १ ॥
देशाद् देशान्तरं तद्वद् द्वीपाद् द्वीपान्तरं तथा ।
लोकाल्लोकान्तरं चापि योऽम्बरे गन्तुमर्हति ।
स विमान इति प्रोक्तः खेटशास्त्रविदा वरैः ॥
(इति विश्वम्भरः)

[३]
की कल्पना आज की ही नहीं किन्तु १६४३ ई० में तो हमने इसे अपनी बडोदावाली "विमानशास्त्र"
नामक प्रकाशित पुस्तक में आज से १६ वर्ष पूर्व दिया था और उक्त लेख का ट्रान्स्क्रिप्ट ( प्रतिलिपि )
१६१८ ई० अर्थात् आज से चालीस वर्ष पूर्व वर्तमान था पुन उस ट्रान्स्क्रिप्ट के मूल म्येनुस्क्रिप्ट में न
जाने कब का पुराना है । अपितु मङ्गल, बुध, शुक्र आदि ग्रहों और नक्षत्रों की कक्षासन्धियों में आ
जाने पर विपत्तियों से बचाने का वर्णन भी आता है ।

विमान के जातिभेद—

मान्त्रिक (योगसिद्धि से सम्पन्न), तान्त्रिक ( औषधयुक्त एवं शक्तिमय वस्तुप्रयोग से सम्पन्न ),
कृतक—यान्त्रिक (कला मशीन एञ्जिन आदि से प्रयुक्त) ये तीन प्रकार के होते हैं । कृतक जाति में
शकुन विमान (पक्षी के आकार का पंखपुच्छसहित विमान), रुक्म विमान (खनिज पदार्थों के योग से
रुक्म अर्थात् सोने जैसी आभा सम्पादित किए लोहे के बना विमान), सुन्दर विमान (शूण्डाल से धूएं
के आधार पर चलनेवाला जेट विमान) कहे हैं तथा त्रिपुर विमान (तीनों स्थल जल गगन में चलने
तरने उडनेवाला विमान) आदि २५ कहे हैं ॥

विमान की गतियां और मार्ग—

विमान की भिन्न भिन्न गतियां 'चालन, कम्पन, ऊर्ध्वगमन, अधोगमन, मण्डल गति-चक्रगति-
घूमगति, विचित्रगति, अनुलोमगति—दक्षिणगति, विलोमगति—वामगति, पराङ्मुखगति, स्तम्भनगति,
तिर्यग्गति—तिरछीगति, विविधगति या नानागति' हैं जो कि विद्युन् के योग या विद्युन्-शक्ति से होती
हैं । विमान के मार्ग आकाश में रेखापथ, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र, ये पांच कहे हैं । विमानगति के
अवरोधक भी आकाशीय पाच आवर्त्त (बवण्डर) बतलाए हैं ।

रक्षाविधान और यन्त्रविधान—

इस वैमानिक प्रकरण में शत्रुद्वाराप्रयुक्त प्रहारक उपायों से एवं आकाशीय पदार्थों से भी
स्वविमान की रक्षा का विधान है । यथा—शत्रु ने जब अपने विमान के मार्ग में दम्भोलि (तारपीडो जैसी
वस्तु) आदि फेंक दी हो तो उसके प्रहार से बचने के लिए अपने विमान की तिर्यग्गति (तिरछीगति) कर
दो या अपने विमान को कृत्रिम मेघों में छिपादो अथवा शत्रुजन पर तामस यन्त्र से तम.-अन्धकार
छोडदो। शत्रुद्वारा भूमि में छिपाए हुए प्रहारक अग्निगोल आदि पदार्थों को गुहागर्भदर्शी यन्त्र से जान-
कर उन से स्वविमान को बचा लेना उस दूरबीन जैसे गुहागर्भदर्शी यन्त्र से ऐसे स्थान पर सूर्यकिरणें
ऐक्सरे की भांति अन्दर प्रविष्ट हो कर उन छिपे हुए पदार्थों को चित्ररूप में दिखलादेती हैं । एव आकाश
में भी शत्रु ओं के आक्रमण से बचने के अनेक उपाय बतलाए हैं जैसे—शत्रु के विमानों ने स्वविमान
को चारों ओर से घेर लिया हो तो अपने विमान की द्विचक कीली को बजाने से ८७ सिङ्खु (डिग्री) की
ज्वालाशक्ति प्रकट होगी उसे गोलाकार में घुमादेने पर वे शत्रु के विमान जलकर नष्ट हो जावेंगे तथा
दूर से आते हुए शत्रु के विमान की ओर ४०८७ तरङ्गे फेंक कर उसे बढने में असमर्थ कर देना । नीचे
खडी हुई शत्रु सेना पर स्वविमान से शब्द सङ्घण-महाशब्दप्रहार करना जिससे वे सैनिक भयभीत होजावें
बहरे बनजावें हृदयभङ्ग को प्राप्त होजावें । एवं आकाशीय पदार्थों वर्षा, वात, विद्युत्, आतप, शब्द, उल्का,

