सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

विषय सूची lxxxix
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
चन्द्र के क्षय वृद्धि में प्राचीन मत में भूल ४४
उपनिषद् प्रमाण से सूर्य आदि का बिम्ब,
कक्षा का मान ४७
चन्द्र कक्षा और बिम्ब का छोटा होना ५५
भूकक्षा का निर्णय ५६
तारा बिम्ब का कारण ५९
शंकु छाया से वृक्ष पर्वत आदि की ऊंचाई ७०
एक शंकु तथा दो शंकु की विधि ७६
पर्वत का दृश्य और अदृश्य भाग ७९
सूर्य चन्द्र की छाया द्वारा घर आदि की ऊंचाई ८०
मेघ की ऊंचाई ८३
पृथ्वी की गोलाई जानने के लिये
शंकु का उपयोग ८६
क्षितिज वृत्त ८७
दृष्टि सीमा के अनुसार पर्वत की दृश्यता ८८
पर्वत पर सूर्य का जल्दी उदय और
देरी से अस्त ९६
उसका व्यावहारिक अर्थ ९८
ग्यारह प्रकार के शंकुओं की दृष्टि सीमा १००
शंकु दृष्टि सीमा का निर्णय १०१
दृष्टि सीमा के शंकु की ऊंचाई १०२
प्राचीन मत से होरा दिन, मास
और वर्ष के पति १०३
सूर्य आदि की दृष्टि सीमा ११४
आकाश कक्षा का मान ११९
उसमें अन्य मतों का खण्डन १२०
वेद पुराण मत का समाधान १२३
स्तुति तथा उपसंहार १२४-१२५
बीसवां प्रकाश – यन्त्र वर्णन ३३९-३५८
यन्त्र की आवश्यकता १
दो प्रकार के गोल यन्त्र २
एक की प्राचीनता तथा दूसरे की नवीनता ३

सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
निर्माण के पूर्व ग्रह पूजा की आवश्यकता ४
भूगोल और मेरुदण्ड ६
निर्माण और स्थापन ८
आधार कक्षा और क्षितिज वृत्त जोड़ना ११
नाड़ी वलय और द्युरात्रि वृत्त बान्धना १४
दो फलकों का न्यास १६
अक्षांश वलय लगाना १७
उनको स्थिर करना अपमण्डल बान्धना २०
स्वस्तिक निर्णय २२
विमण्डल तथा उन्मण्डल बान्धना २३
क्षितिज वृत्त सबसे बड़ा २७
भूगोल बनाने के बाद ग्रह नक्षत्र लगाना २९
ग्रह वलन और प्रवह गति ३०
लंका और ख स्वस्तिक की स्थिति ३१
सभी ६ वृत्तों में खगोल रचना ३२
सममण्डल तथा दृङ्मण्डल का योग ३३
गोल स्थापन की विधि ३४
चक्रार्द्ध दर्शन तथा गोल भ्रमण ३९
प्राचीन मत से एक कक्षा यन्त्र ४२
नया बहु कक्ष यन्त्र ४४
ग्रह चलन देखने के लिए बहुकक्ष यन्त्र ४५
घन चक्र जोड़ी लगाना ४६
भू चन्द्र की स्थिति ५०
अन्य ग्रहों की स्थिति ५१
सूर्य के चारों ओर ग्रह भ्रमण ५३
ग्रह कक्षा का अंगुल मान ५७
ग्रह चक्र के लिये यष्टि ६१
वलयों में अन्तर कम या अधिक करना ६२
यष्टि चलाने की विधि ६३
भूकक्षा में ग्रह देखने की विधि ६६
अन्य प्रकार से भूकक्षा निर्माण ६७
सीधी तथा वक्र गति देखना ७२

विषय सूची xci
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
काल यन्त्र ७६
चक्र आदि नाम ७७
गोलार्द्ध यन्त्र ७८
मान यन्त्र ८२
उससे ग्रह और नक्षत्र की दूरी जानना ८३
उससे मेघ की ऊंचाई जानना ८८
उससे पर्वत आदि का मान जानना ८९
शीशे के बर्तन आदि का प्रयोग ९४
कपाल यन्त्र ९७
स्वयं वह यन्त्र तथा उसका भ्रमण १००
गोल भ्रमण में पाश का अन्तर १०८
गोल ज्ञान का फल ११०
कृतघ्नों को रहस्य नहीं कहना १११
स्तुति तथा उपसंहार ११२-११३
एकविंश प्रकाश – बाकी रहस्य ३५९-३९६
प्रश्नोत्तर रूप में वासना वर्णन १
उन्मण्डल २
चर अनुसार दिनमान में अन्तर ३
गोल के अनुसार उदय अस्त ४
दिन रात्रि का ह्रास वृद्धि ६
विभिन्न स्थानों में दिन रात्रि का मान ७
देव और असुरों की दिन रात्रि ९
ब्रह्मा का दिन १४
पितर दिन १६
लग्न और अस्त लग्न १८
राशियों के लग्न में अन्तर २०
गोल भ्रमण के द्वारा व्याख्या २२
कहां कौन राशि सदा दिखायी देगी २३
ग्रहों की योजन गति की समता का खण्डन २७
गति में तारतम्य २८
शीघ्रफल के कारण ग्रहों की कक्षा केन्द्र में सूर्य ३०
ग्रहों की नैसर्गिक गति ३१

सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
पूर्व सिद्धान्तों के अनुसार भगण संख्या,
उनका आरम्भ ३२
युग भगण को सूक्ष्म करने के लिए
कल्प भगण ३९
भास्कर मत से योग्यता ४०
उसका उपयोग ५०
ग्रन्थकार द्वारा भगण में संशोधन की विधि ५१
भविष्य में भूल शुद्धि की विधि ५४
अयनांश की परीक्षा ७०
वृहस्पति भगण से प्रभव आदि संवत्सर ७१
उसके अनुसार पदकों की तालिका ७६
पदक निकालने की विधि ७७
स्फुटीकरण से पृथ्वी पर दृक् सिद्धि ८३
अन्य लोकों में फल का तर्क ८५
भास्कर मत से फल निकालना ८६
स्फुटीकरण के लिये परिलेख ८७
प्रतिमण्डल भ्रमण का दृष्टान्त ११०
सूर्य चन्द्र का मन्द कर्ण १११
चन्द्र के तुंगान्तर फल का आधार ११५
शीघ्रफल के लिये छेदन ११६
कक्षागति का अंगुल मान
(यन्त्र और परिलेख) १२०
पूर्व सिद्धान्त की गति परीक्षा १३०
स्फूट गति के चार संस्कारों का प्रमाण १४१
परोच्च कल्पना का कारण १४४
भास्कर मत से प्रतिमण्डल बिम्ब का मान १४७
क्रान्ति कम होने का कारण १५२
ग्रहण में लम्बन संस्कार १५३
दृङ्मण्डल में लम्बन और अवनति
आदि का रूप १५४
ग्रास काल का मान आदि १७२
ग्रहण की दिशा का कारण १८१
दो वलनों का कारण १८४
ध्रुव तथा कदम्ब से नापने पर
विक्षेप में अन्तर १९१

