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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

काल वर्णनम् ११
ही (ठीक एक कल्प या १००० महायुग के बाद) सभी ग्रह नक्षत्र वहीं पहुंच जाते
हैं जहां से गति आरम्भ हुयी थी । फिर वैसी ही गति आरम्भ हो जाती है ।
इति द्विशो ब्रह्मदिने ग्रहभ्रम प्रपूर्यते तन्निधनेन तत्क्षयः
इदं मतं मेयदुदीरितं बुधैग्रहक्षयः प्रत्यहमेव कैश्चनः । ४९ ।
इस प्रकार ब्रह्मा के अहोरात्र में दो बार ग्रहों का भगणपूर्ण होता है । ब्रह्मा
के विनाश के साथ ही पूरे ज्योतिश्चक्र का नाश हो जाता है । (१०० वर्ष ब्रह्मा के
या ७२,००० कल्प के उतने ही पूर्ण भगणों के बाद)
स्वयम्भुवा सार्धमदर्शनं भुवो भवेदितीदं न विचार चारु मे
भुवा समं प्राकृतिके लये क्षयो मयोच्यते भग्रह लोक रक्षिणाम् । ५० ।
कई पण्डितों का मत है कि ब्रह्मा के दिन आरम्भ से ग्रहों का आरम्भ और
दिन अन्त से ग्रहों का नाश होता है। सिर्फ पृथ्वी का अन्त ब्रह्मा के नाश के बाद
होता है। मुझे यह मत ठीक नहीं लगता, कि प्रतिदिन ग्रहों का नाश होता है ।
फिर भी पृथ्वी नष्ट नहीं होगी )
इदं महायास विसृष्ट मन्य था कथं दिनान्ते विनिहन्तुमुद्यतः ।
विधिग्रहक्षामरणोर्भुवः स्थितौ किमस्ति मानं हि वृहद् भसंहतौ । ५१ ।
प्राकृतिक लय के समय ही पृथ्वी सहित सभी ग्रह नक्षत्र नष्ट होते हैं । यह
मेरा मत है । क्योंकि (ब्रह्म) दिन समाप्त होने पर सिर्फ छोटी पृथ्वी बची रहे और
बड़े बड़े ग्रह नक्षत्र नष्ट हो जायं इसका कोई उपयुक्त कारण नहीं है ।
यथा तथा वा भवतु प्रयोजनं न तद्विरोधत् गदितं प्रसंगतः ।
अमुष्य कल्पस्य दिनैर्ग्रहादिकं महात्मभिः साधयितुं हि युज्यते । ५२ ।
सिर्फ प्रसंग वश इसकी चर्चा हुई, (इसका ग्रह साधन में कोई उपयोग नहीं
है) । ग्रह साधन के लिए वर्तमान कल्प के दिनों की ही गणना की जाती है ।
(बाकी कल्पों के बारे में कुछ भी मत हो, ग्रह साधन में अन्तर नहीं पड़ता ।
(विरोधी मत भास्कराचार्य का है) ।
प्रकृतमनुसरामः सामरस्याच्छ्रुतस्य
भ्रमति सततमश्विन्यादि पौष्णान्त वर्गे ।
य इह खचर भोगः पूर्ण आलोक्यतेऽसौ
भगण इति निरुक्तः पर्यायः चक्र संज्ञाः । ५३ ।
शास्त्र हमेशा अपने उद्देश्य का ही वर्णन करते हैं अतः प्रसंग में आये विषय
को छोड़ मूल विषय की आलोचना आरम्भ होती है । कोई ग्रह कान्ति वृत्त के
अश्विनी से आरम्भ कर रेवती तक गति होने पर उस ग्रह का एक वृत्त पूरा होता
है । इस एक बार पूर्णवृत्त गति को भगण कहते हैं । जिसके अन्य नाम पर्याय
और चक्र हैं ।