ऊ ]
पुच्छलतारों के अवशेषों तथा ग्रह-नक्षत्रों की कक्षासन्धियों से रक्षा करना भी कहा है । वर्षोपसंहार यन्त्र से
विमानसे सम्बद्ध वायु ऊपर वेग से प्रगति करेगी उससे पुरोवात(वर्षा आनेवालीवायु)संघर्ष को प्राप्तकरके दो
टुकड़ों में विभक्त हो जावेगी जोकि जल की दो शक्तियां है द्रव (पतलापन) और प्राणन (गीला करनेवाली)
पुन विमान पर जल न द्रवित होगा—बहेगा—गिरेगा और न गीला कर सकेगा । महावात के आघात
से बचने को ऽथास्यवातनिरसन यन्त्र लगाना उस से वायु को त्रिमुखी—तीन टुकड़ों में कर दूर भगा
देना । विद्युत् के प्रभाव को दूर रखनेवाला शिर.कीलक यन्त्र विमान के मस्तक में लगाना जो कि छत्री
की भांति घूमता हुआ विद्युत् के प्रभाव को कोसों दूर रखता है । आतप (धूपताप) की क्षति से विमान
को बचाने के लिए आतपोपसंहार यन्त्र लगाना जिस से उष्णता का नाश शीतता का प्रसार हो । शक्त्या-
कर्षणयन्त्र से आकाशतरंगों वातसूत्रों से होने वाली क्षति से विमान को बचाना । एवं शब्द, उल्का,
पुच्छलतारों के अवशेषों और ग्रहों की कक्षासन्धियों के प्रभावों से विमान को बचाने के लिए विविध
यन्त्र लगाना । सूर्यकिरणों को स्वाधीन करने के लिये परिवेशक्रियायन्त्र लगाना आदि कहा गया है। एवं
सूर्यकिरणों को आकर्षित करके विविध उपयोग लेना भी कहा है । इसी प्रकार रूपाकर्षणयन्त्र रूपों का
..... के लिये, विश्वक्रियादर्पण, पञ्चारामुख्ययन्त्र, धूमप्रसारण, औष्ण्ययन्त्र (एञ्जिन), त्रिपुरविमान
..... बनाना और सीत्कारीयन्त्र बाहिर की वायु को खींचने के लिये लगाना जिस से त्रिपुर
विमान के लोग जल में भी श्वास ले सकें, वायु विद्युत् धूम के यथोचित उपयोगार्थ प्राणकुण्डलिनी यन्त्र
वेगमापक, उष्णतामापक चालमापकयन्त्र लगाए जावें एवं विद्युत् से चालित या विद्युत् के योगसे ३२ यन्त्र
प्रयुक्त किए जावें । विमान के प्रत्येक अङ्ग को भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहे से तैयार करके बनाना, लोहों का
खनि से ही प्राप्त होना नहीं किन्तु उसकी प्राप्ति के १२ स्थान बतलाए गए हैं । भूगर्भ में खनिज पदार्थों
की सहस्रों रेखा पंक्तियां कही हैं । इत्यादि बातें इस वैमानिक प्रकरण में अपने अपने स्थान पर मिलेंगी ।
धन्यवाद--
सर्वप्रथम हम ऋषि दयानन्द का महान् धन्यवाद करते हैं जिन्होंने ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका ग्रन्थ
और वेदभाष्य में स्थान स्थान पर विमानयान और उसके द्वारा आकाश में उड़ान पत्र यात्रा करने का
वर्णन ऐसे समय में किया जबकि किसी को इस युग में स्वप्न में भी इस बात की कल्पना न थी । उस
ऋषिके वचनों से प्रेरित हो विमानविषयक पुरातन ग्रन्थों की खोज में हम प्रवृत्त हुए । लगभग पन्द्रह वर्ष
पूर्व बड़ौदा राजकीय संस्कृत पुस्तकभवन (लाईब्रेरी) से हस्तलिखित इस वैमानिक प्रकरण का कुछ भाग
हमें प्राप्त हुआ था उसका हिन्दी अनुवाद 'विमानशास्त्र' नाम से हमने प्रकाशित भी कर दिया था उसी
के आधारपर अन्य खोज हुई वडोदा, पूना, उत्तर, दक्षिण आदि से यह श्लोकसामग्री हमें प्राप्तहुई, एतदर्थ
श्री विनयतोष जी भट्टाचार्य (P H D) अध्यक्ष राजकीय संस्कृत लाईब्रेरी बडोदा का हम धन्यवाद करते
हैं और श्री सुरेन्द्रनाथ जी गोयल एयर कमोडोर के सहयोग की भी हम सराहना करते हैं । पुन गुरुकुल-
कांगडी के अधिकारियों विशेषत गुरुकुल के कुलपति श्री पं० इन्द्र जी विद्यावाचस्पति का भी मैं अत्यधिक
हार्दिक धन्यवाद करता हूं जिन्होंने इस अनुवादकार्य के सम्पादनार्थ गुरुकुल में स्थान तथा पुस्तकभवन
† ऋषि दयानन्द ने वेदभाष्य में "शब्दायमानान् विमानान्-शब्द करते हुए विमान" ऐसा भी लिखा है
जैसा कि विमान उडते हुए शब्द करते हैं ।

