तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
तरुणके स्वप्न
और १६२६ में इस आर्डिनेंसको बाकायदा कानून बनाने-
का आन्दोलन हुआ तो मुझे आश्चर्य न होगा। ऐसा
होनेपर मुझे स्थायी रूपसे विदेशमें रहना पड़ेगा। और
इस तरहके निर्वासनकेलिये मुझे अपने आपको ही उत्तर-
दायी मानना होगा। यदि इस सम्बन्धमें सचमुच सर-
कारको कोई इच्छा होती कि मैं कब विदेशसे लौटकर
आ सकूँगा तो उसका उल्लेख अवश्य होता।
फिर विदेशमें मैं किस हद तक स्वाधीन रहूँगा, इसका
भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, स्विटजरलैंडके कोने-कोनेमें जो
सी० आई० डी० घूमते हैं भारत सरकार क्या उनसे मेरी
रक्षा कर सकेगी ? यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता
कि राजनैतिक सन्देहमें अभियुक्त होने पर म जबतक अपना
मत बदलकर सरकारी गोयन्दा नहीं हो जाता, तब तक
सरकार मुझे सन्देहकी दृष्टिसे ही देखेगी। और यह
निश्चय है कि ये सी० आई० डी० पद पदपर मेरा पीछा
करके, मेरे जीवनको दुःसह कर देंगे।
स्विट्जरलैण्डमें सिर्फ ब्रिटिश गोयन्दा ही नहीं,
बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त स्विस, इटालियन,
फ्रेंच, जर्मन और भारतीय सी० आई० डी० भी हैं, तथा
कोई उत्साही सी० आई० डी० मुझे सरकारकी
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जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
नजरोंमें दोषोंकी खान सिद्ध करनेकेलिये, किसी मिथ्या
घटनाका वर्णन नहीं भेजेगा, इसका ही क्या प्रमाण है ?
मैंने पिछले साल मिस्टर लोमेनसे कहा था, कि सी० आई०
डी० वाले चाहें तो चाहे जिसके विरुद्ध प्रमाण बनाकर
उसे चाहे जिस आर्डिनेंसके अनुसार बन्दी बना सकते
हैं। युरोपमें ऐसा करना और भी सहज है। युरोपमें
जिन्हें सन्देहकी नजरसे देखा जाता है उन्हें स्वदेश लौटनेके-
लिये कितनी असुविधाएं उठानी पड़ती है, यह सब जानते
हैं। विलायती पार्लामेन्ट और मन्त्री सभाके कुछ सदस्य
प्रयत्न न करते तो लाला लाजपतराय जैसे नेता भी भारत
वापिस नहीं आ सकते। सरकारकी सन्देह दृष्टि जब
एक बार मेरे ऊपर पड़ गयी है, तो मेरे भविष्यका क्या
होगा, इसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है।
मैं जानता हूं, कि पुलिसके गोयन्दा इस विषयमें विशेष
तत्पर रहते हैं मैं युरोपमें चाहे जितने शान्त भाव और
सावधानीके साथ क्यों न रहूं, वे मेरे खिलाफ़ भारत
सरकारके पास झूठी रिपोर्ट भेजेंगे ही। मेरे चुप रहनेपर
और कुछ न करनेपर भी वे मुझे भयंकर षड्यन्त्रका
कर्ता धर्ता बतलावेंगे, तथा वे क्या रिपोर्ट दे रहे हैं, यह
मुझे मालूम भी न होगा। फल-स्वरूप उस रिपोर्टके-
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तरुणके स्वप्न
सम्बन्धमें सच बात बतलाने या मेरे कुछ बोलनेकी जगह
नहीं रहेगी। इस प्रकार सम्भवतः १६२६ के पहलेही वे
मुझे बड़ा भारी बोलसेविक नेता प्रकट कर देंगे, जिसके
कारण भारत लौटनेका मेरा रास्ता हमेशाकेलिये
लिये बन्द हो जायगा, क्योंकि युरोपवाले सिर्फ बोल-
सेविकसे ही डरते हैं। इसलिये मैं अपनी इच्छासे अपनी
जन्मभूमिसे निर्वासित होना नहीं चाहता। सरकार भी
यदि मेरे दृष्टि कोणसे इसपर विचार करे तो मेरी अवस्था