विषय सूची xciii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
मेरू का उदय अस्त १९४
शृंगोन्नति का कारण १९७
महापात का कारण १९८
भगण आदि का उपयोग १९९
अक्षांश के अनुसार ऋतुओं का मान २०७
शीत, उष्ण और सम मण्डल २११
मेघ उत्पत्ति २२५
घनमूल की भास्कर विधि २४०
गोल संख्या का घनमूल २४५
स्तुति और उपसंहार २५०-२५३
५. कालाधिकार
द्वाविंश प्रकाश - संवत्सर ३९७-४०८
कालरूप ईश्वर की स्तुति १
काल के दो रूप २
सभी कार्यों में कालरूप ईश्वर का स्मरण ३
काल के विभाग १४
कालात्मा सूर्य १५
संवत्सर आदि शब्दों की उत्पति १६
नौ प्रकार के काल मान २५
चन्द्र मान का निर्णय २७
विभिन्न मासों के कर्तव्य ३६
सूर्य के ८७ दिन आदि का निर्णय ४४
संक्रान्ति पुण्यकाल का निर्णय ४९
पांच प्रकार के वर्षों के सावन दिन आदि ६१
चन्द्र से जल में उल्लास ६५
चन्द्र सतह पर दिन ७६
स्तुति और उपसंहार ७७-७८
त्रयोविंश प्रकाश - पुरुषोत्तम स्तव ४०९-४२६
श्री जगन्नाथ स्तुति प्रतिज्ञा १
उत्कल प्रशंसा २
नीलाद्रि और पुरुषोत्तम ३
पताका तथा ध्वज दण्ड, चक्र ७
कलश और आमला की माला १०

xciv सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
घण्टा और प्रासाद १२
प्राग्रीव वर्णन १३
कल्प वट १४
सप्तमूर्त्ति रूप जगन्नाथ स्तुति १७
श्लेष द्वारा जगन्नाथ और समुद्र स्तुति २१
ब्रह्माण्ड, शिव, गौरी, वाणी, गणेश, सूर्य
और ग्रह साम्य २३
दशावतार स्तुति ३०
उनके अनेक रूपों का कारण ४१
अन्य छन्दों में जगन्नाथ स्तुति ५४
इष्ट प्रार्थना ५६
उपसंहार ५७
चतुर्विंश प्रकाश – उपसंहार ४२७-४५७
कौतुक पञ्जिका १
सूक्ष्म तिथि, स्थूल विधि अन्य विधियां १९
ग्रह निकालना ३२
चन्द्र पात उच्च की सरल विधि, कौतुक
पञ्जिका से लाभ ५०
इस ग्रन्थ के प्रति प्रकाश के विषय ७६
अन्य स्थानों की पञ्जिका बनाना ९२
सौ स्थानों के अक्षांश तथा देशान्तर ९३
दो स्थानों के बीच दूरी निकालना १४०
सूक्ष्मतम क्रान्ति १४२
रवि क्रान्ति और अक्षांश का सूक्ष्म निर्णय १४३
पूर्वजों का वर्णन १४४
ग्रन्थ का समय तथा कृष्णार्पण १४८
ग्रन्थ ग्रहण प्रार्थना १५०
गोल गणित उत्तरार्द्ध समाप्ति १५१
ग्रन्थ समाप्ति १५२
शब्द रूप ब्रह्म की स्तुति १५३
स्तुति और उपसंहार १५४-१५५
परिशिष्ट – पदक ४५९-५१३

श्री कृष्णाय नमः
अविघ्न मस्तु
सिद्धान्त दर्पणः
मध्यमाधिकारः
प्रथमः प्रकाशः
काल वर्णनम्
श्री भूमाधव चक्र चक्रयवनिभृत्तद्भाभिरभ्युज्ज्वलं
श्री कण्ठ प्रमुखाखिला मरशिखा जुष्टांघ्रि पीठोपलम्
श्री नीलाचल मौलि मण्डल महा नीलाय मानं महः
श्री भूमाधरितस्मरं भवतु नः प्रत्यूह हत्युद्यतम् । १ ।
श्री नीलाचल के शिखर भूषण अति नील तेज के युक्त श्री जगन्नाथ हमारे
सभी विघ्न नष्ट करने के लिए सदा उद्यत रहें । श्री जगन्नाथ के साथ श्री (लक्ष्मी),
भू (पृथ्वी), माधव (दुर्गामाधव) चक्र (सुदर्शन चक्र), चक्री (नारायण), बलभद्र
(अवनिभृत्) सुभद्रा-इन सात देवताओं का तेज सम्मिलित है । इन्हें महादेव
(श्रीकण्ठ) के साथ आकर देवता गण पत्थर के रत्न पीठ पर सिर लगाते हैं । १ ।
गांगेय द्युति भंगदांग लतया श्री राधयालिं गितम्
विद्युत्सांगिघना घना घनप घन रुक् प्रेमामृतै का श्रयम् ।
सत्संवित्सुखम क्षर क्षरपरं पूर्णाति पूर्णोत्तमम्
श्रीकृष्णारूय मुपास्महे सुरुचिरं वेदान्तं वेद्यं महः । २ ।
स्वर्ण तेज को भी लज्जित करती हुई श्री राधा की अंगलता के आलिंगन से
(कृष्ण का) श्याम रूप काले मेघ की बिजली के समान शोभित होता है, उस
प्रेम रूपी अमृत का ही एक आश्रय है । यह तेज सत् चित् आनन्द रूप, पंचभूतों
से परे (क्षरपर) अविनाशी, स्वयं पूर्ण होने के कारण अतुलनीय है । २ ।
जयति जगती भर्तुर्धामाद्भुतं परमाणुतां
ययुरपि जगत्कोषा यल्लोम जाल विलावली
यदनिलजल ज्योतिः क्षौणीपराणु गृहोदर-
स्फुर दपि सुरागणैः क्रीडन्निजैरवतारकैः । ३ ।
जगत् के पालक अद्भुत, तेज के परमेश्वर की जय हो, जो परम सूक्ष्म होने
हुए भी रोम-रोम में ब्रह्माण्ड धारण किये हुए हैं । जिन के विराट स्वरूप में पृथ्वी
(मिट्टी) आग, जल, आकाश, पवन पञ्चभूत, सूक्ष्म रूप से फैले हुए हैं, वही
परमात्मा उन्हीं पञ्चभूतों के भीतर देह धारण कर प्रकट होते हैं (अवतार लेते हैं)
उन अवतारों की (क्रीड़ाओं) की देवगण भी गणना नहीं कर पाते ।