ऋ]
(लाईब्रेरी) से पुस्तकों के उपयोग आदि की सर्व सुविधाएं हमें प्रदान करने की महती कृपा की है। अन्त
में सार्वदेशिक आर्यप्रतिनिधि सभा का भी मैं धन्यवाद करता हूँ जिसने मेरे द्वारा समर्पित इस भेंट का
स्वागत कर इसे प्रकाशित किया है। पुन रसायनाचार्य, आयुर्वेदाचार्य, खनिजशास्त्री, भूगर्भशास्त्री, खगोल-
विद्यावेत्ता ज्योतिषी एवं वैज्ञानिक विद्वान् महानुभाव इस का अवलोकन कर इस में आए विविध यन्त्रों
धातुप्रसङ्गों विद्युत् शक्तियों रेडियो-सकेतों राकेट जैसी बातों का विचार कर उनके सम्बन्ध में प्रशस्त
प्रकाश डालें और अपने विचार एव सम्मतिया हमारे पास भेजने की कृपा करें। एतदर्थ ही हम इस कार्य
मैं नि स्वार्थ लगे और इसे प्रकाशित किया है।
विज्ञप्ति—ग्रन्थ के सन्दिग्ध शब्दों और शब्दार्थों के आगे प्रश्न द्योतक चिह्न ? दे दिया गया है।
भवदीय—
स्वामी ब्रह्ममुनि परिव्राजक
१० ६-१६५८ ई०

वैमानिक प्रकरण में निर्दिष्ट पुरातन ग्रन्थों की सूची
१—क्रियासार
२—यन्त्रसर्वस्वम् ( भरद्वाजकृतम् )
३—शौनकीयम् ( शौनककृतम् )
४—लोहतन्त्रम्
५—दर्पणप्रकरणम्
६—विमानचन्द्रिका
७—व्योमानतन्त्रम्
८—यन्त्रकल्प
९—व्योमयानार्कप्रकाश
१०—खेटयानप्रदीपिका
११—यानविन्दु
१२—मणिभद्रकारिका
१३—लोहप्रकरणम्
१४—शक्तितन्त्रम्
१५—दर्पणशास्त्रम्
१६—लोहसर्वस्वम्
१७—धातुसर्वस्वम् ( बोधायनकृतम् )
१८—संस्काररत्नाकर
१९—मणिप्रकरणम्
२०—शब्दमहोदधि.
२१—पटकल्प
२२—यन्त्रप्रकरणम्
२३—अगस्त्यलहरी ( आश्वलायनकृता )
२४—पटप्रदीपिका
२५—चारनिबन्धनग्रन्थ
२६—शक्तिसर्वस्वम्
२७—ऋतुकल्पः
२८—वर्गसर्वस्वम्
२९—मूलार्कप्रकाशिका
३०—चीरीपटकल्प
३१—शशनिर्यासचन्द्रिका
३२—नालिकानिर्णयः
३३—मणिकल्पप्रदीपिका
३४—बृहत्काण्डम्
३५—पट्टिकानिबन्धनम्
३६—खेटविलासग्रन्थ
३७—पार्थिवपाककल्पः
३८—उद्बिज्जत्त्वसारायणम्
३९—गतिनिर्णयाध्याय
४०—लोहतत्त्वप्रकरणम्
४१—सौदामिनीकला ( ईश्वरकृता )
४२—शब्दनिबन्धनम्
४३—निर्यांसकल्प
४४—नामार्थकल्पसूत्रम् ( अत्रिकृतम् )
४५—सर्वशब्दनिबन्धनम्
४६—खेटसर्वस्वम्
४७—द्रावकप्रकरणम्
४८—खेटयन्त्रम्
४९—लोहरत्नाकर
५०—निर्णयाधिकारः
५१—मूषकल्पः
५२—कुण्डकल्पः
५३—कुण्डनिर्णयः
५४—भस्त्रिकानिबन्धनम्

(ii)

[स्तम्भः १ / Column 1]
५५-मुकुरकल्पः
५६-दर्पणकल्पः
५७-पराङ्कुशः
५८-सम्मोहक्रियाकाण्डम्
५९-अंशुबोधिनी
६०-प्रपञ्चसारः
६१-शक्तिबीजम्
६२-शक्तिकौस्तुभम्
६३-यन्त्रकल्पतरुः ( लल्लप्रणीतः )
६४-मणिरत्नाकरः
६५-पटसंस्काररत्नाकरः
६६-विषनिर्णयाधिकार
६७-अशनकल्पः
६८-पाकसर्वस्वम्
६९-लोहाधिकरणम्
७०-बोधानन्दकारिका ( बोधानन्दकृता )
७१-लोहरहस्यम्
७२-परिभाषाचन्द्रिका
७३-विश्वम्भरकारिका ( विश्वभरकृता )
७४-संस्कारदर्पणम्
७५-प्रलयपटलम्
७६-षड्गर्भविवेकः

