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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 330 में से

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पृष्ठ 68

नामकरणम् ] उपोद्घातः ३
न्याय के सिद्धान्तों का सरलतापूर्वक परिज्ञान कराना इस ग्रन्थ का प्रयोजन
है। न्याय के प्रतिपाद्य प्रमाणादि षोडश पदार्थ इसके विषय हैं। न्याय-सिद्धान्त
का परिज्ञान प्राप्त करने वाला जिज्ञासु इसका अधिकारी है। और ग्रन्थ का
विषय के साथ प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव तथा अधिकारी के साथ बोध्यबोधकभाव
सम्बन्ध है। इस प्रकार इस श्लोक में 'अनुबन्धचतुष्टय' की सूचना हुई ।
नामकरण—
लेखक ने अपने ग्रन्थ का नाम 'तर्कभाषा' रखा है। यों तो न्यायसूत्रकार ने
अपने षोडश पदार्थों में 'तर्क' नामक एक पदार्थ माना है और उसका लक्षण
'अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः'१ इस प्रकार किया है।
परन्तु तर्कभाषा के टीकाकारों ने 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते, इति तर्काः प्रमाणादयः
षोडश पदार्थाः' । इस प्रकार तर्क शब्द की व्युत्पत्ति की है और उसका अर्थ
प्रमाणादि षोडश पदार्थ किया है। तर्कभाषा के अतिरिक्त श्री अन्नंभट्ट के
'तर्कसंग्रह', श्री जगदीश तर्कालङ्कार के 'तर्कामृत' आदि अन्य ग्रन्थों के टीका-
कारों ने भी 'तर्क' शब्द की इसी प्रकार की व्युत्पत्ति की है। अतएव इस
व्युत्पत्ति के आधार पर 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते, इति तर्काः प्रमाणादयः षोडश
पदार्थास्ते भाष्यन्तेऽनया इति तर्कभाषा'। अर्थात् प्रमाणादि षोडश पदार्थों की
व्याख्या करने वाली पुस्तक होने के कारण इसका नाम 'तर्कभाषा' रखा गया
है और वह सार्थक या अन्वर्थ संज्ञा है।
न्यायसूत्रकार ने 'कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः' यह जो तर्क का
लक्षण किया है उसके अनुसार किसी तत्त्व के निर्णय के लिए कारणों और
युक्तियों से ऊह अर्थात् अनुसन्धान का नाम तर्क है। आत्मा आदि विशेष
विवादग्रस्त विषयों में तत्त्व निर्णय के लिए न्याय दर्शन ने विशेष रूप से
युक्तियों और कारणों से ऊहापोह की है, और यही उसका प्रधान विषय रहा है
इसलिए न्यायशास्त्र का नाम ही 'तर्क' अथवा 'तर्कशास्त्र' हो गया है। इसी
प्रसङ्ग से न्याय में अनुमान, उस में प्रयुक्त होने वाले शुद्ध हेतुओं, तथा अशुद्ध
हेतुरूप हेत्वाभास, आदि की विशेष विवेचना की गई है। और तत्त्व-निर्णय
के लिए होने वाली कथाओं के 'वाद', 'जल्प', वितण्डा' आदि भेद कर के
उनके नियम और 'निग्रहस्थान' आदि का विशेष वर्णन किया गया है। इस-
१ न्यायसूत्र १,१,४०।