२ सिद्धान्त दर्पण
श्री भास्कर प्रभृति खेचर चक्रवालं
नत्वा गुरुम् स्वपितरौ तदनुग्रहाढ्यः
गूढोऽप्य गाढ़ गणक प्रति पत्तयेऽहं
सिद्धान्त दर्पण इति प्रथयामि शास्त्रम् । ४ ।
सूर्यादि ग्रह, अपने गुरु और माता-पिता को प्रणाम कर उनके आशीर्वाद से
मैं सिद्धान्त दर्पण नामक शास्त्र लिखता हूं जिससे कठिन ज्योतिष शास्त्र को अल्प
बुद्धि गणक भी समझ सकें ।
ग्रन्थेऽस्मिन्नधिकार पञ्चकमहं वक्ष्यामि मध्यस्फुट
त्रिप्रश्नातति गोल काल सहितं सांगं स्ववक्रोद्गतैः ।
वाग्यैः क्वापि दिवाकरांश गतितैर्गन्थान्तरोत्थापितै-
रैकार्थ्यात् क्वचिदन्विते सुवितते बोधाय बालावतेः । ५ ।
इस ग्रन्थ में पांच अधिकार (प्रधान अध्याय) हैं - १. मध्य, २. स्फुट,
३. त्रिप्रश्न, ४. विवेचन सहित गोल, तथा ५. काल । ये सभी विभिन्न अध्यायों
में विभक्त हैं । इसमें अपनी रचना, सूर्य सिद्धान्त तथा अन्य ग्रन्थों से उद्धृत श्लोक
भी हैं । एक ही अर्थ के अन्य ग्रन्थ के श्लोकों से बह्ने भी (ज्योतिष न जानने
वाले भी) सहज ही समझ सकते हैं । इस कारण ग्रन्थ विस्तृत हो गया है । ५ ।
नास्ते काला वयव कलना यत्र दृक् शास्त्र सिद्धा
श्रौत स्मार्त व्यवहतिरपि छिद्यते यत्र धर्म्या ।
तस्मा देषा कृतिरनुतववागस्तुवा प्रस्तु तार्था
ग्राह्या दक्षै ग्रहण भगणा द्यत्र संलक्ष्य साक्षात् । ६ ।
यदि काल के अवयव (लिप्ता, दण्ड, दिन, मास, वर्ष आदि ) की गणना
प्रत्यक्ष नहीं जाय तो वैदिक और स्मार्त कर्म धर्म का फल नहीं देते हैं । अतः
विद्वानों द्वारा इस ग्रन्थ की परीक्षा की जाय कि इसकी गणना अनुसार ग्रहण और
भगण आदि दिखते हैं या नहीं, तब इसे स्वीकार करें । ६ ।
प्राक् सिद्धान्त प्रसिद्धा रवि शशि भगण। घस्र मासाब्द संख्या
भूगोल व्यास जीवोपकरण सहिताः सर्वदा सन्ति सत्याः ।
किन्त्वन्येषां ग्रहाणामिह भगण गणस्योच्च पातेषु कक्षा-
बिम्बादीनां विसम्वादत इतरजनैः कल्प्यते ग्रन्थ जातम् । ७ ।
रवि और चन्द्र के भगण, दिन, मास और वर्ष की संख्या (एक कल्प में)
पृथ्वी, उसका व्यास, ज्या तथा कोटिज्या आदि हमेशा सत्य हैं, अतः ये सब
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार ही लिखी गयी हैं । किन्तु अन्य ग्रहों के भगण, उच्च,
पात, शर, कक्षा और बिम्ब आदि का मान समय के साथ बदलते रहते हैं अतः
नये ग्रन्थ लिखे जाते हैं ।
कल्प, वर्ष, मास, दिन आदि की परिभाषा सूर्य और चन्द्रमा की गति के

काल वर्णनम् ३
अनुसार है, अतः दोनों का परस्पर सम्बन्ध अपरिवर्तित है । वर्ष का कुछ भी मान
हो उसमें पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर लगायेगी, या एक दिन में पृथ्वी का अपने
अक्ष पर एक चक्र होगा । पृथ्वी की गति सूक्ष्म ज्ञात होने पर वर्ष और दिन भी
ज्यादा शुद्ध रूप में ज्ञात होंगे पर उनका परस्पर सम्बन्ध वहीं रहेगा । अन्य ग्रहों
की गति उपकरणों की सूक्ष्मता के अनुसार कम या ज्यादा शुद्ध देखी जती है या
गणित की नयी विधि के अनुसार ज्यादा शुद्ध गणना हो पाती है ।
तत्तद् ग्रन्थेषु यस्मिन् न भवति सुमहत्तारतम्यं ग्रहादे-
दृक् सम्वादात् सतथ्यो बहुतरतमतः कथ्यते ऽसावतथ्यः ।
पूर्वाचार्यैस्तदस्मद् ग्रथनमति चिरस्थायि दृक् सिद्ध भावा -
दव्यर्थं भव्य सेव्यं भवतु हि भवितो भावि भूतानभिज्ञाः । ८ ।
पूर्व आचार्यों ने भी कहा है कि नये ग्रन्थों द्वारा साधित ग्रह और उनके देखे
गये स्थान में बहुत कम अन्तर हो तो उन ग्रन्थों को उपयुक्त समझा जाता है ।
किन्तु ज्यादा भेद होने पर उसे बेकार माना जाता है । इस ग्रन्थ द्वारा सिद्ध ग्रह
उसी स्थान में दिखायी देते हैं । अतः मेरा विश्वास है विद्वान् इसे परीक्षा कर
ग्रहण करेंगे और यहां बहुत काल तक उपयोगी रहेगा ।
यदैवदृक् गोचरतां यदेति तदा तदेवाद्रियते हि शास्त्रम्
सद्वासना वार्तिक एवमाह पश्यत् जनानल्य मतीन् नृसिंहः । ९ ।
(भास्कर विरचित सिद्धान्त शिरोमणि) की 'वासना वार्तिक' नामक टीका
में (ज्योतिर्वित्) नृसिंह ने कहा है कि सामान्य लोगों की बुद्धि कम हैं, अतः जो
शास्त्र प्रत्यक्ष होता है उसी की संसार में प्रतिष्ठा होती है ।
शास्त्रे कृते यदि जगद् व्यवहार हेतौ
गम्भीरता भवति तन्निखिल प्रवृत्तिः ।
न स्यातदोऽत्र गणिते सुगमाभिधेये
शब्दस्य पाटव मनादरणीय मेव । १० ।
यदि लोक व्यवहार के लिये शास्त्र लिखना है तो उसमें शब्द और अर्थ की)
गम्भीरतां होने से लोगों की रुचि नहीं होगी । अतः उसमें शब्द प्रयोग की कुशलता
के बदले गणित का सरल वर्णन जरूरी है ।
स्कन्ध त्रयस्य मध्ये गणित स्कन्धो विचित्र एवादौ ।
होरा जातक वेदीयमृते कृत्येषु संशेते । ११ ।
गणित, फलित और मुहूर्त-इन तीन स्कन्धों में ज्योतिष शास्त्र विभक्त है ।
इसमें गणित का स्थान प्रथम है, क्योंकि इसके बिना फलित और मुहूर्त के काम
में सन्देह होता है ।
श्री भास्करोक्त पाटी विमलास्ते तन्मयापि सा नोक्ता
ग्रह गणितारम्भोयं भूयाद् भव्याय भूतानाम् । १२ ।

