तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 66, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीकेशवमिश्रप्रणीता
तर्कभाषा
उपोद्घातः
अथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिता
‘तर्करहस्यदीपिकाख्या’ हिन्दीव्याख्या ।
यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम् ।
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं, तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥
नमो विश्वात्मभूताय पूताय परमात्मने ।
सच्चिदानन्दरूपाय तर्कतत्त्वावभासिने ॥
समुद्गता पूता निगमनगतस्तर्कसरिता,
तता या तन्त्रे तैः सुगतजिनविप्रैस्त्रिपथगा ।
तदस्या धाराणां परिचयकृते सम्यगधुना,
वयं व्याख्याव्याजात्तरिमभिनवां सन्तनुमहे ॥
अनुबन्धचतुष्टय—
मनुष्य एक मननशील प्राणी है । वह सदा विचारपूर्वक कार्य करता है,
‘मत्वा कर्माणि सीव्यति’² इसी से मनुष्य कहलाता है । अतएव मनुष्य उसी
कर्म में प्रवृत्त होता है जिसमें उसे ‘इष्टसाधनता’ और ‘कृतिसाध्यता’ का ज्ञान
हो । ‘इदं मदिष्टसाधनम्’ यह कार्य मेरा इष्टसाधन है, इससे मेरे प्रयोजन की
सिद्धि होगी, और ‘इदं मत्कृतिसाध्यम्’ यह कार्य मेरे प्रयत्न से साध्य है, मैं इस
कार्य को कर सकता हूँ ऐसा जान कर ही मनुष्य किसी काम में प्रवृत्त होता है ।
इस ज्ञान में ‘इदं’ पद से १ ‘विषय’, ‘मत्’ पद से २ ‘अधिकारी’, ‘इष्ट’ पद से
३ ‘प्रयोजन’ और ‘साधनम्’ या ‘साध्यम्’ पद से ४ ‘सम्बन्ध’ इन चारों का ज्ञान
आ जाता है । इसलिए ‘विषय’ ‘अधिकारी’, ‘सम्बन्ध’ और ‘प्रयोजन’ इन
१ अथर्ववेद १०,७,३२। २ निरुक्त ३,१,७।