समझ सकती है।
यदि बोलसेविक एजेन्ट होनेकी मेरी इच्छा होती तो
सरकारके कहते ही, सबसे पहले मिलनेवाले जहाजसे मैं
युरोपकेलिये रवाना हो जाता। तथा स्वास्थ्य ठीक
होनेपर बोलसेविक दलमें मिलकर समस्त संसारमें एक
विराट् विद्रोहकी सृष्टिकेलिये पेरिससे लेनिन ग्राड तक
दौड़ धूप करता। किन्तु मेरी ऐसी इच्छा या आकांक्षा
नहीं है। जब मैंने सुना कि मुझे भारत, सिंहल और वर्मा
लौटकर नहीं आने दिया जायगा, तब मैने सोचा कि क्या
सचमुच मैं भारतमें ब्रिटिश शासनकी रक्षाकेलिये इतना
विपज्जनक हूं। बंगालसे निर्वासित करके भी सरकार
सन्तुष्ट नहीं हुई, अथवा सब कुछ धोखेबाजी है ? यदि
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जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
'पहली बात सच है तो ब्यूरोक्रेसीके मुकाबलेमें मैं भयका
कारण बनूं यह मेरे लिये श्लाघाकी बात है। किन्तु इसके
बाद ही जब मैं अपने जीवन और कार्य-कलापके बारेमें
सोचता हूं तो अनुभव करता हूं एक हिंसा परायन दल मुझे
जैसा समझता है, वैसा मैं नहीं हूं। मैंने बंगालके बाहर कोई
राजनैतिक कार्य नहीं किया और भविष्यमें करूंगा ऐसा
भी मनमें नहीं सोचता, क्योंकि मैं बंगालको ही अपना
कार्य-क्षेत्र और अपने आदर्शकेलिये काफी विस्तृत सम-
झता हूं। बंगाल सरकारके सिवा अन्य किसी सरकारके
पास मेरे विरुद्ध कोई अभियोग है, ऐसा मैं नहीं समझता।
तब क्यों मेरे लिये समस्त भारत, सिंहल, और बर्मामें
प्रवेश करना निषेध बताया गया ? सिंहल तो बिलकुल
ब्रिटिश उपनिवेश है, कानूनन भारत सरकारकी आज्ञा
वहां चल सकती है, यह सन्देह जनक है।
बंगाल सरकार इस समय मेरी गति विधि नियन्त्रित
करना चाहती है। किन्तु जब मैं स्वाधीन था, तभी
मेरी गति विधि क्या थी ? अक्टूबर सन् १६२३ से
अक्टूबर १६२४ तक सिर्फ दो बार मैं कलकत्ते से बाहर
गया हूं। एक बार खुलना जिला कांफ्रेंसमें, दूसरी बार
नदिया जिलेके कौंसिल निर्वाचनमें खड़े हुए एक उम्मी-
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तरुणके स्वप्न
दवारका समर्थन करनेकेलिये । १६२४ के फरवरी माससे
अक्टुबर तक मैं एक बार भी बाहर नहीं गया । सिराज-
गंज कांफ्रेंसके साथ मुझे नत्थी करनेकेलिये काफी
कोशिश की गयी, इस समय मैं कारपोरेशनके चीफ इक-
जीक्युटिव आफिसरकी हैसियतसे कारपोरेशनके काममें
विशेष व्यस्त था,ठीक कांफ्रेंसके समय कारपोरेशनके धां-
गड़ोकी हड़तालकी संभावनाके कारण एक मिनटकेलिये भी
बाहर जाना संभव नहीं था । सन् १६२४ के मेसे अक्टुबर
तक मैने जो कुछ किया उसे सब जानते हैं । उस समय
सरकारको मेरी गति विधिका सब हाल मालूम था । मेरी
गतिविधिको नियंत्रित करना ही यदि मेरे गिरफ्तार किये
जानेका कारण है तो मैं कह सकता हूं कि मुझे गिरफ्तार
करनेकी कोई जरूरत नहीं थी ।
मिस्टर मोवार्लीने एक विषयमें हृदय हीनताका परि-
चय दिया है। सरकार जानती है प्राय २।। वर्षसे मैं निर्वा-
सित हूं, इस समयमें मैं अपने किसी आत्मीय, यहां तक
कि पिता मातासे भी नहीं मिल सका । सरकारने प्रस्ताव
किया है कि मुझे २।।-३ वर्ष विदेशमें रहना पड़ेगा, इस
समय भी उनके साथ मिलनेकी कोई सुविधा नहीं
मिलेगी । यह मेरे लिये कष्ट दायक है इसमें सन्देह नहीं,.
