बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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की कल्पना आज की ही नहीं किन्तु १६४३ ई० में तो हमने इसे अपनी बडोदावाली "विमानशास्त्र"
नामक प्रकाशित पुस्तक में आज से १६ वर्ष पूर्व दिया था और उक्त लेख का ट्रान्स्क्रिप्ट ( प्रतिलिपि )
१६१८ ई० अर्थात् आज से चालीस वर्ष पूर्व वर्तमान था पुन उस ट्रान्स्क्रिप्ट के मूल म्येनुस्क्रिप्ट में न
जाने कब का पुराना है । अपितु मङ्गल, बुध, शुक्र आदि ग्रहों और नक्षत्रों की कक्षासन्धियों में आ
जाने पर विपत्तियों से बचाने का वर्णन भी आता है ।
विमान के जातिभेद—
मान्त्रिक (योगसिद्धि से सम्पन्न), तान्त्रिक ( औषधयुक्त एवं शक्तिमय वस्तुप्रयोग से सम्पन्न ),
कृतक—यान्त्रिक (कला मशीन एञ्जिन आदि से प्रयुक्त) ये तीन प्रकार के होते हैं । कृतक जाति में
शकुन विमान (पक्षी के आकार का पंखपुच्छसहित विमान), रुक्म विमान (खनिज पदार्थों के योग से
रुक्म अर्थात् सोने जैसी आभा सम्पादित किए लोहे के बना विमान), सुन्दर विमान (शूण्डाल से धूएं
के आधार पर चलनेवाला जेट विमान) कहे हैं तथा त्रिपुर विमान (तीनों स्थल जल गगन में चलने
तरने उडनेवाला विमान) आदि २५ कहे हैं ॥
विमान की गतियां और मार्ग—
विमान की भिन्न भिन्न गतियां 'चालन, कम्पन, ऊर्ध्वगमन, अधोगमन, मण्डल गति-चक्रगति-
घूमगति, विचित्रगति, अनुलोमगति—दक्षिणगति, विलोमगति—वामगति, पराङ्मुखगति, स्तम्भनगति,
तिर्यग्गति—तिरछीगति, विविधगति या नानागति' हैं जो कि विद्युन् के योग या विद्युन्-शक्ति से होती
हैं । विमान के मार्ग आकाश में रेखापथ, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र, ये पांच कहे हैं । विमानगति के
अवरोधक भी आकाशीय पाच आवर्त्त (बवण्डर) बतलाए हैं ।
रक्षाविधान और यन्त्रविधान—
इस वैमानिक प्रकरण में शत्रुद्वाराप्रयुक्त प्रहारक उपायों से एवं आकाशीय पदार्थों से भी
स्वविमान की रक्षा का विधान है । यथा—शत्रु ने जब अपने विमान के मार्ग में दम्भोलि (तारपीडो जैसी
वस्तु) आदि फेंक दी हो तो उसके प्रहार से बचने के लिए अपने विमान की तिर्यग्गति (तिरछीगति) कर
दो या अपने विमान को कृत्रिम मेघों में छिपादो अथवा शत्रुजन पर तामस यन्त्र से तम.-अन्धकार
छोडदो। शत्रुद्वारा भूमि में छिपाए हुए प्रहारक अग्निगोल आदि पदार्थों को गुहागर्भदर्शी यन्त्र से जान-
कर उन से स्वविमान को बचा लेना उस दूरबीन जैसे गुहागर्भदर्शी यन्त्र से ऐसे स्थान पर सूर्यकिरणें
ऐक्सरे की भांति अन्दर प्रविष्ट हो कर उन छिपे हुए पदार्थों को चित्ररूप में दिखलादेती हैं । एव आकाश
में भी शत्रु ओं के आक्रमण से बचने के अनेक उपाय बतलाए हैं जैसे—शत्रु के विमानों ने स्वविमान
को चारों ओर से घेर लिया हो तो अपने विमान की द्विचक कीली को बजाने से ८७ सिङ्खु (डिग्री) की
ज्वालाशक्ति प्रकट होगी उसे गोलाकार में घुमादेने पर वे शत्रु के विमान जलकर नष्ट हो जावेंगे तथा
दूर से आते हुए शत्रु के विमान की ओर ४०८७ तरङ्गे फेंक कर उसे बढने में असमर्थ कर देना । नीचे
खडी हुई शत्रु सेना पर स्वविमान से शब्द सङ्घण-महाशब्दप्रहार करना जिससे वे सैनिक भयभीत होजावें
बहरे बनजावें हृदयभङ्ग को प्राप्त होजावें । एवं आकाशीय पदार्थों वर्षा, वात, विद्युत्, आतप, शब्द, उल्का,