त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary
श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा
त्रिशतिका 87
विवरण - पत्र का निरूपण
तालिका नं. 1- यह प्रमाण-काल अर्थात् ब्याज जोड़ने के मानक काल प्रकट
करता है।
तालिका नं. 2- यह प्रमाण धन अर्थात् ब्याज के मानक धन को सूचित
करता है।
तालिका नं. 3- यह प्रमाण-फल (Rate) है। प्रथम खण्ड में 2/= रूप
सैकड़ा ब्याज प्रकट करता है।
तालिका नं. 4- कर्ज की अवधि (जैसे प्रथम खण्ड में 4 महीना) को प्रकट
करता है।
तालिका नं. 5- मूलधन को द्योतित करता है।
तालिका नं. 6- सम्पूर्ण महीने के कुल ब्याज को प्रकट करता है। जैसे प्रथम
खण्ड में 2/= की दर से 4 महीने के 100/= का ब्याज बताया है। अतः 2×4×1=8
हुआ।
तालिका नं. 7- सम्पूर्ण मूलधन का 1 मास का ब्याज वर्णित है। जैसे प्रथम
खण्ड में 2/= की दर से 1 महीने का 100/= का ब्याज बताया है। अतः 2×1×1
=2
तालिका नं. 8 ⇒ सम्पूर्ण ब्याज के कुल महीने प्राप्त करने के लिये श्लोक
35 के (I) नियम में इसे प्रकट किया है।
तालिका नं. 9- कुल महीने का 100 का ब्याज प्राप्त करने के लिये श्लोक
35 के (II) नियम के अनुसार 100 से कुल ब्याज (तालिका नं. 6) को गुणित-
करके मूलधन (तालिका नं. 5) से विभक्त किया है।
वास्तव में इसे तालिका नं. 3 तथा 4 से गुणित करके आसानी से प्राप्त
किया जा सकता है।
यहाँ तालिका नं. 6 के अन्तिम योग के अनुसार समस्त ब्याज का योग
324/= है तथा 1 महीने के कुल ब्याज का योग 40/= है। संस्कृत व्याख्या तथा
तालिका नं. 3 के अनुसार 4 प्रकार के प्रमाण-फल (rate) हैं तथा तालिका नं.
5 के अनुसार मूलधन का कुल योग 1000/- है।
तालिका को क्रम से इस प्रकार पढ़ेंगे- 1 महीने में 100/= रूप का का
ब्याज 2/= है तो 4 महीने में 100/= का ब्याज 8/= तथा 1 महीने का ब्याज 2/=
है। ब्याज के कुल 4 महीने हैं तथा सम्पूर्ण महीने के 100/= का ब्याज 8/= है।
88 त्रिशतिका
अन्यदुदाहरणम्
पूर्वोक्तैरेव फलैः शतस्य रूपार्धसंयुतैः क्रमशः।
मासैश्च पक्षयुक्तैः कथय कथं पत्रमेकं स्यात्॥ ६२॥
कृतभागानुबन्धे न्यासो यथा
1/1 9/2 1/1 13/2 1/1 21/2 1/1 17/2 लब्धमतीतकालः
100 100 100 200 100 300 100 400 मासाः 8। दिनानि16
1 1 1 1 1 1 1 1
5/2 7/2 9/2 11/2 शतफलम् 4½
लब्धं मूलधनम् 1000। यद्यतीतकाले दिनभागा भवन्ति ततस्तेषामृणिना
धनिनः कलान्तरं दत्वा दिनभागानपास्यैकपत्रं क्रियत इति
सुक्षेमा अनुवाद-पूर्वोक्त ब्याज की दरों में आधा या ½ संयुक्त करके
अर्थात्
त्रिशतिका 89
सुक्षेमा अनुवाद-सोने के अलग-२ वर्णों को सोने की अपनी-२ मात्रा से
गुणित करके उनके योग को सोने की मात्रा के योग से विभक्त करने पर सोने का
वर्ण (fineness) ज्ञात होता है।
द्वादश दश चैकादश वर्णा नव पञ्च षोडश सुवर्णाः।
कनकस्य समावर्ते जायन्ते वर्णकाः केऽस्मिन्१॥ ६३॥
न्यासः 12/9 10/5 11/16 लब्धमावर्ते वर्णाः 11 २/१५
सुक्षेमा अनुवाद-12, 10 तथा 11 वर्ण वाले क्रमशः 9, 5 तथा 16 माष के
सुवर्ण को समावर्त अर्थात् मिला देने पर निर्मित सुवर्ण का क्या वर्ण होगा। अथवा
उसकी शुद्धता कितने वर्ण (carat) की होगी।
अनुशीलन-श्लोक के नियमानुसार-
(12 × 9 + 10 × 5 + 11 × 16) / (9 + 5 + 16) = 334/30 = 11 4/30 = 11 → २/१५ सुवर्ण का वर्ण
90 त्रिशतिका
द्वितीयोदाहरणम्
