तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतर्कभाषाकार केशवमिश्र
बौद्ध, ब्राह्मण तथा जैन तीनों सम्प्रदायों के अपने अपने मत के अनुसार
'तर्कभाषा' इस एक ही नाम से अलग-अलग ग्रन्थ हैं। इनमें से बौद्ध 'तर्कभाषा'
के लेखक मोक्षाकर गुप्त [११००] हैं। यह मोक्षाकर की 'तर्कभाषा' तीनों में
सबसे प्राचीन है। इसमें बौद्धन्याय के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।
ऊपर हमने न्याय साहित्य का जो विवरण दिया है उसमें 'तर्कभाषा' नामक
तीन ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। दूसरी जैन 'तर्कभाषा' के लेखक
जैन विद्वान् श्री यशोविजय [१६८८ ई०] हैं। इसमें जैनन्याय के सिद्धान्तों
का विवेचन किया गया है। और तीसरी 'तर्कभाषा' के लेखक श्री केशवमिश्र
[१२७५ ई०] हैं। इसमें ब्राह्मणों के न्यायसिद्धान्तों का मुख्य रूप से और उसके
साथ ही वैशेषिक सिद्धान्तों का संक्षेप रूप से सम्मिलित विवेचन किया
गया है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा' बौद्ध विद्वान् मोक्षाकर गुप्त की
'तर्कभाषा' के १७५ वर्ष बाद और यशोविजय की जैन 'तर्कभाषा' से लगभग
चार सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी। यह प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या उसी केशव-
मिश्र विरचित 'तर्कभाषा' की हिन्दी व्याख्या है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा'
न्याय के उन प्रकरण ग्रन्थों में से है जिन में मुख्य रूप से न्याय के सिद्धान्तों
का प्रतिपादन करते हुए आनुषङ्गिक रूप से वैशेषिक दर्शन के सिद्धान्तों का भी
समावेश कर लिया गया है।
खेद की बात है कि अन्य ग्रन्थकारों के समान 'तर्कभाषा' के लेखक केशवमिश्र
ने भी स्वयं अपना परिचय देने का कोई प्रयत्न नहीं किया है। इसलिए उनका
देश-काल आदि सब ही कुछ अन्धकार में है। उनका जो कुछ थोड़ा सा परिचय
प्राप्त होता है वह उनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा हमको प्राप्त होता है।
'गोवर्धन मिश्र' ने अपने गुरु श्री केशवमिश्र की इस 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषा-
प्रकाश' नामक एक टीका लिखी है। इस टीका के प्रारम्भ में एक श्लोक
लिखा है जिस से यह विदित होता है कि 'तर्कभाषा' के निर्माता केशवमिश्र
टीकाकार 'गोवर्धनमिश्र' के गुरु हैं। वह श्लोक जो इस गुरुशिष्य-सम्बन्ध को
बतलाता है इस प्रकार है—
विजयश्रीतनूजन्मा गोवर्धन इति श्रुतः।
तर्कानुभाषां तनुते विविच्य गुरुनिर्मिताम् ॥
इस में 'गोवर्धनमिश्र' ने अपना परिचय देते हुए 'तर्कभाषा' को अपने गुरु
की बनाई हुई बतलाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि 'केशवमिश्र' 'गोवर्धन
मिश्र के गुरु थे। इसके आगे 'गोवर्धन मिश्र' ने एक श्लोक और लिखा है जिसमें