[स्तम्भः २ / Column 2]
७७-रघूदयः
७८-शक्तिसूत्रम् ( अगस्त्यकृतम् )
७९-शुद्धविद्याकलापम् ( आश्वलायनकृतम् )
८०-ब्रह्माण्डसारः ( व्यासप्रणीतः )
८१-अंशुमत्तन्त्रम् ( भरद्वाजकृतम् )
८२-छन्द कौस्तुभ ( पराशरप्रणीत )
८३-कौमुदी ( सिंहकोठकृता )
८४-हृपशक्तिप्रकरणम् ( अङ्गिरसकृतम् )
८५-करकप्रकरणम् ( अङ्गिरसकृतम् )
८६-आकाशतन्त्रम् ( भरद्वाजकृतम् )
८७-लोकसंग्रह ( विसरणकृत )
८८-प्रपञ्चलहरी ( वसिष्ठकृता )
८९-जीवसर्वस्वम् ( जैमिनिकृतम् )
९०-कर्मानिष्पार ( आपस्तम्बकृत ) ,
९१-रुकूहृदयम् ( अत्रिकृतम् )
९२-वायुतत्त्वप्रकरणम् ( शकटायनकृतम् )
९३-वैश्वानरतन्त्रम् ( नारदकृतम् )
९४-धूमप्रकरणम् ( नारदकृम् )
९५-ओषधिकल्पः ( अत्रिकृत )
९६-वाल्मीकिगणितम् ( वाल्मीकिकृतम् )
९७-लोहशास्त्रम् ( शाकटायनकृतम् )

☸ वैमानिक प्रकरण में आये आचार्यों के नाम ☸
१—नारायण मुनि       १९—वाताप
२—शौनक          २०—साम्ब
३—गर्ग           २१—बोधानन्द
४—वाचस्पति         २२—भरद्वाज
५—चाक्रायणि        २३—सिद्धनाथ
६—धुण्डिनाथ        २४—ईश्वर
७—विश्वनाथ        २५—आश्वलायन
८—गौतम          २६—व्यास
९—लल्ल          २७—पराशर
१०—विश्वम्भर        २८—सिंहकोष्ठ
११—अगस्त्य        २९—अङ्गिरा
१२—चुडिल         ३०—विसरण
१३—गोभिल         ३१—वसिष्ठ
१४—शाकटायन       ३२—जैमिनि
१५—अत्रि          ३३—आपस्तम्ब
१६—कपर्दी         ३४—बौधायन
१७—गालव         ३५—नारद
१८—अग्निमित्र        ३६—वाल्मीकि

बृहद् विमानशास्त्र
की
संक्षिप्त विषयसूचि
कापी संख्या १--
विषय पृष्ठ
महर्षिभरद्वाजकृत "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थ का एक प्रकरण यह "वैमानिक
प्रकरण" है जिसमें ऐसे ४० प्रकरण थे। "वैमानिक प्रकरण" का ८ अध्यायों
१०० अधिकरणों ५०० सूत्रों में निबद्ध होना कहा गया है। यन्त्रकला जैसे इस ग्रन्थमें
भी आस्तिकता का प्रदर्शन करने के लिये मोक्षम् को मुमुक्षुओं का विमान बतलाया।
वैमानिक प्रकरण से पूर्व 'विमानचन्द्रिका, व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानबिन्दु,
खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश' इन विमानविषयक छ शास्त्रों का विद्यमान
होना जोकि क्रमश नारायण, शौनक, गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि, धूण्डिनाथ
महर्षियों के रचे हुए थे। महर्षि भरद्वाज द्वारा वेद का निर्मन्थन कर "यन्त्रसर्वस्व"
ग्रन्थ को मक्खन के रूप में निकाल कर दिए जाने का कथन†। विमान शब्द का
अर्थ सूत्रकार महर्षि भरद्वाज तथा आचार्य विश्वम्भर आदि के अनुसार वि-पक्षी की
भांति गति के मान से एक देश से दूसरे देश एक द्वीप से दूसरे द्वीप और एक लोक
से दूसरे लोक को आकाश में उडान लेने-पहुँचने में समर्थ यान है। अपितु पृथिवी
जल और आकाश में तीनों स्थानों में गति करने वाला बतलाया गया (जिसे आगे त्रिपुर
विमान नाम दिया है)। विमान के ३२ रहस्यों का निर्देश करना, यथा-विमान का
अदृश्यकरण, शब्दप्रसारण, लङ्घन, रूपाकर्षण, शब्दाकर्षण, शत्रुओं पर धूमप्रसारण
शत्रु से बचाने को स्वविमान का मेघावृत करना, शत्रु के विमानों द्वारा घिर जाने पर
उन पर ज्वालाशक्ति को प्रसारित करना-फेंकना, दूर से आतेहुए शत्रुविमान पर ४०८७
तरङ्गे फेंक कर उड़ने में असमर्थ कर देना, शत्रुसेना पर असह्य महाशब्द संघातरूप
(शब्दबम) फेंक कर उसे भयभीत वधिर शिथिल तथा हृद्रोग से पीडित कर देना आदि।
आकाश में विमान के सम्मुख विमानविनाशक आकाशीय पाच आवर्त (बवण्डरों) का
† निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधि भरद्वाजो महामुनि ।
नवनीत समुद्धृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम् ।।१०।।

