बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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इसी प्रकार ‘वातरंहा, त्रिवन्धुरेण, त्रिवृता रथेन, त्रिचक्रेण’ इत्यादि विशेषणों से युक्त
विमानकालद्योतक अन्य अनेक मन्त्र हैं।
कहीं कहीं वेदमन्त्रों की प्रतीक भी विषयप्रसङ्ग में इस ग्रन्थ में आ जाती है। यथा “यद् द्याव
इन्द्र ते शतम्” (ऋ० ८।१०।५), “नमस्ते रुद्र मन्यवे” (यजु० १६।१) एवं कुछ ब्राह्मणग्रन्थों के वचन
भी आ जाते हैं।
यह ‘वैमानिकप्रकरण’ “यन्त्रसर्वस्व” ग्रन्थ का एक भाग है जिसमें ऐसे ही यन्त्रविषयक
४० प्रकरण थे। “यन्त्रसर्वस्व” ग्रन्थ के रचयिता महर्षि भरद्वाज होने से इस “वैमानिक प्रकरण” के
भी रचयिता महर्षि भरद्वाज हुए। महर्षि भरद्वाज से पूर्व विमानकलासम्बन्धी शास्त्रों के रचयिता अन्य
भी हुए हैं जैसे नारायणमुनि, शौनक,गर्ग, वाचस्पति, चाक्रायणि,धुण्डिनाथ जोकि क्रमशः विमानचन्द्रिका,
व्योमयानतन्त्र, यन्त्रकल्प, यानविन्दु, खेटयानप्रदीपिका, व्योमयानार्कप्रकाश। इन विमानविषयक शास्त्रों
के रचयिता थे†। विमान के बनाने वाले विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु, मय आदि हुए हैं‡।
यह “वैमानिक प्रकरण” ८ अध्यायों १०० अधिकरणों और ५०० सूत्रों मे महर्षि भरद्वाज ने
रचा था, जैसा कि महर्षि भरद्वाज ने स्वयं अपने मङ्गलाचरण वचन मे कहा है—
सूत्रैः पञ्चशतैर्युक्तं शताधिकरणैस्तथा ।
अष्टाध्यायसमायुक्तमतिगूढं मनोहरम् ॥
† पूर्वाचार्यांश्च तद्ग्रन्थान् द्वितीयश्लोकेतोऽब्रवीत् ।
विश्वनायोचेतनामानि तेषां वक्ष्ये यथाक्रमम् ॥३३॥
नारायण शौनकश्च गर्गो वाचस्पतिस्तथा ।
चाक्रायणिर्धुण्डिनाथश्चेति शास्त्रकृतस्स्वयम् ॥३४॥
विमानचन्द्रिका व्योमयानतन्त्रस्तथैव च ।
यन्त्रकल्पो यानबिन्दु खेटयानप्रदीपिका ॥३५॥
व्योमयानार्कप्रकाशाख्येति शास्त्राणि षट् क्रमात् ।
नारायणादिमुनिभि प्रोक्तानि ज्ञानवित्तमै ॥३६॥
विचार्यैतानि विधिवद् भरद्वाज कृपानिधि ।
वैमानिकप्रकरणं सर्वलोकोपकारकम् ।
पारिभाषिकरूपेण रचयामास विस्तरात् ॥३७॥
(वृत्तिकार )
‡ विश्वकर्मा छायापुरुषमनु मयादि .................. ।
(वृत्तिकार )
कृतं स्वयं साध्विति विश्वकर्मणा ।
दिव गते वायुपथे प्रतिष्ठितं व्यराजतादित्यपथस्य लक्ष्मवत् ।
(वाल्मीकि रा० सुन्दर० ८।१२)