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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

द्वितीय खण्ड: राष्ट्र-सेवा, समाज-सुधार एवं स्वाधीनता का आह्वान

जीवनमें ऐसी ट्रेजेडी भी है, जिसके हाथसे मनुष्य छुट-
कारा ही चाहता है, यहां उन्होंने बिलकुल सांसारिक
व्यक्तिका मत प्रकट किया है। मेरा अपना विश्वास तो
यह है कि जो सिर्फ निष्कलंक साधु बनता है या साधु-
त्वका प्रदर्शन करता हैं, वह पाखण्डी है और वही इस
बातका प्रतिवाद कर सकता है।
जो भावुक या तत्व ज्ञानी हैं उनकी यन्त्रणा सम्पूर्ण
रूपसे निरविच्छिन्न है, यह समझना ठीक नहीं है। तत्व
ज्ञानहीनों ( abstract point of view से में उन्हें
तत्व ज्ञानहीन कहता हूं·) का भी अपना एक idealism
है। उसे वे 'पूजार्ह' समझते हैं, श्रद्धा और प्रेम करते हैं।
नाना प्रकारके दुख और यंत्रणाके साथ युद्ध करते समय
वे उसी प्रेमसागरसे साहस और भरोसा पाते हैं। यहां
मेरे साथ जिन्होंने कारावासकी यन्त्रणाभोगी है, उनमें
अनेक ऐसे हैं जो भावुक या दार्शनिक नहीं हैं। तब भी वे
शान्त भावसे यन्त्रणा सहते हैं, वीरकी तरह सहते हैं।
Technical अर्थमें वे दार्शनिक न हों पर मैं उन्हें सम्पूर्ण
रूपसे भाव विवर्जित भी नहीं समझ सकता। संभवतः संसार
में जो कर्मी हैं, उनसबके बारेमें यही बात कही जा सकती
है। सर्वसाधारणके मनमें यह धारणा है कि कैदी जब फां-

तरुणके स्वप्न
सीके तख्तेपर ले जाया जाता है तब उसमें एक तरहकी
स्नायविक दुर्बलता आ जाती है, सिर्फ वे ही वीरकी
तरह मर सकते हैं जो किसी महान् उद्देश्यकी सिद्धिके
लिये प्राणोत्सर्ग करते हैं। यह धारणा ठीक नहीं है।
इस सम्बन्धमें मैंने कुछ तथ्य संग्रह किये हैं तथा इस
सिद्धान्तपर पहुंचा हूं कि अधिकांश अपराधी साहसके
साथ मरते हैं और फांसीकी रस्सी गलेमें पहनाये जाने-
के पहले भगवानके चरणोंमें अपनेको निवेदित कर देते
हैं। बिलकुल किंकर्तव्य विमूढ़ होकर पड़ जानेवाले विशेष
दिखलायी नहीं पड़ते। जेलके एक अध्यक्षने मुझे बत-
लाया था कि एक दिन एक कैदीने फांसीके तख्तेकी ओर
जाते हुए कहा था कि सचमुच उसने हत्या की थी।
उससे पूछा गया कि तुम्हें अपने कामके लिये अनुताप है
क्या ? तो उसने बतलाया कि वह अपने कामकेलिये
जरा भी अनुतप्त नहीं है, क्योंकि जिसकी उसने हत्या
की, उसे मार डालनेके कारणोंसे वह सन्तुष्ट था। उस-
ने वीरकी तरह फाँसीके तख्तेपर पैर रखा और वीरकी
तरह प्राण दिये किन्तु उसकी एक नस भी संकुचित
नहीं हुई।
अपराधियोंके मनस्तत्वकी आलोचना कर मेरी आंखें
८६

