सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ सिद्धान्त दर्पण
श्री भास्कर प्रभृति खेचर चक्रवालं
नत्वा गुरुम् स्वपितरौ तदनुग्रहाढ्यः
गूढोऽप्य गाढ़ गणक प्रति पत्तयेऽहं
सिद्धान्त दर्पण इति प्रथयामि शास्त्रम् । ४ ।
सूर्यादि ग्रह, अपने गुरु और माता-पिता को प्रणाम कर उनके आशीर्वाद से
मैं सिद्धान्त दर्पण नामक शास्त्र लिखता हूं जिससे कठिन ज्योतिष शास्त्र को अल्प
बुद्धि गणक भी समझ सकें ।
ग्रन्थेऽस्मिन्नधिकार पञ्चकमहं वक्ष्यामि मध्यस्फुट
त्रिप्रश्नातति गोल काल सहितं सांगं स्ववक्रोद्गतैः ।
वाग्यैः क्वापि दिवाकरांश गतितैर्गन्थान्तरोत्थापितै-
रैकार्थ्यात् क्वचिदन्विते सुवितते बोधाय बालावतेः । ५ ।
इस ग्रन्थ में पांच अधिकार (प्रधान अध्याय) हैं - १. मध्य, २. स्फुट,
३. त्रिप्रश्न, ४. विवेचन सहित गोल, तथा ५. काल । ये सभी विभिन्न अध्यायों
में विभक्त हैं । इसमें अपनी रचना, सूर्य सिद्धान्त तथा अन्य ग्रन्थों से उद्धृत श्लोक
भी हैं । एक ही अर्थ के अन्य ग्रन्थ के श्लोकों से बह्ने भी (ज्योतिष न जानने
वाले भी) सहज ही समझ सकते हैं । इस कारण ग्रन्थ विस्तृत हो गया है । ५ ।
नास्ते काला वयव कलना यत्र दृक् शास्त्र सिद्धा
श्रौत स्मार्त व्यवहतिरपि छिद्यते यत्र धर्म्या ।
तस्मा देषा कृतिरनुतववागस्तुवा प्रस्तु तार्था
ग्राह्या दक्षै ग्रहण भगणा द्यत्र संलक्ष्य साक्षात् । ६ ।
यदि काल के अवयव (लिप्ता, दण्ड, दिन, मास, वर्ष आदि ) की गणना
प्रत्यक्ष नहीं जाय तो वैदिक और स्मार्त कर्म धर्म का फल नहीं देते हैं । अतः
विद्वानों द्वारा इस ग्रन्थ की परीक्षा की जाय कि इसकी गणना अनुसार ग्रहण और
भगण आदि दिखते हैं या नहीं, तब इसे स्वीकार करें । ६ ।
प्राक् सिद्धान्त प्रसिद्धा रवि शशि भगण। घस्र मासाब्द संख्या
भूगोल व्यास जीवोपकरण सहिताः सर्वदा सन्ति सत्याः ।
किन्त्वन्येषां ग्रहाणामिह भगण गणस्योच्च पातेषु कक्षा-
बिम्बादीनां विसम्वादत इतरजनैः कल्प्यते ग्रन्थ जातम् । ७ ।
रवि और चन्द्र के भगण, दिन, मास और वर्ष की संख्या (एक कल्प में)
पृथ्वी, उसका व्यास, ज्या तथा कोटिज्या आदि हमेशा सत्य हैं, अतः ये सब
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार ही लिखी गयी हैं । किन्तु अन्य ग्रहों के भगण, उच्च,
पात, शर, कक्षा और बिम्ब आदि का मान समय के साथ बदलते रहते हैं अतः
नये ग्रन्थ लिखे जाते हैं ।
कल्प, वर्ष, मास, दिन आदि की परिभाषा सूर्य और चन्द्रमा की गति के