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जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
किन्तु जो मुझे चाहते हैं उनकेलिये तो यह और भी अधिक
कष्टदायक है। पूर्वीय लोग अपने आत्मीयोंके साथ
किस प्रकार अटूट स्नेह सूत्रमें बन्धे रहते हैं, इसका पश्चि-
मीय अनुमान भी नहीं कर सकते। मेरा ख्याल है कि
इस अज्ञानके कारण ही सरकारने ऐसी हृदय हीनताका
परिचय दिया है। वे सोचते हैं जब कि मेरा विवाह
नहीं हुआ, तब मेरा परिवार कहांसे हो सकता है और
किसीके प्रति मेरा प्रेम भी नहीं हो सकता।
पिछले २॥ वर्षोंसे मुझे कैसे कष्ट भोगने पड़ रहे हैं,
सरकार शायद यह भूल गयी। बिना कारण मुझे इतने
दिन तक अटका रखा गया है। तब भी मुझसे कहा
गया है, अस्त्र-शस्त्र तथा विस्फोटक पदार्थ मंगाने, सर-
कारी कर्म्मचारियोंकी हत्या करनेके षड्यन्त्रके अभियोग-
का मैं अपराधी हूं। इस सम्बन्धमें मुझसे कुछ कहनेकेलिये
कहा गय , मेरा कहना है कि मैं निर्दोष हूं। मेरा
विश्वास है कि परलोकगत सर एडवर्ड मार्शल और
सरजान साइमन इससे अधिक और कुछ नहीं कह सकते
थे। दूसरी वार ये अभियोग मेरे सामने रखे गये तब मैंने
पूछा था, इतने आदमियोंके रहते हुए पुलिसने मुझे पकड़ा
क्यों ? मेरा ख्याल है यही उत्तर सन्तोष जनक है।
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तरुणके स्वप्न
मेरी गिरफ्तारीके बाद बंगाल सरकारने मेरे आश्रितोंके
लिये तथा घरकी रक्षाकेलिये किसी तरहका भत्ता नहीं
दिया। इसकेलिये मैंने बड़े लाटके पास आवेदन भेजा
था पर बंगाल सरकारने उसे दबाकर रख छोड़ा। इसके
बाद अब फिर मुझे तीन साल विदेशमें रहनेकेलिये कहा
जा रहा है। युरोप रहनेके समय मुझे अपना खर्च स्वयं
चलाना होगा। यह प्रस्ताव कैसे युक्ति संगत है यह
समझमें नहीं आता। १६२४ में मेरा स्वास्थ्य जितना अच्छा
था, कमसे कम वैसाही स्वास्थ्यशाली बनाकर सरकारको
मुझे छोड़ना चाहिये। जेलमें रहनेके कारण मेरे स्वा-
स्थ्यकी हानि हुई तो क्या सरकार उसकी क्षति पूर्ति
नहीं करेगी ? युरोपमें जब तक मैं स्वस्थ न हो जाऊं
तब तक सरकारको मेरा सब खर्च देना चाहिये। सरकार
यदि युरोप जानेके पहले मुझे घर जाने देती, युरोपमें
मेरा सब खर्च देती और स्वस्थ होतेही मुझे भारत
लौटने देती तो मैं उसके व्यवहारको सहृदयता-पूर्ण
समझता।
मिस्टर मोवार्लीने कहा है सरकार और सुभाषचन्द्र
बोस; दोनो ही समझते हैं कि आर्डिनेन्सकी अवधि
समाप्त होने तक सरकार सुभाषचन्द्र बोसको अटकाकर रख
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जेल-मुक्तिके प्रस्तावका उत्तर
सकती है। इस विषयमें मैं मिस्टर मोवार्लीके साथ सह-
मत हूं। मैं जानता हूं सरकार जितने दिनतक चाहे मुझे
अटका कर रख सकती है। आर्डिनेन्सके खत्म होनेपर
तीसरे रेगुलेशन या किसी अन्य कानूनसे मुझे बन्दी
बना सकती है। व्यवस्थापिकाके सदस्य चाहे जितनी
उछल-कूद मचायें या शासन सभाके सदस्य सफर
खर्च क्यों न ना मंजूर कर दें, मै जानता हूं, सरकार
चाहे तो जीवनभर मुझे बन्दी रख सकती है। सरकार