जेल और कैदी


खुल गयीं। मैं अब सोचता हूं साधारणतया उनके प्रति अ-
विचार किया जाता है। उस बार यानी १६२२ में मैं जब
जेलमें था, उस समय एक कैदी मेरे yard में नौकरका
काम करता था। उस समय मैं महाप्राण देशबन्धुके साथ
एक ही स्थानपर रहता था। देशबन्धुके प्राण बड़े सदय
थे, इसीलिये वे सहजभावसे ही कैदीके प्रति आकृष्ट हो
गये थे। वह पुराना पापी था, आठवार सजा भोग चुका
था। किन्तु न जाने कैसे वह भी देशबन्धुके प्रति अनुरक्त
हो उठा था तथा आश्चर्यदायक शक्तिका परिचय दिया
था। छूटनेके समय देशबन्धुने उससे कहा था कि जेलसे
छूटनेपर मेरे साथ बराबर मिला करना, पुराने साथियों-
के साथ अब मत मिलना। कैदी राजी हो गया था और
कहनेके अनुसार काम भी किया था। तुम्हें सुनकर
आश्चर्य होगा कि वह व्यक्ति एक दिन पुराना दागी था,
जेलसे आनेपर वह उनके घर रहा था, तथा बीच-बीचमें
अभद्र व्यवहार करनेपर भी अब सरल भावसे ही जीवन
यापन करता है तथा देशबन्धुके न रहनेसे जिनकी अपार
क्षति हुई है उनमेंसे वह भी एक है। अनेक कहते हैं कि
छोटी और तुच्छ घटनासे ही मनुष्यके महत्वका विचार
करना चाहिये। यह बात सत्य हो तो देशका उन्होंने जो


८७

तरुणके स्वप्न
कुछ उपकार किया है उसे छोड़ भी दिया जाय तो कहा
जा सकता है कि वे एक महापुरुष थे।
मैं अपनी असली बातसे बहुत दूर आ गया, अब
मुझे रुकना होगा। तुम्हारी चिट्ठीका जवाब पूरा पूरा
नहीं दे सका किन्तु अधिक देर करनेसे आजकी डाक
छूट जायगी। मैं जानता हूं तुम मेरा पत्र पानेकेलिये
उद्विग्न 'होगे। इसलिये यह चिट्ठी आजकी डाकसेही
छोड़ना होगा। अगले पत्रमें और समाचार लिखूंगा।
इति—

दलादलि और बंगालका भविष्य
( श्री भूपेन्द्रनाथ वंद्योपाध्यायको लिखा एक पत्र )
मण्डला जेल
प्रियवरेषु,
आपका २-५-२६ का पत्र पाकर आनन्दित हुआ,
उत्तर देनेमें विलम्ब हुआ, क्षमा करेंगे। इस समय मैं
अनेक बातोंमें अपना मालिक नहीं , यह तो आप सम-
झते ही होंगे। आपके पत्रसे भवानीपुरके सब समाचार
पाकर सुखी और दुखी हुए बिना नहीं रह सकता। आज
८६

तरुणके स्वप्न
बंगालमें दलादलि और झगड़ा झंझट ही अधिक है और
जहांपर जितना कम काम है,वहां उतना ही अधिक झगड़ा
है। भवानीपुरमें कुछ काम होता है इसी लिये झगड़ा
कुछ कम है, किन्तु जो कुछ भी है निष्पक्ष आदमी उससे
म्रियमाण हुए बिना नहीं रह सकता। मैं सिर्फ यही
सोचता हूं कि झगड़ा करनेकेलिये इतने आदमी मिल
मिल जाते हैं, पर मीमांसा करदेने वाला एक भी आदमी
बंगालमें नहीं है ? इसी दलादलिके कारण बंगालने
आज अनिलवरण जैसे स्वदेश सेवकको खो दिया। और
कितने सेवकोंको नहीं खो देगा, कौन जानता है ? बंगाली
आज अन्धे हो रहे हैं, कलह विवादमें निमग्न हैं, इसीलिये
यह बात समझकर भी नहीं समझ पाते । निस्वार्थ आत्म-
दानकी बात तो अब सुनाई नहीं पड़ती । एक महाप्राण
शून्यमें मिल गया, अग्निमय प्रकाशसे युक्त त्यागकी मूर्ति
धारण कर वह हमारे सामने आया,उसी दिव्यालोकके प्रभा-
वसे बंगालीने क्षणभरकेलिये स्वर्गका परिचय पाया;किंतु
फिर वह आलोक भी लुप्त हो गया और बंगाली भी
स्वार्थकी तलैयामे फंस गये। आज बंगालभरमें अधि-
कारके लिये कशमकश हो रही है। जिसके पास अधि-
कार है वह उसे बचाये रखनेकेलिये प्रयत्नशील है। दोनों
६७