सार्धैकादशदशकार्धाष्टमवर्णाः क्व वर्णके योगात्।
अर्धषडंशार्धान्वित-पञ्च-चतुः-सप्त-माषाः स्युः¹॥ ६४॥
11 10 7
न्यासः ½ 1 ½ लब्धमावर्ते वर्णाः 9 ⁴⁰/₁₀₃ ।।
5 4 7
1 1 1
2 6 2
सुक्षेमा अनुवाद-11½ = ²³/₂, ¹⁰/₁, तथा 7½ = ¹⁵/₂ वर्ण वाले क्रमशः अर्धयुक्त
5 अर्थात् ¹¹/₂, छठे अंश से युक्त 4 अर्थात् ²⁵/₆ तथा अर्धयुक्त 7 अर्थात् ¹⁵/₂ माष के सुवर्ण
को मिलाने से निर्मित सुवर्ण का वर्ण क्या होगा।
अनुशीलन-पूर्वोक्त नियमानुसार-
²³/₂ × ¹¹/₂ + ¹⁰/₁ × ²⁵/₆ + ¹⁵/₂ × ¹⁵/₂ = ²⁵³/₄ + ²⁵⁰/₆ + ²²⁵/₄
= (1518 + 1000 + 1350) / 24 = 3868 / 24
¹¹/₂ + ²⁵/₆ + ¹⁵/₂ = (33 + 25 + 45) / 6 = 103 / 6
³⁸⁶⁸/₂₄ × ⁶/₁₀₃ = ²³²⁰⁸/₂₄⁷₂ = (23208 ÷ 24) / (2472 ÷ 24) = ⁹⁶⁷/₁₀₃ = 9 ⁴⁰/₁₀₃ सुवर्ण का वर्ण
पक्वसुवर्णस्य वर्णसुवर्णयोः परिज्ञानाय सूत्रम्
वर्णसुवर्णवधैक्यं विपक्वकनकेन भाजितं वर्णः।
वर्णेन हृतं तु भवेत् तदेव परिपक्ववह्निभवम्²॥ ३७॥
सुक्षेमा अनुवाद-सुवर्ण के वर्ण को उनकी अलग-2 मात्रा से गुणित करके
उनके योग को पक्व सुवर्ण की मात्रा से विभाजित करने से वर्ण का परिज्ञान होगा।
उस योग को सुवर्ण के वर्ण से विभाजित करने पर परिपक्व वह्नि में निर्मित सोने
की मात्रा जानी जावेगी।
अनुशीलन-इससे पूर्व श्लोक में सोने की मात्रा के योग से विभक्त करने
पर सोने के वर्ण का परिज्ञान बताया है। सोने को आग में गलाने पर उसकी मात्रा
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 62, ग.सा.सं. 6.170
२. तुल. पाटी-गणित सू. 53, ग.सा.सं. 6.175, म.सि. 15.40
त्रिशतिका 91
उतनी नहीं रहती। अपितु उसके मल के नष्ट होने से कम हो जाती है। इससे सोने
का वर्ण अधिक अच्छा तथा मूल्य बढ़ जाता है। इस प्रकार ज्यो-ज्यों मात्रा कम
होती है, त्यों-त्यों वर्ण (fineness) बढ़ती है। अतः इसे बढ़े हुए वर्ण को जानने
के लिये उस घटी हुई मात्रा से भाग देना चाहिये। अथवा घटी हुई मात्रा को जानने
के लिये बढ़े हुए वर्ण से भाग देना चाहिये। यही इस श्लोक में कहा है। इन नियमों
से हमें ये सूत्र प्राप्त होते हैं-
वर्ण₁ × मात्रा₁ + वर्ण₂ × मात्रा₂ + ....वर्णₙ × मात्राₙ
वर्ण = ----------------------------------------------------
मात्रा
वर्ण₁ × मात्रा₁ + वर्ण₂ × मात्रा₂ + ....वर्णₙ × मात्राₙ
मात्रा = ----------------------------------------------------
वर्ण
उदाहरणम्
पञ्चाष्टषट्सुवर्णा द्वादशनवकार्धपञ्चदशवर्णाः।
पक्वाः षोडश दृष्टास्तद् वर्णक उच्यतामाशु¹।। ६५।।
12 9 29
न्यासः 1 1 2 पक्वे हेम 16। लब्धं वर्णाः 13¹¹/₁₆
5 8 6
सुक्षेमा अनुवाद-12, 9 तथा 14½ = ²⁹/₂ वर्ण वाले क्रमशः 5, 8 तथा 6 माष
के सुवर्ण मिलकर पकने पर 16 माष के देखे गए। वे कितने वर्ण के होंगे।
अनुशीलन-सोने की कुल मात्रा 5 + 8 + 6 = 19 है। पर आग पर तपाने
से वह 16 माषा रह गया है। इससे उसका वर्ण बढ़ गया है। अतः पूर्वोक्त प्रक्रिया
का अनुसरण करते हुए, 19 से भाग न देकर 16 से भाग देना होगा। इससे उसका
बढ़ा वर्ण प्राप्त होगा-
12 × 5 + 9 × 8 + ²⁹/₂ × 6 60 + 72 + 87
------------------------- = ----------------
16 16
= ²¹⁹/₁₆ = 13 + ¹¹/₁₆ सुवर्ण का वर्ण
द्वितीयोदाहरणम्
त्रिचतुः सप्तवर्णा द्वादशदशकाष्टवर्णका दृष्टाः।
एकादश च विपक्वा वर्णा वद पक्ववह्निभवम्²।। ६६।।
