बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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तदत्र मङ्गलश्लोकरूपेण प्रतिपादितः ॥२०॥
(वृत्तिकार)
पुरातन ऋषि महर्षि चाहे वे धर्मप्रवर्तक हों किसी विद्या या कला के आविष्कारक हों वे सभी
अपने विषय को वेद से अनुमोदित या आविष्कृत हुआ घोषित करते हैं। धर्मप्रवर्तक मनुमहाराज
कहते हैं “धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति ” (मनु० २।१३) धर्म का ज्ञान करने के इच्छुकों के
लिये परम प्रमाण वेद है । राजनीति के व्यवस्थापक वे ही मनुमहाराज कहते हैं “सेनापत्यं च... राज्यं च
वेदशास्त्रविदर्हति" (मनु०१२।१००) सेनाके स्वामी होने और राज्यशासन करनेकी योग्यता वेदका वेत्ता
प्राप्त कर सकता है । तथा “वेदो ह्यथर्वणश्चिकित्सां प्राह” (चरक० सू० ३०।२०) चिकित्सा को अथर्व-
वेद कहता है । इसी प्रकार इस प्रस्तुत विमानकला के प्रवर्तक या आविष्कारक महर्षि भरद्वाज ने भी
वेद से विमानकला का आविष्कार किया है “निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः । नवनीतं समुद्धृत्य
यन्त्रसर्वस्वरूपकम्” (वृत्तिकार १०) भरद्वाज महामुनि ने वेद समुद्र का निर्मन्थन करके “यन्त्रसर्वस्व”
ग्रन्थ (जिसका एक भाग यह वैमानिक प्रकरण है) मक्खनरूप में निकालकर दिया है । वेद में विमान-
कला के विधायक अनेक मन्त्र हैं, उदाहरणार्थ दो तीन मन्त्र यहां प्रस्तुत करते हैं—
वेदा यो वीनां पदमन्तरिक्षेण पतताम् ।
वेदा नाव समुद्रियाः ॥ [ऋ० १।२५।७]
जो आकाशमें उड़ते हुए पक्षियों के स्वरूप को जानता है वह समुद्रिय-आकाशीय † नौकाओं
को–विमानों को जानता है ।
तुग्रो ह भुज्युमश्विनोदमेघे रयिं न कश्चिन्ममृवां अवाहाः ।
तमूहथुनौ॑भिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोदकाभिः ॥
[ऋ० १।११६।३]
बाहिर से सामान लानेवाला लाटू पोत (जहाज) जलतरङ्गों के उत्पातपूर्ण समुद्र मे कदाचित्
डूबता हुआ भोगसामग्री के अध्यक्ष को मरते हुए धन को छोड़ते हुए की भांति छोड़ देता है तब उस
व्यापाराध्यक्ष को अश्विनौ–ज्योतिर्मय और रसमय दो शक्तिया जलसम्पर्करहित बलवती ‘अन्तरिक्षप्रुद्भि ’
आकाश में उड़नेवाली नौकाओं से वहन करती हैं–उडा ले जाती हैं ।
स्यन्दनस्य मूर्धिन चक रथस्य येमथुः ।
परि द्यामन्यदीयते ॥
[ऋ० १।३०।१६]
अबाध्य रथ–विमान की मूर्धा में लगा अन्यत चक्र जो और चक्रों से अलग है–भूमिवाले
चक्रों से अलग है जिसे दो अश्विनौ शक्तियां नियन्त्रित करती है जो कि ‘द्यां परि-ईंयते’ आकाश में
घूमता है ।
† “समुद्र मन्तरिक्षनाम” (निघ० १।३)