४ सिद्धान्त दर्पण
श्री भास्कराचार्य ने पाटी गणित (लीलावती) सम्पूर्ण शुद्ध लिखा है अतः
उसे बिना दुहराये मैं ग्रह गणित का आरम्भ करता हूँ जिससे प्राणियों का कल्याण
हो । १२ ।
सिद्धान्त दर्पणेऽस्मिन् सलोचना तां प्रतर्पणे निपुणाः ।
क्वापि क्वापि विशेषम् पश्यते गणितागम ग्रामात् । १३ ।
विद्वान् लोगों की तृप्ति के लिए सिद्धान्त दर्पण में विशेष बातें हैं जो अन्य
सिद्धान्त ग्रन्थों में नहीं है। उसे कृपा देखें ।
श्रुतिर्यज्ञ कर्म प्रवृत्तैव यज्ञ-
क्रियाः काल मासाद्य वैशद्यमापुः
इतः शास्त्रतः कालबोधो यतोऽङ्गे
श्रुते ज्योतिषं प्रोक्तमस्मान् मुनीन्द्रैः । १४ ।
वेद द्वारा लोग यज्ञकर्म में प्रवृत्त होते हैं । यज्ञ कर्म ठीक समय (मुहूर्त) में
ही फल दायक होते हैं । उस मुहूर्त का ज्ञान ज्योतिष शास्त्र द्वारा ही होता है
अतः मुनि लोग ज्योतिष को वेद का अंग कहते हैं ।
आम्नायाख्यपुंसः समजनि नयनं ज्योतिषं शब्द शास्त्रं
वक्त्रं श्रोत्रं निरुक्तं क्रमत इह भुजा नासिके कल्पशिक्षे ।
छन्दः पङ्न्द्वमस्माद् गुरुतर मखिलादंगतो वेदचक्षु
ज्योतिः शास्त्रं समस्तांगभृदपि न यतः कर्मठो नष्टदृष्टिः । १५ ।
वेदरूपी पुरुष के छः अंग हैं-(१) ज्योतिष आंख हैं, (२) व्याकरण रूपी मुंह,
(३) निरुक्त , कान, (४) कल्पशास्त्र, हाथ, (५) शिक्षाशास्त्र, नाक और (६) छन्द,
दोनों पैर । सबअंग होने पर भी बिना आंख लोग काम नहीं कर सकते अतः
ज्योतिष वेद का प्रधान अंग है ।
ज्योतिः सन्दर्भ सर्वङ्कष विषयदमति र्जातक प्रश्न यात्रा
तत्वज्ञ प्राज्ञ गोष्ठी प्रकट गुण घटोऽप्यस्तु लोकस्तुताज्ञः ।
अन्धा सिद्धान्त बोद्धधा न यदि स पुरुषः शोभते नो भतेजः
पुञ्ज व्याप्तापि लुप्तामृत किरणरुचिर्दर्श जातेव रात्रिः । १६ ।
सम्पूर्ण ज्योतिष शास्त्र में निष्णात होकर एवं जातक, प्रश्न, यात्रा आदि तत्व
जान कर विद्वान् मण्डली में ज्योतिषी प्रतिष्ठित हो सकता है, लेकिन यदि वह
गणित रूपी चक्षु से हीन है तो वह चन्द्रमाहीन रात्रि के समान शोभा हीन हो
जाता है । यद्यपि उसमें नक्षत्रों का प्रकाश रहता है ।
यत्र त्रुट्यादि कालः प्रलयचरमकः खेचराणां प्रचारः
प्रश्नाश्चैवोत्तराणि द्विविधगणितमध्यु द्भवो भूतराशेः ।

काल वर्णनम् ५
स्थानं भूभग्रहादे ग्रहण खगयुति ज्या धनुष्कयन्त्र-
क्षेत्रायं गद्यते सद्रणक गणवरै रेश सिद्धान्त उक्तः । १७ ।
श्रेष्ठ ज्योतिषी सिद्धान्त उसे कहते हैं जिस ग्रन्थ में त्रुटि से लेकर प्रलय पर्यन्त
समय की चर्चा है, जिसमें ग्रह गति, प्रश्न, और उनका उत्तर है, जिसमें (पाटी
और बीज) दो प्रकार का गणित हो, जिसमें सृष्टि चर्चा, पृथ्वी नक्षत्र आदि की
कक्षा, ग्रहण और ग्रह योग की आलोचना और ज्या, धनु आदि यन्त्र और क्षेत्रफल
आदि की चर्चा हो।
श्रेष्ठं सर्वश्रुतानां श्रुत मिति कृतिभि ज्योतिर्षं तत्र सारः
सिद्धान्तस्तत्र गोल स्तदवगति कृतो वर्त्तते यत्र मर्त्यः ।
विद्वत्पूज्यः सदेशः सकल कलुषहृद् धर्म शम्र्माश्रयः स्याद् -
यत्रास्ते नैष तस्मिन् पशु चरित परे पाप जो यन्त्रतापः । १८ ।
शास्त्रज्ञ धार्मिक लोग कहते हैं-सभी शास्त्रों में ज्योतिष श्रेष्ठ हैं। ज्योतिष में
सिद्धान्त और सिद्धान्त में भी गोल श्रेष्ठ हैं। जहां गोल जानने वाले विद्वान् रहते
हैं उस देश की विद्वान् पूजा करते हैं, वहां पापनहीं रहता, धर्म और सुख उस
देश में आश्रय लेते हैं। जहाँ गोलज्ञ विद्वानों का अभाव वहां पशुप्रवृत्ति (आहार,
निद्रा, भय और मैथुन) बढ़ जाते हैं। अतः पाप जनित कुप्रभाव उस देश को नष्ट
कर देते हैं।
यशश्च तुर्वर्ग फलप्रदं श्रुतं पवित्रमेतत्पठनीय मेवतत्
अहर्पति प्राह रह स्यनित्यतः प्रदेयमेतत्प्रवणाय साधवे । १९ ।
यह शास्त्र यश और चतुर्वर्ग फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देता है,
पवित्र और पठनीय भी है अतः सूर्य ने (सूर्यांश पुरुष ने मयासुर को सूर्य सिद्धान्त
का उपदेश दिया था) इस शास्त्र को गोपनीय कहा जिसे केवल सज्जन और
विनयी पुरुष ही पढ़े।
पूर्वार्द्धे कालमहर्गण भगण खग ज्यादि विस्पष्टतेषु
त्रिप्रश्न प्रग्रहोहु ग्रहसमिदुदयास्तेन्दु शृंगातिपातान् ।
अन्त्ये भागेऽनुपयोगोत्तर विविध मत व्यक्ति सृष्टयन्तगोल
क्ष्मा कक्षा यन्त्र वर्षा च्युतुनुति कुतुका न्यत्र पश्यन्तु सन्तः । २० ।
इस ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध में काल परिमाण, अहर्गण, भगण, ग्रह आनयन ज्या
कोटिज्या आदि, स्पष्ट, शर, त्रिप्रश्न, ग्रहण, ग्रहयुति, नक्षत्र, युति, उदय और
अस्त, चन्द्र शृंगोन्नति और अति पात है।
उत्तरार्द्ध में प्रश्न, उत्तर, नानामत चर्चा, सृष्टि और उसका लय, गोल, पृथ्वी,
कक्षा, यन्त्र, देश-विदेश, जगन्नाथ स्तुति और कौतुक पंजिका की आलोचना है।
इसे सज्जन लोग देखें।