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 63
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 64
92 त्रिशतिका
न्यासः 12 10 8
3 4 7 पक्वसुवर्णवर्णाः 11, लब्धं सुवर्णाः 12
सुक्षेमा अनुवाद-12, 10 तथा 8 वर्ण वाले क्रमशः 3, 4 तथा 7 माष के
सुवर्ण वह्नि में तपने पर 11 वर्ण के हो जाते हैं। उनकी अब कितनी मात्रा रह गई,
बताओ।
अनुशीलन-पूर्वोक्त विवरण के अनुसार सोने का वर्ण जितना बढ़ता है,
मात्रा उतनी ही घटती है। अतः यहाँ वर्ण से भाग देने पर मात्रा ज्ञात होगी। अतः-
12 × 3 + 10 × 4 + 8 × 7 36 + 40 + 56 132
───────────────────────── = ──────────────── = ─── = 12
11 11 11
प्रक्षेपक-करण-सूत्रम्
स्वयुतिहृतप्रक्षेपान् फलेन हन्यात् पृथक् फलावाप्त्यै॥
सुक्षेमा अनुवाद-प्रक्षेप¹ अर्थात् खेत में छितराए गए बीज या मूलधन के
योग से 'प्रक्षेप' या मूलधन की अलग-2 मात्रा को विभक्त करके सम्पूर्ण फल या
मिश्रधन से गुणित करने पर अलग-2 फल या उपज ज्ञात होती है।
द्वौ त्रयः पञ्च चत्वारः प्रस्था बीजस्य वापिताः।
शतद्वयं दशोपेतं तत्र किं स्यात् पृथक् फलम्²॥ ६७॥
न्यासः 2 । 3 । 4 । 5 फलम् 210 लब्धं पृथक्-पृथक् फलम् 30 । 45 । 60 ।
75 ।।
सुक्षेमा अनुवाद-अलग-अलग खेतों में क्रमशः 2, 3, 4 तथा 5 प्रस्थ बीज
डाले गए। उन खेतों में कुल मिलाकर 210 प्रस्थ धान्य तैयार हुए। अलग-अलग
खेतों में कितनी-कितनी उपज हुई।।
अनुशीलन-यहाँ खेती से सम्बन्धित प्रश्न दिये गए हैं। इनकी विधि से
लाभ, साझा (share) के वाणिज्य विषयक प्रश्नों को भी हल किया जा सकता है।
इन सबमें समानुपात को खोजा गया है। श्लोक के नियमानुसार प्रश्न का हल-
────────────────────────────────────────────────────────
१. प्रक्षिप्यते उप्यते सन्तन्यते इति प्रक्षेप्यो बीजं, तत उत्पत्तिः फलम्। - पाटी गणित सूत्र 59 पर
टीका
तुल. ब्रा.स्फु.सि. 12.16, सि.शे. 13.19, लीलावती मिश्रक व्यवहार श्लोक 13
२. तुल. पाटी-गणित उदा. 71
त्रिशतिका 93
प्रक्षेप या मूलधन ⇒ 2 । 3 । 4 । 5
इनका योग = 14
मूलधन के योग से एकक मात्रा का विभाग 2/14 = 1/7,
1/7 × 210 = 210/7 = 30 प्रथम खेत की उपज
इसके समानुपात से इस प्रकार हल प्राप्त होते हैं –
14 : 210 : : 2 : x अतः x = (210 × 2)/14 = 420/14 = 30
14 : 210 : : 3 : x x = (210 × 3)/14 = 630/14 = 45
14 : 210 : : 4 : x x = (210 × 4)/14 = 840/14 = 60
14 : 210 : : 5 : x = (210 × 5)/14 = 1050/14 = 75
द्वितीयोदाहरणम्
शतस्य लब्धवानेकः पञ्चशत्यास्तथापरः।
फलमन्यः सहस्रस्य सहस्रे षट्शताधिके।। ६८।।
सर्वग्रामफले विद्वन् तत्रोत्पन्नं शतद्वयम्।
ततः किं कस्य भागे स्याद् गणयित्वा निगद्यताम्।। ६९।।
न्यासः 100। 500। 1000। सर्वग्रामफलम् 1600। सर्वोत्पत्तिः 200। लब्धं
पृथक्-पृथक् फलम् 25/2 । 62 ½ । 125
इति प्रक्षेपकप्रकरणम्
सुक्षेमा अनुवाद-हे विद्वन्! सम्पूर्ण ग्राम के कुल 1600 परिमाण के खेत
में एक ने 100, दूसरे ने 500 तथा तीसरे ने 1000 परिमाण वाले खेत से उपज
प्राप्त की। कुल उपज 200 प्रस्थ हुई। तो किसने कितने प्रस्थ अनाज प्राप्त किया।
अनुशीलन-यह भी समानुपात का प्रश्न है। अतः यह मान लिया गया है
कि सभी खेत समान रूप से उपजाऊ थे। श्लोक के नियमानुसार-
100/1600 × 200 = 1/16 × 200 = 200/16 = 12 ½
diagonal.