दलादलि और बङ्गालका भविष्य
पक्ष कहते हैं; देशोद्धार होगा तो हमारे ही द्वारा होगा ,
नहीं तो नहीं होगा । इन अधिकार-लोभी राजनितिज्ञोंके
झगड़ोंसे अलग रहकर चुपचाप आत्मोत्सर्ग करता रहे,
ऐसा स्वदेशसेवी बंगालमें आज नहीं है क्या ? अपनी
intellectual और spiritual उन्नतिकी अवहेलना कर
जिन्होंने देशसेवामें आत्मनियोग किया है, वे भी यदि
क्षुद्रातिक्षुद्र बातोंमें सबको झगड़ते देखकर निराश होकर
राजनीति क्षेत्रसे अलग हो जायं, इसमें आश्चर्य क्या है ?
अपने मानसिक और पारमार्थिक कल्याणको तुच्छ मान
जिन्होंने देशहितका व्रत लिया है, वे क्या इन क्षुद्र
झगड़े झंझटोंमें अपनेको डुबा देंगे ? जन-सेवासे निराश
होकर यदि वे फिर पारमार्थिक कल्याणमें मन लगावें तो
क्या उनको दोष दिया जा सकता है ? आज मैं स्पष्ट
समझ रहा हूं कि समाजकी यही हालत रही तो न जाने
कितने समाजसेवी अनिलवरणका पथ अवलम्बन करेंगे ।
आज बंगालके अनेक कार्यकर्त्ताओंमें व्यवसायी और
पटवारी बुद्धि जाग पड़ी है। वे अब कहने लगे हैं, हमें
क्षमता दो, पद दो, अथवा हमे कार्यकारिणीका सदस्य
बनाओ, नहीं तो हम काम नहीं करेंगे। मैं पूछना चाहता
हूं नरनारायणकी सेवा व्यवसाय बुद्धिसे, contract से
६१

तरुणके स्वप्न
कबसे होने लगी ? मैं तो जानता था कि सेवाका आदर्श
यही है :—
“दाओ दाओ, फिरे नहि चाओ,
थाके जोदि हृदये सोम्बल ।”
जो बंगाली इतना जल्द देशबन्धुके त्यागकी बात भूल
गया, वह कुछ दिन पहलेकी विवेकानन्दकी वीरवाणी
भूल जायगा, इसमें विचित्रता क्या है ?
दुखकी बात, कलंककी कहानी सोचते-सोचते कलेजा
फटने लगता है। प्रतिकारका उपाय नहीं, करनेकी क्षमता
नहीं, इसीलिये अक्सर सोचता हूं, चिट्ठी पत्री लिखना
बन्द कर दुनियाके साथका बाहरी सम्बन्ध बिलकुल तोड़
दूं । सकूंगा तो लोगोंकी नजरोंसे ओझल होकर तिल-
तिलकर जीवन देकर इसका प्रायश्चित्त कर जाऊंगा ।
इसके बाद यदि ऊपर भगवान हों, यदि सत्यकी प्रतिष्ठा
हो,तो मेरे हृदयकी बात देशवासी एक न एक दिन समझेंगे
ही। देशके नामपर एक इतना बड़ा प्रहसन देखूंगा,
‘Nero is fiddling while Rome is burning’ का
एक नवीन उदाहरण आंखोंके सामने आयेगा—किसी
दिन यह सोचा भी नहीं था ।
बहुत कुछ कह गया, हृदयका आवेग दबाकर न रख
६२