मुझे चिरकालतक बन्दी रखना चाहती है या नहीं,
यही मैं जानना चाहता हूं। देशबन्धु मुझे युवक-वृद्ध
कहकर पुकारते थे, वे मुझे निराशावादी कहते थे।
हां, मैं निराशावादी हो सकता हूं, क्योंकि ज्यादातर
मैं प्रत्येक घटनाका अशुभ ही देखता हूं। वर्तमान
घटनाका सबसे खराब फल क्या हो सकता है, वह भी
मैंने सोचकर देखा है किन्तु तब भी मैंने निश्चय किया
है, जन्मभूमिसे हमेशाकेलिये दूर होनेकी अपेक्षा जेलमें
मृत्युको वरण करना ही अच्छा है। क्योंकि मैं कविकी
इस वाणीमें विश्वास करता हूं।
“गौरवका पथ सिर्फ मृत्युकी ओर ले जाता है।”
सरकारके प्रस्तावके पक्ष और विपक्षमें जो कुछ
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तरुणके स्वप्न
कहना है, मैंने वह सब कहा है। मेरे छुटकारेकी संभावना
दूर चली गयी इसके लिये कोई दुख न करे। पिता माता-
को सबसे अधिक कष्ट होगा, उनको सान्तवना दीजि-
येगा। स्वतंत्रताके पहले व्यक्तिगत और सामूहिक
भावसे हमें अनेक कष्ट सहने होंगे। भगवानको धन्य-
वाद है कि मैं निर्विकार हूं और हर तरहकी अग्निपरीक्षा-
के लिये प्रस्तुत हूं। अपनी जातिके समस्त पापोंका मैं
प्रायश्चित्त कर रहा हूं, इसीसे मैं तृप्त हूं। हमारा विचार
और आदर्श अमर रहेगा, हमारी स्मृति कभी भी नष्ट
न होगी, भविष्य सन्तान हमारी प्रिय कल्पनाकी उत्तरा-
धिकारिणी होगी, यही विश्वास कर हर तरहकी विपत्तियों
और कष्टोंको सहास्य सहकर जीवन बिता दूंगा। इति
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जीवन-लक्ष
( श्री शरच्चन्द्र वसुको लिखे गये पत्रका अनुवाद )
इनसिन जेल।
६ मई १९२७
बड़े भय्या !
लम्बा पत्र लिखनेकी ताकत नहीं है। जबतक पूरी
ताकत न आ जाये मुझे उसका इन्तजार करना होगा।
सरकारी प्रस्तावके सम्बन्धमे भय्याके साथ मेरी
बहुत बातचीत हुई है। मुझे इस तरहकी बातचीतका
अवसर मिला इसके लिये मैं अत्यन्त आनन्दित हूं। मान-
नीय स्वराष्ट्र सचिवने जो सौजन्य दिखलाया उसके
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तरुणके स्वप्न
लिये उन्हें धन्यवाद है। मेरे साथ अभीतक जो व्यवहार
किया जाता था, उससे यह व्यवहार बिलकुल पृथक है।
२७ अप्रैलको भैयाने मुझे सरकारका उत्तर दिख-
लाया। इस उत्तरसे मूल विषय दोनों पक्षोंके सामने और
भी स्पष्टतासे आगया। ११ अप्रैलको सरकारी शर्तोंका
मैंने जो उत्तर दिया था, अब मैं फिर सोचकर उसे ही
ठीक समझता हूं।
मेरा जो सिद्धान्त है, वह सहज विचारका फल है।
अच्छी तरह सोच-विचार करनेसे यह सिद्धांत और भी
दृढ़ होता है। जीवनको सहज भावसे विचार कर मैं
इस सिद्धान्तपर पहुंचा हूं। अच्छीतरह सोचनेपर यह
सिद्धान्त और अधिक दृढ़ हुआ है। जेलमें मेरे जितने ही
अधिक दिन बीतते हैं, मेरे मनमें यह धारणा दृढ़ होती
है कि, जीवन-संग्रामके मूलमे मतवादका संघर्ष, सत्य या
मिथ्याका संघर्ष रहता है। कोई-कोई इसे सत्यके विभिन्न
पहलुओंका संघर्ष भी कहते हैं। मनुष्यकी धारणा ही
मनुष्यको चलाती है, ये सब धारणाएं निष्क्रिय नहीं हैं,
क्रियाशील और संघर्षात्मक हैं। हेगलका Absolute