Now look at the numerator of पिप्पलीमूल्यम्:
It has a round top, diagonal down, flat base: that's 2!
Now look at the numerator of शुण्ठीमूल्यम्:
It has a flat top, diagonal down: that's 7!
Wait, so the printed text literally has:
शुण्ठीमूल्यम् 7/37 पिप्पलीमूल्यम् 2/37!
Wait, wait! Let me look even closer:
Wait, could it be शुण्ठीमूल्यम् 2/37 पिप्पलीमूल्यम् 7/37?
Wait! Look at the first fraction:
Is the numerator २ or 7?
Wait, look at the footnote:
१. तुल. पाटी-गणित सू. 59...
Look at 7 in 57 (at end of line):
The 7 in 57 has a straight horizontal top, and a diagonal down to the left.
Now look at the numerator of the first fraction (after शुण्ठीमूल्यम्):
It has a straight horizontal top, and a diagonal down to the left! That is unmistakably a 7!
Now look at 2 in 125 (line 3):
It has a curved top, diagonal down to the left, and horizontal baseline to the right.
Now look at the numerator of the second
त्रिशतिका 95
अनुशीलन-यहाँ मिश्रधन 1 तथा समान मूल्य से मात्राओं का अनुपात इस
प्रकार है-
मूल्य पण्य या मात्रा
रूप ⇒ 1 : 1/2 पल
⇒ 1 : 2
⇒ 1 : 7
अब श्लोक के नियमानुसार मूल्य को पण्य से विभाजित करने पर ⇒
1 × 2/1 = 2, 1 × 1/2 = 1/2, 1 × 1/7 = 1/7
इस प्रकार समान मात्राओं का मूल्य से अनुपात-
मात्रा मूल्य
पल ⇒ 1 : 2 ⇐ रूप
⇒ 1 : 1/2 ⇐
⇒ 1 : 1/7 ⇐
मूल्य अथवा फल का योग-
2 + 1/2 + 1/7 = 37/14
श्लोक के नियमानुसार प्रक्षेप या मूल्य की अलग मात्राओं को इनके फल
अथवा योग से विभक्त करके मिश्रधन 1 से गुणित करने पर-
2 × 14/37 × 1 = 28/37 रूप की 14/37 पल हींग
1/2 × 14/37 × 1 = 7/37 रूप की 14/37 पल पीपल
1/7 × 14/37 × 1 = 2/37 रूप की 14/37 पल सोंठ
इस प्रकार 28/37 + 7/37 + 2/37 = 1 रूप से प्रत्येक तीनों की 14/37 पल समान
मात्राएँ प्राप्त होती हैं।
समान मात्रा ज्ञात होने पर इनका मूल्य समानुपात से भी ज्ञात होता है-
1/2 : 1 : : 14/37 : x अतः x = (14 × 2)/37 = 28/37 हींग का मूल्य
2 : 1 : : 14/37 : x ...x = (14 × 1)/(37 × 2) = 7/37 पीपल का मूल्य
96 त्रिशातिका
7 : 1 : : 14/37 : x ...x = 14 × 1 / (37 × 7) = 2/37 सोंठ का मूल्य
1 रूप कुल मूल्य
स्पष्टतः यहाँ श्लोक के अनुसार पूर्वोक्त संक्रिया की गई है।
उपर्युक्त सम्पूर्ण नियम बीजगणितीय सामान्य समीकरण से आसानी से सिद्ध
है-
यदि x = एक रूप से प्राप्त होने वाली तीनों वस्तुओं की बराबर अज्ञात मात्रा-
मूल्य चुकाया गया ⇒ 1 रूप
यदि x × 2/1 + x × 1/2 + x × 1/7 = 1 रूप
⇒ x (2/1 + 1/2 + 1/7) = 37/14 x = 1 रूप
प्रश्नानुसार ⇒ 37/14 x = 1 रूप
⇒ x = (14 × 1) / 37 = 14/37 पल
इस प्रकार 14/37 पल ही वह समान मात्रा है जिसके अलग-अलग मूल्यों का योग कुल 1 रूप प्राप्त होता है।
14/37 × 4 = 56/37 = 1 19/37 कर्ष
19/37 × 16 = 304/37 = 8 8/37 माष
8/37 × 5 = 40/37 = 1 3/37 गुंजा
अतः 3/37 गुंजा भाग
विषमक्रयोदाहरणम्
मुद्गाना कुडवाः सप्त लभ्यन्ते नवभिः पणैः।
पणेन कुडवस्यार्धं तण्डुलानामवाप्यते॥ ७१॥
ततः पणत्रयं सार्धं गृहीत्वाशु वणिङ् मम।
तण्डुलानां प्रयच्छाशु मुद्गाना चार्थसंगुणम्१॥ ७२॥
१. तुल. पाटी-गणित उदा. 73-74
त्रिशतिका 97
न्यासः 9 1
7/1 1/2 मिश्रधनम् 7/2 लब्धं मुद्गानां मूल्यं पणः 0
1 2
काकिण्यः 3। वराटकाः 8। वराटकभागाश्च 4/37। तण्डुलानां पणौ 2।
काकिण्यौ 2। वराटकाः 11। वराटकभागाः 33/37। मुद्गानां कुडवः 0।
कुडवभागाः 49/74। तण्डुलानां कुडवः 1। कुडवभागाः 12/37 । इति मिश्रव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-9 पण से 7 कुडव मूँग तथा 1 पण से 1/2 कुडव चावल