६ सिद्धान्त दर्पण
यत्तेज क्षुब्धमाया जनित महदहंकार तन्मात्र भूतोद्
भूताण्डाधीश नाभ्युद्भव भुवन मयाऽम्भोजगर्भात्स्वयं भू ।
भूत्वा भूतेर्भूतानि त्रिभुवन भवनान्या रचश्या स्वधाम्नि
ध्यायं ध्यायं यमास्ते स जयति परम ब्रह्मधामादि देवः । २१ ।
जिसके तेज से क्षुब्ध हो प्रकृति ने महत्तत्व को जन्म दिया, महत्तत्व से
अंहकार और उससे पांच तन्मात्रा, पांच, महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और
आकाश), एकादश इन्द्रियां (पांच, कर्मेन्द्रियां, पांच ज्ञानेन्द्रियां और मन) होते हैं,
उस ब्राह्माण्ड के स्वामी के नाभि कमल से उत्पन्न स्वयंभू ब्रह्मा पंचभूतो के संयोग
से तीन भुवनों की रचना करते हैं, और अपने धाम में रह जिसका ध्यान करते
हैं, वह आदि परम ब्रह्म हमारा पालन करें ।
स्रष्टा सृष्ट्वा भचक्रं ध्रुव युगल युतं सम्रहं सन्नियुक्तं
नित्यभ्रान्तावनान्तो भुवि भवि कवि कर्माद्यभिव्यक्ति हेतोः

काल वर्णनम ७
प्राणादिकोऽसौ व्यवहार योग्यो मूर्त्तो न तद् योग्यतया स्थितोयः
त्रुट्यादि कोऽमूर्त्त इतीरितोऽयं शीघ्रेरितात्यन्त सताग्र सूच्या । २५ ।
काल के प्राण आदि रूप मूर्त हैं । अत दैनन्दिन व्यवहार में आते हैं । जिस
काल का व्यवहार में नहीं लाया जाय वह त्रुटि आदि-अमूर्त काल हैं ।
स्या द्यावतोद्यन्नलिनीदलस्य वेधस्त्रुटिः सैव शतेन (१००) तासाम् ।
एको लवस्तत्पर नामकोऽसौ त्रिंश (३०) ल्लवैरेक निमेष भक्तः । २६ ।
एक कोमल कमल पत्र को तेज छुरी से काटने में जितना समय लगता है
उसे त्रुटि कहते हैं । १०० त्रुटि को एक लव या तत्पर कहते हैं। एक निमेष ३०
लवों में विभक्त है (निमेष = पलक झपकाना)
तैरूच्यतेऽष्टोदश (१८) भिश्च काष्ठा
सार्द्धान्विता स्याद् गुरुवर्ण कालः ।
तैः खेन्दुभिः (१०) प्राण उदीरि तस्तद्-
[L

८ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्रतिथि में विभक्त है । एक संक्रान्ति सेअगली संक्रान्ति तक का समय सौरमास
कहलाता है ।
तद्विएवस्तरो ऽप्युत्तर भाग वाच्योऽर्क (१२) संख्यैः स्तपनस्य मासैः ।
स्यात्सौर संवत्सर एष दिव्यं दिनं तथा दानुज मित्यवेतः । ३१ ।
इन नाक्षत्र, सावन, तिथि, सौर आदि मास का विस्तृत विवरण ग्रन्थ के
उत्तरार्द्ध में है । १२ सौर मास का एक सौर वर्ष तथा एक सौर वर्ष का एक दिव्य
या आसुर दिन होता है ।
देवासुराणां दिन रात्रि भोगो विपर्यये णार्क गति प्रभेदात्
तेषान्तु षष्ट् युत्तरयात्रिशत्या (३६०) दिव्यं भवेदासुर मेव वर्षम् । ३२ ।
सूर्य की उत्तर और दक्षिण गति के कारण देवता असुरों का अहोरात्र होता
है । (सूर्य ६ मास उत्तरी गोलार्द्ध में रहने पर उत्तर ध्रुव में दिन एवं दक्षिणी ध्रुव
में रात होती है । जिसे देवताओं का दिन और असुरों की रात कहते हैं) । ३६०
दिव्य या असुर दिनों का १

