तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ तर्कभाषा [ शास्त्रप्रयोजनम्
बालोऽपि यो न्यायनये प्रवेशम्,-अल्पेन वाञ्छत्यलसः श्रुतेन ।
संक्षिप्तयुक्त्यन्विततर्कभाषा, प्रकाश्यते तस्य कृते मयैषा ॥
चारों को 'अनुबन्धचतुष्टय' कहा जाता है। 'प्रवृत्तिप्रयोजकज्ञानविषयत्व-
मनुबन्धत्वम्', प्रवृत्ति कराने वाले अर्थात् 'इदं मदिष्टसाधनम्' आदि ज्ञान के
विषय जो; १ विषय, २ अधिकारी, ३ प्रयोजन और ४ सम्बन्ध हैं; वे चारों
'अनुबन्धचतुष्टय' कहलाते हैं। और उनका ज्ञान ही मनुष्य को किसी भी
कार्य में प्रवृत्त कराता है। इसलिए किसी ग्रन्थ के अध्ययन में भी मनुष्य तब
ही प्रवृत्त होता है जब उसे उसके विषय आदि का ज्ञान हो। अतएव ग्रन्थ में
अधिकारी पाठकों की अभिरुचि और प्रवृत्ति हो सके इसके लिए ग्रन्थ के
आरम्भ में ही उसके विषय, प्रयोजन आदि का उल्लेख कर देना आवश्यक है।
इसीलिए प्राचीन संस्कृत साहित्य में सर्वत्र ग्रन्थारम्भ में 'अनुबन्धचतुष्टय' के
निरूपण करने की परम्परा रही है। जैसा कि कहा भी है--
'सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः'१ ॥
अर्थात् विषय, सम्बन्ध आदि का ज्ञान होने पर ही अधिकारी श्रोता
व्यक्ति किसी शास्त्र या ग्रन्थ आदि के श्रवण या अध्ययन आदि में प्रवृत्त होता
है। इसलिए ग्रन्थ के आरम्भ में विषय, सम्बन्ध, अधिकारी, प्रयोजन आदि
का प्रतिपादन कर देना चाहिए ।
इसी मर्यादा का अनुगमन करते हुए इस तर्कभाषा ग्रन्थ के रचयिता श्री
'केशवमिश्र' ने अपने ग्रन्थनिर्माण का प्रयोजन बतलाते हुए ग्रन्थ का प्रारम्भ
इस प्रकार किया है—
जो आलसी [ कठिन परिश्रम न कर सकने वाला ] बालक [ ग्रहणधारण-
पटुर्बालो न तु स्तनन्धयः, अर्थात् जो इस विषय को ग्रहण और धारण कर सके
ऐसा बालक दुधमुँहा बच्चा नहीं ] भी थोड़े से श्रवण [ अध्ययन अथवा गुरुमुख से
श्रवण ] से न्याय [ शास्त्र ] के सिद्धान्तों में प्रवेश [ उनका परिचय प्राप्त करना ]
चाहता है उसके लिए संक्षिप्त युक्तियों से अन्वित यह तर्कभाषा [ ग्रन्थ ] मैं
[ केशव मिश्र ] प्रकाशित कर रहा हूँ ।
१ मीमांसाश्लोकवार्तिकम् १,१७ ।