प्राप्त होता है। अतः हे वणिक्! मेरे 3½ अर्थात् 7/2 पण लेकर मूँग का 1/2 तथा
तण्डुल 1 भाग शीघ्र प्रदान करो।
अनुशीलन-यहाँ प्रश्नानुसार पण्य अथवा मात्रा 7 तथा 1/2 कुडव का क्रमशः
मिश्रक-व्यवहार: ब्याज-वृद्धि एवं स्वर्ण-वर्ण गणित (श्लोक ५६-७५)
98 त्रिशतिका
63/74 + 98/37 = 259/74 = 7/2
63/74 में पूर्णांक पण 0 है। 63/74 × 4 = 252/74 = 3 30/74 काकिणी
30/74 × 20 = 600/74 = 8 8/74 वराटक तथा इसके भाग 4/37 सिद्ध है।
98/37 = 2 24/37 पण, 24/37 × 4 = 96/37 = 2 22/37 काकिणी, 22/37 × 20 = 440/37 =
11 33/37 वराटक इस प्रकार 33/37 वराटक भाग सिद्ध होते हैं।
अब अपने-अपने भाग या अंश को पूर्वोक्त फल या योग से विभक्त करके
कुल मूल्य से गुणित करने पर-
1/2 × 14/37 × 7/2 = 49/74 कुडव, 1/2 भाग मूँग का परिमाण
1 × 14/37 × 7/2 = 49/37 अथवा 1 12/37, 1 भाग तण्डुल का परिमाण
इस प्रकार स्पष्टतः 49/37 कुडव तण्डुल का मूल्य 98/37 पण है तथा इस परिमाण
के 1/2 भाग 49/74 कुडव का मूल्य 63/74 है। इन दोनों मूल्यों का योग 7/2 है। अतः इस
मूल्य से उपर्युक्त परिमाण के तण्डुल तथा मुद्ग प्राप्त होंगे।
परिमाण ज्ञात होने पर इनके मूल्य समानुपात से भी ज्ञात हो सकते हैं-
7 : 9 :: 49/74 : x ⇒ x = 9 × 49/74 × 1/7 = 441/518 = 63/74 पण
तथा-
1/2 : 1 :: 49/37 : x ⇒ x = 1 × 49/37 × 2/1 = 98/37 पण
यह सम्पूर्ण विधि बीजगणित के सामान्य नियम के अनुसार स्वतः सिद्ध है।
जैसे-
x = कुडव में तण्डुल की वाञ्छित अज्ञात मात्रा
1/2 x = कुडव में मूँग की वाञ्छित अज्ञात मात्रा
प्रश्नानुसार ⇒ 7/9 कुडव मूँग का मूल्य ⇒ 1 पण
⇒ 1/2 कुडव तण्डुल का मूल्य ⇒ 1 पण
कुल मूल्य चुकाया गया ⇒ 7/2 पण
अतः अज्ञात मात्रा के तण्डुल का मूल्य ⇒ x × 2/1
अज्ञात मात्रा के मूँग का मूल्य ⇒ 1/2 x × 9/7
अज्ञात मात्रा का कुल मूल्य x (2/1 + 9/14) = 37/14 x पण
प्रश्नानुसार कुल मूल्य 7/2 है।
अतः 37/14 x = 7/2 पण,
त्रिशतिका 99
... x = 14/37 × 7/2 = 98/74 = 49/37 कुडव तण्डुल परिमाण
तथा 1/2 x = 49/37 × 1/2 = 49/74 कुडव मुद्ग परिमाण
अब पूर्वोक्तानुसार 1/2 कुडव तण्डुल का मूल्य 1 पण
अतः ⇒ 1 ,, ,, ,, ,, 1 × 2/1 पण
... 49/37 ,, ,, ,, ,, 49/37 × 2 = 98/37 तण्डुल मूल्य
इसी प्रकार—
7/9 कुडव मूँग का मूल्य 1 पण
1 कुडव मूँग का मूल्य 1 × 9/7 = 9/7 पण
49/74 ,, ,, ,, ,, 49/74 × 9/7 = 63/74 पण मुद्ग मूल्य
प्रश्नानुसार 98/37 + 63/74 = 7/2 सिद्ध है।
श्रेढीव्यवहारे सूत्रम्
व्येकपदोत्तरघाते सादावन्त्यं धनं तदादियुतम्।
द्विविभक्तं मध्यधनं गच्छगुणं जायते गणितम्।। ३९।।
सुक्षेमा अनुवाद-1 संख्या से न्यून किये गए पद या गच्छ के साथ उत्तर
या चय को गुणित करके ‘सादि’ अर्थात् आदि धन से युक्त होने पर अन्त्यधन
प्राप्त होता है। उस अन्त्यधन के साथ आदि धन को संयुक्त करके 2 संख्या से
विभक्त करने पर मध्यधन होता है। इस मध्यधन को गच्छ या पद से गुणा करने
पर सर्वधन प्राप्त होता है। इसे गणित कहा जाता है।
अनुशीलन-इस प्रकरण में क्रमिक संख्याओं के योग से प्राप्त अनेक
उपलब्धियों का निरूपण किया गया है। संस्कृत में इन्हें ‘श्रेणी’ कहा जाता है।
गणित शास्त्र में इसका प्राकृत रूप ‘श्रेढ़ी’ शब्द लोकप्रिय रहा है।
इसके लिये यहाँ अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिनका
क्रमिक निरूपण इस प्रकार है—
पारिभाषिक शब्द हिन्दी अर्थ इंग्लिश अर्थ इंग्लिश प्रतीक
आदि-धन, पहला धन अथवा संख्या, first term a
अन्त्य-धन, अन्तिम धन या संख्या, last term l
१. व्येकपदार्धघ्नचयः सादिः पदसंगुणो भवेद् गणितम्।। - पाटी-गणित सूत्र 85, पृ. 110
तुल. आर्यभटीय गणितपाद 1.19, ब्रा.स्फु.सि. 12.17 ग.सा.सं. 2.61 तथा 6.290, ग.कौ.