काल वर्णनम् ९
मन्वन्तरं चन्द्र महीध्र (७१) संख्यैर्महायुगै सत्ययुगप्रमाणः (१७,२८,०००)
सन्धिस्तदन्ते जलसम्प्लवारूयः सर्वादिमः स्यात् खलुसन्धिरेकः । ३६ ।
७१ महायुग के एक मन्वन्तर होता है । प्रत्येक मन्वन्तर के अन्त में सत्ययुग
के बराबर एक सन्धि होती है । जल प्रलय के बाद जब जन सृष्टि का प्रारम्भ
होता है तो पहले मन्वन्तर के पहले भी एक सन्धि (सत्ययुग के बराबर ) होती
है ।
शरेन्दु (१५) भिः सन्धिभिरन्वितैस्तैर्मन्वन्तरैः स्यादशभिः चतुर्भिः (१४)
दिनं विधेः कल्प इति श्रुतं तद् युगैः सहस्रेण मितं निशापि । ३७ ।
१५ सन्धियों से विभक्त १४ मन्वन्तरों का ब्रह्म का एक दिन होता है जिसे
कल्प कहते हैं । इसमें १००० (महायुग या) युग (१४ मन्वन्तर X ७१ युग + १५
सत्य युग x ४/१० युग) होते हैं । इतने ही (१००० युग ) समय की ब्रह्मा की
रात्रि होती है ।
तावत्प्रमाकल्पयुगं द्युरात्रिमित्थं समाना शतमायुरस्य ।
परामहाकल्प इतीरितं तत् परार्द्ध माद्यं किल नाम पाद्म्यम् । ३८ !
इस प्रकार दो कल्पों का ब्रह्मा का अहोरात्र, इस अहोरात्र का जो वर्ष होगा
(३६०x२ कल्प) वैसे १०० वर्ष की ब्रह्मा की आयु है जिसे महाकल्प या परा कहते
हैं । पहले परार्द्ध (५० ब्रह्मवर्ष) का नाम पाद् म्य था ।
वराहमदूर्ध्वन्व परम्पराया वदन्त्यदः कल्पयुगञ्च विज्ञाः ।
अजादिगत्वात्समयस्य नाहं जाने व्यतीताः कत लोकनाथाः । ३९ ।
दूसरे परार्द्ध का नाम वराह है । काल अनादि है अतः कितने ब्रह्म बीत चुके
यह नहीं कहा जा सकता ।
प्रवर्त्तमानस्यविधेरिदानीं व्यतीतमर्धं परमायुषोऽस्य
अत्रा दिमे शेष दलस्य घस्रे ससन्धयः षण्मनवोऽव्यतीताः । ४० ।
वर्तमान ब्रह्मा के परार्द्ध का प्रथम दिन चल रहा है जिसमे सन्धि सहित ६
मनु बीत चुके ।
स्वायम्भुवः प्राङ् मनुराविरासीत् स्वारोचिषश्चोत्तम तामसौ च
रैवतारूय, खलु चाक्षुषोऽनु वैवस्वतः सप्तम एष आस्ते । ४१ ।
क्रमानुसार ६ मनु बीते हैं । स्वायम्भुव, स्वारोचिषु उत्तम , तामस, रैवत और
चाक्षुष । सप्तम मनु का नाम वैवस्तत है ।
अस्यान्तरे यातवती युगानां सप्ताधिकाविंशति (२७) रन्यतश्च ।
युगाद् गतः सत्य मुखा त्रिपादाः कलेः खसप्तांक महार्णवाब्दाः (४९७०) ।४२।
सप्तम मनु में २७ महायुग बीते तथा २८ वें महायुग में सत्य, त्रेता और द्वापर

१० सिद्धान्त दर्पण
बीत चुके । कलियुग में ४९७० वर्ष बीत चुके (ग्रन्थारम्भ के समय) ।
खाद्र्यंकं नागाब्धि नवाक्षि सप्त नवेन्दवो
(१९७२९४८९७०) ब्रह्म दिनादितोऽमी ।
याताः स्युरेतत् गणितोक्ति काले ख
खाभ्रखाभ्रभ्रकृताब्धिचन्द्रै । ४३ । (१४४००००००)।
इन सबको जोड़ने से ब्रह्म के दिना रम्भ से ग्रन्थ आरम्भ तक १९७२९४८९७०
वर्ष बीत चुके । १४,४०,००० द्वारा
कल्पाब्दसंख्या विहता भवन्ति ।
दण्डादयोऽण्डाधिपधस्र भुक्ताः । (१३।४२।३।४३।२७)।
कल्पाब्द, कार्यं त्विपदेव नैभ्यः
प्रयोजनं खेचर वासराब्दे । ४४ ।
कल्पाब्द संख्या में भाग देने से ब्रह्मा के वर्तमान दिन के दण्ड आदि निकलेंगे
(इनका मान १३।४२।३।४३।२७ । है) कल्प वर्ष का इतना ही प्रयोजन है, उसका
ग्रह दिन आदि निकालने में कोई उपयोग नहीं है ।
उत्पद्य विष्णोः सृजतो दिनादौ ग्रहक्षं गोलादिक मब्जयोनेः ।
त्रयं युगानां चरणत्रयञ्च सार्ध यतः कल्पमुखादद्यासीत् । ४५ ।
नारायण से उत्पन्न होकर ब्रह्मा ने अपने दिन के प्रारम्भ से ग्रह, नक्षत्र, गोल,
भूगोल, देव और दैत्य आदि की रचना शुरू की । इसमें उन्हें तीन महायुग, तीन
युग चरण (सत्य त्रेता तथा द्वापर), चौथे युगचरण (कलि) का आधा समय लगा ।
तत्खाभ्र खाब्ध्यं ग ख सप्त चन्द्रे (१७०६४०००)
रब्दैरवेः कल्प समा विहीनाः ।
सृष्ट्यब्दकाः खाद्रिनवाब्धि नाग-
नागाथबाणां कमुव (१९५५८८४९७०) स्त्विदानीम् । ४६ ।
सौर वर्षों में सृष्टि रचना का समय १,७०,६४,००० हुआ । इन्हें कल्पवर्ष में
घटाने से सृष्टि गताब्द १९५५८८४९७० हुआ ।
कले किल प्रान्त दल प्रवेशे लंकार्ध रात्रे विधिरर्क वारात् ।
प्रवर्तयामास खगभ्रमादि प्रमाणितं चैत्र सितादि कालम् । ४७ ।
(सृष्टि होने पर) कलियुग के शेषार्द्ध आरम्भ होने के समय लंका की आधी
रात को ग्रह नक्षत्र मण्डल को घुमा दिया उस दिन को रविवार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
कहा गया ।
तदादितः खेचरचक्र पर्या (यः) समं समाप्ता निशि तावति क्षणे
पुनः परे द्युर्गत सम्भवक्षणे तथा प्रवृत्तास्तत एव मन्वहम् । ४८ ।
इस प्रकार ग्रह नक्षत्र की गति आरम्भ होने पर, ब्रह्मा का दिन समाप्त होते

