बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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वैमानिकप्रकरणं कथ्यतेऽस्मिन् यथामति ।
समस्त सूत्रपाठ कहा है यह तो पता नहीं लगता, हां प्रारम्भ से क्रमशः १४ सूत्र तो इस में
दिए हुए हैं, क्वचित् क्वचित् बीच में भी दिए हुए मिलते हैं और अव्यवस्थितरूप में किन्तु वृत्तिकार
बोधानन्द के वृत्तिश्लोक ही मिलते हैं । वृत्तिकार बोधानन्द यति हैं। लगभग तीन सहस्र श्लोक इस में
हैं और यह ग्रन्थ २३ कापियों में प्राप्त हुआ है । इस ग्रन्थ का काल क्या है यह कुछ नहीं बताया जा
सकता है, मूलहस्त लेख हमें नहीं मिला किन्तु प्रतिलिपि (Transcript) हमें मिला है। ट्रांसक्रिप्ट
कापी १६१८ ई० की हमें बडोदा राजकीय संस्कृत लाईब्रेरी में मिली थी पुन १६१६ ई० की
प्रतिलिपि (Transcript) यह अब मिली जो आज से ४० वर्ष पूर्व की है, इस कापी के मोटे काग़ज़
पुराने ढंग के हैं जो अन्य पक्के काग़ज़ की पट्टियों में चिपके हुए हैं । पूना कालिज ( से प्राप्त कापी ) के
फिल्म फोटो भी प्राप्तहुए हैं उनपर लिखा है “गो वेङ्कटाचल शर्मा १६-८-१६१६, ३-६-१६१६ तारीखें प्रति-
लिपिकर्त्ता ने दी हैं । सूत्रों में ही क्या श्लोकों में भी भाषा पुरानी जचती है, ‘एध’ धातु का प्रयोग बढने
अर्थ में नहीं किन्तु प्राप्त होने अर्थ में आता है” नाशमेधते, लयमेधते । सन्धियां भी आधुनिक ही नहीं
आतीं। पतत्यदा, त्रयाम०, एकमध्यदि, यन्त्राण्यथाक्रमम्, केन्द्रे ष्वात०‡ आदि प्रयोग आते हैं । ‘लोह-
तन्त्र, दर्पणप्रकरण, शक्तितन्त्र’ आदि लगभग १०० पुरातन ग्रन्थों के उल्लेख भी दिए हैं। नारायण गालव
आदि ३६ आचार्यों के नाम भी विमानकलाविषयक शास्त्रनिर्मातृत्व और मतप्रदर्शन के प्रसङ्ग में आए हैं
जिनकी सूचि साथ में दी है । विमान में अनेक अप्रसिद्ध नवीन अद्भुत यन्त्र बनाकर रखने का विधान
भी किया है । इस से ग्रन्थ की पुरातनता प्रतीत होती है ।
विमान शब्द का अर्थ—
महर्षि भरद्वाज के सूत्र और अन्य आचार्य विश्वम्भर आदि के मत में वि—पक्षी की भांति गति
के मान से एक देश से दूसरे देश एक द्वीप से दूसरे द्वीप और एक लोक से दूसरे लोक को जो आकाश
में उड़कर जानेवाला यान हो वह विमान कहा जाता है❉। एक लोक से दूसरे लोक में विमान पहुंचने
† महादेवं महादेवीं वाणीं गणपतिं गुरुम् ।
शास्त्रकारं भरद्वाजं प्रणिपत्य यथामति ॥ १ ॥
बालानां सुखबोधाय बोधानन्दयतीश्वरः ।
सङ्ग्रहाद् वैमानिकप्रकरणस्य यथाविधि ॥
लिलेख बोधानन्दवृत्त्याख्यां व्याख्यां मनोहराम् ॥४॥
(वृत्तिकार )
‡ पतित यदा, त्रि याम० एकमपि यदि, यन्त्राणि यथाक्रमम्, केन्द्रेषु वात०।
✱ वेगसाम्याद् विमानोण्डजानामिति ॥ भ० १ । १ ॥
देशाद् देशान्तरं तद्वद् द्वीपाद् द्वीपान्तरं तथा ।
लोकाल्लोकान्तरं चापि योऽम्बरे गन्तुमर्हति ।
स विमान इति प्रोक्तः खेटशास्त्रविदा वरैः ॥
(इति विश्वम्भरः)