1.105
100 त्रिशतिका
मध्य-धन, मध्य का धन या संख्या, middle term m
सर्वधन या गणित, सम्पूर्ण धन या संख्या, sum of terms s
उत्तर या चय या प्रचय, प्रत्येक संख्या के साथ क्रमशः
जोड़ी जाने वाली संख्या, common difference d
पद या गच्छ, संख्याओं की गणना, number of terms n
प्रस्तुत श्लोक में अन्त्यधन, मध्यधन तथा सर्वधन प्राप्त करने के सूत्र बताए
गए हैं। इनके लिये अन्य पारिभाषिक शब्दों का भी उपयोग है। अन्त्यधन आदि के
सूत्र को हम इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं-
अन्त्यधन = उत्तर (पद – 1) + आदिधन
अथवा 𝑙 = d (n – 1) + a
मध्यधन = आदिधन + अन्त्यधन
————————————————
2
अथवा m = a + 𝑙
———————
2
सर्वधन = पद (आदिधन + अन्त्यधन) अथवा पद × मध्यधन
—————————————————————
2
अथवा s = n (a + 𝑙) अथवा s = n × m
——————————
2
उदाहरणम्
प्रथमेऽह्नि हरीतक्या दीयेताश्वस्य विंशतिर्यस्य।
पञ्चकचयेन दत्ताः कति ता दिनसप्तकेन स्युः॥ ७३॥
न्यासः।। आदिः 20। उत्तरः 5। गच्छः 7। लब्धमन्त्यदिने हरीतक्यः 50।
मध्ये 35। सर्वहरीतक्यः 245।
सुक्षेमा अनुवाद-प्रथम दिन घोड़े को 20 हरड़ दी गई। उसके पश्चात्
अगले 7 दिनों तक प्रतिदिन क्रमशः 5-5 हरड़ बढ़ाकर दी गई। तो सातवें दिन तथा
बीच वाले दिन कितनी दी गईं। इस प्रकार 7 दिनों में कुल कितनी हरड़ प्रदान की
गई।
अनुशीलन-यहाँ उपर्युक्त क्रम से सातवें दिन प्राप्त की गई हरड़ 'अन्त्य-ध
न' कही जावेगी।
त्रिशतिका 101
यहाँ प्रथम दिन दी गई 20 हरड़ आदिधन (a) है, प्रतिदिन अतिरिक्त दी
जाने वाली संख्या उत्तर या चय (d) 5 है, दिनों की कुल संख्या पद या गच्छ (n)
7 है। इस स्थिति में उपर्युक्त सूत्र का प्रयोग करने पर–
5 (7-1) + 20 = 50 अन्त्यधन
यह अन्त्यधन का सर्वथा समुचित सूत्र है। क्योंकि वह घोड़ा निम्न क्रम से
हरड़ प्राप्त करता है–
प्रथम दिन, द्वितीय दिन, तृतीय दिन, चतुर्थ दिन, पञ्चम दिन, षष्ठ दिन, सप्तम दिन
a, (a + d), (a + 2d), (a + 3d), (a + 4d), (a + 5d), (a + 6d)
20, 20+5=25, 20+10=30, 20+15=35, 20+20=40, 20+25=45, 20+30=50
तालिका से स्पष्ट है कि प्रत्येक दिन तथा अन्तिम 7वें दिन भी nवें दिन
से 1 कम से गुणित उत्तर (d) के साथ आदिधन (a) संयुक्त है। अतः प्रस्तुत सूत्र
में यही कहा गया है।
प्रस्तुत उदाहरण में मध्य दिन चतुर्थ दिन है। अन्त्यधन के उपाय से मध्यधन
जानने के प्रस्तुत सूत्र अनुसार–
(20 + 50) / 2 = 35 मध्यधन
इसी प्रकार सातों दिन में कुल हरड़ सर्वधन जानने के लिये उपर्युक्त सूत्र
का प्रयोग करने पर–
7 (20 + 50) / 2 = 245 अथवा 7 × 35 = 245 सर्वधन
पाटी-गणित में सर्वधन के सूत्र में अन्त्यधन का सम्पूर्ण सूत्र सम्मिलित
करते हुए सूत्र भी प्रदान किया है।¹ उससे अन्ततः यही पूर्वोक्त सूत्र प्राप्त होता है–
सर्वधन = n (a + ℓ) / 2
पाटी-गणित में इस स्थिति को ज्यामितीय समलम्ब चतुर्भुज (trapazium)
का रूप देते हुए एक ऐसे ‘शराव’ नामक पात्र से तुलना की है, जिसकी आधार
भुजा छोटी तथा सम्मुख भुजा बड़ी हो। प्रस्तुत उदाहरण में आदिधन 20, अन्त्यधन
50 तथा दिनों की संख्या 7 मान कर यह चित्र प्रस्तुत करते हैं–
१. व्येकपदार्धघ्नचयः सादिः पदसंगुणो भवेद् गणितम्॥ - पाटी-गणित सूत्र 85, पृ. 110
तुल. आर्यभटीय गणितपाद 1.19, ब्रा.स्फु.सि. 12.17 ग.सा.सं. 2.61 तथा 6.290, ग.कौ.