काल वर्णनम् ११
ही (ठीक एक कल्प या १००० महायुग के बाद) सभी ग्रह नक्षत्र वहीं पहुंच जाते
हैं जहां से गति आरम्भ हुयी थी । फिर वैसी ही गति आरम्भ हो जाती है ।
इति द्विशो ब्रह्मदिने ग्रहभ्रम प्रपूर्यते तन्निधनेन तत्क्षयः
इदं मतं मेयदुदीरितं बुधैग्रहक्षयः प्रत्यहमेव कैश्चनः । ४९ ।
इस प्रकार ब्रह्मा के अहोरात्र में दो बार ग्रहों का भगणपूर्ण होता है । ब्रह्मा
के विनाश के साथ ही पूरे ज्योतिश्चक्र का नाश हो जाता है । (१०० वर्ष ब्रह्मा के
या ७२,००० कल्प के उतने ही पूर्ण भगणों के बाद)
स्वयम्भुवा सार्धमदर्शनं भुवो भवेदितीदं न विचार चारु मे
भुवा समं प्राकृतिके लये क्षयो मयोच्यते भग्रह लोक रक्षिणाम् । ५० ।
कई पण्डितों का मत है कि ब्रह्मा के दिन आरम्भ से ग्रहों का आरम्भ और
दिन अन्त से ग्रहों का नाश होता है। सिर्फ पृथ्वी का अन्त ब्रह्मा के नाश के बाद
होता है। मुझे यह मत ठीक नहीं लगता, कि प्रतिदिन ग्रहों का नाश होता है ।
फिर भी पृथ्वी नष्ट नहीं होगी )
इदं महायास विसृष्ट मन्य था कथं दिनान्ते विनिहन्तुमुद्यतः ।
विधिग्रहक्षामरणोर्भुवः स्थितौ किमस्ति मानं हि वृहद् भसंहतौ । ५१ ।
प्राकृतिक लय के समय ही पृथ्वी सहित सभी ग्रह नक्षत्र नष्ट होते हैं । यह
मेरा मत है । क्योंकि (ब्रह्म) दिन समाप्त होने पर सिर्फ छोटी पृथ्वी बची रहे और
बड़े बड़े ग्रह नक्षत्र नष्ट हो जायं इसका कोई उपयुक्त कारण नहीं है ।
यथा तथा वा भवतु प्रयोजनं न तद्विरोधत् गदितं प्रसंगतः ।
अमुष्य कल्पस्य दिनैर्ग्रहादिकं महात्मभिः साधयितुं हि युज्यते । ५२ ।
सिर्फ प्रसंग वश इसकी चर्चा हुई, (इसका ग्रह साधन में कोई उपयोग नहीं
है) । ग्रह साधन के लिए वर्तमान कल्प के दिनों की ही गणना की जाती है ।
(बाकी कल्पों के बारे में कुछ भी मत हो, ग्रह साधन में अन्तर नहीं पड़ता ।
(विरोधी मत भास्कराचार्य का है) ।
प्रकृतमनुसरामः सामरस्याच्छ्रुतस्य
भ्रमति सततमश्विन्यादि पौष्णान्त वर्गे ।
य इह खचर भोगः पूर्ण आलोक्यतेऽसौ
भगण इति निरुक्तः पर्यायः चक्र संज्ञाः । ५३ ।
शास्त्र हमेशा अपने उद्देश्य का ही वर्णन करते हैं अतः प्रसंग में आये विषय
को छोड़ मूल विषय की आलोचना आरम्भ होती है । कोई ग्रह कान्ति वृत्त के
अश्विनी से आरम्भ कर रेवती तक गति होने पर उस ग्रह का एक वृत्त पूरा होता
है । इस एक बार पूर्णवृत्त गति को भगण कहते हैं । जिसके अन्य नाम पर्याय
और चक्र हैं ।

१२ सिद्धान्त दर्पण
अर्का (१२) शो भर्गणस्य राशिगृह भक्षेत्रर्क्षनामास्य तु ।
त्रिंशां (३०) शोऽपि लवांश भाग उदितस्तत्षष्ठि (६०) भागः कला ।
लिप्ता तत् खरशांश (६०) कस्तु विकला तत्तत्खषड् (६०)
भागकै र्गत्यर्थं कथिताः पराद्यवयवाः प्राक् सूरिभिर्भूरिशः । ५४ ।
भगण (वृत्त) के १/१२ भाग को राशि कहते हैं । राशि, गृह, भ, क्षेत्र, ऋक्ष
आदि इसी के नाम हैं । राशि का १/३० भाग अंश है । लव और भाग अंश के
अन्य नाम है । अंश के १/६० भाग को कला या लिप्ता कहते हैं । कला के १/६०
भाग को विकला या विलिप्ता कहते हैं । विकला के १/६० भाग और उसके भी
१/१६० भाग को परा, विपरा आदि कहते हैं । प्राचीन आचार्यों ने ये सब नाम
ग्रह गति के वर्णन में प्रयोग किये हैं ।
यः पूर्वत्र परार्द्ध के स्मवसति श्री माधवा रूयां दधद्-
गुप्तः कृत महेन्द्र नीलतनरुक, नीलाचला ग्रस्थले ।
द्वैतीयीक परार्ध केऽधम जनानुद्धर्तु कामः स्फुटं ।
धत्ते दारव धाम मामवतुमा कान्तः स सन्तायतः । ५५ ।
प्रथम (पाद म्य नामक) परार्ध में महेन्द्र नील कान्ति वाले नीलगिरि के शिखर
पर श्री नीलमाधव के नाम से जो वास करते थे, वही द्वितीय परार्द्ध (वाराह) में
पतितों के उद्धार के लिए दारु ब्रह्म रूप में प्रकट हो वहीं रहते हैं, वह लक्ष्मीकान्त
श्री जगन्नाथ मेरा कष्ट दूर करें ।
इत्युत्कलोज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत-
श्रीचन्द्रशेखर कृतौ गणितेऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
शुद्धोऽगमत्समयभाक् प्रथमः प्रकाशः । ५६ ।
उड़ीसा के उज्ज्वल राजकुल में जन्मे श्री चन्द्र शेखर के दृक् सिद्ध गणित
ग्रन्थ सिद्धान्त दर्पण को बच्चे भी समझ सकते हैं । उसका प्रथम प्रकाश समाप्त
हुआ ।