दलादलि और बङ्गालका भविष्य

सका। आपलोगोंको बिलकुल अपना समझता हूं इस-
लिये इतनी बाते लिखनेका साहस हुआ। आपलोग संग-
ठन-मूलक काम कर रहे हैं, आशा है आप इस दलादलिके
कीचड़से अलग रहेंगे।
विद्यालयका समाचार पाकर विशेष आनन्दित हुआ।
किन्तु मकानकी बात पढ़कर बिना दुखी हुए न रह सका।
किन्तु यह बात मैं पहलेसे ही जानता हूं तथा चण्डीबाबू
आदिसे इसके परिणामके सम्बन्धमें कह भी चुका था।
मैं हमेशा सोचता कि स्कूलके अधिकारियोंने unbusiness-
like ढंगसे जमीन लीज लेकर मकान बनवानेका काम शुरू
कर दिया था जिसके फलस्वरूप जमीनदारको ही फायदा
हुआ। जाने दो, अब तो 'गतस्य शोचना नास्ति।' आप-
लोग जरा भी ना उम्मीद न हो कर "गृह निर्माण" के
लिये धन संग्रह कर रहे हैं, यह अत्यन्त आशाप्रद है।
आपका प्रयत्न सफल होगा इसमे मुझे सन्देह नहीं है,
क्योंकि, "नहि कल्याणकृत् कश्चित् दुर्गतिं तात ! गच्छति"
समितिके तमाम समाचार जानकर बहुत सुखी हुआ।
आपलोग मेहतर चमार आदि छोटी जाति कहलानेवालों-
के बालकोंकेलिये एक विद्यालय खोल सके तो बहुत
अच्छा हो। इस विषयमें अमृतके साथ सलाह करियेगा,
६३

तरुणके स्वप्न
बहुत दिन हुए मुझे उसका एक पत्र मिला था। दुःख है
कि उत्तर न दे सका। आज कुलदाको पत्र लिखा है,
आशा है आगामी सप्ताह अमृतको पत्र लिखूँगा।
कहना न होगा कि मैं रहता तो आपलोगोंको अलग
न होने देता, हां भिन्न शाखा स्थापित करनेका प्रस्ताव
मैं अवश्य करता, खैर जो हुआ सो हुआ। आपलोगोंने
Constitution बनाके अच्छा ही किया।
आशा है चावल, चन्दा संग्रहके सम्बन्धमें बालक
समितिके साथ आपका तनाव न होगा। एक ही स्थानमें
यदि अनेक समितियां चावल, चन्दा लेना आरंभ करदें
तो गृहस्थ ऊब उठते हैं, यह बात ध्यान रखना चाहिये।
मेरा ख्याल है कि यदि आप दो एक कार्यकर्ताओंको
कासिमबाजार पोलिटेकनिकमें भेज कर कुछ सिखला ले
सकें तो technical शिक्षाकी विशेष सुविधा होगी।
मैं एक बार कासिमबाजार स्कूल गया था, स्कूल मुझे
बहुत पसन्द आया, वे कई ऐसी नयी चीजें सिखलाते हैं
जो अन्य स्कूलोंमे नही सिखलायी जातीं, जैसे बेतका
काम, clay modelling, सिलाई, electroplating आदि।
मैं जब गया था तब electroplating के लिये मैशीनरी
खरीदी जा रही थी।
६४