1.105
102 त्रिशतिका
नापियाँ मिलीमीटर में हैं।
यहाँ दिनों की संख्या या गच्छ को शीर्षलम्ब बताया है१। यह समलम्ब
चतुर्भुज है। अतः इसके लिये पाटी-गणित का यह नियम प्राप्त करते हैं-
श्रेढ़ीक्षेत्रे तु फलं भूमुखयोगार्धलम्बहतिः
अर्थात् इस आकार का श्रेढ़ी फल आधार भुजा तथा इसकी सम्मुख भुजा
के योग के आधे का शीर्षलम्ब से गुणन द्वारा प्राप्त होता है। स्पष्टतः यह समलम्ब
चतुर्भुज के क्षेत्रफल का सूत्र है तथा यह पूर्वोक्त सर्वधन के सूत्र के ठीक समतुल्य
बैठता है।
त्रिशतिका सूत्र 42 पृ. 84 में भी अन्य शब्दों में यही सूत्र प्रस्तुत किया है।
इस चतुर्भुज में 20 × 7 का एक आयत तथा 15/2 × 7 के दो त्रिभुज हैं। इन
दोनों के सूत्रों को मिलाने पर हम पुनः वही 7 (15 + 20) = 245 क्षेत्रफल प्राप्त
करते हैं। इस प्रकार 15 + 20 = 35 यह प्रतिदिन के दान का औसत या मध्यधन
प्रकट होता है।
निम्नांकित तालिका से भी प्रकट है कि यही प्रतिदिन के दान का औसत
है-
समान क्रम ⟹ 20 25 30 35 40 45 50 = 245
विपरीत क्रम ⟹ 50 45 40 35 30 25 20 = 245
योग ⟹ 70 70 70 70 70 70 70 = 490
यहाँ दोनों क्रम से लिखी संख्याओं का योग एक समान 490 होने से प्रकट
है कि परिमाण समान है। साथ ही प्रथम 20 + 50 = 70 स्पष्टतः a + ℓ है। आगे
भी सभी का योग 70 होने से सिद्ध है कि ये सभी जोड़े a + ℓ के समकक्ष हैं।
तालिका से यह भी प्रकट है कि सम्पूर्ण दिनों की संख्या या n से गुणित a + ℓ
श्रेढ़ीफल का दुगुना 490 है। अतः निश्चय ही श्रेढ़ी फल n गुणित a + ℓ का ½
होगा। सूत्र में यही प्रकट किया गया है। यह a + ℓ का ½ मध्यधन ही है। अतः
n गुणित मध्यधन को भी सर्वधन कहा जा सकता है। सूत्र में यही प्रकट किया
गया है।
१. गच्छसमो लम्बकस्तस्य - पाटी-गणित सूत्र 79, पृ. 107
... Physical line 4:वित्तं प्रयच्छति... Physical line 5:पूर्वोक्तोदाहृतवन्न्यासः... Physical line 6:17। मध्यधनम् 9¾। सर्वधनम् 292½ Physical line 7:सुक्षेमा अनुवाद-कोई धनी किसी याचक को प्रथम दिन 2½ अथवा 5/2 रूप Physical line 8:वित्त देकर एक मास तक प्रत्येक अन्य दिन ½ रूप बढ़ाकर प्रदान करता है, तो Physical line 9:मास के अन्तिम तथा मध्य दिन वह कितने रूप प्रदान करेगा। साथ ही सम्पूर्ण Physical line 10:कुल कितने रूप अथवा सर्वधन दिया जावेगा। Physical line 11:यहाँ उत्तर (d) ½, गच्छ (n) 30 है। Physical line 12:पूर्वोक्त सूत्रानुसार- Physical line 13:½ (30-1) + 5/2 = 29/2 + 5/2 = 34/2 = 17 रूप अन्त्य धन Physical line 14:5/2 + 17 = 39/2 × ½ = 39/4 = 9¾ रूप मध्यधन(with bar under 5/2 + 17) Physical line 15: 2`
Physical line
104 त्रिशतिका
आदिधन (a) = s/n - (n-1) d / 2
इस सूत्र को सर्वधन के विस्तृत सूत्र द्वारा प्राप्त किया गया है। ऊपर जो
सर्वधन का सूत्र उल्लिखित है, उसमें l के स्थान पर उसका सूत्र लिखने पर सर्वधन
