बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें✽ भूमिका ✽
बाल्मीकिरामायण का पुष्पक विमान आबालवृद्ध प्रसिद्ध एवं लोकविदित ही है†, पुनः
महाराजा भोज के “समराङ्गणसूत्रधार” ग्रन्थ में भी पारे से उडने वाले विमान का उल्लेख है‡, ऐसे ही
“युक्तिकल्पतरु” में भी विमान की चर्चा आती है☸। अतएव विमानकला आर्यों एवं आर्यावर्त (भारत)
की पुरातनकला है। उसी पुरातनकलापरम्परा में यह प्रस्तुत ग्रन्थ भी जानना चाहिए। आर्य आस्तिक थे
उनका प्रत्येक कार्य आस्तिकभाव से ओत प्रोत रहता था—ईश्वर की स्तुति से प्रारम्भ होता था, ऐसा ही
आचार इस ग्रन्थ में भी उपलब्ध होता है—
यद्विमानगतास्सर्वे यान्ति ब्रह्म परं पदम् ।
तन्नत्वा परमानन्दं श्रुतिमस्तकगोचरम् ॥१॥
(मङ्गलाचरणश्लोक• १)
माण्डूक्ये च यदोङ्कारः परापरविभागतः ।
विमानत्वेन मुनिना तदेवात्राभिर्वणितं ॥१५॥
वाचकं प्रणवो ह्यत्र विमान इति वर्णितं ॥१६॥
तमारुह्य यथाशास्त्रं गुरूक्तेनैव वर्त्मना ।
ये विशन्ति ब्रह्मपदं ब्रह्मचर्यादिसाधनात् ।
† यस्य तत्पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम् ।
वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम् ॥
(वाल्मीकि० रा० आरण्य० ४८।६)
‡ लघु दारूमयं महाविहङ्गं दृढसुश्लिष्टतनु विधाय तस्य ।
उदरे रसयन्त्रमादधीत ज्वलनाधारमधोऽस्य चाग्निपूर्णम् ॥
(समराङ्गण० यन्त्रवि० ३१।९५)
☸ व्योमयानं विमानं वा पूर्वमासीन्महीभुजाम् ॥
(युक्तिकल्पतरु० यानप्र० ५०)