दलादलि और बङ्गालका भविष्य
आपका भेजा हुआ विद्यालय और समितिका con-
stitution मिला।
स्वास्थ्य विभागका काम ठीक नहीं हो रहा है, यह
बड़े दुःखकी बात है, इसका कारण यह है कि जनसाधा-
रणको ठीक तरहसे आकर्षित नहीं किया जा सका। ठीक
ढङ्गसे पुकारनेपर जनता बिना प्रत्युत्तर दिये नहीं रह
सकती। स्वास्थ्य विभागके उद्देश्यसे दातव्य चिकित्सा-
लयका उद्देश्य बिलकुल भिन्न है। जनतामें यदि कर्म-
प्रेरणाको जाग्रत करना है तो प्रेम द्वारा उन्हें अपना
बनाना होगा।
संभवत, आप नहीं जानते कि दक्षिण कलकत्ता सेवा-
श्रमकी त्रुटिके लिये मैं जिम्मेदार हूं। बाहर रहनेके कारण
मैं इसे ठीक organise नहीं कर सका। फिर एकाएक
गिरफ्तार कर लिया। जिस समय सेवाश्रम कालीघाटमें
था, उस समय मकान भाड़ा और सहकारी मंत्रीका वेतन
मैं खुद देता था। सिर्फ बालकोंके भोजनादिका खर्च सर्व
साधारणके दानके भरोसे चलता था। सेवाश्रमके संबंध-
में मेरा clear conscience है, क्योकि जनताके दिये हुए
द्रव्यमेंसे मैंने एक पाईका भी असद्व्यवहार नहीं किया।
मेरी गिरफ्तारीके बाद भी जो मैं देता था उसे मेरे बड़े
६५

तरुणके स्वप्न
भइया देते आ रहे हैं। किन्तु अब आय बढ़ी है और खर्च
घटा है इसलिये पहले जितना रुपया नहीं देना पड़ता।
जिस समय मैं दो सौ रुपया खर्च किया करता था, उस
समय कुछ मित्र कहते थे कि पांच सात बालकोंकेलिये
मैं व्यर्थ ही खर्च करता हूं। किन्तु उन्हें नहीं मालूम कि
मनकी तरंगसे ही मैं यह काम नहीं कर रहा हूं, बल्कि
प्रायः १२।१४ वर्षसे जो आग मुझे जला रही है, उसीके
शमनकेलिये मैंने इस काममें हाथ दिया है। मैं कांग्रेसको
छोड़ सकता हूं किन्तु सेवाश्रमका काम छोड़ना मेरे
लिये असम्भव है। दरिद्रनारायणकी सेवाका ऐसा प्रकृ-
ष्ट अवसर कैसे छोड़ा जा सकता है ? सेवाश्रमके पीछे
कितना इतिहास छिपा हुआ है, सेवाश्रमकी कल्पना क्यों
और कैसे मेरे दिमागमें आयी, कैसे मैं विचारमय जगत्-
से कर्ममय जगत्में आया, ये सब बातें किसी और समय
लिखूंगा। पत्रमें लिखनेकी चेष्टा करूंगा तो पत्र किताब
बन जायगा।
बहुत बातें लिखीं, अब बन्द करूं । मेरी बात पूछी है
क्या उत्तर दूं । रवि बाबूकी एक कविता मुझे बहुत
पसन्द हैं। कविकी भाषामें उत्तर देना क्या धृष्टता
होगी ? कवियोंका आदर इसीलिये अधिक है वे, हमारे
६६

matra?
Look at तोमादेर: 'दे' has an 'े' matra.
In सावार: above 'र' there is a dot or faint mark, or maybe just सावार?
In Hindi transliteration of Bengali: সবারে -> सावारे, but often printed as सावार if they dropped the final 'e' or mistyped. Look at it: it has सावारे or सावार? Actually, looking at it, there's no clear slant like in डाकिछे's 'छे' or तोमादेर's 'दे'. But wait, above 'र' there is a slight mark. Let's look at सावारे: either सावारे or सावार. It looks more like सावारे with a broken matra, or सावार. Let's look closely: it's सावारे. Wait, no, compare to 'र' in मोर (line above): 'र' has nothing. In सावार: nothing above 'व', above 'र' there is a small dot/fleck. To be safe, सावारे is the correct Bengali word, but let's check सावार. It could easily be सावारे.