का विस्तृत सूत्र तथा उसके आदिधन का यह सूत्र इस प्रकार प्राप्त करते हैं–
सूत्र उदाहरण
सर्वधन¹७ s =n {2a + (n-1)d} 245 = 7/2 {2 × 20 + (7-1)5} = 7/2 × 70
= 490 / 2
⇒ 2s = n {2a + (n-1)d} 490 = 7{2 × 20 + (7-1)5} = 7 × 70
⇒ 2s/n = 2a + (n-1)d 490/7 = 2 × 20 + (7-1)5 = 40 + 30 = 70
⇒ 2a = 2s/n - (n-1)d 40 = 490/7 - (7-1)5 = 70-30
⇒ a = 2s/2n - (n-1)d/2 20 = 490/14 - (7-1)5/2 = 35-15
a = s/n - (n-1)d/2 20 = 245/7 - (7-1)5/2 = 35-15
इस प्रकार हमने आदिधन के लिये सर्वधन के द्वारा ठीक वही सूत्र प्राप्त
कर लिया है, जिसका श्लोक में उल्लेख है। वास्तव में बीजगणितीय समीकरण
के सामान्य नियमों के द्वारा किसी भी धन के परिज्ञान के आधार पर आदिधन का
पता लगाया जा सकता है। जैसे अन्त्यधन (ℓ) के आधार पर–
ℓ = a + (n-1)d 50 = 20 + (7-1)5 = 20 + 30
a = ℓ - (n-1)d 20 = 50-(7-1)5 = 50-30
मध्यधन के आधार पर–
m = (a + ℓ)/2 35 = (20 + 50)/2
2m = a + ℓ 70 = 20+50
a = 2m-ℓ 20 = 70-50
सर्वधन के सूत्र में उल्लिखित सूत्र के आधार पर–
s = n (a + ℓ)/2 245 = 7 (20 +50)/2 = 7 × 35
त्रिशतिका १०५
2s / n = a + l 490 / 7 = 20 + 50
a = (2s / n) - l 20 = (490 / 7) - 50 = 70-50
द्वितीय उदाहरण के आदिधन को भी श्लोकोक्त सूत्र के अनुसार इस प्रकार
प्राप्त करते हैं–
a = s/n - (n-1)d / 2 , a = 1170 / (4 × 30) - (30-1) ½ / 2 ⇒ 1170/120 - 29/2 × ½
⇒ 117/12 - 29/4 = 30/12 = 5/2 आदिधन
प्रचयज्ञानाय करणसूत्रम्
पदहृतफलं मुखोनं निरेकपददलहृतं प्रचयः¹।
न्यासः।। आदिः 20। उ० 0। गच्छः 7। गणितम् 245। लब्धमुत्तरः 5।
द्वितीये न्यासः।। आ ५/२। उ० 0। ग० 30। गणितम् 292½। लब्धमुत्तरः ½।
सुक्षेमा अनुवाद–पद अथवा गच्छ (n) से विभाजित फल अथवा सर्वधन
(s) में से मुख या आदि धन (a) को घटावें। प्राप्त संख्या को 1 कम पद (n) से
विभाजित करें तो प्रचय (d) का परिज्ञान होता है।
अनुशीलन–प्रस्तुत नियमानुसार प्रचय (d) के लिये यह सूत्र प्राप्त करते हैं–
प्रथम उदाहरण में समन्वय
प्रचय (d) = [2 (s/n - a)] / (n - 1) [2 (245/7 - 20)] / (7 - 1) = 2 (35-20) / 6 = 30/6 = 5
यह सूत्र पूर्वोक्त सर्वधन के सूत्र के आधार पर समीकरण द्वारा अनायास
प्राप्त है–
१. यह सूत्र पूर्वोक्त पृ. 101 में वर्णित पाटी-गणित से ध्वनित है।
106 त्रिशतिका
सूत्र | उदाहरण
s = n/2 {2a + (n-1)d} | 245 = 7/2 {2 × 20 + (7-1)5} = 7/2 × 70 = 490/2
2s/n = 2a + (n-1)d | 490/7 = 2 × 20 + (7-1)5 = 40 + 30
(n-1)d = 2s/n - 2a | 6 × 5 = 490/7 - 2 × 20 = 70-40
d = (2s/n - 2a) / (n-1) | 5 = (490/7 - 2 × 20) / (7-1) = (70-40)/6 = 30/6 = 5
अथवा d = (s/n - a) / (n-1) | 2(245/7 - 20) / (7-1) = 2 × (35-20) / 6 = 30/6 = 5
पूर्वोक्त अन्त्यधन (ℓ) के सूत्र के