(ख)
विषय पृष्ठ
आना और उनसे विमान रक्षा का उपाय । विमान में विश्वक्रियादर्पण आदि
३१ यन्त्रों का स्थापन करना ॥ १-२४
कापी संख्या २ --
विमानचालक यात्रियों को ऋतुओं की २५ विषशक्तियों के प्रभाव स बचने
के लिये ऋतु ऋतु के अनुसार पहिनने और ओढ़ने के योग्य वस्त्रों और भिन्न भिन्न
भोजनों का विधान, अन्न भोजन के अभाव में मोदक आदि तथा कन्दमूलफलों एवं
उनके मुरब्बों रसों का विशेष सेवन करना । विमान में उपयुक्त ऊष्मप लोहों के सौम,
सौण्डाल और मौर्विक तीन बीज लोहों का वर्णन एवं शोधन तथा बीज लोहों की
उत्पत्ति में भूगर्भ की आकर्षण शक्ति तथा पृथिवी की बाहरी कक्षाशक्ति और सूर्यकिरणों
भूततन्मात्राओं एवं ग्रहों के प्रभाव को निमित्त बतलाना, तीन सहस्र भूगर्भस्थ खनिज-
रेखापंक्तियों का निर्देश तथा सातवें रेखापंक्तिस्तर में तीन खनिजगर्भकोशों में सौम,
सौण्डाल, मौर्विक लोहों की उत्पत्ति का कथन ॥ २५-४३
कापी संख्या ३ --
विमान के भिन्न भिन्न यन्त्रों, कीलों (पेंचों) को भिन्न भिन्न लोहों से बनाने
का विधान । लोहे की प्राप्ति के १२ प्रकार या स्थान बतलाए जिससे कि 'खनिज,
जलज, ओषधिज, धातुज, कृमिज, क्षारज, अण्डज, स्थलज, अपभ्रंशक, कृतक' नामोंसे
लोहे कहे गए हैं। बीज लोहे सौम, सौण्डाल, मौर्विक कहे और प्रत्येक के ग्यारह ग्यारह
भेद होने से ३३ भेद बतलाए हैं ॥ ४४-५५
कापी संख्या ४--
विविध अनर्थों के ज्ञानार्थ विमान में दर्पणयन्त्र 'विश्वक्रियादर्पण, शक्त्या-
कर्षण, वैरूप्यदर्पण, कुण्टिणीदर्पण, पिञ्जुलादर्पण, गुहागर्भदर्पण, रौद्रीदर्पण लगाए
जाना ॥ ५६-७०
कापी संख्या ५--
विमान की भिन्न भिन्न १२ गतियां चलन, कम्पन, ऊर्ध्वगमन, अधोगमन,
मण्डलगति--चक्रगति--घूमगति, विचित्रगति, अनुलोमगति--दक्षिणगति, विलोम-
गति--वामगति, पराङ्मुखगति, स्तम्भनगति, तिर्यग्गति--तिरछीगति, विविधगति या
नानागति' विद्युत् के योग से या विद्युत्शक्ति से होती हैं। विद्युत् से चालित या
विद्युन्मय विश्वक्रियादर्श आदि ३२ यन्त्रों का वर्णन । शत्रु के द्वारा किए समस्त क्रिया-
कलाप को दिखलाने वाला विश्वक्रियाकर्षणादर्श यन्त्र का विधान ॥ ७१-८४
कापी संख्या ६--
शक्त्याकर्षण यन्त्र का विधान, जिसके द्वारा आकाशतरंगों और वातसूत्रों से
होने वाली क्षति से विमान बच जाता है तथा परिवेषक्रियायन्त्र का स्थान जो कि