Wait, look at line :
मानुष होते छि पाषाणेर कोले
पाषाणेर: 'प' 'ा' 'ष' 'ा' 'णे' 'र

तरुणके स्वप्न

शरीर अभी उतना अच्छा नहीं है, मगर उसके लिये
चिन्ता भी नहीं है। अमृत प्रभृति कैसे हैं? आप लोगोंका
कुशल समाचार पढ़कर अत्यन्त सुख होगा। पर कामका
समय बरबाद कर पत्र लिखनेकी जरूरत नहीं है। मेरा
प्रीति पूर्ण नमस्कार स्वीकार कीजियेगा। इति
६८

हिन्दू-मुस्लिम पैक्ट
माण्डला जेल
मैने आपका इस्तहार और श्रीयुक्त सेन गुप्त लिखित
उसका प्रतिवाद पढ़ा है। अब तक श्रीयुक्त सेन गुप्तके
प्रतिवादका कोई उत्तर नहीं देखा। पैक्टके फिर ग्रहण
करनेकी बात उठ ही नहीं सकती। सिराजगंजमें जब पैक्ट
स्वीकृत हुआ था, तब इसके खिलाफ एक दल था जो
मूक था। देशबन्धु यह जानते थे और उन्होंने एक बार
नहीं, बार बार साफ कह दिया था कि उनका उद्देश्य
देशके दो भिन्न सम्प्रदायोंके मिलनेकी एक स्पष्ट भित्ति
स्थापित करना है।
६६

तरुणके स्वप्न
इसलिये यदि इस पैक्टका कुछ अंश या कुछ धाराएं
उद्देश्य साधनके विपरीत या ग्रहणके अयोग्य समझी
जायं तो उनके परिवर्तनमें भी देशबन्धुको आपत्ति नहीं
थी। जहां तक मुझे याद है शायद कोकनाडा कांग्रेसमें
उन्होंने यह भी कहा था कि बंगाल पैक्ट इसी समय
कांग्रेस ग्रहण कर ले, यह वे नहीं चाहते। उनकी इच्छा
थी कि यह पैक्ट अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा
आलोचित हो।
किन्तु उस समय कांग्रेस उसकी घोर विरोधी थी,
तथा कांग्रेसके सभ्य उस पैक्टकी आलोचना करनेके लिये
तैयार नहीं थे। कोकनाडा कांग्रेसके बाद सिराजगंजमें
यह पैक्ट गृहित हुआ था। मैं वहां ही उपस्थित नहीं था
किन्तु पैक्ट ग्रहण करनेके पहले भी देशबन्धुने सबको
आश्वासन दिया था कि वे किसी तरहके तर्क या सम-
झौतेकी बात नहीं सुनेंगे सो बात नहीं, बल्कि वे पैक्टके
किसी अंश या धाराके परिवर्तनकी जरूरत होनेपर वैसा
करनेकेलिये तैयार थे।
इसलिये मेरा खयाल है कि देशबन्धुका अनुरक्त भक्त
रहते हुए भी पैक्टके किसी किसी अंशके परिवर्तनकी
मांगकी जा सकती है। साथ ही साथ मैं यह भी समझ
१००

हिन्दू-मुस्लिम पैक्ट
रहा हूं कि सिर्फ देशबन्धुका ही या उनके न रहने-
पर बङ्गालकी समस्याका समाधान करनेके लिये अखिल
भारतीय कांग्रेस कमेटीका ही मुंह ताकनेसे काम नहीं
चलेगा। हिन्दू मुस्लिम समस्या अखिल भारतीय रूपसे
हल होनेपर भी, बङ्गालकी हिन्दू मुस्लिम समस्यांका
समाधान बङ्गालीको ही करना होगा।
समाचार पत्रोंके पढ़नेसे जहांतक सम्भव हो सकता
है, घटनाओंके सिलसिलेको समझ कर मैंने कुछ दृढ़
धारणाएं की हैं। उनमेंसे एक यह है कि वर्तमान विपद्-
संकुल समयमें हमें जिस चीजका सबसे अधिक अभाव
है, वह है सब विषयोंमें स्पष्ट दूरदर्शिता। इति—
१०१