Idea, हेपमेन और शोपेनहार Blind Will और हेनरी
“Iean Vital” के मतसे समस्त धारणाएँ ही क्रियाशील
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जीवन-लक्ष
हैं। ये सब धारणाएं खुद ही अपना पथ बना लेती हैं।
हम तो मिट्टीके पुतले हैं, भगवानकी तेजराशिके कुछ अणु
ही हममें हैं। यही समझकर हमें आत्मोत्सर्ग करना
होगा।
सांसारिक और शारीरिक सुख दुखको अग्राह्य कर
जो इस भावसे आत्मनिवेदन कर सके उसके जीवनमें
सफलता अवश्यम्भावी है। एक दिन मेरे आदर्शकी
विजय होगी, इसका मुझे दृढ़ विश्वास है। इसलिये अपने
स्वास्थ्य और भविष्यके सम्बन्धमें मैं कुछ चिन्ता नहीं
करता।
सरकारी शर्तके जवाबमें मैंने जो कुछ लिखा है उसमें
मैंने अपना मत व्यक्त कर दिया है। किसी किसी सम-
लोचकका कहना है कि अच्छी शर्तें पानेकेलिये मैंने चाल
चली है। समालोचकोंकी इस प्रकारकी निर्दय समा-
लोचनासे मैं दुःखी हूं। मैंने दूकानदारी या दर मुलाई
नहीं की, कूटनीतिसे मुझे घृणा है। मैं एक आदर्श लेकर
खड़ा हूं। बस, यहीं सब शेष है! मैं जीवनको इतना
प्रिय नहीं समझता कि उसकी रक्षाकेलिये चालाकीका
आश्रय लूं। मूल्यके सम्बन्धमें मेरी धारणा बाजारकी
धारणासे पृथक है। शारीरिक या वैषयिक सुखकी
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तरुणके स्वप्न
कसौटीपर जीवनकी सफलता या व्यर्थताका निर्णय
किया जा सकता है, इसे मैं नहीं मानता। हमारा संग्राम
शारीरिक बलका नहीं है। वैषयिक लाभ प्राप्तिकेलिये भी
हमारी लड़ाई नहीं है। सेण्टपालने कहा है,—
“हम रक्त मांसके विरुद्ध संग्राम नहीं करते, हमारा
संग्राम उनके विरुद्ध है; जो पृथ्वीके अन्धकारके नायक
हैं, हमारा संग्राम उच्च-पद-प्राप्त अन्यायके विरुद्ध है।”
स्वाधीनता और सत्य ही हमारा आदर्श है, रातके बाद
जैसे दिन आता है, हमारी कोशिश भी वैसे ही सफल
होगी, होगी ! हमारा शरीर नष्ट हो सकता है किन्तु
अटल विश्वास और दुर्जय संकल्पके बलसे हमारी जय
अवश्य होगी। हमारे आदर्शकी सफलता देखनेका सौ-
भाग्य किसे प्राप्त होगा, यह तो भगवान ही जानते हैं।
किन्तु अपने सम्बन्धमे मैं कह सकता हूं, मैं अपना काम
किये जाऊंगा, फिर चाहे जो भी हो।
और एक बात कहकर वक्तव्य समाप्त करता हूं। मैं
स्विटजरलैण्ड जाऊंगा या नहीं यह मैं अभी स्थिर नहीं
कर सकता। शरीरकी वर्त्तमान समयमें जो अवस्था है
उसे देखते हुए स्विटजरलैण्ड जानेका परिश्रम मैं कर
नहीं सकूंगा। फिलहाल भारतके किसी स्वास्थ्यप्रद
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जीवन-लक्ष
〰〰〰〰〰
स्थानमें रहकर मुझे स्वास्थ्यलाभ करना होगा। कितने
दिन बाद स्विटजरलैण्ड जाने लायक शक्ति प्राप्त कर
सकूँगा कुछ ठीक नहीं। जो भी हो डॉक्टरोंका मत है कि
जबतक मैं जरा अच्छा नहीं हो जाता, तबतक स्विटजरलैंड
जानेका सवाल ही नहीं उठ सकता। और भारतके किसी
स्वास्थ्यप्रद स्थानमें रहकर ही यदि मैं स्वास्थ्यलाभ कर
सकूँ या इच्छापूर्वक निर्वासन स्वीकार न करूँ तो
स्विटजरलैण्ड जानेकी जरूरत ही क्या है?