( ग )
विषय पृष्ठ
विमान के मार्ग में आई सूर्यकिरणों को स्वाधीन करके विमान को निर्बाध गतिशील
करता है ॥ ८५ - ६६
कापी संख्या ७—
द्रावक तारों पर लपेटने के लिए गेण्डे आदि चर्म का विधान। वातसंयोजक,
धूमप्रसारण आदि यन्त्रों का निर्माण । ३२ मणिवर्गों के १२ वें वर्ग में कही १०३
मणियों का विमान में सूर्यकिरणाकर्षणार्थ उपयोग लेना । परिवेषक्रियायन्त्रद्वारा विमान
में वातसंयोजन धूमप्रसारण सूर्यकिरणाकर्षण आदि व्यवहार ॥ १००-११०
कापी संख्या ८—
ग्रहों के चार अतिचार आदि विरोधी गतियों के संघर्ष से आकाश में बहती
हुई विषशक्ति के आक्रमण या प्रभाव से विमान के अङ्गों को निष्प्रभाव रखने के लिए
अङ्गोपसंहारयन्त्र का विधान तथा भूगर्भ से उद्भूत और पृथिवी की बाह्यकक्षाओं से
प्रकट हुए अनिष्टों के निवारणार्थ विस्तृतास्यक्रियायन्त्र का स्थापन । शत्रुओं पर कृत्रिम
विविध धूमप्रकाश को वैरुप्यदर्पणद्वारा फेंक कर उन्हें विरूप करना मूर्च्छा आदि भिन्न
भिन्न रोगों में ग्रस्त करना ! आकाशीय वातावरण से विमान के अङ्गों तथा विशेषत
उपरि अङ्गों में शिथिलता आ जाने और उनपर मल लिप्त होजाने से बचाने को पद्मपत्र-
मुखयन्त्र का विधान ॥ १११-१२७
कापी संख्या ६—
ग्रीष्मकाल में उष्णकिरणों के मेल से कुलिका नाम की शक्ति विमान को
भस्म कर देने वाली उत्पन्न हो जाती है उसे कुण्टिणीशक्तियन्त्र के विविध अङ्गोंद्वारा
पी लिये जाने का वर्णन, तथा ग्रीष्म में विषयुक्त पञ्चशिखा नाम की घातिका शक्ति
उत्पन्न हो जाती है जो कि प्राणियों के जीवनरस का शोषण एवं अनेकविध रोगों का
निमित्त है उसे नष्ट करने के लिये पुष्पिणीयन्त्र (पुष्पाकार अरायन्त्र) लगाना, जो कि
उसके विषयुक्तप्रवाहों को बाहिर निकाल देता है। दो वायुओं के आवर्त्त--चक्रधूम
एवं सूर्यकिरणों के संसर्ग से वज्रसमान विद्युत् का पतन हो जाया करता है उससे बचने
के लिये पिञ्जुलादर्शयन्त्र का विमान में लगाना ॥ १२८-१४५
कापी संख्या १०--
शत्रु के द्वारा भूमि में दबाए--छिपाए हुए महागौलाग्नियन्त्र का गुहागर्भादर्श
यन्त्र ( दूरबीन जैसे यन्त्र) द्वारा सूर्यकिरणों (ऐक्सरे की भांति) पकड भूमि में प्रविष्ट कर
निर्यासपट पर प्रतिबिम्ब (फोटो) लेलेना ॥ १४६-१५४
कापी संख्या ११--
शत्रु पर अन्धकार फैलाने वाला तमोयन्त्र । आकाशीय १३ वातावरण में हुए

( घ )
विषय पृष्ठ
वातसंघर्ष से विमान को बचाने वाला पञ्चवातस्कन्धनालयन्त्र लगाना जिसके नालों से
वातविषशक्तिया विमान से खिंचकर बाहिर निकल जाती हैं । आवह आदि १२२ भेदों
में हैं ७६ वा वातायन प्रवाह है जहां ग्रीष्म ऋतु में विमान की वक्रगति से यात्रियों को
हानि की सम्भावना है विमान की वक्रगति को रोकने के लिये विमान के लिये विमान
के नीचे पार्श्वकेन्द्र में वातस्तम्भनाल कीलयन्त्र लगाना । वर्षा ऋतु में विद्युत् से उत्पन्न
अग्निशक्ति की शान्ति विद्युद्दर्पणयन्त्र से हो जाना बर्फ के समान ठण्डा हो जाना।
आकाशीय ३०४ शब्दों में मेघतरङ्ग वायु विद्युत् की कड़क से ८ वें स्तर में श्रोत्र-
विदीर्णता और बधिरता आदि हानि से बचने को शब्दकेन्द्रमुखयन्त्र लगाना ॥ १५५-१७३
कापी संख्या १२-
आकाश में रोचिषी आदि १२ उल्काएं विद्युत् से भरी हैं उक्त उल्काओ
में स्थित विद्युत् के प्रहार से विमान को बचाने के लिये विद्युदुद्वादशकयन्त्र लगाना ।
विमान में स्थित धूम, विद्युत् और वायु को नियन्त्रित करने और उपयोग में लेने के
लिये प्राणकुण्डलिनी यन्त्र लगाना । जिससे विमान की विविध गतिया सिद्ध होती हैं ॥ १७४-१८३
कापी संख्या १३-
आकाश में ग्रहों के प्रभाव से विमानपथरेखा में शीतरसधारा शीतधूमधारा
शीतवायुधारा वेगसे आ जाया करती हैं जोकि विमानके कलपुर्जो को शिथिल और यात्रियों
को रुग्ण तथा विमानपथ को अदृश्य कर दिया करती हैं उन्हें निष्फल करने या उनके
प्रहार से बचने के लिये शक्त्युद्गमयन्त्र लगाना । शत्रुद्वारा दम्भोलि (तारपीडो जैसे)
आदि विघातक आठ यन्त्र स्वविमान के मार्ग में फेंके हुओं से बचाने के लिये
स्वविमान की वक्रगति देने के निमित्त वक्रप्रसारणयन्त्र लगाना । विद्युत्शक्ति को सर्वत्र
विमानाङ्गों में प्रेरित करने के लिये विद्युत-शक्ति से पूर्ण तारों से घिरा पिञ्जरा जैसा
शक्तिपञ्जरयन्त्र लगाना। मेघों से विद्युत् के पतन की आशङ्का पर विमान के शिर पर
छत्री के आकार का घूमता हुआ शिर कीलकयन्त्र लगाना जिससे विद्युत् का प्रभाव
कोसों दूर रहे । विविध शब्दों भाषा भाषणो बाजे स्वर सङ्कल्प आदि को खींचनेवाला
शब्दाकर्षणयन्त्र लगाना ॥ १८४-१८६
कापी संख्या १४-
भिन्न भिन्न भय आदि अवसरों पर जैसे वैसे रंग के वस्त्र का प्रसारण होना
आठों दिशाओं में ग्रहों और किरणो की सन्धियों में ऋतुकाल सम्बन्धी १५ कौबेर-
विद्युत् शक्तिपूर्ण वायुए हैं उनसे यात्रियों को विविध कष्ट सम्भावनीय हैं उनसे बचाने
के लिये दिशाम्पतियन्त्र लगाना ॥ १८६-२१२
कापी संख्या १५-
ग्रहों के सञ्चार मार्गों में ग्रहों के परस्पर, एक रेखाप्रवेश से ग्रहसन्धि में