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
इनसिन सेन्ट्रल जेल
४ अप्रैल १६२७
बड़े भइया !
मिस्टर मोवार्लीके प्रस्तावके सम्बन्धमें मेरी क्या राय
है, यह जाननेकेलिये निश्चय ही आप लोग उत्कण्ठित
हो रहे होंगे और मेरा खयाल है इस सम्बन्धमें अपना मता-
मत प्रकट करनेका समय आ गया है। मेरी रायसे आप
लोगोंकी राय मिलेगी या नहीं, नहीं जानता। तब भी
मेरे मतकी चाहे जो भी कीमत क्यों न हो; नीचेकी
पंक्तियोंमें उसे प्रकट कर रहा हूं।
१०२

An exact line-by-line transcription of the Hindi text:

जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
मैंने अत्यन्त संयत होकर मिस्टर मोवार्लीके प्रस्ताव-
को पढ़ा। उनके प्रत्येक शब्द और प्रत्येक बातपर बार-
बार विचार किया और उससे मैं इस नतीजापर पहुंचा हूं
कि यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्होंने अत्यन्त साव-
धानीके साथ अपने वक्तव्यके शब्द चुने हैं और खूब सोच
समझकर उन्हें प्रकट किया है। उनके प्रस्तावके सब पह-
लुओंको अच्छी तरह सोचनेके बाद आज मैं अपना मत
प्रकट कर रहा हूं। इस समय मैं आपको जो कुछ भी
लिख रहा हूं उसे अनेक बार सोचकर निश्चय किया है।
तब भी मुझसे यदि कोई भूल हो गयी हो तो जाननेपर
उसपर फिर विचार करनेकेलिये प्रस्तुत हूं।
पहले ही कह देता हूं कि मिस्टर मोवार्लीकी स्पष्ट-
वादिताकी मैं प्रशंसा करता हूं और सोचता हूं उनकी ही
तरह यदि मैं भी सब बातोंको स्पष्ट रूपसे व्यक्त न करूंगा
तो बड़ा अन्याय होगा, तथा मेरा कर्तव्य भी अधूरा रह
जायगा। स्पष्टवादितामें मेरा हमेशा ही विश्वास रहा है
और मैं समझता हूं साफ-साफ कहनेसे दोनों पक्षोंको
अन्तमें लाभ ही होता है।
मिस्टर मोवार्लीकी कई बातोंके लिये मैं उन्हें धन्यवाद
दिये बिना नहीं रह सकता,खासकर जहांपर उन्होंने कहा है
१०३

कि वे मेरे अतीत कार्य-कलाप और भविष्यकी गतिविधि-
के लिये किसी तरहकी स्वीकारोक्ति नहीं चाहते। उन्होंने
कहा है कि मैं यदि प्रतिज्ञा करके कहूं तो वे मुझे छोड़
देंगे। अन्तमें उन्होंने कहा है कि पहले उन्होंने यह प्रस्ताव
मेरे सामने इसलिये नहीं रखा, कि ऐसा होनेसे मनमें यह
बात मेरे मनमें आ सकती थी कि प्रस्ताव स्वीकृत
करनेकेलिये मुझे बाध्य किया जा रहा है। इन अंशोको
पढ़कर समझा हूं कि वे मुझे आत्म-सम्मान विशिष्ट
सज्जन पुरुष समझते हैं और निम्नलिखित कारणोंके
कारण उनके प्रस्तावमें मेरे प्रति जो सम्मानजनक अंश
है उसकी उपलब्धि मैंने की है। अन्तमें बङ्गीय कानून
सभाके सदस्यकी हैसियतसे माननीय सभ्यके इस
तरहके व्यवहारकी प्रशंसा किये बिना भी मुझसे
नहीं रहा जाता। क्योंकि मेरा ख्याल है कि कौंसिल
के सभ्योंके प्रति आस्था स्थापनेकर किसी प्रस्तावका
सर्वप्रथम उनके सामने उपस्थित करनेका निदर्शन यह सर्व-
प्रथम ही है।
मेरा ख्याल है कि मिस्टर मोवार्लोको प्रस्तावके
सम्बन्धमें अपनी तरफसे कुछ नहीं कहना है।
सबसे पहले एक