साथ ही साथ स्विटजरलैण्ड जानेका निश्चय करने-
के पहले मुझे अपनी आर्थिक स्थितिके सम्बन्धमें सोचना
होगा। परिवारवालोंके साथ, विशेषकर माता पिताके
साथ इस सम्बन्धमें बातचीत करना होगा। कुछ ही
महिनोंमें बंगालकी राजनैतिक अवस्थामें परिवर्तन हो
सकता है तथा बंगाल सरकारकी धारणा भी परिवर्तित
हो सकती है। किसी तरहका निश्चय करनेके पहले इन
सब बातोंपर विचार कर लेना होगा। जो भी हो, मैं
किसी तरहकी बन्दिश नहीं चाहता, यदि सरकार किसी
तरहकी रोक थाम करना चाहे तो आप लोग बातचीत
बन्द कर दें। ईश्वर महान् है—कमसे कम अपनी सृष्टिसे
महान् अवश्य है। हम जब उसमें विश्वास करते हैं, तब
हमें दुःखी नहीं होना चाहिये।
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तरुणके स्वप्न
मेरे प्रति जो अनुरक्त हैं और सहानुभूति पूर्ण हैं, मैं
उनकेलिये पीड़ाका कारण हूं, इसके लिये मुझे बड़ा दुःख
है। किन्तु यही सोचकर मुझे सांत्वना मिली है कि जो
समान रूपसे मातृभूमिके प्रति आस्था सम्पन्न हैं, वे समान
रूपसे दुःख सुख भोगनेके अधिकारी हैं। आशा है आप
लोग सानन्द होंगे। इति
१२२
निवेदन
फैलसल लाज
शिलांग
१०-८-२७
श्रद्धापूर्वक निवेदन,
जब मैं उत्तर कलकत्ताके निर्वाचन क्षेत्रसे बंगीय
व्यवस्थापिका सभाकेलिये उम्मीदवार खड़ा हुआ
था, तब मुझे मान्डला जेलसे २४ सितम्बरको आपके पास
आवेदन भेजना चाहिये था मगर वह आपके पास नहीं
पहुंचा। अधिकारियोंने चाहे जिस कारणसे हो वह पत्र
आपके पासतक नहीं पहुंचने दिया। उन्होंने साधारण
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तरुणके स्वप्न
आवेदन पत्रको क्यों रोक लिया, यह पूछने पर भी उसका
कुछ उत्तर नहीं मिला। इसके बाद अपने निर्वाचनके विषयमें
व्यक्ति विशेषको मैंने जो पत्र दिये थे, उनमेंसे भी अधिक
अपने लक्ष स्थान तक नहीं पहुंचे। जब मैं जेलमें था तब
एक उच्च कर्मचारीसे सुना था कि अधिकारियोंकी इच्छा
है कि मैं जेलमें रहकर निर्वाचनका काम न चला सकूं।
किन्तु मुझे विश्वास है कि मेरा लिखित निवेदन
आपके पास न पहुंचनेपर भी मेरे आकुल हृदयका मूक
निवेदन आपके पास पहुंच गया होगा। इसीलिये मेरा
निवेदन न सुननेपर भी और अति प्रबल योग्य प्रतिद्वन्दी
होनेपर भी मेरे जैसे अयोग्य आदमीको वोट देकर आपने
निर्वाचित किया है। माण्डला जेलमें रातको दस बजे जब मैंने
कई राजबन्दियोंके साथ निर्वाचनकी सफलताका समा-
चार सुना, उस समय प्रकट रूपसे आपके प्रति कृतज्ञता
नहीं जना सका। किन्तु मेरा विश्वास है कि नदी, नद,
जंगल पारकर मेरे हृदयकी वाणी आपके पासतक पहुंच
गयी होगी।
आपके प्रति विशेष कृतज्ञता प्रकट करनेका कारण यह
है कि जिस अवस्थामें पड़कर मित्रको उसके मित्र भी
पहचान नहीं पाते, ऐसे समयमें, जब कि मैं अधिकारियों
१२४
निवेदन
द्वारा लांछित था, उस समय भी आपने अधिकारियोंकी
पर्वा न कर मुझे सम्मानके उच्च आसनपर बैठाया । मेरे