( ङ )
विषय पृष्ठ
ज्वालामुखीविषशक्ति है जिससे यात्री मर जाते तक हैं उस विषशक्ति के नाशार्थ पट्टिका-
भ्रकयन्त्र लगाना । शरद् और हेमन्त ऋतु की शीतता को निवृत्त करने के लिये
सूर्यशक्त्यपकर्षण यन्त्र लगाना । शत्रु के विमानोंद्वारा अपना विमान घिर जाने पर
उनके ऊपर अपस्मारधूमप्रसारणार्थ अपनी रक्षा के अर्थ अपस्मारधूमप्रसारणाख्ययन्त्र
लगाना । अभ्रमण्डलों एवं वायुप्रवाहों के सङ्घर्ष में विमान को अविचलित रखने के
लिये स्तम्भनयन्त्र का होना । अग्निहोत्रार्थ और पाकार्थ वैश्वानरनालयन्त्र भी लगाना ॥ २१३-२२८
कापी संख्या १६--
मान्त्रिक, तान्त्रिक, कृतक ( यान्त्रिक ) नाम से विमानों के तीन जातिभेद ।
त्रेतायुग में मान्त्रिक--मन्त्रप्रभाव योगसिद्धि से, द्वापर में तान्त्रिक-तन्त्रप्रभाव-
औषध युक्ति से, कलियुग में कृतक-यान्त्रिक-यन्त्रकलापरायण। मान्त्रिक विमान के
२५ प्रकार "यन्त्रसर्वस्व" ग्रन्थ में महर्षि भरद्वाज के अनुसार, किन्तु "मणिभद्रिका"
ग्रन्थ में गौतम के अनुसार ३२ हैं ॥ २२६-२३६
कापी संख्या १७--
तान्त्रिक विमान के भेद ५६ कहे हैं । कृतक अर्थात् यान्त्रिक-यन्त्रकला से
चालित विमान २५ प्रकार के हैं । कृतक ( यान्त्रिक) विमानों में प्रथम शकुन विमान
है उसके पीठ पक्ष पुच्छ आदि २८ अङ्गों का वर्णन और रचना भिन्न भिन्न ओषधि
खनिज पदार्थों के पुट से बनाए हुए भिन्न भिन्न कृत्रिम लोहों से करना । शकुन विमान
की पीठ पर तीन बड़े कमरे बनाना, प्रथम में विमान के अङ्गयन्त्रों और उपकरणों को
रखना दूसरे में स्तम्भ के साथ यात्रियों के बैठने को घर ( Compartments )
तीसरे में विमान के सिद्ध यन्त्र आदि साधन । शकुन विमान में चार औष्ण्य यन्त्र
( ऐञ्जिन ), चार वाताकर्षण यन्त्र वायु को खींचने के लिये, भूमि पर सञ्चार करने
को भी चक्र लगाना ॥ २३७-२५२
कापी संख्या १८--
दूसरा सुन्दर विमान है, उसमें धूमोद्गम आदि ८ विशेष अङ्ग हों । पात्र में
धूमाञ्जन तैल, हिंगुल तैल, शुक्ततुण्डि तैल, कुलटी ( मन शिला ) का तैल भरना ।
विद्युत् के संयोजनार्थ मणिपीठ के अन्दर नालमार्ग से दो तार लगाना, नालस्तम्भ के
अन्दर धूम को रोकने और फेंकने के अर्थ छिद्रसहित घूमने वाले तीन चक्र नाल सहित
लगाना तैलधूम और जलधूम की नालें उन्हें बाहर निकालने को लगाना एवं ४० यन्त्र
सुन्दर विमान में लगाना । शुण्डाल--शुण्ड जैसा यन्त्र १ बालिश्त मोटा १२ बालिश्त
लम्बा ऊंचा हो जिससे विमान दौड़ता है। दूध गोन्द वाले वृक्षों के दूध गोन्द तथा
विशेष निर्दिष्ट लोहे आदिको मिला कर शुण्डाल का बनाया जाना । शुण्डाल से धूम
निकालने और वायुको खींचने के द्वारा विमान का चलाना । संघर्षण,पाकजन्य,जलपात,