द्वितीयः प्रकाशः
भगण आदि का वर्णन
सूर्यज्ञा स्फुजितां पुरोगतिमतो कोटिघ्न दन्ताब्धयः (४,३२, ००,०००)
कल्पेस्युर्भगणाः शनिज्य कुभुवां ते चैव शीघ्रोच्चजाः ।
खाभ्राभ्रांगसुराग्नि मार्गण गिरि ग्रावेषवः (५७,७५,३३,३६, ०००) शीतगो
रादित्य क्षितिभू नगाष्ट रसगो दृक् बाहवो (२९,९६,८७,११,१२) भूभुवः । १ ।
एक कल्प में सूर्य के पश्चिम से पूर्व के भगण ४,३२,००,००, ००० हैं ।
(कोटि = १ करोड़, दन्त = ३२, अब्धयः = ४ समुद्र) यही भगण बुध और
शुक्र के (अस्फुजित) के हैं । मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्च यही है ।
चन्द्र (शीतगः) के एक कल्प के भगण ५७, ७५, ३३, ३.३, ३६,००० है ।
(ख = ०, अभ्र = ०, अंग = ७, सुर = ३३, अग्नि = ३, मार्गण (बाण) = ५,
गिरि = ७, ग्रौ = ७, इषवः (बाण) = ५) ।
मंगल के एक कल्प के भगण २, २९, ६८, ७१, ११२ है ।
(आदित्य = १२, क्षिति, भू = १, नग = ७, अष्ट = ८, रस = ६, गो (इन्द्रिय)
= ९ दृक् (आंख), बाहवो (बाहु) = २) ।
क्विन्द्राद्यंग नवांग राम नववाज्यब्जा (१७,९३,६९,६७,१४१) ज्ञशीघ्रोच्चजा
बाणाभ्रेक्षण बाणबाण धरणी वेदर्तु रामाः ( ३६,४१,५५,२०५) गुरोः
षष्ट्यष्टा द्विशराक्षि दृक् भुजनभः शैला (७,०२,२२,५७,८६०) मृगोः शीघ्रजा ।
भूपाद्र्यं क कृतांग षट्क मनवः (१४,६६,४९,७१६) सौरैर्मताः पर्ययाः । २ ।
बुध (अज्ञ) के शीघ्रोच्च का कल्प भगण (१७,९३,६९,६७,१४१ ) है । (कु
(पृथ्वी) = १ख इन्द्र = १४ प्रति मन्वन्तर ) अद्रि (पर्वत) = ७, अंग = ६, नव
= ९, राम = ३, वाजि (अश्व) = ७ सूर्य रश्मि) अब्ज चन्द्र = १, गुरु का
कल्प भगण (३६, ४१, ५५, २०५) हैं ।
शुक्र शीघ्रोच्च का कल्प भगण (७, ०२, २२, ५७, ८६०) हैं । शनि का कल्प
भगण (१४, ६६, ४९, ७१६) है ।
सूर्यात्पूर्वग मन्दतुंग भगणाः पाथोधिरामाग्नयः. (३३४)
शून्यऽम्भोधि नवाद्वि रुद्र भुजग स्तम्पेरमाम्भोधय, ( ४८,८१,१७,९४० ।
पूर्णेन्दुज्वलनाः (३१०) खचन्द्रनिगमा (४१०) बाणाभ्रनागा (८०५) कुभृत्
पञ्चेषु प्रमिताः । (५५७) खसमय (७०) इति ज्ञेया पदच्छेदतः । ३ ।
पूर्व से पश्चिम की तरफ सूर्य के मन्दोच्च के कल्प भगण ३३४ हैं । चन्द्रमन्दोच्च
के कल्प भगण (४८, ८१, १७, ९४०) हैं । मंगल मन्दोच्च का (३१०) बुध मन्दोच्च
(४१०), गुरु मन्दोच्च (८०५), शुक्र मन्दोच्च (५५७) तथा शनि मन्दोच्च (७०) है ।

१४ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्रात् पश्चिम गामि पात भगणा रामाग्नि शून्याष्टगो
चक्षुः पक्ष गुणेक्षणानि (२३,२२,९८,०३३) फणभृत् नन्देक्षणानि (२९८) क्रमात्
पक्षाक्षाक्षमताः (२२२) खचन्द्र वसुधा (११०) बाणाब्धि नन्दाः (९४५) शरा
कूपारेषव (५४५) ईरिता न तु रवेः पाततः कदाचिद्भवेत् । ४ ।
(सूर्य क्रान्ति वृत्त में रहने के कारण उसके कक्षा पात का भगण नहीं है ।)
चन्द्र कक्षापात का कल्प भगण (२३,२२,९८,०३३) मंगल का (२९८) बुध का
(२२२), गुरु का (९४५) शुक्र का (११०) तथा शनि का ५४५ है ।
भचक्र पश्चाद् भ्रम सम्मितार्क्ष घस्रा विधातु र्दिवसे भवन्ति
खशून्य शून्याष्ट भुजाष्टशैल रामाक्षि पक्षाष्ट शरेन्दु संख्याः
(१५,८२,२३,७८,२८,०००) । ५ ।
एक नक्षत्र के प्रथम उदय से अगले उदय के समय को नाक्षत्र दिन कहते
हैं । एक कल्प में (१५,८२,२३,७८,२८,०००) नाक्षत्र दिन होते हैं ।
विवर्जिता यद्भगणैर्भवेयुस्तत्तद्ग्रह क्षौणि दिनानि तानि
दिवाकरोयैर्भगणैर्विहीना श्रान्द्रा भवन्त्येषधिनाथ मासाः । ६ ।
ग्रह के प्रथम उदय से द्वितीय उदय तक समय को उस ग्रह का सावन दिन
कहते हैं । नाक्षत्र दिन संख्या से ग्रह भगण संख्या घटाने से ग्रह सावन दिन
संख्या मिलती है । चन्द्र भगण से सूर्य भगण घटाने पर चान्द्र मास संख्या मिलती
है ।
सूर्यस्यमासैः परिवर्जितास्ते कल्पेधिमासाः स्यु रथेन्दु मासाः
खराम (३०) निघ्नाः विधुवासरास्ते तिथिक्षयाः सावन वासरोनाः । ७ ।
कल्प की चान्द्र मास संख्या से सूर्य मास संख्या (सूर्य भगण x १२)
घटाने से कल्प की अधिमास संख्या (चन्द्र भगण-सूर्य भगण x १३) आती
है । कल्प के चान्द्र मास संख्या को ३० से गुणा कर (चान्द्र तिथि) उससे सावन
दिन घटाने पर कल्प का तिथि क्षय होता है ।
मासारवेः कोटिहताः कृताष्ट चन्द्रेषवः (५१,८४,००,००,०००)
कैरव बान्धवस्य ।
खखाभ्रषड् वह्नि गुणाग्निराम पाथोधिरामेन्द्रिय
(५३,४३,३३,६,०००) सम्मिताःस्युः । ८ ।
एक कल्प में सौर मास संख्या (५१,८४,००,००, ०००)
एक कल्प में चान्द्र मास संख्या (५३,४३,३३,३६,०००)
पूर्णपूर्ण गगनांग निर्जर त्र्यंक बाणविधवो (१,५९,३३,३६,०००) ऽधिमासकाः ।
खाभ्र खाभ्र ख ख खाभ्र दृक् शरार्थेन्द्रियेन्दब
(१५,५५,२०,००,००,०००) इहार्कवाशराः । ९ ।