प्रति ऐसा स्नेह और विश्वास प्रकट कर आपने सिर्फ
मुझे ही धन्य नहीं किया बल्कि सभी राजबन्दियोंको
गौरवमण्डित किया है ।
जेलमें रहते हुए आपके प्रति अपनी आन्तरिक कृत-
ज्ञता प्रकट करनेका अवसर नहीं मिला तथा वर्तमान सम-
स्याके सम्बन्धमें आपका मतामत जाननेका सुयोग भी
नहीं मिला । सोचा था, जब मुक्ति मिलेगी तभी ये दो
कार्य सम्पादन कर सकूंगा । पहले छूटनेकी बिलकुल
आशा नहीं थी, किन्तु जिस दिन अप्रत्याशित भावसे छूटा
उस दिन मैं बीमार और शैयाग्रस्त था । आपके प्रतिनिधि-
की हैसियतसे मेरा जो कर्तव्य है उसे जेलसे छूटनेपर
भी मैं आजतक नहीं कर सका । इच्छा न रहनेपर भी
आपके साथ मुलाकात न करके मुझे यहां आना पड़ा ।
कर्मक्षेत्रमें आनेमें अभी विलम्ब है, पर पहलेसे अब जरा ठीक
हूं, इसलिये निश्चय किया कि कमसेकम पत्र द्वारा अपना
निवेदन प्रकट कर दूं ।
मेरे छुटकारेके बाद आपने मुझे जिस प्रकार अभि-
नन्दित किया है एवं मेरी आरोग्य-कामनाकेलिये जो
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तरुणके स्वप्न
कुछ किया है, उसे मैं भूल नहीं सकता। आपने मुझे सेवा
करनेका अधिकार देकर धन्य किया है, मेरी एकान्त
कामना है कि मैं अपने इस अधिकारका समुचित उपयोग
कर सकूं। आपने मेरे प्रति स्नेह और विश्वास प्रकट कर
मुझे सम्मानित किया है।
पूर्ण रूपसे स्वस्थ होनेमें विलम्ब होनेपर भी आपके
आशीर्वाद और शुभ इच्छाके प्रभावसे मैं आरोग्य लाभ
कर रहा हूं। किन्तु शारीरिक आरोग्य प्राप्त करनेपर भी
मानसिक शान्ति पाना असंभव है। बङ्गालकी इतनी सुयोग्य
सन्तानें जबतक बिना अपराध बन्दी हैं, बिना विचारे
जेलोंमें पीसी जा रही हैं, बङ्गालके असंख्य नर-नारी जबतक
अपने प्रिय जनोंके दुःख कष्ट और लांछनाका ख्याल कर
असह्य हार्दिक वेदनासे दिन रात छटपटा रहे हैं, बङ्गालके
असंख्य घर पिता, पुत्र, पति, भाईके बिना श्मसान तुल्य
हो रहें हैं, तबतक कौन बङ्गाली खा-पीकर सुखसे
सो सकता हैं ? बंगालके गवर्नरने मुझे सूचित किया है
कि इस बार कौंसिलमें उपस्थित न होनेपर भी मेरा नाम
सदस्योंकी सूचीसे न काटा जायगा। मेरे मनमें हो रहा
है कि कौंसिलकी आगामी बैठकमैं जब राजबन्दियोंका
प्रश्न उठे तब वहां उपस्थित होकर अपना कर्तव्य पालन
१२६
निवेदन
करूं। चिकित्सकोंकी अनुमति मिलेगी या नहीं, नहीं
जानता, यदि अनुमति मिल गयी तो कलकत्ता आकर
अपना कर्तव्य पालन करूंगा। कौंसिलकी बैठकमे उपस्थित
हो सकूंगा इस आशासे प्रस्ताव और कुछ प्रश्न तैयार कर
लिये हैं। किन्तु यदि अनुमति न मिली तो जितना जल्द
हो सके आरोग्यलाभ कर जन सेवाकेलिये कर्मक्षेत्रमें आ
जाऊं, इसकी पूर्ण चेष्टा करूंगा। इस समय चारों तरफ
नव जागरणके लक्षण दिखलाई पड़ रहे हैं। राष्ट्रीय जीवन
क्षेत्रमे जो बाढ़ आनेवाली उसका आभास मेरे मनको मिल
गया है, अब यही चाहता हूं कि ठीक समयपर उसके लिये
शरीर और मनसे प्रस्तुत रहूं।
किमधिकम्। मेरी श्रद्धाञ्जलि ग्रहण कीजियेगा।
इति—