( घ )
विषय पृष्ठ
सांयोजक, किरणजन्य आदि ३२ विद्युद्यन्त्र होते हैं परन्तु विमान में सांयोजक विद्यु-
द्यन्त्र का लगाया जाना अगस्त्य के शक्तितन्त्र के अनुसार कहा जाना ॥ २५३-२६६
कापी संख्या १९----
विद्युत्-शक्ति पूरक पात्र बनाने का प्रकार, विमानको भूमि से ऊपर उठानेके
लिए वातप्रसारणयन्त्र (वायुके फेंकनेवाला यन्त्र) लगाना, २६०० कक्ष्यागति (अश्वगति)
से वात को फेंकना, वायु के निकलने से विमान का वेग से दौड़ना । सुन्दरविमान
का आवरण भी शकुनविमान की भांति राजलोहे से बनाया जाना, कमरे और शेष ३२
अंग भी वैसे ही बनाना । विमान के चलने में धूम आदि निकालने का वेगप्रमाण
गणित शास्त्र से निश्चित किया जाना, एक चुटकी बजाने जितने काल में धूमोद्गम
यन्त्र (एन्जिन) से औष्म्य वेग ३४८० लिङ्क (डिग्री) प्रमाण में हो जाने पर विमान
का एक घड़ी में ४०० योजन अर्थात् एक घण्टे में ४००० कोस (लगभग ८०००
मील) परिमाण से गति करना ॥ २७०-२८०
कापी संख्या २०----
तीसरे रुक्मविमान का राजलोहे से बनना और पाकविशेष से रुक्म अर्थात्
स्वर्ण रंग वाला बन जाना अत एव उसका रुक्म विमान नाम से कहा जाना । १२
बालिश्त लम्बा चौडा लोहपिण्ड चक्र श्रृंखला तन्त्री (जञ्जीर) द्वारा अन्य चक्रों से युक्त
होने पर गतिशील होता है, अंगूठे द्वारा बटनका दबाने से सब कलायन्त्रों का चल
पडना और विद्युत् के योग से धूम का ५०० लिंक (डिग्री) वेग हो जाना चकताइडन-
स्तम्भ के आकर्षण से विमान का वेग से उड़ना । रुक्म विमान में अभ्रक की भित्तिया
आदि बनाया जाना ॥ पृष्ठ २८१-३०१
कापी संख्या २१-
त्रिपुर विमान अपने तीन आवरणों से पृथिवी जल आकाश में चलने वाला
होने से त्रिपुर विमान नाम से प्रसिद्ध होना । प्रथम भाग से पृथिवी पर दूसरे भाग से
जल में तीसरे भाग से आकाश में गमन करता है । त्रिपुर विमान में किरणजन्य
विद्युत् से काम लेना । त्रिपुर विमान के ऊपर नीचे चक्रों में शक्ति होने से उसका
पर्वतों पर चढ़ने तिरछे चलने में समर्थ होना । त्रिपुर विमान में अभ्रक का विशेष
प्रयोग करना, ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र नाम से अभ्रक के चार भेद कहे गए, श्वेत
ब्राह्मण रक्त क्षत्रिय पीत वैश्य और कृष्ण शूद्र अभ्रक बतलाया है । ब्राह्मण अभ्रक के
१६, क्षत्रिय अभ्रक के १२, वैश्य अभ्रक के ७ और शूद्र अभ्रक के १५ भेद । त्रिपुर
विमान में दिशाओं में घूमने वाले घर लगाना । उसका प्रथम आवरण सब से बड़ा
दूसरा उससे छोटा तीसरा और भी छोटा होना । प्रथम आवरण के ऊपर नीचे मुख-
वाले पेंचों में घूमने वाले हस्त चक्रों-मण्डूक हस्तचक्रों का लगाया जाना उनका विद्युत्-
तारों से युक्त हो जल में गति करना ॥ पृष्ठ ३०२-३१८